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  • भाजपा से इस्तीफे के बाद कांग्रेस में शामिल हुए नरेंद्र बाबू, पुराने नेताओं की अनदेखी को लेकर नेतृत्व पर लगाए आरोप

    भाजपा से इस्तीफे के बाद कांग्रेस में शामिल हुए नरेंद्र बाबू, पुराने नेताओं की अनदेखी को लेकर नेतृत्व पर लगाए आरोप

    नई दिल्ली ।कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के पूर्व विधायक और प्रदेश ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष एनएल नरेंद्र बाबू ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। भारत जोड़ो कन्वेंशन के दौरान उन्हें कांग्रेस की सदस्यता दिलाई गई। इस मौके पर कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने उन्हें कांग्रेस का गमछा पहनाकर पार्टी में स्वागत किया।

    नरेंद्र बाबू के कांग्रेस में शामिल होने के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। कार्यक्रम में मंत्री रामलिंगारेड्डी, एचएम रेवन्ना, पूर्व मंत्री रानी सतीश, रमेश बाबू, हनुमंतरायप्पा और पूर्व मेयर रमेश समेत कई नेताओं की मौजूदगी रही।

    नरेंद्र बाबू ने कांग्रेस में शामिल होने से कुछ दिन पहले ही भाजपा से अलग होने का अपना फैसला सार्वजनिक किया था। शुक्रवार को उन्होंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने पार्टी के प्रदेश ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष पद से भी त्यागपत्र दे दिया था।

    भाजपा छोड़ने की घोषणा करते समय नरेंद्र बाबू ने पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की स्थिति को लेकर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा था कि उन्होंने करीब 10 साल तक भाजपा के लिए काम किया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अपेक्षित जिम्मेदारी और सम्मान नहीं मिला।

    नरेंद्र बाबू कर्नाटक के तिगाला समुदाय के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। भाजपा से अलग होने के दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि वह अवसर देखकर पार्टी बदलने वाली राजनीति में विश्वास नहीं रखते। उनके मुताबिक, पार्टी के लिए लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्हें जिस तरह की जिम्मेदारी और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला।

    उन्होंने भाजपा नेतृत्व पर राजाजीनगर और महालक्ष्मी लेआउट में भी अनदेखी का आरोप लगाया था। नरेंद्र बाबू का कहना था कि उन्हें लंबे समय तक इंतजार कराया गया। साथ ही इन क्षेत्रों में उन्हें और उनके साथ काम करने वाले लोगों को नजरअंदाज किया गया।

    भाजपा से इस्तीफा देने के बाद नरेंद्र बाबू के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा तेज हो गई थी। अब भारत जोड़ो कन्वेंशन के दौरान उन्होंने औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में पार्टी में उनका स्वागत किया गया।

    नरेंद्र बाबू का भाजपा छोड़ना ऐसे समय हुआ है जब कर्नाटक की राजनीति में दोनों प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक गतिविधियां लगातार बनी हुई हैं। हालांकि, उनके पार्टी बदलने के पीछे उन्होंने मुख्य रूप से भाजपा में पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सम्मान और जिम्मेदारी नहीं मिलने की बात कही है।

    कांग्रेस में शामिल होने के दौरान मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी रही। इस कार्यक्रम के साथ नरेंद्र बाबू का भाजपा से कांग्रेस तक का राजनीतिक सफर औपचारिक रूप से बदल गया है। उन्होंने भाजपा में करीब एक दशक तक काम करने के बाद अब कांग्रेस का रुख किया है।

  • कर्नाटक कैबिनेट विस्तार के बाद बढ़ी कांग्रेस की अंदरूनी नाराजगी, डीके शिवकुमार ने खड़गे और वेणुगोपाल से की मुलाकात

    कर्नाटक कैबिनेट विस्तार के बाद बढ़ी कांग्रेस की अंदरूनी नाराजगी, डीके शिवकुमार ने खड़गे और वेणुगोपाल से की मुलाकात


    नई दिल्ली । कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति सामने आने लगी है। मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से कुछ कांग्रेस विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। इसी बीच मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने सोमवार को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर मंत्रियों के विभागों के बंटवारे और संभावित छोटे बदलावों को लेकर चर्चा की।

    डीके शिवकुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच दो घंटे से अधिक समय तक बातचीत होने की जानकारी सामने आई है। इससे पहले शिवकुमार ने कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से भी चर्चा की। इन बैठकों को कर्नाटक मंत्रिमंडल में हालिया विस्तार के बाद बने राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    कर्नाटक सरकार में इस महीने की शुरुआत में बड़ा कैबिनेट विस्तार किया गया था। इस विस्तार में 19 नए मंत्रियों को शामिल किया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की कुल संख्या 33 हो गई। हालांकि, नए मंत्रियों को अभी तक विभागों का आवंटन नहीं किया गया है। विभागों के बंटवारे में हो रही देरी के बीच पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं।

    मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाने वाले कुछ विधायक अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने इन नेताओं को साथ बनाए रखने की चुनौती है। वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और कुछ मंत्रियों ने ऐसे विधायकों से बातचीत भी की है। इसका उद्देश्य नाराजगी को कम करना और संगठन के भीतर समन्वय बनाए रखना बताया जा रहा है।

    विभागों के बंटवारे को लेकर मुख्यमंत्री की शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई बातचीत को इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। चर्चा है कि नाराज विधायकों को संतुष्ट करने के लिए कुछ मंत्रियों के विभागों में बदलाव किया जा सकता है। इसके अलावा एक या दो मौजूदा मंत्रियों को हटाने की संभावना पर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है, हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

    डीके शिवकुमार ने कैबिनेट में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल में एक महिला को शामिल किया जाना चाहिए और इस दिशा में काम किया जाएगा। साथ ही उन्होंने जल्दबाजी से बचने की बात कही। इससे माना जा रहा है कि कैबिनेट में संभावित बदलाव केवल विभागों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं रह सकते हैं।

    कर्नाटक विधानसभा का मानसून सत्र 13 अगस्त से शुरू होना है। कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश है कि विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले मंत्रियों के विभागों का बंटवारा और आवश्यक बदलाव पूरे कर लिए जाएं। इससे सरकार को सदन में एकजुटता के साथ काम करने में मदद मिल सकती है और मंत्रियों को भी अपनी जिम्मेदारियों के साथ काम शुरू करने का अवसर मिलेगा।

    उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने भी विभागों के बंटवारे को लेकर कहा है कि इसमें कोई बड़ी परेशानी नहीं है। उनके अनुसार, जल्द ही सभी मंत्रियों को जिम्मेदारियां सौंप दी जाएंगी। इससे संकेत मिलता है कि सरकार विभागों के आवंटन को लेकर अंतिम चरण की प्रक्रिया में है।

    कर्नाटक कांग्रेस के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक तरफ नए मंत्रियों को विभाग देकर सरकार के कामकाज को व्यवस्थित करना है, वहीं दूसरी तरफ मंत्रिमंडल से बाहर रह गए विधायकों की नाराजगी को संभालना है। ऐसे में खड़गे और वेणुगोपाल के साथ डीके शिवकुमार की बैठकों को पार्टी के भीतर समन्वय बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    हालांकि, संभावित फेरबदल को लेकर अभी अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। विभागों के बंटवारे और मंत्रियों में बदलाव से जुड़ी तस्वीर विधानसभा के मानसून सत्र से पहले स्पष्ट होने की उम्मीद है। फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व विधायकों की नाराजगी दूर करने और सरकार के भीतर संतुलन बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।