Tag: Social Media Case

  • सोशल मीडिया पोस्ट पर बड़ा फैसला: शाजापुर कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए 2 साल की सजा दी

    सोशल मीडिया पोस्ट पर बड़ा फैसला: शाजापुर कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए 2 साल की सजा दी


    शाजापुर । शाजापुर जिले की न्यायालय ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट डालने के मामले में आरोपी मोहसिन (पिता मुबारिक, निवासी ज्योति नगर, शाजापुर) को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। आरोपी ने फेसबुक पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए पोस्ट साझा की थी, जिसे राष्ट्रीय भावनाओं को आहत करने वाला माना गया। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, शाजापुर ने मंगलवार दोपहर सुनवाई के बाद आरोपी को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया और सजा का आदेश दिया।

    धाराओं के तहत अलग-अलग सजा और जुर्माना
    कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 153-बी के तहत 2 वर्ष के सश्रम कारावास और 1000 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है। इसके अलावा धारा 505(1)(बी) के तहत 1 वर्ष का सश्रम कारावास और 1000 रुपये का अर्थदंड तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) की धारा 67-ए के तहत 1 वर्ष का सश्रम कारावास और 1000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।

    2019 में दर्ज हुई थी शिकायत
    जिला मीडिया सेल प्रभारी प्रतीक श्रीवास्तव ने बताया कि यह मामला 16 फरवरी 2019 का है। उस समय फरियादी रोहित राठौर ने थाना कोतवाली शाजापुर में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि ‘मोहसिन लाला’ नाम की फेसबुक आईडी से यह विवादित पोस्ट डाली गई थी। फरियादी ने पोस्ट का स्क्रीनशॉट भी पुलिस को साक्ष्य के रूप में सौंपा था, जिसके आधार पर जांच शुरू की गई।

    राष्ट्रीय भावनाओं को आहत करने का आरोप
    शिकायत में यह भी कहा गया था कि इस तरह की पोस्ट से लोगों की राष्ट्रीय भावनाएं आहत हुईं और समाज में तनाव की स्थिति पैदा होने की आशंका थी। पुलिस ने मामले की जांच के बाद आरोपी के खिलाफ विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज कर इसे न्यायालय में प्रस्तुत किया था।

    कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध
    न्यायालय में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और तर्कों के आधार पर आरोपी को दोषी पाया गया। इस मामले में शासन की ओर से पैरवी प्रतीक श्रीवास्तव और तुलसी मानकर द्वारा की गई। यह फैसला सोशल मीडिया के दुरुपयोग और भड़काऊ पोस्ट के खिलाफ एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

  • अदालत सख्त रुख में: गोपाल राय को नोटिस, सोशल मीडिया सामग्री पर न्यायिक कार्यवाही तेज

    अदालत सख्त रुख में: गोपाल राय को नोटिस, सोशल मीडिया सामग्री पर न्यायिक कार्यवाही तेज


    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल राय और एक खोजी पत्रकार को अवमानना नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई एक आपराधिक अवमानना याचिका के आधार पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया पर न्यायपालिका से संबंधित आपत्तिजनक और अवमाननापूर्ण सामग्री प्रसारित की गई, जो न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ थी।

    मामला कथित आबकारी नीति से जुड़े भ्रष्टाचार केस से संबंधित बताया जा रहा है, जिसने राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस को जन्म दिया है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक टिप्पणियों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और न्यायालय की गरिमा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया।

    यह याचिका अशोक चैतन्य की ओर से दायर की गई थी, जिसमें आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ भी अवमानना कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इन दोनों नेताओं को पहले ही एक स्वतः संज्ञान मामले में नोटिस जारी किया जा चुका है, जो पहले से ही न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

    न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि सभी संबंधित मामलों को एक साथ सुना जाएगा। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 4 अगस्त की तारीख तय की है और नए पक्षकारों को अपना जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही, सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई संबंधित सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश भी जारी किए गए हैं ताकि जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा न आए।

    अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहुरा को अमीकस क्यूरी नियुक्त किया है, जिन्हें मामले में सहायता प्रदान करने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। यह नियुक्ति अदालत को मामले की निष्पक्ष और विस्तृत समीक्षा में सहायता करने के उद्देश्य से की गई है।

    याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि जब आबकारी नीति केस में कुछ आरोपियों को ट्रायल कोर्ट से राहत मिली थी, तब केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। यह मामला न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में सूचीबद्ध हुआ, जिसके बाद उन पर कथित रूप से पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप सोशल मीडिया पर लगाए गए।

    अदालत ने पूर्व में दिए गए अपने आदेशों में यह भी टिप्पणी की थी कि न्यायपालिका के खिलाफ समन्वित अभियान चलाना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जा सकता है, हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रचनात्मक और सीमित आलोचना की अनुमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में बनी रहती है।

    बाद में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया, जिसके बाद केस को दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है।