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  • नाना पाटेकर ने किसानों के परिवारों के लिए छोड़ दी थी 1.5 करोड़ की कार, मदद के लिए बांटने को दिए थे चेक

    नाना पाटेकर ने किसानों के परिवारों के लिए छोड़ दी थी 1.5 करोड़ की कार, मदद के लिए बांटने को दिए थे चेक

    नई दिल्ली: अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर के साथ उनके अभिनय करियर के अलावा सामाजिक कार्यों से जुड़े कई किस्से भी चर्चा में हैं। किसानों और उनके परिवारों की मदद से जुड़ा ऐसा ही एक प्रसंग सामने आया है। लेखक रणबीर पुष्प ने एक बातचीत में नाना पाटेकर के बारे में बताते हुए कहा था कि उनके बारे में लोगों ने कई बार गलत राय बनाई। उन्होंने उन दावों को भी गलत बताया था, जिनमें नाना पाटेकर के गुस्सैल स्वभाव की वजह से प्रोड्यूसर्स को नुकसान होने की बात कही जाती थी। इसी बातचीत में उन्होंने नाना के किसानों के प्रति संवेदनशील रवैये से जुड़ा एक किस्सा साझा किया था।

    रणबीर पुष्प के मुताबिक, एक दिन नाना पाटेकर न्यूज देख रहे थे। इस दौरान उन्होंने किसानों की आत्महत्या से जुड़ी खबर देखी, जिसमें एक पूरा परिवार शोक में डूबा हुआ था। उस समय नाना अगले दिन करीब 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने वाले थे और खरीदारी से जुड़ी सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। लेकिन किसानों के परिवार की स्थिति देखने के बाद उन्होंने अपना फैसला बदल दिया। उन्होंने तुरंत अपने दोस्त को फोन किया और कहा कि 15-15 हजार रुपये के चेक बनवाकर सभी किसानों को बांट दिए जाएं। इस किस्से के जरिए उनके किसानों के प्रति लगाव और जरूरतमंद परिवारों की मदद करने की सोच का उल्लेख किया गया था।

    नाना पाटेकर सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे और उन्होंने NAAM फाउंडेशन की स्थापना की थी। किसानों की परेशानियों और उनके परिवारों की स्थिति को लेकर उनकी चिंता का जिक्र कई बार किया गया है। रणबीर पुष्प ने इसी संदर्भ में कहा था कि जो व्यक्ति किसानों के दुख को देखकर अपनी 1.5 करोड़ रुपये की कार खरीदने का फैसला बदल सकता है, वह किसी का बुरा कैसे सोच सकता है। किसानों के परिवारों की मदद से जुड़ा यह किस्सा नाना पाटेकर के सामाजिक सरोकारों को सामने रखता है।

    नाना पाटेकर के गुस्से से जुड़ा एक और किस्सा भी इसी बातचीत में बताया गया था। रणबीर पुष्प के मुताबिक, एक बार नाना ने किसी व्यक्ति को कार से प्लास्टिक की बोतल बाहर फेंकते हुए देखा। उन्होंने अपनी कार रोककर उस बोतल को उठाया। इसके बाद उन्होंने उस व्यक्ति की कार रुकवाई और शीशा नीचे करने को कहा। नाना ने उससे सवाल किया कि देश को साफ रखने की जिम्मेदारी किसकी है। उन्होंने गांधीजी का जिक्र करते हुए कहा था कि गांधीजी चले गए हैं, लेकिन लोग अब भी इस धरती पर हैं और एक नागरिक के तौर पर देश को साफ रखना उनकी जिम्मेदारी है। इस घटना में उनका गुस्सा सार्वजनिक जगहों पर स्वच्छता और नागरिक जिम्मेदारी को लेकर था।

    नाना पाटेकर ने 75 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया, जिसके बाद उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की कोशिश की और करीब 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा के एक चर्चित अभिनेता का करियर समाप्त हुआ। नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उन्होंने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अभिनय की शुरुआत की और आगे चलकर हिंदी तथा मराठी फिल्मों में पहचान बनाई। उन्होंने अपने करियर में तीन नेशनल अवॉर्ड जीते थे और 2013 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। ‘परिंदा’, ‘तिरंगा’, ‘वेलकम’, ‘अपहरण’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों में उनके काम को जाना जाता है।

  • बैंक की नौकरी छोड़ी तो गरीब बच्चों को बनाया मिशन, 12 से 500 तक पहुंचा कारवां, ग्वालियर के मैनेजर की कहानी

    बैंक की नौकरी छोड़ी तो गरीब बच्चों को बनाया मिशन, 12 से 500 तक पहुंचा कारवां, ग्वालियर के मैनेजर की कहानी


    ग्वालियर । रिटायरमेंट के बाद आमतौर पर लोग अपने परिवार और निजी जिंदगी के लिए समय निकालते हैं लेकिन ग्वालियर के रिटायर्ड बैंक मैनेजर एमएल अहिरवार ने अपनी जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया। पत्नी के निधन के बाद जब उनके जीवन में अकेलापन और गहरा दुख आया तो उन्होंने खुद को उस दर्द में समेटने के बजाय जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी संवारने का फैसला किया। आज करीब छह साल से वे झुग्गी बस्तियों और मजदूर परिवारों के बच्चों को पढ़ाने में जुटे हैं। उनकी यह पहल अब 400 से 500 बच्चों तक पहुंच चुकी है।

    अहिरवार के जीवन में यह बदलाव कोरोना की दूसरी लहर के दौरान आया। करीब 2 मई 2021 को उनकी पत्नी का निधन हो गया था। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। जीवन में अचानक ऐसा खालीपन आया जिसे भरना आसान नहीं था। इसी दौर में उनकी मुलाकात शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त ओपी दीक्षित से हुई। दीक्षित पहले से ही झुग्गी बस्तियों के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे थे। पत्नी के निधन के करीब चार से पांच महीने बाद अहिरवार भी उनके साथ बच्चों को पढ़ाने लगे। शुरुआत में उनके पास सिर्फ 12 से 13 बच्चे आते थे लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती चली गई।

    अहिरवार का फोकस उन बच्चों पर है जिनके माता-पिता मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे कामों में व्यस्त रहते हैं। आर्थिक मजबूरियों के कारण कई परिवार बच्चों की पढ़ाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। ऐसे बच्चे स्कूल से दूर होने के साथ गलत संगत में पड़ने के खतरे का भी सामना करते हैं। अहिरवार का प्रयास है कि इन बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखा जाए और उन्हें ऐसा माहौल दिया जाए जिसमें वे अपने भविष्य के बारे में सोच सकें।

    ग्वालियर में काम की तलाश में आने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चे भी उनकी कक्षा का हिस्सा हैं। टीकमगढ़ और छतरपुर जैसे इलाकों से परिवार रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों में आते हैं। बार-बार जगह बदलने के कारण बच्चों की पढ़ाई टूट जाती है। ऐसे बच्चों को लगातार पढ़ाई से जोड़े रखना अहिरवार की पहल का अहम हिस्सा है।

    सिर्फ पढ़ाने तक ही उनकी जिम्मेदारी सीमित नहीं है। वे जरूरतमंद बच्चों को कॉपी किताब और स्टेशनरी जैसी पढ़ाई की सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं। जिन बच्चों के सामने स्कूल की फीस भरने की समस्या आती है वहां वे अपनी क्षमता के अनुसार मदद करते हैं। समाजसेवी और कुछ संगठन भी समय-समय पर इस काम में सहयोग करते हैं। कई बच्चों का स्कूल में दाखिला कराने में भी उन्होंने मदद की है ताकि उनकी शिक्षा बीच में न छूटे।

    शुरुआत में परिवार को भी चिंता थी कि अहिरवार अपना इतना समय बच्चों के बीच क्यों दे रहे हैं लेकिन जब इस पहल का असर दिखाई देने लगा तो परिवार ने उनका साथ देना शुरू कर दिया। अब उनके बच्चे भी इस काम में उनका समर्थन करते हैं। अहिरवार के लिए किसी बच्चे का पढ़ाई जारी रखना और आगे बढ़ना ही सबसे बड़ी खुशी है।

    उनका मानना है कि जरूरतमंद की आर्थिक मदद करना निश्चित रूप से जरूरी है लेकिन शिक्षा का दान किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी बदल सकता है। इसी सोच के साथ रिटायर्ड बैंक मैनेजर ने अपने जीवन के खालीपन को बच्चों के भविष्य की रोशनी से भर दिया। 12 बच्चों से शुरू हुई उनकी छोटी सी पहल आज सैकड़ों बच्चों तक पहुंच चुकी है और यही उनके लिए पत्नी की याद को एक सार्थक दिशा देने का सबसे बड़ा जरिया बन गई है।

  • गोपाल भार्गव के सरकारी बंगले में मरीजों का आशियाना: भोपाल में बना प्ले स्कूल जैसा गेस्ट रूम

    गोपाल भार्गव के सरकारी बंगले में मरीजों का आशियाना: भोपाल में बना प्ले स्कूल जैसा गेस्ट रूम


    भोपाल। भोपाल के 74 बंगला क्षेत्र का बंगला नंबर बी-1, जो सागर जिले के रहली से विधायक और पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव का सरकारी आवास है, अब मरीजों का ठिकाना बन गया है। यह बंगला पहले मंत्री के रूप में भार्गव को आवंटित हुआ था, लेकिन अब यह बीमार बच्चों और मरीजों के लिए विशेष सुविधा केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।
    बच्चों के लिए प्ले स्कूल जैसा गेस्ट रूम
    गोपाल भार्गव की पुत्रवधु शिल्पी भार्गव ने इस बंगले में बीमार बच्चों, विशेषकर दिल से जुड़ी बीमारियों वाले बच्चों के लिए एक खास गेस्ट रूम तैयार कराया है। यह कमरे प्ले स्कूल की तरह सजाया गया है, जिसमें झूले, खिलौने और बच्चों के लिए विशेष बिस्तरों की व्यवस्था है। बच्चों का मनोबल बनाए रखने के लिए दीवारों पर रंग-बिरंगे कार्टून और आकर्षक पेंटिंग्स बनाई गई हैं।

    50 बिस्तरों के तीन हॉल
    बंगले में मरीजों के रहने के लिए तीन रेनोवेटेड हॉल बनाए गए हैं, जिनमें कुल 50 बिस्तरों की सुविधा है।

    मरीजों के आने-जाने, रुकने और इलाज के लिए कर्मचारियों की व्यवस्था की गई है। साथ ही एम्बुलेंस सेवा, भोजन और अस्पताल में इलाज कराने की पूरी सुविधा भी दी गई है।

    फ्री भोजन और खास मेन्यू
    बंगले में रहने वाले मरीजों के लिए सुबह नाश्ता, चाय और दो टाइम फ्री भोजन की सुविधा है। इस किचन को “गोपाल जी की रसोई” नाम दिया गया है। भोजन में मलाई कोफ्ता, मटर पनीर, पालक पनीर, बैगन भर्ता, आलू टमाटर, दाल मखनी, मूंग दाल, जीरा राइस, हलवा, खिचड़ी, गरम रोटियाँ, अचार, पापड़, चटनी और सलाद जैसी विविध और पौष्टिक डिशेज़ शामिल हैं।

    एम्बुलेंस सेवा और पंजीकरण
    हर रविवार को गढ़ाकोटा स्थित निज निवास गणनायक से तीन एम्बुलेंस भोपाल के लिए मरीजों को लेकर रवाना होती हैं।

    मरीजों का पंजीकरण गढ़ाकोटा में किया जाता है और भोपाल पहुंचते ही कर्मचारी आधार कार्ड, बीमारी की जानकारी और अस्पताल का नाम लेकर मरीजों को भर्ती कराते हैं।

    पूरी सुविधा निशुल्क
    गोपाल भार्गव के क्षेत्र के मरीजों को आने-जाने, रुकने, खाने और इलाज की पूरी सुविधा नि:शुल्क दी जाती है। इलाज आयुष्मान कार्ड या मुख्यमंत्री सहायता योजना के माध्यम से कराया जाता है। यदि इनसे मदद न मिले तो गोपाल भार्गव अपने निजी फंड से इलाज की व्यवस्था करते हैं।

    बच्चों के लिए अनुकूल वातावरण
    शिल्पी भार्गव ने यह व्यवस्था बच्चों के मनोबल को ध्यान में रखकर बनाई है। उनका उद्देश्य था कि जब बच्चे इलाज के लिए आएं तो उन्हें डर या असहजता महसूस न हो। इसलिए गेस्ट रूम को प्ले स्कूल जैसा सजाया गया और वातावरण को अनुकूल बनाया गया।

    लंबे समय से चल रही व्यवस्था
    अभिषेक भार्गव ने बताया कि यह व्यवस्था 2004 से शुरू है, जब गोपाल भार्गव मंत्री थे। उस समय भी मरीजों के आने-जाने, रहने, खाने और इलाज की सुविधा दी जाती थी। अब यह प्रकल्प निजी स्तर पर जारी है।

    जीवन और मृत्यु के लिए भी सुविधा
    गोपाल भार्गव का परिवार न केवल इलाज, बल्कि मृत्यु और अंतिम संस्कार की सुविधा भी प्रदान करता है। मरीज की मृत्यु होने पर शव घर तक पहुंचाने की व्यवस्था, बरमान घाट पर अस्थि विसर्जन और पंडित व नाई की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

    निजी खर्च और धर्म
    इस पूरे प्रकल्प में सरकारी मदद सीमित है। बंगले में साज-सज्जा और मरीजों की सुविधाएं निजी खर्च से ही संचालित होती हैं। गोपाल भार्गव का धर्म और ध्येय वाक्य है, “निरंतर कर्म” और यह दर्शन उनके कार्यों में स्पष्ट दिखाई देता है।

    गोपाल भार्गव और उनके परिवार द्वारा स्थापित यह व्यवस्था न केवल बीमार बच्चों और मरीजों के लिए मददगार साबित हो रही है, बल्कि यह मानवता और सेवा का अद्वितीय उदाहरण भी पेश करती है।