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  • 8 अक्टूबर को शिव पूजा और पितृ श्राद्ध का विशेष संयोग, गुरु प्रदोष और मासिक शिवरात्रि एक साथ

    8 अक्टूबर को शिव पूजा और पितृ श्राद्ध का विशेष संयोग, गुरु प्रदोष और मासिक शिवरात्रि एक साथ

    नई दिल्ली । 8 अक्टूबर 2026 का दिन धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। गुरुवार को गुरु प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का संयोग बन रहा है। इसी दिन पितृ पक्ष का त्रयोदशी श्राद्ध भी किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत और भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल प्राप्त हो सकता है। इसके अलावा शुक्ल योग, ब्रह्म योग और गुरुवार व्रत भी इसी दिन पड़ रहे हैं। इस तरह 8 अक्टूबर को कई धार्मिक संयोग एक साथ बन रहे हैं, जिसके कारण यह दिन शिव भक्तों और पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    8 अक्टूबर को आश्विन माह का पहला प्रदोष व्रत होगा। आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर की रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 8 अक्टूबर की रात 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। गुरु प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 59 मिनट से रात 8 बजकर 27 मिनट तक बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुरु प्रदोष व्रत रखने और भगवान शिव की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होने का फल मिलता है। इस दिन शिव उपासना करने वाले भक्त व्रत रखकर विशेष पूजा कर सकते हैं।

    इसी दिन मासिक शिवरात्रि का भी संयोग बन रहा है। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तिथि 8 अक्टूबर की रात 10 बजकर 15 मिनट से शुरू होकर 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। निशिता मुहूर्त के आधार पर मासिक शिवरात्रि 8 अक्टूबर को मानी जाएगी। शिवरात्रि की निशिता पूजा का समय रात 11 बजकर 44 मिनट से देर रात 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। शिव भक्त इस अवधि में भगवान शिव की पूजा और आराधना कर सकते हैं।

    8 अक्टूबर को पितृ पक्ष का त्रयोदशी श्राद्ध भी किया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी की उदयातिथि मिलने के कारण उन पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाएगा, जिनका निधन किसी भी महीने की त्रयोदशी तिथि को हुआ हो। श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप मुहूर्त सुबह 11 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 32 मिनट से 1 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। अपराह्न काल दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से 3 बजकर 39 मिनट तक बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण से पितरों की तृप्ति होती है और पिशाच योनि में फंसे पितरों के उद्धार की मान्यता है।

    इस दिन शुक्ल योग भी रहेगा। शुक्ल योग सुबह से देर रात 12 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। इसके बाद ब्रह्म योग शुरू होगा, जिसे भी शुभ योग माना गया है। इसके साथ ही 8 अक्टूबर को इस महीने का दूसरा गुरुवार व्रत भी रखा जाएगा। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा और उपवास करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु की कृपा से दांपत्य जीवन सुखमय होता है, विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और कुंडली में गुरु दोष से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

    8 अक्टूबर की रात भद्रा लगने की बात भी बताई गई है, लेकिन इसे लेकर इस दिन होने वाले धार्मिक कर्मों पर कोई विशेष अहित नहीं माना गया है। गुरु प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, त्रयोदशी श्राद्ध, शुक्ल योग, ब्रह्म योग और गुरुवार व्रत के कारण यह दिन धार्मिक गतिविधियों के लिहाज से खास माना जा रहा है। शिव भक्त इस दिन व्रत और पूजा कर भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं, जबकि पितृ पक्ष के नियमों के अनुसार त्रयोदशी श्राद्ध और तर्पण भी किया जा सकता है।

  • पितृ पक्ष में क्यों टालते हैं प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री? जानिए राजपाल यादव से जुड़े मामले में क्या आया सामने

    पितृ पक्ष में क्यों टालते हैं प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री? जानिए राजपाल यादव से जुड़े मामले में क्या आया सामने

