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  • SIR प्रक्रिया पर बॉम्बे हाईकोर्ट की चुनाव आयोग को फटकार, बिना सुनवाई नाम हटाने पर कानून का पालन करने को कहा

    SIR प्रक्रिया पर बॉम्बे हाईकोर्ट की चुनाव आयोग को फटकार, बिना सुनवाई नाम हटाने पर कानून का पालन करने को कहा


    नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। गोवा में SIR के दौरान एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा कि किस कानून के तहत किसी व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिए बिना मतदाता सूची से उसका नाम हटाया जा सकता है। अदालत ने चुनाव आयोग की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी मतदाता सूची से छूट न जाए।

    मामला गोवा में SIR के दौरान एक परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने से जुड़ा है। इस मामले में परिवार का नाम हटाने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। इसी बिंदु पर सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाना है तो उससे पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने बिना सुनवाई के नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग से संबंधित कानूनी आधार स्पष्ट करने को कहा।

    सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से तकनीक के बजाय कानून और नियमों के अनुसार प्रक्रिया अपनाने को कहा। अदालत ने SIR के दौरान इस्तेमाल की जा रही प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट की टिप्पणी थी कि मौजूदा प्रक्रिया को देखने पर ऐसा लग रहा है कि कानून और नियमों को कुछ समय के लिए किनारे कर दिया गया है और काम सॉफ्टवेयर के हिसाब से किया जा रहा है। इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण में तकनीकी प्रक्रिया के साथ कानूनी प्रावधानों के पालन के महत्व पर सवाल उठाया।

    अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित चुनाव अधिकारी को भी कोर्ट में बुलाया है। हाईकोर्ट की सुनवाई का केंद्र यह रहा कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति या परिवार के सदस्यों के नाम हटाने की कार्रवाई किस कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई और क्या संबंधित लोगों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग से उस कानून का आधार बताने को कहा जिसके तहत बिना सुनवाई के किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। मामले में गोवा के परिवार के छह सदस्यों के नाम हटाए जाने की कार्रवाई इसी प्रक्रिया के संदर्भ में जांच के दायरे में है।

    बॉम्बे हाईकोर्ट की इस सुनवाई में SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया, सुनवाई का अवसर और कानून के पालन से जुड़े सवाल प्रमुख रहे। अदालत ने कहा कि तकनीकी व्यवस्था के आधार पर प्रक्रिया चलाने के बजाय संबंधित कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही, मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है कि किसी मतदाता का नाम अनावश्यक रूप से छूट न जाए। मामले में संबंधित चुनाव अधिकारी को अदालत के समक्ष बुलाए जाने के बाद अब नाम हटाने की प्रक्रिया और उसके कानूनी आधार से जुड़े पहलुओं पर सुनवाई आगे बढ़ेगी।

  • मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय, SIR को कानूनी दायरे में माना, आगे की लड़ाई लगभग समाप्त

    मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय, SIR को कानूनी दायरे में माना, आगे की लड़ाई लगभग समाप्त

    नई दिल्ली ।सुप्रीम कोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर दायर याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और अधिकार क्षेत्र को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण और पुनरीक्षण की प्रक्रिया चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है और इसे किसी भी तरह से उसकी शक्तियों से बाहर का कदम नहीं माना जा सकता। इस निर्णय के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में चल रही बहस को एक स्पष्ट दिशा मिलती दिखाई दे रही है। अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाने के लिए किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण को मनमाना या असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता, बशर्ते वह निर्धारित कानूनी ढांचे के भीतर किया गया हो।

    अदालत ने अपने विस्तृत रुख में यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का उद्देश्य किसी भी नागरिक को मतदाता सूची से अनुचित रूप से बाहर करना नहीं है, बल्कि सूची में केवल पात्र और वैध मतदाताओं को शामिल करना है। यह भी कहा गया कि दस्तावेजों की जांच और उनकी विश्वसनीयता के आधार पर नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय लेना आयोग की प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। अदालत ने यह भी माना कि इस प्रक्रिया को नागरिकता तय करने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह अधिकार संविधान और कानून के तहत किसी अन्य प्राधिकरण के पास होता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया किसी भी मौजूदा कानून का उल्लंघन नहीं करती है। अदालत ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व से जुड़े कानून और संविधान के प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची को अद्यतन और सही करने का पूरा अधिकार प्राप्त है। इस निर्णय के माध्यम से अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि विशेष परिस्थितियों में व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण की आवश्यकता पड़ सकती है और इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि यह प्रक्रिया कानूनी सीमाओं के भीतर हो।

    इस फैसले के बाद याचिकाकर्ताओं के सामने कानूनी रूप से सीमित विकल्प बचे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अब इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है, जिसमें अदालत से अपने ही निर्णय पर पुनः विचार करने की मांग की जाती है। इसके अलावा एक अंतिम विकल्प के रूप में क्यूरेटिव याचिका भी दायर की जा सकती है, जो बेहद सीमित परिस्थितियों में स्वीकार की जाती है। हालांकि इन दोनों विकल्पों में सफलता की संभावना को लेकर कानूनी जानकार बहुत अधिक उम्मीद नहीं जताते।

    कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने चुनाव आयोग की भूमिका को और स्पष्ट कर दिया है तथा मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया को संवैधानिक वैधता प्रदान कर दी है। अब यह मामला लगभग अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ता दिख रहा है, जहां आगे की कानूनी लड़ाई केवल सीमित दायरों में ही संभव रह गई है।

  • West-Bangal: SIR प्रक्रिया को गति देने के लिए 150 बाहरी जजों की तैनाती… लेकिन भाषा बनी बड़ी चुनौती

    West-Bangal: SIR प्रक्रिया को गति देने के लिए 150 बाहरी जजों की तैनाती… लेकिन भाषा बनी बड़ी चुनौती


    कोलकाता।
    प. बंगाल (West-Bangal) में एसआईआर प्रक्रिया (SIR Process) को रफ्तार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के निर्देश पर दूसरे राज्यों से 150 से अधिक न्यायाधीशों की तैनाती की गई है। जमीनी स्तर पर इन बाहरी जजों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है बांग्ला भाषा को समझना। कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) के पूर्व न्यायाधीशों को भी इस प्रक्रिया में जोड़ा गया है। ये सभी दावों-आपत्तियों के निपटारे, दस्तावेजों के सत्यापन और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया में लगे हैं।

    इतनी बड़ी न्यायिक तैनाती के बावजूद कामकाज में सबसे बड़ी अड़चन भाषा बन रही है। एसआईआर के तहत आने वाले अधिकांश फॉर्म, दस्तावेज व गवाहों के बयान बांग्ला में हैं, जिन्हें दूसरे राज्यों से आए न्यायिक अधिकारी सीधे तौर पर समझ नहीं पा रहे हैं। बाहरी राज्य से आए एक न्यायाधीश ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि रोज सैकड़ों फाइलें देखनी होती हैं, जो बांग्ला में हैं। ऐसे में हर केस को समझने के लिए अनुवाद पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, काम प्रभावित न हो, इसके लिए कई न्यायाधीशों को ट्रांसलेटर खुद रखने पड़ रहे हैं।


    फाइलें निपटाने में देरी संभव

    न्यायाधीशों के सामने भाषा की चुनौती का सीधा असर प्रक्रिया पर पड़ सकता है। बांग्ला न समझ पाने के कारण फाइलों के अनुवाद पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे मामलों के निपटारे में देरी संभव है। चुनाव आयोग के अनुसार, पहली सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट सोमवार को जारी होगी। इसमें उन वोटरों के नाम शामिल होंगे, जिनके दावे सही पाए गए हैं। फिर अपील और ट्रिब्यूनल प्रक्रिया से अंतिम सूची तैयार होगी।


    एसआईआर की यह स्थिति

    कुल दावे-आपत्तियां : 60 लाख से अधिक, 27 लाख मामले अब तक निपटाए गए।
    हटाए गए नाम : करीब 63 लाख से ज्यादा, 30 लाख मामले पुनर्विचार/विचाराधीन…बड़े पैमाने पर जोड़-घटाव जारी है।

  • बंगाल में संवैधानिक संकट: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी पर लगाया भड़काने का आरोप; चुनाव अधिकारियों के लिए मांगी विशेष सुरक्षा

    बंगाल में संवैधानिक संकट: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी पर लगाया भड़काने का आरोप; चुनाव अधिकारियों के लिए मांगी विशेष सुरक्षा


    नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन SIR को लेकर निर्वाचन आयोग ECI और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रही जंग अब सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में पहुँच गई है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक बेहद तीखे हलफनामे में चुनाव आयोग ने बंगाल की स्थिति को ‘असाधारण’ करार देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आयोग का कहना है कि राज्य में चुनाव अधिकारियों को न केवल डराया-धमकाया जा रहा है, बल्कि मुख्यमंत्री के सार्वजनिक भाषणों से अधिकारियों के खिलाफ नफरत और हिंसा का माहौल बनाया जा रहा है।

    अधिकारियों की जान को खतरा और पुलिस की चुप्पी चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल में चुनावी मशीनरी को पंगु बनाने का प्रयास किया जा रहा है। आयोग ने हलफनामे में जिक्र किया कि मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘हरि दास’ नामक एक माइक्रो-ऑब्जर्वर का नाम सार्वजनिक रूप से लिया, जिससे उस अधिकारी की जान खतरे में पड़ गई है। हालात इतने बेकाबू हैं कि मुर्शिदाबाद के 9 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने सामूहिक इस्तीफा देते हुए काम करने से मना कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन पर जानलेवा हमले हो रहे हैं और राज्य पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। उत्तर दिनाजपुर में तो 700 लोगों की भीड़ ने उस केंद्र पर ही धावा बोल दिया जहाँ सूची संशोधन का कार्य चल रहा था। आयोग ने स्पष्ट कहा कि पुलिस FIR दर्ज करने में भी आनाकानी कर रही है।

    देश का इकलौता राज्य जहाँ CEO को मिली ‘Y+’ सुरक्षा चुनाव आयोग ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि बंगाल की जमीनी हकीकत देश के अन्य राज्यों से पूरी तरह अलग और डरावनी है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को ‘Y+ श्रेणी’ की सुरक्षा प्रदान करनी पड़ी है। पूरे भारत में बंगाल इकलौता ऐसा राज्य बन गया है जहाँ एक चुनाव अधिकारी को अपनी सुरक्षा के लिए कमांडो के घेरे में रहना पड़ रहा है। आयोग ने दलील दी कि जहाँ अन्य राज्यों में SIR प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है, वहीं बंगाल में राजनीतिक हस्तक्षेप ने संकट खड़ा कर दिया है।

    ममता बनर्जी का पक्ष:लोकतंत्र को खतरा दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका की पैरवी करते हुए चुनाव आयोग की नीयत पर हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर केवल बंगाल में ही ‘माइक्रो-ऑब्जर्वर्स’ की नियुक्ति क्यों की जा रही है? मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि करीब 58 लाख वैध मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने मांग की कि 2026 का विधानसभा चुनाव पुरानी सूची के आधार पर ही हो और वर्तमान संशोधन प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए।

    सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फिलहाल चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह नामों की त्रुटियों को सुधारते समय संवेदनशीलता बरते ताकि किसी भी असली नागरिक का मताधिकार न छीने। अब सोमवार को होने वाली अगली सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं कि क्या बंगाल में चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो पाएगी या हिंसा का यह साया गहराता जाएगा।