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  • अश्लील कंटेंट पर जीरो टॉलरेंस: ‘टटीरी’ सॉन्ग हटाने में जुटी हरियाणा पुलिस

    अश्लील कंटेंट पर जीरो टॉलरेंस: ‘टटीरी’ सॉन्ग हटाने में जुटी हरियाणा पुलिस

    नई दिल्ली:रैपर Badshah के विवादित गाने ‘टटीरी’ को लेकर Haryana Police ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस के अनुसार अब तक इस गाने से जुड़े कुल 857 लिंक विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से हटवाए जा चुके हैं। इनमें 154 यूट्यूब वीडियो और 703 इंस्टाग्राम रील्स शामिल हैं, जो इस गाने को प्रमोट या शेयर कर रहे थे।

    यह कार्रवाई उन आरोपों के बाद की गई है, जिनमें गाने के बोलों में महिलाओं और नाबालिगों के प्रति आपत्तिजनक और अश्लील भाषा के इस्तेमाल की बात सामने आई थी। पुलिस ने इसे समाज के लिए हानिकारक मानते हुए स्पष्ट किया है कि इस तरह के कंटेंट को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    पंचकूला पुलिस ने इस मामले में तेजी दिखाते हुए सभी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी किया है। इन नोटिस में गाने के हर वर्जन—चाहे वह री-अपलोड हो, शॉर्ट वीडियो हो या किसी अन्य फॉर्मेट में—उसे तुरंत हटाने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस की साइबर टीम लगातार ऐसे कंटेंट की निगरानी कर रही है और नए अपलोड्स को भी ट्रैक कर रही है।

    राज्य के पुलिस महानिदेशक Ajay Singhal ने इस मुद्दे पर कड़ा संदेश देते हुए कहा कि राज्य सरकार महिलाओं और बच्चों की गरिमा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी दोहराया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी बनाए रखना बेहद जरूरी है और इसके लिए जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जा रही है।

    वहीं, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक Shibash Kabiraj ने सोशल मीडिया यूजर्स को सीधी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस गाने पर रील बनाता है, वीडियो शेयर करता है या किसी भी रूप में इसे फैलाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाएगी। ऐसे अकाउंट्स को ब्लॉक किया जा सकता है और बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त धाराओं में केस दर्ज होगा।

    यह मामला Panchkula के सेक्टर-20 स्थित साइबर थाना में दर्ज किया गया है। पुलिस की टीमें लगातार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय रहकर उन यूजर्स की पहचान कर रही हैं, जो इस गाने को फैलाने में शामिल हैं।

    हरियाणा पुलिस ने आम जनता से भी अपील की है कि वे इस तरह के किसी भी आपत्तिजनक कंटेंट को शेयर करने से बचें और यदि कहीं ऐसा कंटेंट दिखे तो तुरंत पुलिस को सूचित करें। अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया आज एक शक्तिशाली माध्यम है, इसलिए इसका उपयोग जिम्मेदारी के साथ करना जरूरी है।

    यह कार्रवाई एक बड़े संदेश के तौर पर देखी जा रही है कि अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील और अपमानजनक कंटेंट के खिलाफ सख्ती बढ़ रही है। आने वाले समय में ऐसे मामलों में और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं, ताकि ऑनलाइन स्पेस को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाया जा सके।

  • संसद से सड़क तक छिड़ी अश्लीलता के विरुद्ध जंग: हरभजन सिंह के विचारों से सहमत हुए बिजनेसमैन राज कुंद्रा, कड़े सरकारी एक्शन की अपील

    संसद से सड़क तक छिड़ी अश्लीलता के विरुद्ध जंग: हरभजन सिंह के विचारों से सहमत हुए बिजनेसमैन राज कुंद्रा, कड़े सरकारी एक्शन की अपील

    नई दिल्ली। आज के डिजिटल युग में इंटरनेट की सुलभता ने जहाँ विकास के नए द्वार खोले हैं, वहीं बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक प्रभावों ने समाज के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। इसी कड़ी में बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति और जाने-माने बिजनेसमैन राज कुंद्रा ने इंटरनेट पर परोसे जा रहे अश्लील कंटेंट और अनियंत्रित वेबसाइट्स के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। राज कुंद्रा का यह बयान पूर्व क्रिकेटर और ‘आम आदमी पार्टी’ के सांसद हरभजन सिंह द्वारा हाल ही में संसद में उठाए गए उस मुद्दे के समर्थन में आया है, जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया पर बच्चों के बढ़ते एक्सपोजर पर चिंता जताई थी।