    नई दिल्ली ।अभिनेता राजपाल यादव से जुड़े एक मामले में पितृ पक्ष के दौरान संपत्ति की रजिस्ट्री रुकने का जिक्र सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके वकील ने अदालत में बताया कि जिस संपत्ति को बेचकर रकम जुटाई जानी है, उसकी रजिस्ट्री पितृ पक्ष के कारण रुकी हुई है और नवरात्र की शुरुआत में सौदा पूरा होने की उम्मीद है। इस बात के बाद पितृ पक्ष के दौरान जमीन, मकान या दूसरी बड़ी संपत्ति की खरीद और रजिस्ट्री को टालने की धार्मिक परंपरा एक बार फिर चर्चा में आ गई है। कई हिंदू परिवार इस अवधि में नई संपत्ति खरीदने या बड़े शुभ कार्य शुरू करने से बचते हैं।

    हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए विशेष समय माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इन दिनों ध्यान नए उत्सव या सांसारिक शुभ कार्यों की बजाय पूर्वजों से जुड़े धार्मिक कर्मों पर रखा जाता है। इसी वजह से कई परिवार नई जमीन या मकान खरीदने, प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री कराने और बड़े निवेश की शुरुआत जैसे कामों को आगे के शुभ समय तक टालना पसंद करते हैं।

    पितृ पक्ष में प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री रोकने की मान्यता मुख्य रूप से धार्मिक और पारंपरिक विश्वास से जुड़ी है। इस अवधि को आमतौर पर मांगलिक कार्यों के लिए शुभ समय नहीं माना जाता। इसलिए कुछ परिवार नई शुरुआत से जुड़े काम नवरात्र, दीपावली या किसी अन्य शुभ मुहूर्त तक स्थगित कर देते हैं। हालांकि, केवल पितृ पक्ष होने के कारण संपत्ति की खरीद या रजिस्ट्री पर कोई कानूनी रोक नहीं होती। कोई व्यक्ति अपने कानूनी, व्यावहारिक या आर्थिक कारणों के आधार पर इस अवधि में संपत्ति खरीद या रजिस्ट्री करा सकता है। यह फैसला धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत परंपरा से जुड़ा विषय है।

    पितृ पक्ष के दौरान हर तरह की खरीदारी को अशुभ नहीं माना जाता। रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। भोजन, कपड़े, दवाएं, घर की जरूरी सामग्री और कामकाज से संबंधित सामान की खरीद पर सामान्य रूप से ऐसी रोक नहीं मानी जाती, जो सभी लोगों पर लागू हो। श्राद्ध और पितरों से जुड़े धार्मिक कर्मों के लिए अनाज, फल, सब्जियां, घी, दूध और भोजन सामग्री खरीदना भी इसी अवधि की जरूरतों का हिस्सा हो सकता है। कई परिवार इस दौरान ब्राह्मण भोजन, जरूरतमंदों को दान और पितरों की पसंद की वस्तुओं का दान भी करते हैं।

    वहीं नई जमीन या मकान खरीदने, नई प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री, गृह प्रवेश, विवाह और अन्य बड़े मांगलिक कार्यों को कई परिवार पितृ पक्ष में करने से बचते हैं। कुछ लोग नया वाहन खरीदने, महंगे आभूषण लेने या बड़े निवेश की शुरुआत को भी इस अवधि के बाद करना पसंद करते हैं। इसके पीछे मुख्य आधार धार्मिक मान्यता है, न कि कोई कानूनी नियम। इसलिए अलग-अलग परिवार अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार निर्णय लेते हैं।

    पहले से तय संपत्ति की रजिस्ट्री के मामले में भी परिवारों की प्राथमिकता अलग हो सकती है। यदि संपत्ति का सौदा पहले ही तय हो चुका है और रजिस्ट्री की तारीख पितृ पक्ष में पड़ती है, तो धार्मिक मान्यता मानने वाले लोग तारीख आगे बढ़ाना पसंद कर सकते हैं। दूसरी ओर, जिन लोगों के लिए कानूनी प्रक्रिया, समय या आर्थिक कारण महत्वपूर्ण हैं, वे तय तारीख पर रजिस्ट्री करा सकते हैं। ऐसे में पितृ पक्ष के दौरान प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री को लेकर फैसला धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

  • काशी के पिशाचमोचन में अकाल मौत का तर्पण, घोड़े का कान और गाय की पूंछ छूने की अनोखी परंपरा

    काशी के पिशाचमोचन में अकाल मौत का तर्पण, घोड़े का कान और गाय की पूंछ छूने की अनोखी परंपरा


    नई दिल्ली: पितृपक्ष के दौरान वाराणसी के पिशाचमोचन में हर दिन 20 हजार से ज्यादा लोग पूर्वजों और अकाल मौत से जुड़े श्राद्ध कर्म कराने पहुंच रहे हैं। आदि गंगा विमलोदत्त कुंड के किनारे इन दिनों 10 से 12 तरह के श्राद्ध कर्म कराए जा रहे हैं। नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और तर्पण के बाद यहां दो विशेष प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं। इनमें संजाब नस्ल के शक्ति घोड़े का कान छूना और अकाल मौत वाले व्यक्ति की फोटो पीपल के सूखे पेड़ पर लगाना शामिल है। मान्यता के अनुसार, इन्हें पितरों और आत्माओं की शांति की कामना से जुड़ी अंतिम प्रक्रिया माना जाता है। पिशाचमोचन पर पितृपक्ष शुरू होने से एक दिन पहले से संजाब नस्ल के दो घोड़े खड़े हैं। इनका इस्तेमाल साल में केवल श्राद्ध के 15 दिनों के दौरान होता है। बाकी समय इनकी बुकिंग विवाह समारोहों के लिए की जाती है।

    पिशाचमोचन क्षेत्र में 10 से 15 पीपल के पेड़ हैं, जिन पर करीब 500 फोटो फ्रेम लगे हुए हैं। वहां मौजूद पंडित अमित मिश्रा के अनुसार, इन पेड़ों पर उन आत्माओं की तस्वीरें लगाई जाती हैं, जिनकी अचानक मौत हुई और जिन्हें शांतिपूर्वक विदा नहीं माना गया। उन्होंने बताया कि लोग ऐसी आत्माओं की शांति के लिए यहां श्राद्ध कराने आते हैं। इसी तरह गाजीपुर के मुख्तार की पत्नी और बेटी भी करीब 30 साल पहले हुई उनकी मौत के बाद श्राद्ध कराने यहां पहुंची थीं। परिवार का कहना था कि उनके पति सपने में आते थे और इससे उन्हें डर लगता था। पिशाचमोचन में अकाल मौत से मुक्ति के लिए पीपल के पेड़ पर फोटो फ्रेम लगाने के साथ कील ठोकने की प्रक्रिया भी श्राद्ध पूजा के पैकेज में शामिल है।

    यहां घोड़े का कान, भैंस का सींग और गाय की पूंछ छूकर पितरों के नाम पर दान करने की भी परंपरा है। जिस संजाब नस्ल के घोड़े का कान लोग छूते हैं, उसका नाम शक्ति है। एक व्यक्ति को घोड़े का कान छूने के लिए कम से कम 10 रुपये देने होते हैं। बताया गया है कि यह घोड़ा रोजाना कम से कम 50 हजार रुपये तक कमा लेता है। पिशाचमोचन में श्राद्ध कर्म कराने वालों में गरीब और संपन्न परिवार दोनों शामिल होते हैं। यहां नेता, जज, फिल्म स्टार और अन्य सम्पन्न परिवार भी तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं। एक मृतक के तर्पण की सामान्य लागत 15 से 20 हजार रुपये बताई गई है, जबकि कई बार यह खर्च 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। भीड़ अधिक होने के कारण कुंड के किनारों के अलावा आसपास के पांच-छह भवनों में भी श्राद्ध कर्म कराए जाते हैं।

    अकाल मौत के लिए यहां सबसे महंगा श्राद्ध नारायण बलि बताया गया है। पांच ब्राह्मणों से नारायण बलि कराने की लागत 15 हजार रुपये है, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए आठ हजार रुपये और पार्वण श्राद्ध के लिए 2500 रुपये लिए जाते हैं। गयातीर्थ और गया श्राद्ध की कीमत निश्चित नहीं है और यह 1100 से 2500 रुपये या उससे अधिक हो सकती है। यदि एक ही परिवार में कई लोगों की अकाल मौत हुई हो तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग श्राद्ध कराया जाता है। पांच लोगों की अकाल मौत होने पर सभी के लिए अलग-अलग नारायण बलि करानी होती है और प्रत्येक के लिए कम से कम 15 हजार रुपये का खर्च बताया गया है।

    पिशाचमोचन में श्राद्ध कर्म की व्यवस्था बड़े स्तर पर होती है। मुन्ना पंडा के परिवार के लोग यहां प्रमुख महंत होते हैं, जबकि पितृपक्ष के 15 दिनों के लिए करीब 400 पंडे श्राद्ध कराने में जुटते हैं। तर्पण के लिए बैठने की जगह का किराया 500 रुपये लिया जाता है। एक तर्पण में करीब डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। काम सूर्योदय के साथ शुरू होकर आधी रात तक चलता है। यहां व्यवस्था के लिए पंडे वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल करते हैं। पानी, गोबर, दूध और सफाई जैसी जरूरतों के लिए इसी माध्यम से कर्मचारियों को बुलाया जाता है। यहां आने वाले यजमानों को केवल दक्षिणा लेकर आने की जरूरत होती है, जबकि श्राद्ध और तर्पण में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री पैकेज के साथ यहीं उपलब्ध कराई जाती है।

  • पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू, जानिए पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी श्राद्ध तिथियां और धार्मिक मान्यताएं

    पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू, जानिए पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी श्राद्ध तिथियां और धार्मिक मान्यताएं

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने की विशेष अवधि माना जाता है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में पूर्वज अपने वंशजों के समीप आते हैं और उनके द्वारा किए गए अन्न तथा जल के अर्पण से तृप्त होते हैं। इसी कारण इन 16 दिनों को धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है। इसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर, शनिवार से शुरू होगा और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।

    26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा। इसके बाद 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध और 30 सितंबर को चतुर्थी तथा पंचमी श्राद्ध किया जाएगा। अक्टूबर में 1 तारीख को षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध, 3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध और 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध रहेगा।

    इसके बाद 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध, 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या रहेगी, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होगा।

    सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तब भी सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने का धार्मिक महत्व बताया गया है।

    धार्मिक परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु जिस हिंदू तिथि को हुई हो, पितृपक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। इसलिए श्राद्ध की तिथि केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के आधार पर तय नहीं की जाती। इसके लिए हिंदू पंचांग में मृत्यु की तिथि को देखा जाता है। यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार श्राद्ध का समय निर्धारित किया जाता है।

    पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म में संकल्प, तर्पण, पिंडदान, सात्विक भोजन का अर्पण और दान जैसी परंपराएं शामिल मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन का एक हिस्सा गाय, कौवे और कुत्ते के लिए भी अलग रखा जाता है।

    तर्पण के दौरान जल में काले तिल, जौ और कुशा मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित करने की परंपरा है। इसके अलावा संबंधित पूर्वज की मृत्यु तिथि पर पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए प्रार्थना पूरी होती है।

  • पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध के लिए विशेष अवधि माना जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। इसे सोलह श्राद्ध या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के 16 दिनों में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान करने से पितृ दोष तथा पूर्वजों के ऋण से मुक्ति मिलती है और परिवार को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    पितृपक्ष के दौरान नई शुरुआत और मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ संस्कार जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसका कारण यह माना जाता है कि पितृपक्ष का पूरा समय पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए किए जाने वाले कर्मकांड को समर्पित रहना चाहिए।

    धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि पूर्वजों की पूजा में विधि और अनुष्ठान का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस अवधि में परिवार का ध्यान श्राद्ध कर्म और तर्पण पर केंद्रित रखने की परंपरा है। इसी वजह से उत्सव और मांगलिक आयोजनों को टालने की मान्यता प्रचलित है।

