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  • फसल खराब हुई तो अब मिलेगा ज्यादा मुआवजा, सरकार ने बढ़ाई बीमित राशि; 31 जुलाई तक करा सकते हैं बीमा

    फसल खराब हुई तो अब मिलेगा ज्यादा मुआवजा, सरकार ने बढ़ाई बीमित राशि; 31 जुलाई तक करा सकते हैं बीमा


    मध्य प्रदेश। खरीफ सीजन में खेती करने वाले किसानों के लिए राहत भरी खबर है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत राज्य सरकार ने इस बार प्रमुख खरीफ फसलों की बीमित राशि बढ़ा दी है। इसका सीधा फायदा उन किसानों को मिलेगा जिनकी फसल प्राकृतिक आपदा, अतिवृष्टि, सूखा या अन्य कारणों से खराब होती है। नई व्यवस्था के तहत धान, मक्का और सोयाबीन की फसल पर मिलने वाले बीमा क्लेम में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी, जिससे नुकसान की भरपाई पहले की तुलना में बेहतर तरीके से हो सकेगी।

    सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार धान की बीमित राशि में प्रति हेक्टेयर 4100 रुपए, मक्का में 2350 रुपए और सोयाबीन में 3910 रुपए तक की बढ़ोतरी की गई है। इसका असर सीधे क्लेम राशि पर पड़ेगा। अनुमान है कि धान उत्पादक किसानों को लगभग 10 प्रतिशत, मक्का किसानों को करीब 7 प्रतिशत और सोयाबीन उत्पादकों को लगभग 5 प्रतिशत तक अधिक क्लेम मिल सकेगा।

    हालांकि बीमित राशि बढ़ने के साथ बीमा प्रीमियम में भी मामूली वृद्धि होगी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ा हुआ मुआवजा किसानों के लिए कहीं अधिक लाभदायक साबित होगा। फसल को नुकसान होने की स्थिति में अतिरिक्त क्लेम किसानों को आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगा और अगली फसल की तैयारी के लिए भी सहारा देगा।

    सरकार ने फसल बीमा का लाभ समझाने के लिए उदाहरण भी दिया है। आगर-मालवा जिले में मक्का की थ्रेशोल्ड उपज 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर निर्धारित है। यदि किसी किसान की उपज केवल 30 क्विंटल रहती है तो वर्ष 2025 में 34,650 रुपए की बीमित राशि के आधार पर उसे 8,663 रुपए का क्लेम मिलता था। इस वर्ष बीमित राशि बढ़कर 37 हजार रुपए होने से समान नुकसान की स्थिति में किसान को लगभग 9,250 रुपए का क्लेम मिलेगा।

    इसी तरह सागर जिले में असिंचित धान की बीमित राशि बढ़ने से प्रति हेक्टेयर मिलने वाला क्लेम लगभग 322 रुपए तक बढ़ जाएगा। पहले जहां नुकसान की स्थिति में 6,238 रुपए मिलते थे, अब वही राशि बढ़कर करीब 6,560 रुपए हो जाएगी। दतिया जिले में सोयाबीन किसानों को भी राहत मिलेगी, जहां बीमित राशि बढ़ने के कारण क्लेम में लगभग 467 रुपए प्रति हेक्टेयर की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत ऋण लेने वाले किसानों के लिए बीमा सामान्यतः अनिवार्य रहता है। यदि कोई ऋणी किसान बीमा नहीं कराना चाहता है तो उसे संबंधित बैंक में निर्धारित समय सीमा के भीतर लिखित रूप से इसकी सूचना देनी होगी। वहीं गैर-ऋणी किसानों के लिए बीमा पूरी तरह स्वैच्छिक है और वे अपनी इच्छा से योजना का लाभ ले सकते हैं।

    राज्य सरकार ने खरीफ फसलों के बीमा के लिए 31 जुलाई अंतिम तिथि निर्धारित की है। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि समय रहते बीमा कराकर अपनी फसल को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान के खिलाफ सुरक्षित करें, ताकि विपरीत परिस्थितियों में उन्हें आर्थिक सहायता मिल सके।

  • मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने देश में खरीफ सीजन की तैयारियों पर असर डालना शुरू कर दिया है। अब तक सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश दर्ज होने के कारण कपास और सोयाबीन जैसी प्रमुख नकदी फसलों की बुआई अपेक्षा से काफी पीछे चल रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो इसका असर कृषि उत्पादन के साथ-साथ उद्योगों पर भी दिखाई दे सकता है।

    कृषि मंत्रालय के 19 जून तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की बुआई 17.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 22.82 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार करीब 5.69 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में कपास बोई गई है। कपास के रकबे में आई यह गिरावट संकेत दे रही है कि किसान फिलहाल इस फसल की ओर कम रुझान दिखा रहे हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि अगले कुछ सप्ताह में कपास की बुआई में तेजी नहीं आई तो कच्चे कपास और यार्न की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे वस्त्र उद्योग की लागत बढ़ने की आशंका है।

    सोयाबीन की सुस्ती से तिलहन क्षेत्र भी प्रभावित

    कपास के साथ-साथ तिलहन फसलों की बुआई भी दबाव में है। इसकी प्रमुख वजह सोयाबीन की धीमी बुआई है। पिछले वर्ष इसी अवधि में सोयाबीन का रकबा 2.50 लाख हेक्टेयर था, जो इस बार घटकर 1.30 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी करीब 1.20 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।

    सोयाबीन के कमजोर प्रदर्शन का असर कुल तिलहन क्षेत्र पर भी पड़ा है। पिछले साल जहां तिलहन फसलों का रकबा 8.11 लाख हेक्टेयर था, वहीं इस बार यह घटकर 7.24 लाख हेक्टेयर रह गया है। हालांकि मूंगफली और सूरजमुखी की खेती में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन वह सोयाबीन की कमी की भरपाई नहीं कर पा रही है।

    धान और बाजरा किसानों की पहली पसंद बने

    इसके विपरीत धान और मोटे अनाजों की बुआई में वृद्धि दर्ज की गई है। धान का रकबा 4.26 लाख हेक्टेयर बढ़कर 12.36 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वहीं बाजरा सहित मोटे अनाजों का क्षेत्रफल 2.14 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.05 लाख हेक्टेयर हो गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धान और मोटे अनाजों में सरकारी खरीद की मजबूत व्यवस्था और अपेक्षाकृत कम जोखिम किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। दूसरी ओर कपास और सोयाबीन में वैश्विक बाजार की अनिश्चितता तथा कीट प्रकोप का खतरा किसानों को सतर्क बना रहा है।

    जल प्रबंधन व्यवस्था पर मूडीज की चिंता

    इस बीच, मूडीज रेटिंग्स ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। एजेंसी का कहना है कि पानी के आवंटन, मूल्य निर्धारण और वितरण से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाएं देश के लिए वित्तीय और क्रेडिट जोखिम पैदा कर रही हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार यदि जल प्रबंधन ढांचे में समय रहते सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में राज्यों की वित्तीय स्थिति और उनकी क्रेडिट रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    खेती में खप रहा 80 फीसदी ताजा पानी

    मूडीज के मुताबिक भारत में पानी की कीमतें विशेष रूप से कृषि क्षेत्र के लिए अत्यधिक रियायती हैं। देश के कुल ताजे जल संसाधनों का लगभग 80 फीसदी हिस्सा खेती में उपयोग हो रहा है। सब्सिडी आधारित व्यवस्था के कारण पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

    एआई और डाटा सेंटर भी बढ़ा रहे दबाव

    रिपोर्ट में एक नए उभरते खतरे की ओर भी संकेत किया गया है। देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार के साथ बड़े पैमाने पर डाटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।

    मूडीज का मानना है कि डाटा सेंटरों की बढ़ती जल मांग पहले से दबाव झेल रही जल आपूर्ति व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकती है। आने वाले वर्षों में सरकारों और यूटिलिटी कंपनियों को इस अतिरिक्त दबाव से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति बनानी होगी।