    हरभजन सिंह ने संसद सत्र के दौरान यह मुद्दा प्रभावी ढंग से रखा था कि इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की सामाजिक और मानसिक स्थिति प्रभावित हो रही है। उन्होंने मांग की थी कि ऐसे कंटेंट तक बच्चों की पहुंच सीमित होनी चाहिए ताकि उनके कोमल मन को दूषित होने से बचाया जा सके। हरभजन के इस विचार का समर्थन करते हुए राज कुंद्रा ने स्पष्ट कहा कि आज इंटरनेट पर मौजूद “फ्री और बिना किसी कंट्रोल” वाले कंटेंट ने समाज के लिए संकट पैदा कर दिया है। कुंद्रा के अनुसार, अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री बहुत ही आसानी से कम उम्र के बच्चों तक पहुंच रही है, जिसे रोकने के लिए ऐसी वेबसाइट्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना अनिवार्य है।

    राज कुंद्रा ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहे बदलावों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई अन्य देशों में इस तरह के सख्त बैन पहले से ही लागू हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का एक्सेस पूरी तरह से लिमिटेड यानी सीमित कर दिया जाना चाहिए। कुंद्रा ने जोर देकर कहा कि यद्यपि उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए और भी कई मुद्दे हैं, लेकिन वर्तमान में बच्चों का भविष्य और समाज की सुरक्षा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जिस पर तुरंत कड़े नियमों की आवश्यकता है।

    दिलचस्प बात यह है कि राज कुंद्रा का यह बयान उनके अपने अतीत के कारण भी चर्चा का विषय बना हुआ है। साल 2021 में राज कुंद्रा पर एडल्ट कंटेंट बनाने और उसे ऐप के जरिए प्रसारित करने के गंभीर आरोप लगे थे, जिसके चलते उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। हालांकि, बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी। इसके अतिरिक्त, आईपीएल के दौरान सट्टेबाजी जैसे विवादों में भी उनका नाम उछला था। इन तमाम विवादों के बीच, राज कुंद्रा ने अब जिस तरह से अश्लील कंटेंट के खिलाफ मोर्चा संभाला है, वह सोशल मीडिया और पब्लिक डोमेन में नई बहस को जन्म दे रहा है। उन्होंने समाज के व्यापक हित को सर्वोपरि रखते हुए इंटरनेट सुरक्षा और बच्चों के डिजिटल संरक्षण पर सरकार से सख्त नीति बनाने की अपील की है।

  • 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन, आंध्र प्रदेश में प्रस्ताव पर चर्चा..

    16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन, आंध्र प्रदेश में प्रस्ताव पर चर्चा..


    नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रही है। राज्य के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान बताया कि बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर सोशल मीडिया का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों को इन प्लेटफॉर्म्स पर नहीं होना चाहिए। वे यह नहीं समझ पाते कि किस तरह का कंटेंट उनके संपर्क में आ रहा है। ऐसे में मजबूत कानूनी ढांचे की जरूरत है।

    सरकार का यह कदम ऑस्ट्रेलिया के अंडर-16 सोशल मीडिया कानून से प्रेरित है। ऑस्ट्रेलिया ने पिछले महीने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए TikTok X (ट्विटर) फेसबुक इंस्टाग्राम यूट्यूब और स्नैपचैट जैसी प्रमुख सोशल मीडिया साइट्स पर प्रतिबंध लगाया था। इस कानून के तहत न तो बच्चे नए अकाउंट बना सकते हैं और न ही पुराने अकाउंट चालू रख सकते हैं। आंध्र प्रदेश सरकार इसी मॉडल का अध्ययन कर रही है। यदि यह लागू होता है तो यह भारत का पहला राज्य होगा जो बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कानूनी पाबंदी लगाएगा।

    तेलुगु देशम पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता दीपक रेड्डी ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि पिछली सरकार के दौरान सोशल मीडिया का दुरुपयोग हुआ था और विशेषकर महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक और अपमानजनक हमले किए गए। उन्होंने कहा कम उम्र के बच्चे भावनात्मक रूप से इतने परिपक्व नहीं होते कि वे ऑनलाइन नकारात्मक और नुकसानदायक कंटेंट को समझ सकें। इसलिए सरकार दुनिया के बेहतरीन उदाहरणों का अध्ययन कर रही है।दीपक रेड्डी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस कदम को सेंसरशिप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि इसका उद्देश्य केवल बच्चों को जहरीले कंटेंट ऑनलाइन नफरत और मानसिक नुकसान से बचाना है।

    आंध्र प्रदेश सरकार फिलहाल इस प्रस्ताव पर विचार और अध्ययन के चरण में है। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह कदम ऐतिहासिक साबित हो सकता है। अगर इसे लागू किया गया तो राज्य के छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूरी तरह नियंत्रित होगा और उन्हें मानसिक एवं भावनात्मक रूप से सुरक्षित रखा जा सकेगा।विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बच्चों को डिजिटल दुनिया के खतरे से बचाने और उनके स्वस्थ मानसिक विकास के लिए बेहद जरूरी है। सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल युग में एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है।

  • ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन: एक महीने में हटे 50 लाख अकाउंट, कितना कारगर रहा फैसला?

    ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन: एक महीने में हटे 50 लाख अकाउंट, कितना कारगर रहा फैसला?


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले को लागू हुए अब एक महीने से अधिक समय बीत चुका है और इसके शुरुआती नतीजे सामने आने लगे हैं। सवाल यह है कि क्या यह सख्त कदम वास्तव में असरदार साबित हो रहा है?

    यूरो न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक कानून लागू होने के पहले ही महीने में सोशल मीडिया कंपनियों ने करीब 50 लाख नाबालिग अकाउंट हटा दिए हैं। ऑस्ट्रेलिया के इंटरनेट रेगुलेटर ने बताया कि 10 दिसंबर से लागू हुए इस कानून के तहत 16 साल से कम उम्र के करीब 4.7 मिलियन अकाउंट विभिन्न प्लेटफॉर्म्स से डिलीट किए गए हैं। इसे डिजिटल सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

    ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी कमिश्नर ने इस संबंध में गुरुवार को आधिकारिक डेटा जारी किया। उन्होंने बताया कि यह आंकड़े इस बात का शुरुआती संकेत हैं कि बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अब नियमों को गंभीरता से लागू कर रहे हैं और नाबालिगों को प्लेटफॉर्म से दूर रखने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं।ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने इन शुरुआती नतीजों पर संतोष जताते हुए कहा “मैं इन आंकड़ों से बहुत खुश हूं। यह साफ है कि डिजिटल सुरक्षा को लेकर दी गई रेगुलेटरी गाइडेंस और प्लेटफॉर्म्स के साथ बेहतर समन्वय अब सकारात्मक नतीजे देने लगा है।” उन्होंने इसे कम्प्लायंस पर पहला सरकारी डेटा बताया।

    हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ 16 साल से कम उम्र के अकाउंट अभी भी सक्रिय हैं। उनका कहना था कि जैसे समाज में अन्य सुरक्षा कानूनों के साथ होता है वैसे ही इस कानून की सफलता केवल पूर्ण रोक से नहीं बल्कि नुकसान को कम करने और सामाजिक व्यवहार को बदलने से आंकी जाएगी। उन्होंने माना कि कुछ बच्चे सोशल मीडिया पर बने रहने के लिए “क्रिएटिव तरीके” अपना सकते हैं लेकिन कानून का उद्देश्य एक सुरक्षित डिजिटल संस्कृति तैयार करना है।इन नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यही कारण है कि टेक कंपनियां अब उम्र सत्यापन और अकाउंट मॉनिटरिंग को लेकर ज्यादा सख्त रवैया अपना रही हैं।

    ऑस्ट्रेलिया के इस कदम पर अब दुनिया के कई देश नजर बनाए हुए हैं। डेनमार्क समेत अन्य नॉर्डिक देशों ने भी इसी तरह के कानून पर काम शुरू कर दिया है। नॉर्डिक देशों के समूह ने नवंबर में घोषणा की थी कि वे 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस ब्लॉक करने को लेकर एक समझौते पर पहुंचे हैं जिसे 2026 के मध्य तक कानून का रूप दिया जा सकता है।डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया का यह प्रयोग भविष्य में अन्य देशों के लिए एक मॉडल बन सकता है। हालांकि इसकी वास्तविक सफलता का मूल्यांकन लंबे समय में ही संभव होगा जब यह देखा जाएगा कि इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल व्यवहार में कितना सकारात्मक बदलाव आता है।

  • ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के टीनएजर्स के लिए सोशल मीडिया बैन कियाकंपनियों पर जुर्माना लगाने का आदेश

    ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के टीनएजर्स के लिए सोशल मीडिया बैन कियाकंपनियों पर जुर्माना लगाने का आदेश


    नई दिल्ली ।
    ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के टीनएजर्स के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बैन कर दिया है। यह कदम दुनिया में इस तरह का पहला कदम हैजो 10 दिसंबर से लागू हो चुका है। अब से 16 साल से छोटे बच्चे और किशोर फेसबुकइंस्टाग्रामयूट्यूबटिकटॉक जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। सोशल मीडिया कंपनियों को आदेश दिए गए हैं कि वे इन प्लेटफॉर्म्स पर छोटे उम्र के यूजर्स के अकाउंट डिलीट करें और ऐसा नहीं करने पर भारी पैनल्टी का सामना करना पड़ेगा। हालांकिपेरेंट्स और टीनएजर्स पर कोई पैनल्टी नहीं लगेगी।

    ऑस्ट्रेलिया में नया कानून

    ऑस्ट्रेलिया ने यह नया कानून लागू कर दिया हैजो 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के उपयोग से प्रतिबंधित करता है। इसका उद्देश्य बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया की लत और उसके नकरात्मक प्रभावों से बचाना है। इस कानून के लागू होने से अब 16 साल से कम उम्र के यूजर्स को फेसबुकइंस्टाग्रामटिकटॉक और यूट्यूब जैसी प्रमुख सोशल मीडिया साइट्स का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित होगा। इन प्लेटफॉर्म्स को यह आदेश दिया गया है कि वे इन उम्र के यूजर्स के अकाउंट्स को तुरंत डिलीट करें और यदि ऐसा नहीं किया गया तो उन कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।

    कंपनियों पर होगा जुर्माना

    ऑस्ट्रेलिया सरकार ने सभी प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों को आदेश जारी किए हैं कि वे रात 12 बजे तक 16 साल से कम उम्र के बच्चों का एक्सेस इन प्लेटफॉर्म्स से पूरी तरह से ब्लॉक कर दें। यदि कोई कंपनी इन आदेशों का पालन नहीं करतीतो उस पर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलरकरीब 296 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह कदम सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक सख्त चेतावनी है कि वे बच्चों की सुरक्षा को गंभीरता से लें और उन्हें सोशल मीडिया के संभावित खतरों से बचाने के लिए कदम उठाएं।

    यूजर्स के मिले-जुले रिएक्शन

    ऑस्ट्रेलिया के इस नए कानून के बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। जहां एक तरफ बड़ी टेक कंपनियां और आजादी समर्थक संगठन इस कदम की आलोचना कर रहे हैंवहीं दूसरी तरफ कई पैरेंट्स और समाज के कुछ वर्ग इसे सकारात्मक कदम मान रहे हैं। पैरेंट्स का कहना है कि यह कदम उनके बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैक्योंकि सोशल मीडिया के अधिक उपयोग से बच्चों में अवसादचिंताऔर आत्मसम्मान में कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

    दूसरी ओरकुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाला कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह से अलग करना भी सही नहीं हो सकताक्योंकि यह प्लेटफॉर्म्स कई अवसर और जानकारी प्रदान करते हैंजो बच्चों के विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

    सामाजिक प्रभाव और बहस

    ऑस्ट्रेलिया का यह कदम सोशल मीडिया की भूमिका और इसके बच्चों पर पड़ने वाले प्रभावों पर वैश्विक स्तर पर बहस को और बढ़ा देगा। सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल के बारे में कई विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्यआत्मविश्वास और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह भी चुनौती होगी कि वे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाती हैंजबकि उनकी प्राइवेसी और स्वतंत्रता को बनाए रखें।

    इस नए कानून से अन्य देशों में भी एक उदाहरण पेश हो सकता हैजो सोशल मीडिया के इस्तेमाल के बारे में सख्त दिशा-निर्देशों की ओर कदम बढ़ाते हैं। लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या इस तरह के कानून पूरी दुनिया में लागू किए जा सकते हैंया फिर यह केवल ऑस्ट्रेलिया के लिए एक विशेष मामला होगा। ऑस्ट्रेलिया का यह कदम बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैलेकिन इसके सामाजिक और कानूनी प्रभावों को लेकर अभी और चर्चाएं जारी रहेंगी।