नई दिल्ली ।
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि भारत के लिए तकनीकी संप्रभुता हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण सामग्रियों का मजबूत घरेलू इकोसिस्टम विकसित करना बड़ी चुनौती है। सेमीकंडक्टर और अन्य उन्नत तकनीकों के लिए आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति कुछ सीमित देशों में केंद्रित होने के कारण भारत को अपनी विनिर्माण क्षमता और विशेषज्ञता तेजी से बढ़ाने की जरूरत है।Tag: Sovereignty
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भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत बनाने के लिए जरूरी मटेरियल इकोसिस्टम विकसित करना होगा, अश्विनी वैष्णव ने बताई चुनौती
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में अपने विचार रखते हुए वैष्णव ने कहा कि भारत को सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए जरूरी केमिकल्स, गैसों, सब्सट्रेट्स और अन्य इनपुट्स के उत्पादन में घरेलू क्षमताएं मजबूत करनी होंगी। उनके मुताबिक, इन सामग्रियों की वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर कुछ देशों का अधिक नियंत्रण भारत की एक प्रमुख प्रौद्योगिकी और विनिर्माण केंद्र बनने की महत्वाकांक्षा के सामने चुनौती है।मंत्री ने बताया कि जिन देशों ने महत्वपूर्ण सामग्रियों के क्षेत्र में मजबूत स्थिति बनाई है, उन्होंने इसके लिए कई दशकों तक काम किया है। हालांकि, भारत के पास इतनी लंबी अवधि तक इंतजार करने का विकल्प नहीं है। इसलिए देश को महत्वपूर्ण सामग्रियों के विनिर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और प्रबंधन से जुड़ी विशेषज्ञता विकसित करने की गति बढ़ानी होगी।उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का सेमीकंडक्टर मिशन अब केवल चिप बनाने और उनकी असेंबली तक सीमित नहीं है। इसका दायरा बढ़ाकर उन सामग्रियों और औद्योगिक क्षमताओं को भी शामिल किया जा रहा है, जिनकी जरूरत चिप निर्माण के विभिन्न चरणों में होती है। इस व्यापक दृष्टिकोण में केमिकल्स, गैसों, सब्सट्रेट्स और अन्य आवश्यक इनपुट्स का इकोसिस्टम तैयार करना शामिल है।वैष्णव के अनुसार, देश के सेमीकंडक्टर कार्यक्रम के दूसरे चरण में इन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। सरकार की रणनीति तैयार उत्पादों की असेंबली से आगे बढ़कर मॉड्यूल और कंपोनेंट्स के निर्माण तक पहुंचने की है। इसके बाद मटेरियल्स और अंततः पूंजीगत उपकरणों के उत्पादन की क्षमता विकसित करना भी इस दिशा का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र में टिकाऊ विकास के लिए केवल अंतिम उत्पाद तैयार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उससे जुड़े पूरे औद्योगिक इकोसिस्टम को मजबूत करना आवश्यक है।तकनीकी संप्रभुता के अर्थ को स्पष्ट करते हुए मंत्री ने कहा कि भारत का उद्देश्य दूसरे देशों पर हर तरह की निर्भरता को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है। इसके बजाय रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी कमजोरियों को दूर करना और जरूरत के समय देश की क्षमता तथा लचीलेपन को मजबूत बनाना प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि यह तय करना जरूरी है कि किन उत्पादों और क्षेत्रों में भारत के भीतर डिजाइन, विनिर्माण और संपूर्ण उत्पाद विकास की क्षमताएं होनी चाहिए और किन क्षेत्रों में दूसरे देशों के साथ सहयोग जारी रखा जा सकता है। प्रौद्योगिकी को उन्होंने वैश्विक वैल्यू चेन का हिस्सा बताया।उन्होंने कहा कि भारत जिन क्षेत्रों में प्रवेश करना चाहता है, वहां एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने 28 नैनोमीटर से 90 नैनोमीटर के लेगेसी नोड्स का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इस श्रेणी में एक मिलियन डॉलर की मशीन का उत्पादन केवल एक डॉलर की चिप की कमी के कारण भी रुक सकता है। ऐसे में डिजाइन, विनिर्माण और अंतिम उत्पाद के संपूर्ण मूल्यांकन की क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण है। इसी सोच के आधार पर भारत अपनी तकनीकी और औद्योगिक रणनीति को आगे बढ़ा रहा है। -

संयुक्त राष्ट्र के नए मानचित्र प्रस्ताव पर भारत का स्पष्ट रुख, कहा संप्रभु क्षेत्र को गलत दिखाना किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं
नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के नक्शे को अधिक वास्तविक क्षेत्रफल के साथ प्रस्तुत करने वाले Equal Earth Projection को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव पर भारत ने अपना रुख स्पष्ट किया है। भारत ने प्रस्ताव के मूल उद्देश्य का समर्थन करते हुए कहा है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व वास्तविक क्षेत्रफल के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही भारत ने यह भी साफ किया कि उसके संप्रभु क्षेत्र को किसी भी गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना स्वीकार्य नहीं है।संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को पेश किए गए प्रस्ताव के पक्ष में भारत समेत 164 देशों ने मतदान किया। छह देश मतदान से दूर रहे, जबकि अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्र प्रक्षेपण को बढ़ावा देना है, जिसमें विभिन्न महाद्वीपों और क्षेत्रों के क्षेत्रफल को पारंपरिक नक्शों की तुलना में वास्तविक अनुपात के अधिक करीब दिखाया जा सके।
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को लेकर स्पष्ट किया कि इसका संबंध किसी विशेष राजनीतिक मानचित्र को स्वीकार करने से नहीं है। भारत के अनुसार, समान-क्षेत्र वाले मानचित्र प्रक्षेपण का मूल उद्देश्य दुनिया के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से अफ्रीका जैसे बड़े भूभागों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुरूप बेहतर प्रतिनिधित्व देना है।
भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया है, लेकिन इसके साथ अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। भारत ने जोर दिया कि प्रस्ताव किसी विशेष मानचित्र, मानचित्र प्रक्षेपण या किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के चित्रण को प्रमाणित नहीं करता। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से भौगोलिक क्षेत्रफल के प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाना है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि देश के आधिकारिक मानचित्र और संप्रभु क्षेत्र से जुड़े विषयों पर भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है। भारत के अनुसार, जम्मू-कश्मीर और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख समेत उसका संपूर्ण संप्रभु क्षेत्र आधिकारिक भारतीय मानचित्र के अनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
भारत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच, प्रकाशन या मानचित्र में उसके क्षेत्र को गलत तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए। भारत का कहना है कि गलत या भ्रामक नक्शे उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े गंभीर विषय हैं। ऐसे चित्रण को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे मामले में मानचित्रों के राजनीतिक और भौगोलिक इस्तेमाल के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। Equal Earth Projection जैसे मानचित्र प्रक्षेपण मुख्य रूप से पृथ्वी के अलग-अलग क्षेत्रों के आकार को तुलनात्मक रूप से सही ढंग से दिखाने पर केंद्रित होते हैं। इसके विपरीत राजनीतिक मानचित्र देशों की सीमाओं, विवादित क्षेत्रों और स्थानों के नामों को प्रदर्शित करते हैं।
भारत ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव किसी राजनीतिक सीमा या विवादित क्षेत्र की स्थिति तय नहीं करता। इसलिए प्रस्ताव के समर्थन को भारत की सीमाओं से संबंधित किसी अलग राजनीतिक स्थिति के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रस्ताव के पारित होने के बाद दुनिया के नक्शे में बदलाव को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बदल गई हैं। यह पहल मुख्य रूप से मानचित्र प्रक्षेपण और भौगोलिक क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व से संबंधित है।
भारत का संदेश इस मामले में दो हिस्सों में स्पष्ट है। एक ओर उसने वास्तविक क्षेत्रफल को बेहतर तरीके से दर्शाने वाले मानचित्र प्रक्षेपण के सिद्धांत का समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े आधिकारिक मानचित्रण पर किसी भी तरह की गलत प्रस्तुति को अस्वीकार किया है। इसी रुख के साथ भारत ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए अपनी सीमा संबंधी स्थिति दोहराई है।
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ऐतिहासिक कूटनीतिक कामयाबी: ट्रंप और पेजेश्कियान के हस्ताक्षरों से टला महायुद्ध, अमेरिका-ईरान शांति समझौता तत्काल प्रभाव से लागू
