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  • चीन के स्पेस मिशन को बड़ा झटका, लॉन्च के कुछ ही देर बाद रॉकेट में विस्फोट; संचार उपग्रह नष्ट

    चीन के स्पेस मिशन को बड़ा झटका, लॉन्च के कुछ ही देर बाद रॉकेट में विस्फोट; संचार उपग्रह नष्ट


    नई दिल्ली। चीन के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम को सोमवार रात बड़ा झटका लगा जब लॉन्ग मार्च 7A रॉकेट लॉन्च के कुछ ही समय बाद हवा में विस्फोट का शिकार हो गया। रॉकेट अपने साथ झोंगशिंग 4B यानी चाइनासैट 4B संचार उपग्रह लेकर उड़ान भर रहा था लेकिन मिशन के शुरुआती चरण में ही रॉकेट में गंभीर तकनीकी असामान्यता सामने आई और करीब 85 सेकंड बाद वह आसमान में टूटकर आग के विशाल गोले में बदल गया। इस दुर्घटना के साथ ही रॉकेट में मौजूद संचार उपग्रह भी नष्ट हो गया और चीन का यह अंतरिक्ष मिशन पूरी तरह विफल हो गया।

    यह प्रक्षेपण चीन के हैनान द्वीप स्थित वेनचांग स्पेस लॉन्च सेंटर से किया गया था। लॉन्च के बाद शुरुआती कुछ सेकंड तक रॉकेट सामान्य तरीके से आगे बढ़ता दिखाई दिया लेकिन करीब डेढ़ मिनट से भी कम समय बाद उसमें गड़बड़ी सामने आ गई। घटना से जुड़े वीडियो में रॉकेट को उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद बिखरते और तेज आग की लपटों के बीच नष्ट होते देखा जा सकता है। हादसे के बाद मिशन से जुड़े अधिकारियों के बीच भी हलचल बढ़ गई। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने घटना के करीब तीन घंटे बाद मिशन की विफलता की पुष्टि करते हुए बताया कि उड़ान के दौरान रॉकेट में तकनीकी असामान्यता उत्पन्न हुई थी।

    इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चाइनासैट 4B संचार उपग्रह था। इसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाना था और इसके जरिए रेडियो टेलीविजन तथा अन्य संचार सेवाओं को मजबूत करने की योजना थी। लेकिन रॉकेट के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण उपग्रह भी मिशन के साथ नष्ट हो गया। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि रॉकेट में तकनीकी समस्या किस स्तर पर उत्पन्न हुई और आखिर ऐसी कौन सी गड़बड़ी थी जिसके कारण उड़ान के शुरुआती चरण में ही पूरा मिशन असफल हो गया।

    चीन ने हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जानकारी में तकनीकी असामान्यता को दुर्घटना की वजह बताया गया है लेकिन विस्तृत जांच के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि समस्या रॉकेट के इंजन ईंधन प्रणाली नियंत्रण प्रणाली या किसी अन्य महत्वपूर्ण हिस्से में थी। चीन के सरकारी मीडिया में हादसे को लेकर सीमित जानकारी सामने आई है। वहीं चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामने आए कुछ वीडियो की उपलब्धता भी सीमित दिखाई दी। ऐसे में हादसे की वास्तविक परिस्थितियों को लेकर फिलहाल आधिकारिक जांच के नतीजों का इंतजार किया जा रहा है।

    लॉन्ग मार्च 7A को चीन के महत्वपूर्ण प्रक्षेपण वाहनों में गिना जाता है और इसे उसके अंतरिक्ष कार्यक्रम का वर्कहॉर्स भी कहा जाता है। इसका विकास चाइना एकेडमी ऑफ लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी ने किया है जो चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन की सहायक इकाई है। यह लॉन्ग मार्च 7A का 18वां मिशन था। इससे पहले वर्ष 2020 में अपनी पहली उड़ान के दौरान इसे असफलता का सामना करना पड़ा था लेकिन उसके बाद रॉकेट ने कई सफल मिशन पूरे किए थे। ऐसे में ताजा दुर्घटना चीन के लिए तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    चीन इस समय अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने में जुटा है। अमेरिका के साथ पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक उपग्रह प्रक्षेपण चंद्र मिशन और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वर्ष 2050 तक देश को अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी शक्ति बनाने का लक्ष्य रखा है। ऐसे समय में एक महत्वपूर्ण रॉकेट और संचार उपग्रह का एक साथ नष्ट होना उसके अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए बड़ा झटका है। अब जांच के निष्कर्षों पर नजर रहेगी क्योंकि उनसे भविष्य के लॉन्ग मार्च मिशनों की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।

  • आर्टेमिस II मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों ने सुरक्षित तरीके से देखा सूर्य ग्रहण, सोलर ग्लासेज का उपयोग अनिवार्य बताया

    आर्टेमिस II मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों ने सुरक्षित तरीके से देखा सूर्य ग्रहण, सोलर ग्लासेज का उपयोग अनिवार्य बताया


    नई दिल्ली। अंतरिक्ष से सूर्य ग्रहण देखना जितना रोमांचक अनुभव है, उतना ही संवेदनशील भी है, क्योंकि इस दौरान आंखों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल ही में आर्टेमिस II मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने सूर्य ग्रहण का अद्भुत दृश्य देखा, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सोलर व्यूइंग ग्लासेज के उपयोग की आवश्यकता को भी स्पष्ट रूप से सामने रखा। यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि चाहे पृथ्वी हो या अंतरिक्ष, सूर्य को सीधे देखना हमेशा सावधानी की मांग करता है।

    इस मिशन में शामिल अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना कोच, जेरेमी हैनसन, रीड वाइजमैन और विक्टर ग्लोवर ने ओरियन स्पेसक्राफ्ट से सूर्य ग्रहण का अवलोकन किया। उन्होंने विशेष सोलर एक्लिप्स ग्लासेज पहनकर ग्रहण के आंशिक चरणों को देखा, ताकि आंखों को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे। वैज्ञानिकों के अनुसार, केवल पूर्ण सूर्य ग्रहण के कुछ क्षणों को छोड़कर बाकी समय सूर्य को सीधे देखना आंखों के लिए अत्यंत खतरनाक होता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि सूर्य की तेज रोशनी और हानिकारक विकिरण आंखों की रेटिना को स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि सामान्य धूप के चश्मे सूर्य ग्रहण देखने के लिए सुरक्षित नहीं माने जाते। सोलर व्यूइंग ग्लासेज विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए बनाए जाते हैं और ये अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होते हैं, जो आंखों को सुरक्षित रखते हैं।

    आंशिक और वलयाकार सूर्य ग्रहण के दौरान सावधानी और भी आवश्यक हो जाती है, क्योंकि इन स्थितियों में सूर्य पूरी तरह ढका नहीं होता। ऐसे में पूरे समय सोलर ग्लासेज पहनना जरूरी होता है। यदि चश्मे में किसी प्रकार की खरोंच या क्षति हो, तो उनका उपयोग तुरंत बंद कर देना चाहिए। बच्चों को ग्रहण दिखाते समय विशेष निगरानी की आवश्यकता होती है, ताकि वे बिना सुरक्षा के सूर्य की ओर न देखें।

    इसके अलावा, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि सोलर ग्लासेज पहनकर भी कैमरा, दूरबीन या टेलीस्कोप के माध्यम से सूर्य को नहीं देखना चाहिए। इन उपकरणों के जरिए सूर्य की किरणें और अधिक तीव्र होकर आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसे उपकरणों के लिए अलग से विशेष सोलर फिल्टर का उपयोग करना अनिवार्य होता है।

