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  • शरद पूर्णिमा पर श्रीकृष्ण ने क्यों रचाया था महारास, गोपी बनने के बाद गोपेश्वर महादेव कैसे पड़े प्रसिद्ध

    शरद पूर्णिमा पर श्रीकृष्ण ने क्यों रचाया था महारास, गोपी बनने के बाद गोपेश्वर महादेव कैसे पड़े प्रसिद्ध

    नई दिल्ली । शरद पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में इसी पूर्णिमा की चांदनी रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। श्रीकृष्ण की इस दिव्य लीला को देखने और उसमें शामिल होने के लिए देवता भी उत्सुक थे। ब्रज में प्रचलित एक कथा के मुताबिक, भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ वृंदावन पहुंचे थे। महारास में प्रवेश करने के लिए उन्हें गोपी का रूप धारण करना पड़ा। इसी प्रसंग से भगवान शिव के गोपेश्वर महादेव के रूप में प्रसिद्ध होने की मान्यता जुड़ी है।

    शरद पूर्णिमा की रात वृंदावन की प्राकृतिक सुंदरता और चंद्रमा की चांदनी को महारास की कथा से जोड़ा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का विस्तार से वर्णन मिलता है। धार्मिक वर्णन के अनुसार, शरद ऋतु की एक रात आकाश में पूर्ण चंद्रमा चमक रहा था। वृंदावन में खिले फूलों और यमुना के किनारे बहती शीतल हवा के बीच भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी बजाई।

    बांसुरी की मधुर धुन सुनकर गोपियां उनकी ओर आकर्षित हुईं और उनके पास पहुंच गईं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से अनेक रूप धारण किए, जिससे प्रत्येक गोपी को अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण केवल उसी के साथ रास कर रहे हैं। इस लीला को भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ब्रज में शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

    भगवान शिव के गोपी रूप में महारास में शामिल होने की कथा भी ब्रज की प्रचलित धार्मिक मान्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कथा के अनुसार, भगवान शिव श्रीकृष्ण की इस दिव्य लीला के दर्शन करना चाहते थे। वह माता पार्वती के साथ वृंदावन पहुंचे, लेकिन महारास मंडल में प्रवेश के समय उन्हें रोक दिया गया। मान्यता के अनुसार, वहां श्रीकृष्ण के साथ सखी भाव से लीला में शामिल होने के लिए गोपी रूप में होना आवश्यक था।

    महारास में प्रवेश पाने की इच्छा से भगवान शिव ने गोपी का रूप धारण करने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार, उन्होंने यमुना में स्नान किया और गोपी का रूप लेकर महारास मंडल में प्रवेश किया। वह लीला में इतने मग्न हो गए कि उनका घूंघट हट गया और वहां मौजूद गोपियों को उनके वास्तविक स्वरूप का पता चल गया। भगवान शिव को देखकर गोपियां हंसने लगीं। भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी भक्ति और लीला में शामिल होने की इच्छा से प्रसन्न हुए। इसके बाद भगवान शिव को गोपेश्वर नाम से संबोधित किए जाने की मान्यता प्रचलित हुई। वृंदावन में स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने महारास के माध्यम से गोपियों की मनोकामना पूरी की थी। इस लीला को कामदेव के अहंकार पर विजय से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि रास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया से प्रत्येक गोपी को उनके साथ होने का अनुभव हुआ, लेकिन इस दिव्य प्रसंग में सांसारिक कामना के बजाय भक्ति और समर्पण का भाव प्रमुख रहा।

    कथा में यह भी बताया जाता है कि महारास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अनंत रूप धारण किए थे। चंद्रमा की चांदनी और उस रात के दिव्य वातावरण का वर्णन भी इस प्रसंग का हिस्सा है। शरद पूर्णिमा की रात को लेकर ब्रज में आज भी धार्मिक आयोजन और श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण किया जाता है।

    श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के अध्याय 29 से 33 तक रासलीला का वर्णन मिलता है। इन पांच अध्यायों को रास पंचाध्यायी कहा जाता है। इनमें श्रीकृष्ण की बांसुरी सुनकर गोपियों का उनके पास पहुंचना, उनका अंतर्धान होना, गोपियों का विरह और फिर महारास का प्रसंग शामिल है। शरद पूर्णिमा पर कई श्रद्धालु रास पंचाध्यायी का पाठ या श्रवण करते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार, श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करने से भक्ति भाव और मानसिक शांति की अनुभूति होती है।

