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  • शनिवार से शनिवार तक रहेगा पितृ पक्ष जानें किस दिन किस तिथि का होगा श्राद्ध और क्या हैं जरूरी नियम

    शनिवार से शनिवार तक रहेगा पितृ पक्ष जानें किस दिन किस तिथि का होगा श्राद्ध और क्या हैं जरूरी नियम


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष को लेकर 26 और 27 सितंबर की तारीखों को लेकर लोगों के बीच भ्रम बना हुआ है। पंचांग की गणना के अनुसार 26 सितंबर शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध होगा जबकि प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर रविवार से शुरू होगा। इसके बाद 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा। इस तरह पूर्णिमा श्राद्ध को शामिल करने पर यह अवधि 16 दिनों की मानी जा रही है।

    इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत और समाप्ति दोनों शनिवार को होने का संयोग बताया जा रहा है। 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किया जाएगा। इसके अगले दिन 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध होगा। इसके बाद 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध और 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध किया जाएगा। 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध रहेगा। इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध और 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध किया जाएगा।

    3 अक्टूबर शनिवार को अष्टमी श्राद्ध होगा जबकि 4 अक्टूबर रविवार को नवमी श्राद्ध किया जाएगा। 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध और 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध रहेगा। 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध के साथ मघा नक्षत्र से जुड़ा श्राद्ध भी बताया गया है। 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। इसके बाद 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। यही पितृ पक्ष का अंतिम दिन होगा।

    पितृ पक्ष में जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो उस तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की मान्यता है। इस दिन उन सभी पूर्वजों का स्मरण किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को ज्ञात नहीं होती या जिनका नियमित श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाता।

    श्राद्ध कर्म में तर्पण पिंडदान और भोजन दान जैसे कर्मों का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तर्पण के दौरान जल और तिल का प्रयोग किया जाता है। कई परंपराओं में कुशा का इस्तेमाल भी किया जाता है। श्राद्ध का भोजन तैयार करने के बाद गाय कुत्ते कौए और अन्य जीवों के लिए भोजन निकालने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है।

    श्राद्ध कर्म के समय को लेकर भी धार्मिक परंपराओं में विशेष नियम बताए गए हैं। सामान्य तौर पर श्राद्ध कर्म दिन के उस हिस्से में करने की परंपरा है जिसे कुतप काल कहा जाता है। हालांकि स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार तर्पण और श्राद्ध के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष तिथि का श्राद्ध करने से पहले स्थानीय पंचांग या विद्वान से सही समय की जानकारी लेना उचित माना जाता है।

    कुल मिलाकर वर्ष 2026 का पितृ पक्ष तारीखों के लिहाज से खास माना जा रहा है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से इसकी शुरुआत होगी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समापन होगा। इस दौरान अलग अलग तिथियों के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने और परिवार की परंपराओं को निभाने का महत्वपूर्ण अवसर है।

  • Pitru Paksha 2026: कब करें पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण, 15 दिनों की पूरी तिथि सूची के साथ जानें मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

    Pitru Paksha 2026: कब करें पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण, 15 दिनों की पूरी तिथि सूची के साथ जानें मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का महत्व


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का अत्यंत महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता पिता और पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध तर्पण पिंडदान और दान पुण्य जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साल 2026 में पितृपक्ष सितंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू होगा और अक्टूबर में सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। ऐसे में परिवारों के लिए श्राद्ध पक्ष की सभी तिथियों की जानकारी रखना बेहद जरूरी है ताकि वे अपने पूर्वजों का श्राद्ध सही दिन पर कर सकें।

    वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर शनिवार से होगी। इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। इसके बाद 27 सितंबर रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध होगा और क्रमशः अलग अलग तिथियों पर पूर्वजों के निमित्त धार्मिक कर्म किए जाएंगे। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है क्योंकि इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर उनका श्राद्ध नहीं हो पाया हो।

    पितृपक्ष की प्रमुख तिथियों की बात करें तो 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा जबकि 27 सितंबर को प्रतिपदा और 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध किया जाएगा। 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध होगा। इस बार 30 सितंबर बुधवार को एक विशेष स्थिति बनेगी क्योंकि इसी दिन चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध किया जाएगा। जिन परिवारों में किसी पूर्वज का निधन चतुर्थी या पंचमी तिथि को हुआ था वे इस दिन उनका श्राद्ध कर्म कर सकेंगे।

    इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी 2 अक्टूबर को सप्तमी 3 अक्टूबर को अष्टमी और 4 अक्टूबर को नवमी तिथि का श्राद्ध होगा। 4 अक्टूबर को मातृ नवमी भी मानी जाएगी जिसका अपना विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन दिवंगत माताओं और परिवार की अन्य महिलाओं के निमित्त श्राद्ध तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। श्रद्धालु इस दिन मातृ पक्ष के पूर्वजों का स्मरण कर उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करते हैं।

    पितृपक्ष की आगे की तिथियों में 5 अक्टूबर को दशमी 6 अक्टूबर को एकादशी 7 अक्टूबर को द्वादशी 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाएगा। इसके बाद 10 अक्टूबर को अमावस्या के दिन सर्वपितृ श्राद्ध के साथ इस पावन पक्ष का समापन होगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार मृत्यु की तिथि होती है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो पितृपक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध करना उचित माना जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी पूर्वज की मृत्यु प्रतिपदा तिथि को हुई थी तो पितृपक्ष में प्रतिपदा के दिन उनका श्राद्ध किया जाता है। वहीं जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या विशेष अवसर मानी जाती है।

    पितृपक्ष केवल धार्मिक कर्मकांड का समय नहीं बल्कि अपनी जड़ों और पूर्वजों को याद करने का भी अवसर है। इस अवधि में श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार तर्पण पिंडदान भोजन और दान पुण्य करने की परंपरा रही है। वर्ष 2026 में 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलने वाला यह पितृपक्ष श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगा।