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  • रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा

    रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा


    नई दिल्ली । नींद हमारे शरीर और दिमाग को आराम देने के साथ अगले दिन बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार करती है। यही वजह है कि पर्याप्त नींद को स्वस्थ जीवनशैली का बेहद जरूरी हिस्सा माना जाता है। अगर रात की नींद बार-बार अधूरी रह रही है तो इसका असर सिर्फ सुबह की थकान या दिनभर की सुस्ती तक सीमित नहीं रहता बल्कि धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार याददाश्त एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगता है। गुस्सा जल्दी आना छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन महसूस होना किसी काम पर ध्यान केंद्रित न कर पाना और जरूरी बातें भूल जाना कई बार नींद पूरी न होने से भी जुड़ा हो सकता है।

    एक रात नींद कम होने पर अगले दिन थकान सिरदर्द सुस्ती और काम करने में परेशानी महसूस होना सामान्य हो सकता है। कभी-कभार ऐसा होने पर आमतौर पर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती लेकिन जब नींद की कमी लगातार बनी रहती है तो इसका असर रोजमर्रा की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। व्यक्ति को छोटे-छोटे फैसले लेने में भी परेशानी हो सकती है और पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान भटकने की समस्या बढ़ सकती है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न मिलने की स्थिति में शरीर और दिमाग दोनों पर दबाव बढ़ता है।

    नींद की कमी का सीधा असर व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। पर्याप्त आराम न मिलने पर व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में भी ज्यादा चिड़चिड़ा हो सकता है और छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता है। भावनाओं को नियंत्रित करना भी मुश्किल महसूस हो सकता है। यही समस्या अगर लंबे समय तक जारी रहे तो तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। नींद और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध काफी गहरा माना जाता है और लगातार नींद की समस्या रहने पर चिंता तथा अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

    याददाश्त और एकाग्रता पर भी नींद की कमी का असर पड़ता है। रात में शरीर और दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिलने पर अगले दिन किसी काम पर ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। चीजें याद रखने में दिक्कत हो सकती है और काम या पढ़ाई का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। बच्चों और किशोरों के लिए पर्याप्त नींद विशेष रूप से जरूरी है क्योंकि नींद उनकी सीखने की क्षमता ध्यान याददाश्त और व्यवहार से जुड़ी होती है। इसलिए बच्चों में लगातार नींद की परेशानी को केवल आदत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    कम नींद का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने को वजन बढ़ने मधुमेह और हृदय स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से भी जोड़ा जाता है। कुछ लोगों को रात में सोने में परेशानी होती है जबकि कुछ लोग पर्याप्त समय बिस्तर पर रहने के बाद भी सुबह तरोताजा महसूस नहीं करते। कुछ नींद संबंधी विकारों में रात के समय सांस लेने में रुकावट या सांस के अनियमित होने जैसी समस्या भी हो सकती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को पर्याप्त समय सोने के बावजूद अच्छी गुणवत्ता वाली नींद नहीं मिल पाती।

    कुछ संकेत ऐसे हैं जिन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। अगर गाड़ी चलाते समय बार-बार झपकी आने लगे टीवी देखते या किताब पढ़ते समय थोड़ी देर में ही नींद आने लगे दिन के समय बहुत ज्यादा नींद महसूस हो काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाए या चीजें याद रखने में पहले से ज्यादा परेशानी होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया बढ़ना और काम करने की क्षमता में कमी आना भी लगातार खराब नींद के संकेत हो सकते हैं।

    इसलिए नींद को केवल आराम का समय समझने के बजाय स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरत मानना जरूरी है। अगर रात में लगातार सोने में परेशानी हो रही है या पर्याप्त समय सोने के बाद भी दिनभर अत्यधिक नींद और थकान बनी रहती है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। समय रहते नींद से जुड़ी समस्या के कारणों की पहचान करने और जरूरी सुधार करने से रोजमर्रा की कार्यक्षमता मानसिक संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

  • खाना खाते ही सुस्ती और नींद का कारण क्या है दोपहर में ज्यादा असर क्यों होता है जानें पूरी वजह

    खाना खाते ही सुस्ती और नींद का कारण क्या है दोपहर में ज्यादा असर क्यों होता है जानें पूरी वजह