  • 8 अक्टूबर को शिव पूजा और पितृ श्राद्ध का विशेष संयोग, गुरु प्रदोष और मासिक शिवरात्रि एक साथ

    8 अक्टूबर को शिव पूजा और पितृ श्राद्ध का विशेष संयोग, गुरु प्रदोष और मासिक शिवरात्रि एक साथ

    नई दिल्ली । 8 अक्टूबर 2026 का दिन धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। गुरुवार को गुरु प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का संयोग बन रहा है। इसी दिन पितृ पक्ष का त्रयोदशी श्राद्ध भी किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत और भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल प्राप्त हो सकता है। इसके अलावा शुक्ल योग, ब्रह्म योग और गुरुवार व्रत भी इसी दिन पड़ रहे हैं। इस तरह 8 अक्टूबर को कई धार्मिक संयोग एक साथ बन रहे हैं, जिसके कारण यह दिन शिव भक्तों और पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    8 अक्टूबर को आश्विन माह का पहला प्रदोष व्रत होगा। आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर की रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 8 अक्टूबर की रात 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। गुरु प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 59 मिनट से रात 8 बजकर 27 मिनट तक बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुरु प्रदोष व्रत रखने और भगवान शिव की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होने का फल मिलता है। इस दिन शिव उपासना करने वाले भक्त व्रत रखकर विशेष पूजा कर सकते हैं।

    इसी दिन मासिक शिवरात्रि का भी संयोग बन रहा है। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तिथि 8 अक्टूबर की रात 10 बजकर 15 मिनट से शुरू होकर 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। निशिता मुहूर्त के आधार पर मासिक शिवरात्रि 8 अक्टूबर को मानी जाएगी। शिवरात्रि की निशिता पूजा का समय रात 11 बजकर 44 मिनट से देर रात 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। शिव भक्त इस अवधि में भगवान शिव की पूजा और आराधना कर सकते हैं।

    8 अक्टूबर को पितृ पक्ष का त्रयोदशी श्राद्ध भी किया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी की उदयातिथि मिलने के कारण उन पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाएगा, जिनका निधन किसी भी महीने की त्रयोदशी तिथि को हुआ हो। श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप मुहूर्त सुबह 11 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 32 मिनट से 1 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। अपराह्न काल दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से 3 बजकर 39 मिनट तक बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण से पितरों की तृप्ति होती है और पिशाच योनि में फंसे पितरों के उद्धार की मान्यता है।

    इस दिन शुक्ल योग भी रहेगा। शुक्ल योग सुबह से देर रात 12 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। इसके बाद ब्रह्म योग शुरू होगा, जिसे भी शुभ योग माना गया है। इसके साथ ही 8 अक्टूबर को इस महीने का दूसरा गुरुवार व्रत भी रखा जाएगा। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा और उपवास करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु की कृपा से दांपत्य जीवन सुखमय होता है, विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और कुंडली में गुरु दोष से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

    8 अक्टूबर की रात भद्रा लगने की बात भी बताई गई है, लेकिन इसे लेकर इस दिन होने वाले धार्मिक कर्मों पर कोई विशेष अहित नहीं माना गया है। गुरु प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, त्रयोदशी श्राद्ध, शुक्ल योग, ब्रह्म योग और गुरुवार व्रत के कारण यह दिन धार्मिक गतिविधियों के लिहाज से खास माना जा रहा है। शिव भक्त इस दिन व्रत और पूजा कर भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं, जबकि पितृ पक्ष के नियमों के अनुसार त्रयोदशी श्राद्ध और तर्पण भी किया जा सकता है।

  • हरतालिका तीज पर नहीं होगी आखिरी वक्त की भागदौड़, पूजा स्थल, सामग्री और श्रृंगार की तैयारी इस क्रम में करें

