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  • क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा

    क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा


    नई दिल्ली। हिंदू परंपरा में क्षौर कर्म को केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि एक शुद्धिकरण और अनुशासन से जुड़ी धार्मिक क्रिया माना गया है। इसमें बाल कटवाना, दाढ़ी-मूंछ बनवाना और नाखून काटना शामिल होता है। शास्त्रों और परंपराओं में इससे जुड़े कई नियम बताए गए हैं, जिन्हें लोग आस्था के आधार पर मानते हैं।

    क्या है क्षौर कर्म?
    क्षौर कर्म का अर्थ है शरीर की स्वच्छता से जुड़ी गतिविधियाँ जैसे

    बाल कटवाना या मुंडन कराना

    दाढ़ी और मूंछ बनवाना

    नाखून काटना

    धार्मिक दृष्टि से इसे शुद्धता और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

    किन दिनों में इसे टालने की परंपरा है?
    परंपरागत मान्यताओं में कुछ तिथियों और दिनों को क्षौर कर्म के लिए कम शुभ माना गया है, जैसे—

    एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा

    कुछ धार्मिक पर्व और व्रत के दिन

    संक्रांति के समय

    कुछ परंपराओं में मंगलवार और शनिवार को भी इसे टालने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह सभी जगह समान नहीं है और क्षेत्रीय परंपराओं पर निर्भर करता है।

    भद्रा और मुहूर्त का महत्व
    शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य, जिसमें क्षौर कर्म भी शामिल है, करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए कई लोग शुभ मुहूर्त देखकर ही यह कार्य करते हैं।

    श्राद्ध से जुड़ी परंपरा
    श्राद्ध कर्म के समय शुद्धता और नियमों का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण श्राद्ध करने से पहले शरीर की स्वच्छता पर ध्यान देने की परंपरा रही है, जिसमें क्षौर कर्म को भी शामिल किया जाता है।

    आयु से जुड़ी मान्यताएं
    कुछ परंपराओं में अलग-अलग दिनों में क्षौर कर्म करने को लेकर आयु बढ़ने या घटने जैसी मान्यताएं प्रचलित हैं। लेकिन यह पूरी तरह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास पर आधारित है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • नववर्ष के पहले रविवार को महाकाल मंदिर में भक्तों का उमड़ा सैलाबअद्भुत शृंगार में दर्शन

    नववर्ष के पहले रविवार को महाकाल मंदिर में भक्तों का उमड़ा सैलाबअद्भुत शृंगार में दर्शन


    उज्जैन । उज्जैन नववर्ष के पहले रविवार को उज्जैन स्थित बाबा महाकाल के मंदिर में श्रद्धालुओं का जमावड़ा हुआ। साल के पहले रविवार पर बाबा महाकाल के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचे। इस दिन को विशेष रूप से भस्म आरती और बाबा के अद्भुत शृंगार के लिए जाना जाता है।भक्तों का उत्साह सर्द मौसम में भी बरकरार रहा और देर रात से ही वे भस्म आरती में शामिल होने के लिए मंदिर परिसर में लाइनों में खड़े नजर आए। श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन से अभिभूत हो गएऔर हर-हर महादेव के जयकारों से पूरा मंदिर गूंज उठा।

    महाकाल का अद्भुत शृंगार

    माघ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के रविवार को बाबा महाकाल का विशेष शृंगार किया गयाजिसे देखकर भक्त भावविभोर हो उठे। इस शृंगार में बाबा के माथे पर बेलपत्र और चांदी का चांद चढ़ाया गयाजिससे उनके दिव्य स्वरूप की अनुभूति हुई। शृंगार के दौरान बाबा पर घीदूधदही और रस से जलाभिषेक किया गया। इसके बादभांग से बाबा का शृंगार किया गया। बाबा महाकाल का यह रूप भक्तों के लिए अत्यंत आकर्षक था और उन्हें आंतरिक शांति का अनुभव हुआ।

    भस्म आरती का महत्व

    शृंगार के बाद भस्म आरती का आयोजन हुआजिसमें बाबा महाकाल को भस्म से नहलाया गया। भस्म आरती के दौरान माना जाता है कि बाबा निराकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैंलेकिन शृंगार के बाद वे साकार रूप में अपने भक्तों के कष्ट हरने आते हैं। इस दौरान बाबा महाकाल ने कमल और मखाने की माला पहने हुएअपने भक्तों को आलोकिक रूप में दर्शन दिए। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत अभूतपूर्व थाऔर मंदिर में जय श्री महाकाल की गूंज सुनाई दी।

    महाकाल के अलग-अलग रूप

    बाबा महाकाल का शृंगार हर दिन अलग तरीके से किया जाता है। प्रत्येक तिथि और शुभ दिन पर बाबा अपने भक्तों को नए रूप में दर्शन देते हैंयही कारण है कि भस्म आरती में हमेशा भक्तों की अधिकतम संख्या होती है। बाबा महाकाल की सेवा में सुबह से शाम तक छह अलग-अलग आरतियां होती हैंजो प्रत्येक में अपने आप में विशिष्ट होती हैं बाबा महाकाल के दर्शन और शृंगार से श्रद्धालुओं का मन श्रद्धा और भक्ति से अभिभूत हो जाता है। इस नववर्ष के पहले रविवार ने भक्तों को बाबा महाकाल के नए रूप से साक्षात्कार करने का अवसर दियाऔर उनके हर कष्ट को हरने की शक्ति को महसूस किया।