    नई दिल्ली । दोपहर में खाना खाने के बाद अचानक आंखों का भारी होना और काम के दौरान सुस्ती महसूस करना बहुत से लोगों के लिए सामान्य अनुभव है। कई बार लंच खत्म करने के कुछ ही देर बाद ऐसा लगता है कि बस थोड़ी देर आंखें बंद कर ली जाएं। इस स्थिति को Post Meal Sleepiness कहा जाता है। आमतौर पर यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती बल्कि शरीर की प्राकृतिक घड़ी खाने की मात्रा और भोजन में मौजूद पोषक तत्वों के साथ कई शारीरिक प्रक्रियाओं के कारण ऐसा हो सकता है।

    सबसे पहले शरीर की प्राकृतिक घड़ी यानी Circadian Rhythm को समझना जरूरी है। हमारा शरीर लगभग 24 घंटे के एक चक्र के अनुसार नींद और जागने से जुड़े बदलाव करता है। दोपहर के समय शरीर में जागने और सतर्क रहने का संकेत कुछ कम हो सकता है। इसी वजह से बिना खाना खाए भी कई लोगों को दोपहर के वक्त हल्की सुस्ती महसूस होती है। जब इसी समय खाना खाया जाता है तो यह असर और अधिक महसूस हो सकता है।

    खाने की मात्रा भी दोपहर की नींद को प्रभावित करती है। अगर लंच बहुत ज्यादा मात्रा में किया गया है तो खाना खाने के बाद भारीपन और सुस्ती अधिक महसूस हो सकती है। बहुत ज्यादा कैलोरी वाला भोजन तली हुई चीजें अत्यधिक मीठा भोजन या रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाना कुछ लोगों में खाने के बाद ऊर्जा और सतर्कता में बदलाव ला सकता है। वहीं संतुलित मात्रा में प्रोटीन फाइबर और अन्य पोषक तत्वों वाला भोजन लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    खाना खाने के बाद शरीर में पाचन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस दौरान हार्मोन और तंत्रिका तंत्र से जुड़े कई संकेत बदलते हैं। भोजन से मिलने वाले ग्लूकोज और अन्य पोषक तत्वों के स्तर में बदलाव होता है और शरीर पाचन से जुड़ी गतिविधियों को सक्रिय करता है। इन सभी प्रक्रियाओं का संयुक्त प्रभाव कुछ लोगों में नींद या सुस्ती जैसा एहसास पैदा कर सकता है।

    अक्सर यह कहा जाता है कि खाना खाने के बाद शरीर का पूरा खून पेट की ओर चला जाता है और इसी कारण दिमाग में खून कम पहुंचने से नींद आती है। हालांकि यह इस घटना की पूरी और सही व्याख्या नहीं मानी जाती। शरीर में रक्त का प्रवाह इस तरह अचानक दिमाग से हटकर केवल पाचन तंत्र की ओर नहीं चला जाता कि उससे सामान्य तौर पर दिमाग को पर्याप्त रक्त न मिले। खाने के बाद आने वाली नींद कई शारीरिक बदलावों के संयुक्त प्रभाव से जुड़ी होती है।

    दोपहर के भोजन के बाद नींद अधिक महसूस होने की एक बड़ी वजह रात की अधूरी नींद भी हो सकती है। अगर किसी व्यक्ति ने पिछली रात पर्याप्त नींद नहीं ली है तो दिनभर जागे रहने के साथ शरीर में नींद की जरूरत बढ़ती जाती है। ऐसे में दोपहर का प्राकृतिक सुस्ती वाला समय आते ही थकान और नींद ज्यादा महसूस हो सकती है।

    लंच के बाद सुस्ती कम करने के लिए बहुत भारी भोजन करने से बचना उपयोगी हो सकता है। भोजन की मात्रा जरूरत के अनुसार रखें और खाने में प्रोटीन फाइबर तथा पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करें। भोजन के बाद कुछ देर हल्की चाल से चलना भी शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। पर्याप्त पानी पीना और रात में नियमित रूप से अच्छी नींद लेना भी बेहद जरूरी है।

    हालांकि अगर रोजाना खाना खाने के बाद अत्यधिक नींद आती है और इसके साथ चक्कर कमजोरी या दूसरे लक्षण भी दिखाई देते हैं या दिनभर की सामान्य गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है क्योंकि लगातार अत्यधिक नींद कभी कभी नींद से जुड़ी समस्या खून की कमी थायरॉइड या ब्लड शुगर से संबंधित परेशानी के साथ भी देखी जा सकती है।