    हरतालिका तीज पर नहीं होगी आखिरी वक्त की भागदौड़, पूजा स्थल, सामग्री और श्रृंगार की तैयारी इस क्रम में करें

    नई दिल्ली । हरतालिका तीज का पर्व व्रत और पूजा के साथ तैयारियों के लिए भी खास माना जाता है। इस दिन घर की साफ-सफाई, पूजा स्थल की सजावट, शिव-पार्वती की प्रतिमा की तैयारी, पूजा की थाली और श्रृंगार से जुड़े कई काम करने होते हैं। यदि इन तैयारियों को आखिरी समय तक टाल दिया जाए तो व्रत के दिन काफी भागदौड़ हो सकती है। ऐसे में जरूरी कामों को पहले से अलग-अलग चरणों में पूरा करने से दिन को व्यवस्थित रखा जा सकता है।

    सबसे पहले पूजा स्थल और प्रतिमा की तैयारी कर लें। यदि घर में शिव-पार्वती की पूजा के लिए मिट्टी की प्रतिमा बनाई या रखी जाती है, तो उसे पहले से तैयार करके पूजा की जगह पर सजा दें। चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर प्रतिमा को व्यवस्थित रखा जा सकता है। पूजा स्थल के आसपास फूलों या रंगोली से हल्की सजावट भी की जा सकती है। इससे पूजा की जगह पहले से तैयार रहेगी और बाद में इस काम के लिए समय नहीं निकालना पड़ेगा।

    इसके बाद तीज के लिए पहने जाने वाले कपड़ों और श्रृंगार की सामग्री को एक जगह रख लें। साड़ी या पारंपरिक कपड़ों के साथ चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, गहने और दूसरी जरूरी चीजें पहले से तैयार रखना सुविधाजनक रहेगा। यदि मेहंदी लगानी है तो इसे भी पहले ही लगा लेना बेहतर रहेगा। इससे पूजा के समय तैयार होने की जल्दबाजी से बचा जा सकता है।

    पूजा की थाली को भी समय रहते व्यवस्थित कर लेना चाहिए। इसमें फूल, फल, दीपक, धूप, रोली, अक्षत, पान-सुपारी, प्रसाद और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य जरूरी चीजें रखी जा सकती हैं। सारी सामग्री एक साथ रखने और उसे दोबारा जांच लेने से पूजा के दौरान किसी सामान के लिए बार-बार उठने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

    पूजा की सामग्री तैयार होने के बाद पूजा स्थल को एक बार फिर देख लें। चौकी, प्रतिमा और पूजा की थाली को सही जगह पर रखें। यदि फूलों की सजावट या रंगोली बनानी है तो उसे भी इसी दौरान पूरा किया जा सकता है। इस तरह पूजा शुरू होने से पहले सभी जरूरी व्यवस्थाएं पूरी रहेंगी।

    दिन के आखिर में खुद के श्रृंगार की तैयारी करें। साड़ी के साथ पारंपरिक आभूषण, चूड़ियां, बिंदी और सिंदूर को तैयार रखें। सभी चीजें पहले से निकालकर रखने पर शाम के समय एक-एक सामान ढूंढने की परेशानी नहीं होगी और आराम से तैयार होने का समय मिल सकेगा।

    हरतालिका तीज की तैयारियों को सुबह, दोपहर और शाम के कामों में बांटने से पूरे दिन की भागदौड़ कम की जा सकती है। सुबह घर की सफाई और पूजा सामग्री की तैयारी, इसके बाद पूजा स्थल की सजावट और फिर शाम से पहले श्रृंगार की व्यवस्था पूरी की जा सकती है। इससे पूजा के समय जरूरी कामों का दबाव कम रहेगा।

    पूजा की तिथि और मुहूर्त अलग-अलग शहरों में स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए पूजा के समय के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार जानकारी की पुष्टि करना उचित रहेगा। पहले से तैयारी पूरी रखने से हरतालिका तीज के दिन पूजा और अन्य जरूरी काम व्यवस्थित तरीके से किए जा सकते हैं।

  • सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम

    सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम


    नई दिल्ली । 
    हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में की गई शिव उपासना, सोमवार व्रत और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का अलग महत्व होता है। सुहागिन महिलाएं भी पति की सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ इस महीने में विभिन्न व्रत और पूजा करती हैं।

    सावन के दौरान महिलाओं के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद भगवान शिव की पूजा और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत या धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। मान्यता है कि दिन की शुरुआत धार्मिक कार्यों और सकारात्मक विचारों के साथ करने से पूजा के प्रति एकाग्रता बनी रहती है।

    धार्मिक मान्यताओं में सावन के दौरान काले वस्त्रों से परहेज करने की बात कही जाती है। इसके स्थान पर हरे रंग को शुभ माना जाता है। सावन में हरा रंग प्रकृति, हरियाली और सौभाग्य से जोड़ा जाता है। हालांकि इन परंपराओं को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए और अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में इनके पालन का तरीका अलग हो सकता है।

    शिव पूजा से जुड़ी सामग्री को लेकर भी कुछ मान्यताएं प्रचलित हैं। सावन में भगवान शिव को बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा है। वहीं तुलसी, हल्दी और केतकी के फूल को शिव पूजा में अर्पित न करने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है। पूजा सामग्री का उपयोग करते समय श्रद्धालु अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक विधि का भी ध्यान रखते हैं।

    सावन के व्रत के दौरान सात्विक भोजन करने पर विशेष जोर दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मांसाहार और मदिरा से दूर रहने की परंपरा है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन करती हैं। भोजन को लेकर किसी भी प्रकार का व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    सावन के व्रत और पूजा के दिनों में बैंगन, मूली तथा कुछ पत्तेदार सब्जियों से परहेज करने की परंपरा भी बताई जाती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ मौसम संबंधी पारंपरिक कारण भी बताए जाते हैं। बारिश के मौसम में कुछ सब्जियों में कीड़े लगने की संभावना अधिक मानी जाती थी, इसलिए पुराने समय से इनके सेवन को सीमित करने की परंपरा विकसित हुई।

    मासिक धर्म को लेकर भी कुछ पारंपरिक धार्मिक नियम बताए जाते हैं, जिनमें शिवलिंग को स्पर्श न करने की मान्यता शामिल है। हालांकि यह धार्मिक परंपरा का विषय है और अलग-अलग परिवारों तथा समुदायों में इसके पालन के तरीके भिन्न हो सकते हैं। इस दौरान महिलाओं के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

    सुहागिन महिलाओं के लिए सावन में मंगली गौरी, शिवरात्रि और हरियाली तीज जैसे व्रतों का भी विशेष महत्व बताया जाता है। वहीं अविवाहित लड़कियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से सावन के सोमवार का व्रत रखने की धार्मिक परंपरा का पालन करती हैं। सावन का मूल उद्देश्य श्रद्धा, संयम और भगवान शिव की भक्ति से जुड़ा माना जाता है। इसलिए पूजा और व्रत करते समय धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य, स्वच्छता और अपनी क्षमता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

  • सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को, 6 साल बाद बन रहे शुभ संयोग में जानें पूजा विधि और शिव आराधना का सही तरीका

    सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को, 6 साल बाद बन रहे शुभ संयोग में जानें पूजा विधि और शिव आराधना का सही तरीका

    नई दिल्ली ।सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान आने वाले सोमवार को शिव भक्तों के लिए खास महत्व प्राप्त होता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और बेलपत्र, फूल, धतूरा, फल तथा प्रसाद अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस वर्ष सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को पड़ रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस बार सावन के दूसरे सोमवार का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है। उपलब्ध धार्मिक जानकारी के अनुसार, ऐसा शुभ संयोग करीब छह साल बाद बन रहा है। शिव भक्तों के लिए सोमवार और प्रदोष दोनों ही भगवान शिव की उपासना से जुड़े महत्वपूर्ण अवसर माने जाते हैं।

    सावन सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेने की परंपरा है। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करके शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दूध या अन्य पूजन सामग्री से अभिषेक भी कर सकते हैं।

    पूजा के दौरान भगवान शिव को बेलपत्र, शमी, कनेर, धतूरा, चावल और फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आराधना की जाती है। फल, पान, सुपारी और प्रसाद भी पूजा में शामिल किए जा सकते हैं। श्रद्धालु पूरे दिन व्रत रखते हुए भगवान शिव का स्मरण और मंत्र जाप करते हैं।