    पितृपक्ष में नई चीजें खरीदने को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं। इस दौरान रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी वस्तुएं खरीदने पर सामान्यतः रोक नहीं मानी जाती, लेकिन बड़ी खरीदारी से परहेज करने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नए कपड़े, गहने, वाहन, मकान-जमीन और लोहे से जुड़ी बड़ी वस्तुओं की खरीदारी को इस अवधि में शुभ नहीं माना जाता।

    नए कपड़ों को लेकर भी पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं कही जाती, लेकिन पितृपक्ष में सादे और सात्विक वस्त्र पहनने को उचित माना गया है। श्राद्ध और तर्पण के समय सफेद, हल्के पीले या अन्य हल्के रंग के कपड़े पहनने की परंपरा बताई गई है। इसका उद्देश्य इस अवधि की सादगी और धार्मिक एकाग्रता बनाए रखना माना जाता है।

    पितृपक्ष के दौरान भगवान विष्णु के चातुर्मास से जुड़ी मान्यता भी बताई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण चातुर्मास में भी कई प्रकार के मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा है।

    इसके अलावा पितृपक्ष के दौरान खान-पान और दैनिक व्यवहार को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। इस अवधि में सात्विक भोजन करने, मांस, मछली, अंडा, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई धार्मिक परंपराओं में लहसुन और प्याज से भी परहेज करने की बात कही गई है। बाल और दाढ़ी न कटाने की मान्यता भी कुछ परंपराओं में प्रचलित है।

    पितृपक्ष में घर का वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण रखने पर जोर दिया जाता है। झगड़े, अपशब्द और गलत व्यवहार से बचने की सलाह दी जाती है। पशु-पक्षियों और जरूरतमंद लोगों के प्रति भी संवेदनशील व्यवहार करने की मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस अवधि में विनम्रता, संयम और श्रद्धा के साथ पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए।

  • श्रद्धा कपूर के आइकॉनिक एक्शन सीन के पीछे थीं नादिन थेरॉन, ‘स्त्री 2’ के बीटीएस वीडियो ने खोला बड़ा राज

    श्रद्धा कपूर के आइकॉनिक एक्शन सीन के पीछे थीं नादिन थेरॉन, ‘स्त्री 2’ के बीटीएस वीडियो ने खोला बड़ा राज

    नई दिल्ली । राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर स्टारर हॉरर कॉमेडी फिल्म ‘स्त्री 2’ ने रिलीज के बाद दर्शकों के बीच जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की थी। फिल्म में कहानी, कॉमेडी और हॉरर के साथ कई ऐसे एक्शन सीक्वेंस भी देखने को मिले थे, जिनमें श्रद्धा कपूर का किरदार काफी प्रभावशाली नजर आया। अब फिल्म की रिलीज के करीब दो साल बाद इससे जुड़ा एक ऐसा खुलासा सामने आया है, जिसने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। फिल्म में श्रद्धा कपूर के लिए कई मुश्किल स्टंट करने वाली प्रोफेशनल स्टंट आर्टिस्ट नादिन थेरॉन ने पर्दे के पीछे की झलकियां साझा की हैं।

    नादिन थेरॉन दक्षिण अफ्रीकी अभिनेत्री और प्रोफेशनल स्टंट परफॉर्मर हैं। उन्होंने बॉलीवुड की कई फिल्मों में मुख्य कलाकारों के बॉडी डबल के तौर पर काम किया है। ‘स्त्री 2’ में भी उन्होंने श्रद्धा कपूर के किरदार से जुड़े कई रोमांचक एक्शन दृश्यों को परफॉर्म किया था। नादिन ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर फिल्म के सेट से जुड़े बिहाइंड द सीन वीडियो और तस्वीरें साझा कीं। इन दृश्यों में वह श्रद्धा कपूर के किरदार के लिए स्टंट करती हुई दिखाई दे रही हैं।

    नादिन द्वारा साझा किए गए वीडियो में फिल्म के कुछ ऐसे एक्शन सीक्वेंस नजर आते हैं, जिन्हें दर्शकों ने सिनेमाघरों में श्रद्धा कपूर के किरदार के हिस्से के रूप में देखा था। खास तौर पर श्रद्धा के किरदार से जुड़ा चोटी लहराने वाला चर्चित स्टंट भी नादिन करती दिखाई देती हैं। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स को यह जानकर हैरानी हुई कि पर्दे पर दिखाई देने वाले सभी मुश्किल एक्शन मूवमेंट श्रद्धा कपूर ने खुद नहीं किए थे।

    नादिन ने ‘स्त्री 2’ से जुड़े अपने अनुभव को याद करते हुए बताया कि यह उनके लिए बेहद मजेदार प्रोजेक्ट था। उन्होंने भारत में काम करने, अलग-अलग तरह के स्टंट और कैमरे के सामने प्रदर्शन करने के अनुभव को खास बताया। उन्होंने श्रद्धा कपूर के साथ काम करने का मौका मिलने पर भी खुशी जताई। उनके पोस्ट से यह स्पष्ट हुआ कि फिल्म के एक्शन दृश्यों को तैयार करने में पर्दे के पीछे स्टंट टीम की भी अहम भूमिका थी।

    नादिन थेरॉन का फिल्मी काम सिर्फ ‘स्त्री 2’ तक सीमित नहीं है। वह हालिया समय में आलिया भट्ट की फिल्म ‘अल्फा’ से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने इस फिल्म में आलिया भट्ट के बॉडी डबल के तौर पर एक्शन सीक्वेंस परफॉर्म किए हैं। नादिन ने ‘अल्फा’ के सेट से जुड़े बिहाइंड द सीन वीडियो भी साझा किए हैं, जिनमें उनके स्टंट काम की झलक दिखाई देती है।

    बॉलीवुड फिल्मों में बड़े एक्शन दृश्यों को पर्दे पर प्रभावशाली बनाने के लिए प्रोफेशनल स्टंट कलाकारों और बॉडी डबल्स की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कलाकार कैमरे के सामने किरदार और भावनाओं को जीवंत करते हैं, जबकि बेहद जोखिम वाले या तकनीकी रूप से कठिन दृश्यों में प्रशिक्षित स्टंट कलाकार उनकी मदद करते हैं। ‘स्त्री 2’ से सामने आया नादिन का वीडियो इसी पर्दे के पीछे की मेहनत को सामने लाता है।

    फिल्म की रिलीज के लंबे समय बाद नादिन थेरॉन का यह खुलासा अब प्रशंसकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। श्रद्धा कपूर के प्रशंसकों के लिए यह वीडियो फिल्म के चर्चित दृश्यों को एक नए नजरिए से देखने का मौका भी देता है। पर्दे पर कुछ सेकंड के लिए दिखाई देने वाले खतरनाक स्टंट के पीछे कितनी तैयारी और विशेषज्ञता होती है, नादिन के साझा किए गए बीटीएस वीडियो उसकी झलक दिखाते हैं।

  • क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा

    क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा


    नई दिल्ली। हिंदू परंपरा में क्षौर कर्म को केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि एक शुद्धिकरण और अनुशासन से जुड़ी धार्मिक क्रिया माना गया है। इसमें बाल कटवाना, दाढ़ी-मूंछ बनवाना और नाखून काटना शामिल होता है। शास्त्रों और परंपराओं में इससे जुड़े कई नियम बताए गए हैं, जिन्हें लोग आस्था के आधार पर मानते हैं।

    क्या है क्षौर कर्म?
    क्षौर कर्म का अर्थ है शरीर की स्वच्छता से जुड़ी गतिविधियाँ जैसे

    बाल कटवाना या मुंडन कराना

    दाढ़ी और मूंछ बनवाना

    नाखून काटना

    धार्मिक दृष्टि से इसे शुद्धता और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

    किन दिनों में इसे टालने की परंपरा है?
    परंपरागत मान्यताओं में कुछ तिथियों और दिनों को क्षौर कर्म के लिए कम शुभ माना गया है, जैसे—

    एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा

    कुछ धार्मिक पर्व और व्रत के दिन

    संक्रांति के समय

    कुछ परंपराओं में मंगलवार और शनिवार को भी इसे टालने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह सभी जगह समान नहीं है और क्षेत्रीय परंपराओं पर निर्भर करता है।

    भद्रा और मुहूर्त का महत्व
    शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य, जिसमें क्षौर कर्म भी शामिल है, करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए कई लोग शुभ मुहूर्त देखकर ही यह कार्य करते हैं।

    श्राद्ध से जुड़ी परंपरा
    श्राद्ध कर्म के समय शुद्धता और नियमों का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण श्राद्ध करने से पहले शरीर की स्वच्छता पर ध्यान देने की परंपरा रही है, जिसमें क्षौर कर्म को भी शामिल किया जाता है।

    आयु से जुड़ी मान्यताएं
    कुछ परंपराओं में अलग-अलग दिनों में क्षौर कर्म करने को लेकर आयु बढ़ने या घटने जैसी मान्यताएं प्रचलित हैं। लेकिन यह पूरी तरह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास पर आधारित है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • नववर्ष के पहले रविवार को महाकाल मंदिर में भक्तों का उमड़ा सैलाबअद्भुत शृंगार में दर्शन

    नववर्ष के पहले रविवार को महाकाल मंदिर में भक्तों का उमड़ा सैलाबअद्भुत शृंगार में दर्शन


    उज्जैन । उज्जैन नववर्ष के पहले रविवार को उज्जैन स्थित बाबा महाकाल के मंदिर में श्रद्धालुओं का जमावड़ा हुआ। साल के पहले रविवार पर बाबा महाकाल के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचे। इस दिन को विशेष रूप से भस्म आरती और बाबा के अद्भुत शृंगार के लिए जाना जाता है।भक्तों का उत्साह सर्द मौसम में भी बरकरार रहा और देर रात से ही वे भस्म आरती में शामिल होने के लिए मंदिर परिसर में लाइनों में खड़े नजर आए। श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन से अभिभूत हो गएऔर हर-हर महादेव के जयकारों से पूरा मंदिर गूंज उठा।

    महाकाल का अद्भुत शृंगार

    माघ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के रविवार को बाबा महाकाल का विशेष शृंगार किया गयाजिसे देखकर भक्त भावविभोर हो उठे। इस शृंगार में बाबा के माथे पर बेलपत्र और चांदी का चांद चढ़ाया गयाजिससे उनके दिव्य स्वरूप की अनुभूति हुई। शृंगार के दौरान बाबा पर घीदूधदही और रस से जलाभिषेक किया गया। इसके बादभांग से बाबा का शृंगार किया गया। बाबा महाकाल का यह रूप भक्तों के लिए अत्यंत आकर्षक था और उन्हें आंतरिक शांति का अनुभव हुआ।

    भस्म आरती का महत्व

    शृंगार के बाद भस्म आरती का आयोजन हुआजिसमें बाबा महाकाल को भस्म से नहलाया गया। भस्म आरती के दौरान माना जाता है कि बाबा निराकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैंलेकिन शृंगार के बाद वे साकार रूप में अपने भक्तों के कष्ट हरने आते हैं। इस दौरान बाबा महाकाल ने कमल और मखाने की माला पहने हुएअपने भक्तों को आलोकिक रूप में दर्शन दिए। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत अभूतपूर्व थाऔर मंदिर में जय श्री महाकाल की गूंज सुनाई दी।

    महाकाल के अलग-अलग रूप

    बाबा महाकाल का शृंगार हर दिन अलग तरीके से किया जाता है। प्रत्येक तिथि और शुभ दिन पर बाबा अपने भक्तों को नए रूप में दर्शन देते हैंयही कारण है कि भस्म आरती में हमेशा भक्तों की अधिकतम संख्या होती है। बाबा महाकाल की सेवा में सुबह से शाम तक छह अलग-अलग आरतियां होती हैंजो प्रत्येक में अपने आप में विशिष्ट होती हैं बाबा महाकाल के दर्शन और शृंगार से श्रद्धालुओं का मन श्रद्धा और भक्ति से अभिभूत हो जाता है। इस नववर्ष के पहले रविवार ने भक्तों को बाबा महाकाल के नए रूप से साक्षात्कार करने का अवसर दियाऔर उनके हर कष्ट को हरने की शक्ति को महसूस किया।