    यदि सोलर व्यूइंग ग्लासेज उपलब्ध न हों, तो अप्रत्यक्ष तरीके से ग्रहण देखना एक सुरक्षित विकल्प है। पिनहोल प्रोजेक्टर जैसी सरल विधि के माध्यम से सूर्य की छवि को कागज या दीवार पर प्रोजेक्ट करके बिना किसी जोखिम के ग्रहण का आनंद लिया जा सकता है। इस तकनीक में सीधे सूर्य को देखने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे आंखों की सुरक्षा बनी रहती है।

  • इसरो के अगले साल के सात प्रमुख मिशन: गगनयान से लेकर क्वांटम-की वितरण तक

    इसरो के अगले साल के सात प्रमुख मिशन: गगनयान से लेकर क्वांटम-की वितरण तक


    नई दिल्ली । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने अगले साल मार्च तक सात महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशनों की योजना बनाई है। इनमें कई नई प्रौद्योगिकियां और भारतीय अंतरिक्ष यात्रा के प्रमुख मील के पत्थर शामिल हैं। इनमें से एक प्रमुख मिशन 2026 में होने वाला गगनयान का पहला मानवरहित अभियान होगाजो भारत के मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान की शुरुआत का संकेत देगा। इसके अलावाइसरो द्वारा स्वदेशी रूप से निर्मित इलेक्ट्रिक प्रणोदन प्रणालियों और क्वांटम-की वितरण जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का परीक्षण भी किया जाएगा।
    इसरो के मुताबिकपहले मिशन की शुरुआत अगले हफ्ते की संभावना हैजिसमें भारत का सबसे भारी रॉकेटएलवीएम3‘ब्लूबर्ड-6’ संचार उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित करेगा। यह रॉकेट इसरो की न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के बीच एक वाणिज्यिक करार के तहत उड़ान भरेगा। एलवीएम3जिसे ह्यूमन रेटेड माना जाता है2026 की शुरुआत में फिर से उड़ान भरेगा और गगनयान के तहत भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन का पहला मानवरहित यानव्योममित्रलेकर अंतरिक्ष की कक्षा में प्रवेश करेगा।
    गगनयान मिशन के तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 2027 में पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजे जाने की योजना है। इसके पहलेअगले साल एक और मानवरहित मिशन लॉन्च किया जाएगाजो गगनयान के विभिन्न पहलुओं का आकलन करेगा। इस मिशन में ह्यूमन रेटेड प्रक्षेपण वाहन के वायुगतिकीय पैमानेकक्षीय मॉड्यूल के प्रदर्शन और चालक दल मॉड्यूल के पुनः प्रवेश एवं पुनर्प्राप्ति की प्रक्रिया को परखा जाएगा।
    इसके अलावाइसरो द्वारा पहली बार उद्योग जगत द्वारा निर्मित ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी का प्रक्षेपण भी किया जाएगा। इस मिशन में ओशनसैट उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया जाएगासाथ ही भारत-मॉरीशस संयुक्त उपग्रह और ध्रुव स्पेस का लीप-2 उपग्रह भी भेजा जाएगा। पीएसएलवी रॉकेट में एक अन्य महत्वपूर्ण मिशनईओएस-एन1और 18 छोटे उपग्रहों को कक्षा में भेजने की योजना है।
    इसरो के अनुसार2026 में और भी महत्वपूर्ण मिशन हो सकते हैंजिनमें क्वांटम-की वितरण और स्वदेशी यात्रा-तरंग नली प्रवर्धक जैसी नई प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन शामिल है। इसरो द्वारा किए गए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते के तहत एचएएल-एलएंडटी कंसोर्टियम को पांच पीएसएलवी रॉकेट के निर्माण का ठेका भी दिया गया हैजिससे उपग्रहों के वाणिज्यिक प्रक्षेपण को बढ़ावा मिलेगा।
    इसरो के इन मिशनों से न केवल भारत की अंतरिक्ष यात्रा की दिशा स्पष्ट होगीबल्कि ये वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में भारत की ताकत को भी प्रमाणित करेंगे। इसरो की ये योजनाएं आने वाले वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगी।