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  • कॉमनवेल्थ में मध्य प्रदेश का दम, यामिनी और अजय बाबू ने जीते रजत पदक, सरकार देगी 25-25 लाख और नौकरी

    कॉमनवेल्थ में मध्य प्रदेश का दम, यामिनी और अजय बाबू ने जीते रजत पदक, सरकार देगी 25-25 लाख और नौकरी


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रदेश का मान बढ़ाया है। जूडो में सागर जिले की किसान परिवार की बेटी यामिनी मौर्य और वेटलिफ्टिंग में अजय बाबू वल्लुरी ने रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया। दोनों खिलाड़ियों की इस उपलब्धि पर मध्य प्रदेश सरकार ने 25-25 लाख रुपए की पुरस्कार राशि और खेल नीति के तहत सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने दोनों खिलाड़ियों को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने पूरे प्रदेश को गौरवान्वित किया है और यह सफलता प्रदेश के युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

    महिलाओं की 57 किलोग्राम जूडो स्पर्धा में यामिनी मौर्य ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल तक का सफर तय किया। स्वर्ण पदक के मुकाबले में उनका सामना इंग्लैंड की असेल्या टोपराक से हुआ, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद रजत पदक जीतकर उन्होंने मध्य प्रदेश और देश का नाम रोशन किया। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि यामिनी एक सामान्य किसान परिवार से आती हैं। उनके पिता हरिओम मौर्य खेती करते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों को पूरा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

    यामिनी के कोच दीपक रजक ने बताया कि उन्होंने पहली बार यामिनी की प्रतिभा को पुराने सदर स्कूल के मैदान में खेलते हुए पहचाना था। उन्होंने परिवार को समझाया कि बेटी में असाधारण क्षमता है और उसे नियमित प्रशिक्षण मिलना चाहिए। शुरुआत में आर्थिक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण परिवार थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन बाद में उन्होंने यामिनी का पूरा साथ दिया। लगातार मेहनत और अनुशासन के दम पर यामिनी ने राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बनाई और अब कॉमनवेल्थ गेम्स का रजत पदक जीतकर प्रदेश का गौरव बढ़ाया है।

    यामिनी के चाचा श्रीनाथ मौर्य ने कहा कि परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन आज उनकी उपलब्धि पूरे परिवार के संघर्ष का परिणाम है। उन्होंने कहा कि यदि बेटियों को खेल और शिक्षा में आगे बढ़ने का अवसर मिले तो वे देश के लिए बड़ी सफलताएं हासिल कर सकती हैं। यामिनी की सफलता इस बात का जीवंत उदाहरण है।

    वहीं पुरुषों की 79 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में अजय बाबू वल्लुरी स्वर्ण पदक से केवल एक किलोग्राम दूर रह गए। मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले अजय के पिता भोपाल में पदस्थ हैं और इसी कारण वह लंबे समय से मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अजय ने कुल 330 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। उन्होंने स्नैच में 149 किलोग्राम वजन उठाकर नया गेम्स रिकॉर्ड बनाया, जबकि क्लीन एंड जर्क में 181 किलोग्राम वजन उठाकर गेम्स रिकॉर्ड की बराबरी भी की।

    हालांकि अंतिम प्रयास में मलेशिया के एरी हिदायत मुहम्मद ने 184 किलोग्राम वजन उठाकर नया गेम्स रिकॉर्ड बना दिया। उनका कुल स्कोर 331 किलोग्राम पहुंच गया और वे स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहे। अजय बाबू महज एक किलोग्राम के अंतर से गोल्ड से चूक गए, लेकिन उनका प्रदर्शन पूरे प्रतियोगिता के दौरान बेहद शानदार रहा।

    दूसरी ओर महिलाओं की 10000 मीटर रेस वॉक में भारत की रवीना गायकवाड़ का अभियान निराशाजनक रहा। रेस वॉकिंग नियमों के उल्लंघन पर उन्हें तीन रेड कार्ड मिलने के बाद अयोग्य घोषित कर दिया गया और उनका सफर वहीं समाप्त हो गया।

    मध्य प्रदेश के दो खिलाड़ियों की इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने साबित कर दिया है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती। यामिनी और अजय बाबू की सफलता प्रदेश के हजारों युवा खिलाड़ियों को बड़े सपने देखने और उन्हें मेहनत के दम पर पूरा करने की प्रेरणा देती रहेगी।

  • कॉमनवेल्थ में रजत जीतकर दिखाई संवेदनशीलता, लवलीना ने असम के बाढ़ पीड़ितों को समर्पित किया पदक

    कॉमनवेल्थ में रजत जीतकर दिखाई संवेदनशीलता, लवलीना ने असम के बाढ़ पीड़ितों को समर्पित किया पदक


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय महिला मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन ने भले ही स्वर्ण पदक से मामूली दूरी पर रुककर रजत पदक जीता हो, लेकिन उन्होंने अपनी संवेदनशील सोच और मानवीय भावना से पूरे देश का दिल जीत लिया। ग्लासगो में शानदार प्रदर्शन के बाद लवलीना ने अपना पहला कॉमनवेल्थ पदक असम के बाढ़ पीड़ितों को समर्पित कर दिया। उनकी इस भावनात्मक पहल पर उनके पिता टिकेन बोरगोहेन ने गर्व जताते हुए कहा कि बेटी ने खेल के साथ-साथ इंसानियत का भी बेहतरीन उदाहरण पेश किया है।

    महिलाओं की 75 किलोग्राम बॉक्सिंग स्पर्धा के फाइनल में लवलीना का मुकाबला ऑस्ट्रेलिया की अमासो ग्रीनटी से हुआ, जिसमें उन्हें 1-4 से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि हार के बावजूद उन्होंने अपने करियर का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया। मुकाबले के बाद उन्होंने इस उपलब्धि को असम में बाढ़ से प्रभावित लोगों को समर्पित करने का फैसला किया, जिसने उनकी जीत को और भी खास बना दिया।

    लवलीना के पिता टिकेन बोरगोहेन ने बताया कि बेटी प्रतियोगिता के दौरान भी लगातार असम के बाढ़ पीड़ितों की चिंता कर रही थी। उन्होंने कहा कि लवलीना ने उनसे फोन पर बातचीत के दौरान आग्रह किया था कि जितना संभव हो सके बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद की जाए। इसी सोच के साथ लवलीना अकादमी की ओर से लगातार राहत कार्यों में सहयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बेटी द्वारा अपना पदक बाढ़ पीड़ितों को समर्पित करना पूरे परिवार के लिए गर्व का विषय है।

    उन्होंने कहा कि फाइनल में हार का थोड़ा दुख जरूर है, लेकिन सिल्वर मेडल भी किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। यह लवलीना का कॉमनवेल्थ गेम्स में पहला पदक है और पूरे परिवार के लिए बेहद खुशी का क्षण है। उनके अनुसार पदक जीतने से भी बड़ी बात यह है कि लवलीना ने अपनी सफलता को जरूरतमंद लोगों के नाम कर दिया।

    लवलीना की इस उपलब्धि पर देशभर से उन्हें बधाइयां मिलीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने उन्हें शानदार प्रदर्शन के लिए शुभकामनाएं दीं। टिकेन बोरगोहेन ने इन सभी नेताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि खिलाड़ियों को मिलने वाला यह सम्मान उनके मनोबल को और मजबूत करता है। उन्होंने बताया कि मुकाबले के बाद लवलीना से उनकी संक्षिप्त बातचीत हुई थी और वह रजत पदक जीतने से संतुष्ट होने के साथ-साथ आगे और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए भी उत्साहित हैं।

    मुकाबले के बाद लवलीना ने भी स्वीकार किया कि स्वर्ण पदक नहीं जीत पाने का थोड़ा अफसोस जरूर है, लेकिन भारतीय टीम के शानदार प्रदर्शन ने उनकी खुशी बढ़ा दी। उन्होंने कहा कि यह उनका पहला कॉमनवेल्थ गेम्स पदक है, इसलिए इसकी अहमियत उनके लिए बेहद खास है। उनका मानना है कि यदि वह देश के लिए स्वर्ण जीत पातीं तो खुशी और अधिक होती, लेकिन अब उनका पूरा ध्यान आगामी एशियाई खेलों पर है, जहां वह स्वर्ण पदक जीतने के लक्ष्य के साथ उतरेंगी।

    लवलीना बोरगोहेन ने अपने प्रदर्शन से यह साबित किया कि एक सच्चा खिलाड़ी केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं रहता बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाता है। खेल के मैदान में संघर्ष और मैदान के बाहर संवेदनशीलता का यह अनूठा उदाहरण उन्हें देश के करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बनाता है। उनकी उपलब्धि और मानवीय सोच आने वाली पीढ़ियों के खिलाड़ियों को भी समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश देती है।

  • आर्थिक तंगी से कॉमनवेल्थ पोडियम तक, लवप्रीत सिंह ने सिल्वर जीतकर बढ़ाया भारत का मान

    आर्थिक तंगी से कॉमनवेल्थ पोडियम तक, लवप्रीत सिंह ने सिल्वर जीतकर बढ़ाया भारत का मान