नई दिल्ली। वैश्विक कूटनीति के पन्नों में आज का दिन एक बड़े और ऐतिहासिक बदलाव के रूप में दर्ज हो गया है। पिछले कई महीनों से युद्ध की कगार पर खड़े अमेरिका और ईरान ने अपने सारे विवादों और दुश्मनी को पीछे छोड़ते हुए आखिरकार शांति समझौते पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने दोनों देशों के बीच जारी सैन्य टकराव को हमेशा के लिए खत्म करने के मकसद से एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस बड़े घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव पूरी तरह समाप्त हो गया है और यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू माना जा रहा है।व्हाइट हाउस और ईरानी राजनयिकों द्वारा साझा की गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस शांति समझौते से जुड़ी दो बेहद महत्वपूर्ण तस्वीरें और वीडियो वैश्विक मीडिया के सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के वर्साय महल में आयोजित एक विशेष रात्रिभोज के दौरान इस समझौते की मूल प्रति पर हस्ताक्षर किए। इस ऐतिहासिक क्षण के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी उनके ठीक बगल में मौजूद थे, जिनकी गवाही में व्हाइट हाउस ने हस्ताक्षर का वीडियो भी जारी किया है। दूसरी तरफ, तेहरान से ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की भी समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए तस्वीरें दुनिया के सामने आईं। इससे पहले बीते रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद गालिबाफ ने इस मसौदे पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद स्विट्जरलैंड में होने वाले औपचारिक समारोह की जगह इसे तुरंत ही लागू करने का फैसला लिया गया।
इस ऐतिहासिक समझौते के तहत कुल 14 प्रमुख शर्तें तय की गई हैं, जो दोनों देशों के भविष्य के संबंधों की दिशा तय करेंगी। समझौते की पहली और सबसे बड़ी शर्त के अनुसार, अमेरिका और ईरान सभी मोर्चों पर अपनी सैन्य कार्रवाइयों को तत्काल और स्थायी रूप से रोकने की घोषणा करते हैं। दोनों देशों ने वचन दिया है कि वे भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ किसी भी तरह का युद्ध या सैन्य अभियान शुरू नहीं करेंगे। इसके साथ ही, लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का पूरा सम्मान किया जाएगा। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न करने और 60 दिनों के भीतर बातचीत के जरिए एक अंतिम और पूर्ण रूप से बाध्यकारी समझौता तैयार करने की प्रतिबद्धता जताई है।
मध्य प्रदेश और देश के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समझौते से वैश्विक बाजार और तेल आपूर्ति को बड़ी राहत मिलेगी। समझौते के तहत अमेरिका अगले 30 दिनों के भीतर ईरान के खिलाफ लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकेबंदी और सभी व्यापारिक अवरोधों को पूरी तरह हटा लेगा। इसके बदले में ईरान फारस की खाड़ी से लेकर ओमान सागर तक आने-जाने वाले सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए अगले 60 दिनों तक पूरी तरह निशुल्क और सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराएगा। साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सेवाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए ओमान के साथ बातचीत शुरू की जाएगी। इसके अतिरिक्त, अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के आर्थिक पुनर्वास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की भारी-भरकम फंडिंग सुनिश्चित करने पर सहमत हुआ है।
परमाणु कार्यक्रम के मोर्चे पर भी इस समझौते ने बेहद संवेदनशील मुद्दों को सुलझाया है। ईरान ने स्पष्ट रूप से पुष्टि की है कि वह भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, जबकि उसके पास मौजूद संवर्धित परमाणु सामग्री के प्रबंधन का समाधान दोनों देश आपसी सहमति के मैकेनिज्म से निकालेंगे। जब तक अंतिम समझौता पूरा नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्ष यथास्थिति बनाए रखेंगे, जिसके तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को वर्तमान स्थिति से आगे नहीं बढ़ाएगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा। इसके अलावा, अमेरिकी वित्त विभाग ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए तत्काल बैंकिंग और बीमा छूट प्रदान करेगा, और विदेशों में फ्रीज की गई ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों को भी पूरी तरह रिलीज किया जाएगा। इस ऐतिहासिक शांति समझौते को अंतिम रूप देने के बाद अब इसे औपचारिक मंजूरी के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के समक्ष भेजा जाएगा।