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  • शिवपुरी में पितृपक्ष शुरू होते ही बाणगंगा और भदैयाकुंड पर उमड़ी भीड़, पूर्वजों के लिए हुआ तर्पण-पिंडदान

    शिवपुरी में पितृपक्ष शुरू होते ही बाणगंगा और भदैयाकुंड पर उमड़ी भीड़, पूर्वजों के लिए हुआ तर्पण-पिंडदान


    शिवपुरी । शिवपुरी में पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही शनिवार को धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई। शहर के प्रमुख बाणगंगा और भदैयाकुंड घाट पर सुबह से ही लोग अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा और धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचने लगे। सुबह करीब 7 बजे से दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। परिवार के लोग पूजा सामग्री लेकर घाटों पर पहुंचे और पंडितों की देखरेख में तर्पण श्राद्ध और पिंडदान की विधि पूरी की।

    पितृपक्ष को हिंदू परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त धार्मिक कर्मकांड करने का विशेष समय माना जाता है। इसी मान्यता के चलते शिवपुरी में भी कई परिवार अपने पितरों के लिए निर्धारित तिथि के अनुसार अनुष्ठान करने पहुंचे। घाटों पर लोगों ने स्नान और पूजा के बाद पितरों को जल अर्पित किया। इसके साथ ही पिंडदान और श्राद्ध कर्म भी किए गए।

    सुबह के समय बाणगंगा और भदैयाकुंड दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई। अलग अलग क्षेत्रों से परिवारों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। कई लोग अपने साथ पूजा सामग्री लेकर पहुंचे थे। घाटों पर पंडितों की मौजूदगी में मंत्रोच्चार के साथ कर्मकांड संपन्न कराया गया। परिवार के सदस्यों ने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी आत्मा की शांति और परिवार की सुख समृद्धि की कामना की।

    पंडित शिव नारायण शर्मा के अनुसार पितृपक्ष में अपनी परंपरा और पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करने की धार्मिक मान्यता है। इस दौरान परिवार अपने पितरों के निमित्त जल अर्पित करते हैं और निर्धारित विधि से पूजा करते हैं। उन्होंने बताया कि पितृपक्ष के दौरान अलग अलग तिथियों पर पूर्वजों के लिए कर्मकांड किए जाते हैं।

    इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई है और यह 10 अक्टूबर तक चलेगा। इस अवधि में श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार संबंधित श्राद्ध तिथि पर तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। कई परिवारों के लिए पितृपक्ष का पहला दिन विशेष महत्व रखता है और इसी वजह से पहले दिन भी घाटों पर अच्छी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

    शिवपुरी के बाणगंगा और भदैयाकुंड पर सुबह से बढ़ती भीड़ के बीच धार्मिक वातावरण बना रहा। घाटों पर परिवारों के समूह दिखाई दिए जो अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा करते नजर आए। जैसे जैसे दिन आगे बढ़ा वैसे वैसे दोनों स्थानों पर लोगों की आवाजाही बढ़ती गई।

    पितृपक्ष के दौरान शिवपुरी में आने वाले दिनों में भी इन धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की संभावना है। अलग अलग तिथियों पर लोग अपने पूर्वजों के लिए निर्धारित श्राद्ध कर्म करेंगे। इस दौरान तर्पण पिंडदान और श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों के जरिए परिवार अपने पितरों का स्मरण करेंगे और उनकी आत्मा की शांति की कामना करेंगे।

  • धर्म कर्म: फाल्गुन अमावस्या पर पितरों के लिए करें यह पवित्र कर्म, पितृ दोष से मिलेगी मुक्ति

    धर्म कर्म: फाल्गुन अमावस्या पर पितरों के लिए करें यह पवित्र कर्म, पितृ दोष से मिलेगी मुक्ति


    नई दिल्ली। फाल्गुन मास की अमावस्या हिंदू धर्म में पितरों की शांति और पितृ दोष से मुक्ति के लिए एक अत्यंत शुभ और पुण्यदायी दिन माना जाता है। इस वर्ष यह तिथि 16 फरवरी, 2026 की शाम 05:34 बजे से प्रारंभ होकर 17 फरवरी, 2026 की सायं 05:30 बजे तक रहेगी, इसलिए साल 2026 में फाल्गुन अमावस्या 17 फरवरी, मंगलवार को मनाई जाएगी।

    धार्मिक मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा अर्चना, तर्पण पिंडदान और दान पुण्य कर्म से पितृ दोष होने पर भी मुक्ति प्राप्त होती है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। यह अवसर आत्मिक शुद्धि, मृत्यु के बाद के कर्जों का निवारण तथा परिवार में सुख शांति, समृद्धि और संतुलन लाने के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

    सबसे पहले पवित्र स्नान करना शुभफलदायी होता है। ब्रह्म मुहूर्त या सुबह जल्दी उठकर आप पवित्र नदी जैसे गंगा में स्नान करें। यदि नदी का स्नान संभव न हो, तो घर पर गंगाजल में तिल, कुश और काले तिल मिलाकर स्नान करना भी पुण्यदायी माना जाता है। स्नान के बाद अपने पूर्वजों को पितृ तर्पण और पिंडदान करना चाहिए, जिसमें जल, तिल, अन्न और शुद्ध मन से प्रार्थना शामिल हो।

    तर्पण करते समय दक्षिण की ओर मुख करके जल को कंठ के पास से बहाते हुए ॐ पितृभ्यो नमः जैसे मंत्र का उच्चारण किया जाता है, जिससे पूर्वजों को शांति स्वास्थ्य और मोक्ष प्राप्त होने की मान्यता प्रचलित है। पिंडदान में शुद्ध अन्न और तिल से बनाए गए पिंड को गंगा यमुना जैसे पवित्र नदी के तट पर या किसी पवित्र स्थान पर अर्पित करें। इससे पितृलोक में निवास करने वाले पूर्वजों को संतुष्टि और पुण्य की प्राप्ति होती है।

    अमावस्या तिथि में दान पुण्य का भी विशेष महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन कराना, गरीबों को अन्न, वस्त्र, मसाले, दाल चावल आदि दान करना तथा गो दैनिक सेवा या पशु पक्षियों को पानी भोजन देना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इससे जीवन में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और संपन्नता आती है।

    शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना और उसके चारों ओर सात परिक्रमा करना लाभकारी होता है। इससे पितरों की शांति और परिवार में सुख समृद्धि का आगमन होता है, साथ ही गृहस्थ जीवन में बाधाएँ कम होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    धार्मिक परंपरा के अनुसार अमावस्या पितरों से जुड़ी तिथि है, इसलिए इस दिन स्नान, दान पुण्य, तर्पण पिंडदान तथा मंत्र जाप करने से पितृ दोष से मुक्ति पाई जा सकती है और पूर्वजों की कृपा प्राप्त होती है।