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय वेटलिफ्टर लवप्रीत सिंह ने अपने शानदार प्रदर्शन से पूरे देश को गौरवान्वित कर दिया। पुरुषों के 110+ किलोग्राम भार वर्ग में उन्होंने कुल 388 किलोग्राम वजन उठाकर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। गोल्ड मेडल उनसे केवल एक किलोग्राम दूर रह गया, लेकिन उनकी मेहनत, संघर्ष और जज्बे ने करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया। लवप्रीत ने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने आर्थिक अभाव भी कभी बड़ी बाधा नहीं बनते।

    पंजाब के अमृतसर जिले के बाल सचंदर गांव में जन्मे लवप्रीत का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके पिता दर्जी का काम करते हैं, जबकि दादा सब्जियां बेचकर परिवार का गुजारा करते थे। सीमित आय के बावजूद परिवार ने बेटे के सपनों पर कभी समझौता नहीं किया। पिता ने सिलाई मशीन की आवाज के बीच बेटे के लिए मेडल जीतने का सपना संजोया और हर मुश्किल परिस्थिति में उसका साथ दिया। परिवार ने अपनी जरूरतों में कटौती की, लेकिन लवप्रीत की ट्रेनिंग और खानपान में कोई कमी नहीं आने दी।

    महज 13 वर्ष की उम्र में लवप्रीत ने वेटलिफ्टिंग की दुनिया में कदम रखा। स्थानीय कोचों के मार्गदर्शन में शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। उनकी प्रतिभा और अनुशासन ने जल्द ही उन्हें पहचान दिलाई। वर्ष 2015 में भारतीय नौसेना में नौकरी मिलने के बाद उनके करियर को नई दिशा मिली। इसके बाद उन्हें पटियाला स्थित राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में अभ्यास का अवसर मिला, जहां उनकी प्रतिभा और अधिक निखरी।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लवप्रीत ने लगातार अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। उन्होंने कॉमनवेल्थ जूनियर चैंपियनशिप में स्वर्ण और एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर भारतीय वेटलिफ्टिंग में अपनी मजबूत पहचान बनाई। बाद में 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य और कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने खुद को देश के भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में शामिल कर लिया।

    ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लवप्रीत का प्रदर्शन यादगार रहा। स्नैच राउंड में उन्होंने 176 किलोग्राम वजन उठाकर नया कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड बनाया और प्रतियोगिता में बढ़त हासिल की। इसके बाद क्लीन एंड जर्क में उन्होंने 212 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। अंतिम प्रयास में उन्होंने 217 किलोग्राम वजन उठाकर गोल्ड पर कब्जा जमाने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका। इसी कारण वह कुल 388 किलोग्राम के साथ सिल्वर पर रहे, जबकि न्यूजीलैंड के डेविड लिटी ने 389 किलोग्राम उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

    हालांकि गोल्ड मेडल उनसे सिर्फ एक किलोग्राम दूर रह गया, लेकिन उनके संघर्ष और प्रदर्शन ने उन्हें देश का हीरो बना दिया। साधारण परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर रिकॉर्ड बनाना और भारत के लिए पदक जीतना किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। लवप्रीत की सफलता यह संदेश देती है कि मेहनत, अनुशासन और परिवार का विश्वास किसी भी सपने को हकीकत में बदल सकता है। उनका यह सिल्वर मेडल केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।

  • भारत की झोली में एक और मेडल, लवप्रीत सिंह ने वेटलिफ्टिंग में किया कमाल

    भारत की झोली में एक और मेडल, लवप्रीत सिंह ने वेटलिफ्टिंग में किया कमाल

    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के वेटलिफ्टर लवप्रीत सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश की झोली में एक और रजत पदक डाल दिया। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित पुरुषों के 110+ किलोग्राम भार वर्ग मुकाबले में लवप्रीत ने कुल 388 किलोग्राम वजन उठाकर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। वह स्वर्ण पदक से केवल एक किलोग्राम के मामूली अंतर से चूक गए। न्यूजीलैंड के डेविड लिटी ने 389 किलोग्राम वजन उठाकर गोल्ड मेडल जीता, जबकि इंग्लैंड के एंड्रयू ग्रिफिथ्स 356 किलोग्राम के साथ कांस्य पदक हासिल करने में सफल रहे।

    मुकाबले की शुरुआत से ही लवप्रीत सिंह शानदार लय में नजर आए। स्नैच स्पर्धा में उन्होंने अपने पहले प्रयास में 168 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद दूसरे प्रयास में 173 किलोग्राम का वजन भी आसानी से उठाकर अपनी दावेदारी मजबूत कर दी। तीसरे और अंतिम प्रयास में उन्होंने 176 किलोग्राम वजन उठाकर प्रतियोगिता में बढ़त बना ली। इस प्रदर्शन के दम पर वह स्नैच में शीर्ष स्थान पर रहे और न्यूजीलैंड के डेविड लिटी पर 10 किलोग्राम की बढ़त हासिल कर चुके थे।

    हालांकि असली मुकाबला क्लीन एंड जर्क में देखने को मिला। लवप्रीत ने पहले 205 किलोग्राम और फिर 212 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद उन्होंने स्वर्ण पदक पक्का करने के इरादे से 217 किलोग्राम की चुनौती ली, लेकिन अंतिम प्रयास सफल नहीं हो सका। दूसरी ओर डेविड लिटी ने शानदार वापसी करते हुए क्लीन एंड जर्क में 223 किलोग्राम वजन उठाया और कुल 389 किलोग्राम के साथ महज एक किलोग्राम की बढ़त बनाकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। लवप्रीत का कुल स्कोर 388 किलोग्राम रहा, जिसने उन्हें रजत पदक दिलाया।

    पंजाब के अमृतसर जिले के बाल सचंदर गांव में 6 सितंबर 1997 को जन्मे लवप्रीत सिंह की सफलता संघर्ष और मेहनत की प्रेरक कहानी है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वर्ष 2010 में महज 13 वर्ष की उम्र में वेटलिफ्टिंग शुरू की। स्थानीय कोचों के मार्गदर्शन में लगातार अभ्यास करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब का प्रतिनिधित्व किया और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

    साल 2017 में उन्हें पटियाला स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में जगह मिली, जहां उनकी प्रतिभा को और निखार मिला। शुरुआत में उन्होंने 105 किलोग्राम वर्ग में खेलते हुए जूनियर कॉमनवेल्थ और एशियाई जूनियर प्रतियोगिताओं में पदक जीते। बाद में अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग महासंघ द्वारा नई भार श्रेणियां लागू होने के बाद वह 109 किलोग्राम वर्ग में पहुंचे और वहां भी शानदार प्रदर्शन जारी रखा।

    लवप्रीत इससे पहले 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीत चुके हैं। इसके अलावा 2022 कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक भी अपने नाम किया था। अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में रजत पदक जीतकर उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह भारत के सबसे भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में शामिल हैं। भले ही इस बार गोल्ड उनसे सिर्फ एक किलोग्राम दूर रह गया, लेकिन उनका प्रदर्शन भारतीय खेल प्रेमियों के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय बन गया।

  • CWG 2026: 10,000 मीटर में इतिहास रचने वाले गुलवीर सिंह को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की शुभकामनाएं

    CWG 2026: 10,000 मीटर में इतिहास रचने वाले गुलवीर सिंह को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की शुभकामनाएं


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन लगातार जारी है। प्रतियोगिता के छठे दिन भारत के स्टार लंबी दूरी के धावक गुलवीर सिंह ने पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह इस स्पर्धा में कॉमनवेल्थ गेम्स का पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बन गए हैं। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए देश का गौरव बढ़ाने वाला खिलाड़ी बताया।

    राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी संदेश में कहा गया कि ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पुरुषों की 10,000 मीटर स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीतकर गुलवीर सिंह ने भारत के लिए इतिहास रच दिया है। राष्ट्रपति ने कहा कि पूरे देश को उनकी इस उपलब्धि पर गर्व है और भविष्य में भी वे इसी तरह देश के लिए नई सफलताएं हासिल करें, यही शुभकामना है।

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी गुलवीर सिंह को बधाई देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के सपूत और भारतीय सेना के नायब सूबेदार ने अपने शानदार प्रदर्शन से देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है। उन्होंने कहा कि गुलवीर की यह उपलब्धि कड़ी मेहनत, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

    ग्लासगो के स्कॉट्सटाउन स्टेडियम में आयोजित फाइनल मुकाबले में गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर की दौड़ 27 मिनट 49.78 सेकंड में पूरी कर रजत पदक अपने नाम किया। ऑस्ट्रेलिया के काई रॉबिन्सन ने 27 मिनट 48.93 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि आइल ऑफ मैन के डेविड मुलार्की 27 मिनट 50.28 सेकंड के समय के साथ कांस्य पदक हासिल करने में सफल रहे।

    उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव में 1 जून 1998 को जन्मे गुलवीर सिंह भारतीय सेना में नायब सूबेदार के पद पर कार्यरत हैं। उनका एथलेटिक्स सफर गांव की पगडंडियों और खेतों में दौड़ लगाने से शुरू हुआ था, जब वे सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे थे। वर्ष 2018 में भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में शामिल होने के बाद उन्होंने लंबी दूरी की दौड़ में लगातार शानदार प्रदर्शन किया और देश के शीर्ष धावकों में अपनी पहचान बनाई।

    गुलवीर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान 2023 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 5,000 मीटर दौड़ का कांस्य पदक जीतकर बनाई। इसके बाद 2022 एशियाई खेलों में 10,000 मीटर स्पर्धा में भी कांस्य पदक अपने नाम किया। वर्ष 2025 में दक्षिण कोरिया में आयोजित एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 5,000 मीटर और 10,000 मीटर दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतकर एशिया के शीर्ष लंबी दूरी के धावकों में अपनी मजबूत जगह बनाई।

    अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मिला यह ऐतिहासिक रजत पदक गुलवीर सिंह के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल हो गया है। उनकी इस सफलता ने न केवल भारतीय एथलेटिक्स को नई पहचान दी है, बल्कि देश के युवा खिलाड़ियों के लिए भी एक नई प्रेरणा प्रस्तुत की है।

  • भारत की मेडल झोली हुई और मजबूत, राजा मुथुपंडी के सिल्वर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री मोदी ने जताया गर्व

    भारत की मेडल झोली हुई और मजबूत, राजा मुथुपंडी के सिल्वर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री मोदी ने जताया गर्व


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन लगातार जारी है और देश के पदकों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। वेटलिफ्टिंग में भारत को एक और बड़ी सफलता तब मिली जब तमिलनाडु के प्रतिभाशाली वेटलिफ्टर राजा मुथुपंडी ने पुरुषों के 65 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक अपने नाम कर लिया। उनकी इस उपलब्धि ने पूरे देश को गौरवान्वित किया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी शानदार सफलता पर बधाई देते हुए उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दी हैं।

    राजा मुथुपंडी ने पूरे मुकाबले के दौरान दमदार प्रदर्शन करते हुए कुल 286 किलोग्राम वजन उठाया। उन्होंने स्नैच में 126 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 160 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। उनका प्रदर्शन पूरे मुकाबले में बेहद संतुलित और प्रभावशाली रहा। हालांकि स्वर्ण पदक मलेशिया के अजनील बिदिन ने जीता जिन्होंने रिकॉर्ड 299 किलोग्राम वजन उठाकर पहला स्थान हासिल किया लेकिन राजा मुथुपंडी का रजत पदक भारत के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं माना जा रहा है।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी करते हुए राजा मुथुपंडी को बधाई दी और कहा कि पुरुषों के 65 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग वर्ग में रजत पदक जीतकर उन्होंने पूरे देश का सम्मान बढ़ाया है। राष्ट्रपति ने कहा कि देश को उनकी उपलब्धि पर गर्व है और भविष्य की प्रतियोगिताओं के लिए उन्हें शुभकामनाएं दीं।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजा मुथुपंडी की उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स में वेटलिफ्टिंग से भारत के लिए एक और पदक आना बेहद गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि राजा की सफलता से हर भारतीय खुश है और उनका प्रदर्शन देश के युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करेगा। प्रधानमंत्री ने उनके उज्ज्वल भविष्य और आगामी प्रतियोगिताओं में और बड़ी सफलताओं की कामना भी की।

    राजा मुथुपंडी का यह पदक भारत के लिए बेहद अहम साबित हुआ क्योंकि इससे पहले भारतीय वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह चनंबम पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीत चुके थे जबकि स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। मीराबाई ने लगातार तीसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम और मजबूत कर लिया है।

    भारतीय वेटलिफ्टिंग टीम का यह प्रदर्शन साफ संकेत देता है कि देश के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। शुरुआती दिनों में ही वेटलिफ्टिंग में मिले इन पदकों ने भारत की पदक तालिका को मजबूत किया है और अन्य खिलाड़ियों का भी मनोबल बढ़ाया है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही लय बरकरार रही तो भारत इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में अपने पिछले प्रदर्शन से भी बेहतर नतीजे हासिल कर सकता है।

    भारत के खिलाड़ियों का लगातार शानदार प्रदर्शन यह साबित कर रहा है कि वर्षों की मेहनत आधुनिक प्रशिक्षण और बेहतर खेल सुविधाओं का सकारात्मक परिणाम अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई देने लगा है। राजा मुथुपंडी का रजत पदक भी इसी सफलता की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है जिसने देशवासियों को एक और गर्व का अवसर दिया है।