    भगवान शिव की पूजा में ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है। इसे शिव का सरल और प्रमुख मंत्र माना जाता है। श्रद्धालु पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं।

    सावन सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का संयोग होने के कारण इस दिन शिव आराधना का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। प्रदोष व्रत भी भगवान शिव को समर्पित होता है और प्रदोष काल में शिव पूजा करने की परंपरा है। ऐसे में भक्त सोमवार की पूजा के साथ प्रदोष काल में भी भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।

    इस दिन महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी किया जाता है। मंत्र है, “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥” धार्मिक मान्यताओं में इस मंत्र को भगवान शिव की उपासना से जुड़ा महत्वपूर्ण मंत्र माना गया है।

    सावन सोमवार के अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। कई श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे दिन सात्विक जीवनशैली का पालन करते हैं।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा में दिखावे के बजाय श्रद्धा और भक्ति को महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रद्धालु अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा सामग्री का उपयोग कर सकते हैं। व्रत रखने वाले लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।

    10 अगस्त का दूसरा सावन सोमवार इसलिए विशेष माना जा रहा है क्योंकि इस दिन सोमवार और प्रदोष व्रत का संयोग बताया जा रहा है। श्रद्धालु सुबह से शिव पूजा के साथ दिनभर भगवान शिव का स्मरण कर सकते हैं और प्रदोष काल में भी विधिपूर्वक आराधना कर सकते हैं।

  • समुद्र किनारे स्थित इस पौराणिक शिवधाम का रावण से क्या है गहरा संबंध, जानिए 123 फीट ऊंची प्रतिमा का रहस्य

    समुद्र किनारे स्थित इस पौराणिक शिवधाम का रावण से क्या है गहरा संबंध, जानिए 123 फीट ऊंची प्रतिमा का रहस्य

    नई दिल्ली ।कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के अंतर्गत आने वाले भटकल तालुका में स्थित मुरुदेश्वर मंदिर देश के सबसे प्रमुख और भव्य धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। अरब सागर के तट पर कंदुका पहाड़ी पर स्थित यह पावन धाम अपनी अटूट धार्मिक आस्था, अद्वितीय वास्तुकला और मनोरम प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता है। तीन तरफ से नीले समुद्र से घिरे होने के कारण इस मंदिर परिसर की छटा अत्यंत आकर्षक और अद्भुत दिखाई देती है।

    मुरुदेश्वर मंदिर का पौराणिक इतिहास लंकापति रावण और भगवान शिव के परम पवित्र आत्मलिंग की कथा से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंकाधिपति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के उद्देश्य से अत्यंत कठोर तपस्या की थी। रावण की इस कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे अपना आत्मलिंग प्रदान किया था, लेकिन इसके साथ एक विशेष शर्त भी रखी गई थी कि इसे रास्ते में कहीं भी भूमि पर नहीं रखा जाना चाहिए।

    पौराणिक प्रसंगों के मुताबिक, जब रावण उस दिव्य आत्मलिंग को लेकर अपनी राजधानी लंका की ओर बढ़ रहा था, तब देवताओं ने विशेष परिस्थितियां निर्मित कर दीं। इन्हीं परिस्थितियों के प्रभाव में आकर रावण ने अनजाने में आत्मलिंग को एक स्थान पर जमीन पर रख दिया। इसके बाद लाख कोशिशों के बावजूद वह उस शिवलिंग को दोबारा भूमि से नहीं उठा सका। माना जाता है कि इसी प्रक्रिया में आत्मलिंग के कुछ अंश जिन-जिन पवित्र स्थानों पर गिरे, उनमें मुरुदेश्वर की भूमि भी शामिल थी।

    इस ऐतिहासिक और धार्मिक परिसर की सबसे बड़ी और मुख्य विशेषता यहां स्थापित भगवान शिव की अत्यंत विशाल प्रतिमा है। खुले आकाश के नीचे निर्मित यह प्रतिमा ध्यान मुद्रा में बैठी हुई अवस्था में स्थापित की गई है, जिसकी कुल ऊंचाई 123 फीट बताई जाती है। अरब सागर के किनारे स्थित होने के कारण यह भव्य प्रतिमा काफी दूर से ही श्रद्धालुओं को स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। सूर्य की किरणों के बीच समुद्र की उठती लहरों के साथ इस प्रतिमा का दृश्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

    धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह मंदिर अपनी स्थापत्य कला और वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर में बना विशाल एवं बहुमंजिला गोपुरम, जिसे ‘राजा गोपुरा’ कहा जाता है, यहां की प्रमुख संरचनात्मक पहचान है। श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए इस विशाल गोपुरम की ऊपरी मंजिलों तक जाने की व्यवस्था की गई है, जहां से पूरे मंदिर परिसर, विशाल शिव प्रतिमा और दूर तक फैले अरब सागर का विहंगम दृश्य साफ देखा जा सकता है।

    मंदिर की पारंपरिक नक्काशी और भव्य बनावट में दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला की गहरी छाप नजर आती है। समुद्र, पहाड़ी और मंदिर का यह विहंगम संयोजन यहां आने वाले हर व्यक्ति को एक नया और आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले तीर्थयात्री भी इस पवित्र स्थल के दर्शन कर आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

    आज के समय में मुरुदेश्वर एक बहुत बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है। साल भर यहां देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद लेने आते हैं। महाशिवरात्रि जैसे पावन और बड़े धार्मिक पर्वों पर तो यहां श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ता है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां का शांत समुद्री तट और प्राकृतिक नजारे भी पर्यटकों को निरंतर अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

    संक्षेप में कहा जाए तो मुरुदेश्वर धाम पौराणिक कथाओं, प्राचीन मान्यताओं, दक्षिण भारतीय वास्तुकला और समुद्री सौंदर्य का एक दुर्लभ एवं अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। 123 फीट ऊंची विशालकाय शिव प्रतिमा इस पावन स्थल को एक विशिष्ट पहचान देती है, वहीं रावण और आत्मलिंग से जुड़ी पौराणिक गाथा इसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को और अधिक मजबूत बनाती है।

  • भगवान शिव के भस्म धारण करने की परंपरा का क्या है महत्व, धार्मिक मान्यताओं में छिपा है गहरा जीवन दर्शन

    भगवान शिव के भस्म धारण करने की परंपरा का क्या है महत्व, धार्मिक मान्यताओं में छिपा है गहरा जीवन दर्शन


    नई दिल्ली ।
    सनातन धर्म में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विलक्षण और आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण माना गया है। जहां अन्य देवी-देवताओं को दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित देखा जाता है, वहीं महादेव अपने शरीर पर श्मशान की भस्म धारण करते हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य को दर्शाने वाला एक गहरा दर्शन है।

    वैदिक मान्यताओं के अनुसार भस्म धारण करना इस बात का प्रतीक है कि यह भौतिक संसार अनित्य है। मनुष्य जिस शरीर और सांसारिक वस्तुओं पर गर्व करता है, वे सब अंततः राख में बदल जाने वाली हैं। महादेव इस स्वरूप के माध्यम से मनुष्य को यह सीख देते हैं कि नश्वर चीज़ों से मोह बांधने के बजाय शाश्वत सत्य और आत्मज्ञान की खोज करनी चाहिए।

    पौराणिक संदर्भों में भस्म से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं। एक कथा के अनुसार जब कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तो महादेव ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से उन्हें भस्म कर दिया। इसके बाद उन्होंने उस राख को अपने शरीर पर लगाया, जो वासना और भौतिक इच्छाओं पर पूर्ण विजय का संदेश देती है।

    धार्मिक दृष्टिकोण से अग्नि में जलने के बाद बचा हुआ अवशेष ही भस्म कहलाता है, जिसमें किसी प्रकार की अशुद्धि शेष नहीं रहती। इसीलिए इसे परम पवित्र माना गया है। भगवान शिव इसे अपने अंग पर लगाकर संसार को यह समझाते हैं कि व्यक्ति को अपने भीतर की बुराइयों, अहंकार और वासनाओं को भस्म करके पवित्रता प्राप्त करनी चाहिए।

    सामान्य श्रद्धालुओं के लिए भी विभूति धारण करने का विशेष नियम बताया गया है। जनसामान्य को श्मशान की राख के स्थान पर यज्ञ अथवा विधिवत पूजित भस्म का प्रयोग करना चाहिए। इसे मस्तक पर त्रिपुंड के रूप में लगाया जाता है। यह त्रिपुंड भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार होता है।

    महादेव का यह अलौकिक वेश आज भी हर जीव को समभाव, संयम और वैराग्य का मार्ग दिखाता है। यह संदेश देता है कि जीवन की वास्तविक सुंदरता बाहरी आभूषणों में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और ईश्वर के प्रति समर्पण में निहित है।

  • सावन के पहले सोमवार काशी शिवमय: बाबा विश्वनाथ धाम में चार लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

    सावन के पहले सोमवार काशी शिवमय: बाबा विश्वनाथ धाम में चार लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन


    वाराणसी। सावन के पहले सोमवार पर काशी पूरी तरह शिवमय नजर आई। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम सहित जिले के सभी प्रमुख शिवालयों में तड़के से ही श्रद्धालुओं और कांवड़ियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक और दर्शन के लिए श्रद्धालु रविवार रात से ही कतारों में डटे रहे। सोमवार दोपहर तक करीब चार लाख श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर नया रिकॉर्ड बनाया।

    भोर चार बजे से शुरू हुआ जलाभिषेक
    विश्वनाथ धाम में सुबह चार बजे मंगला आरती के बाद जलाभिषेक शुरू हुआ। मंदिर प्रशासन ने कांवड़ियों का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। पूरी काशी में “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोष गूंजते रहे। श्रद्धालु रातभर बैरिकेडिंग में अपनी बारी का इंतजार करते हुए भजन-कीर्तन और शिव आराधना में लीन रहे।

    प्रमुख शिवालयों में भी उमड़ी आस्था
    काशी विश्वनाथ धाम के अलावा मार्कंडेय महादेव, महामृत्युंजय महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, शूलटंकेश्वर और रामेश्वर महादेव सहित अन्य शिवालयों में भी सुबह से जलाभिषेक के लिए लंबी कतारें लगी रहीं। पूर्वांचल के कई जिलों से पहुंचे कांवड़ियों ने गंगा और गोमती संगम में स्नान कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया।

    40 हजार यादव बंधुओं की ऐतिहासिक जलाभिषेक यात्रा
    चंद्रवंशी गोप सेवा समिति के बैनर तले करीब 40 हजार यादव बंधुओं ने अपनी पारंपरिक जलाभिषेक यात्रा निकाली। 94वें वर्ष आयोजित इस यात्रा की शुरुआत गौरी केदारेश्वर महादेव मंदिर से हुई। श्रद्धालुओं ने लगभग 17 किलोमीटर की यात्रा के दौरान श्रीकाशी विश्वनाथ समेत नौ प्रमुख शिवालयों में जलाभिषेक किया। परंपरा के अनुसार इस बार भी केवल 21 यादव बंधुओं को गर्भगृह में जलाभिषेक की अनुमति मिली।

    कांवड़ शिविरों में गूंजे भजन-कीर्तन
    शहर के चितरंजन पार्क, लक्सा, मंडुवाडीह, मैदागिन समेत विभिन्न स्थानों पर बने कांवड़ शिविरों में रविवार रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु रुके। यहां भजन-कीर्तन, शिव आराधना और विश्राम का सिलसिला चलता रहा। सोमवार सुबह गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए विभिन्न मंदिरों की ओर रवाना हुए। सावन के पहले सोमवार पर काशी में उमड़ी यह आस्था और श्रद्धा एक बार फिर भगवान शिव के प्रति भक्तों की अटूट आस्था का सजीव प्रमाण बनी।

  • मौनी अमावस्या 2026 18 जनवरी को चमकेगी इन 3 राशियों की किस्मत महादेव होंगे मेहरबान

    मौनी अमावस्या 2026 18 जनवरी को चमकेगी इन 3 राशियों की किस्मत महादेव होंगे मेहरबान


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में माघ मास की अमावस्या जिसे मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है का आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। यह दिन विशेष रूप से तप ध्यान और आत्म-चिंतन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस वर्ष मौनी अमावस्या 18 जनवरी रविवार को मनाई जाएगी। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस दिन ग्रहों की स्थिति कुछ राशियों के लिए अत्यंत लाभकारी रहेगी। खासकर कर्क मकर और कुंभ राशियों के जातकों के लिए यह दिन एक वरदान साबित हो सकता है क्योंकि इस दिन भगवान शिव की विशेष कृपा उन पर बरसने वाली है।

    कर्क राशि

    कर्क राशि के जातकों के लिए मौनी अमावस्या का दिन बेहद शुभ और लाभकारी रहेगा। भगवान शिव की कृपा से आपके रुके हुए मांगलिक कार्य संपन्न होंगे और जो कार्य पहले कठिन लग रहे थे वे अब सुगमता से पूरे होंगे। इस दिन के दौरान खासकर बिजनेस और वित्तीय मामलों में सकारात्मक बदलाव आएगा।

    लाभ

    व्यापार में लाभ के प्रबल योग हैं। निवेश के लिए यह समय उत्तम रहेगा और आपको अच्छा रिटर्न मिल सकता है।जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सफलता और समृद्धि की संभावनाएं बन रही हैं।

    उपाय

    मानसिक शांति और मनोकामना पूर्ति के लिए गंगाजल में काले तिल मिलाकर भगवान शिव का अभिषेक करें। यह उपाय आपके जीवन में शांति और समृद्धि लाएगा।

    मकर राशि

    मकर राशि के स्वामी शनिदेव हैं और इनके आराध्य भगवान शिव हैं। मौनी अमावस्या पर यह दिन मकर राशि के जातकों के लिए विशेष रूप से शुभ होगा। इस दिन आपको बड़ी उपलब्धियों की प्राप्ति हो सकती है जिनकी आप लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे। इसके अलावा पार्टनर का सहयोग और समर्थन भी प्राप्त होगा जिससे आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्यों में गति आएगी।

    लाभ

    लंबे समय से अटके हुए काम अब गति पकड़ेंगे। मानसिक तनाव में कमी आएगी जिससे जीवन में शांति और संतुलन स्थापित होगा। पार्टनर और सहयोगियों से पूरी मदद मिलेगी।

    उपाय

    इस दिन काले तिल का दान करना आपके लिए विशेष रूप से लाभकारी रहेगा। इससे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होगा और कार्यों में सफलता मिलेगी।

    कुंभ राशि

    कुंभ राशि के जातकों के लिए भी यह मौनी अमावस्या बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। ग्रहों की स्थिति कुंभ राशि के लिए शुभ संकेत दे रही है। इस दिन महादेव की विशेष कृपा से आपके जीवन में आने वाली चुनौतियों से मुक्ति मिल सकती है और जो भी कष्ट चल रहे थे वे दूर हो सकते हैं। आप मानसिक शांति और संतुलन महसूस करेंगे जो आपके व्यक्तिगत जीवन में सुधार लाएगा।

    लाभ

    किसी भी पुराने या लंबित कार्य में सफलता मिलने की संभावना है। इस दिन आपको मानसिक शांति प्राप्त होगी और घर-परिवार में सुख-शांति का माहौल बनेगा कोई नई शुरुआत करने के लिए यह समय अत्यंत अनुकूल रहेगा।

    उपाय

    इस दिन शिवलिंग पर जल अर्पित करने और धूप-दीप से पूजा करने से विशेष लाभ मिलेगा। इससे आपके कार्यों में आ रही अड़चनें दूर होंगी और आपकी जिंदगी में सुख-समृद्धि आएगी। 18 जनवरी 2026 को होने वाली मौनी अमावस्या आपके जीवन में नए बदलाव ला सकती है खासकर कर्क मकर और कुंभ राशियों के जातकों के लिए। इस दिन भगवान शिव की कृपा से आपकी मेहनत का फल मिलेगा रुके हुए कार्य पूरे होंगे और जीवन में सकारात्मक बदलाव आएगा। इन तिथियों पर शिव पूजा और दान का महत्व अधिक बढ़ जाता है और ये उपाय आपके जीवन में शांति समृद्धि और सफलता लाने में सहायक होंगे।