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  • मंगल पर एपीएक्सएस का कमाल, 1761 नमूनों की जांच कर भेजीं 3943 वैज्ञानिक रिपोर्ट

    मंगल पर एपीएक्सएस का कमाल, 1761 नमूनों की जांच कर भेजीं 3943 वैज्ञानिक रिपोर्ट


    नई दिल्ली। मंगल ग्रह की सतह पर लगातार वैज्ञानिक खोजों में जुटा नासा का क्यूरियोसिटी रोवर एक बार फिर चर्चा में है। इस रोवर पर लगा कनाडा का अत्याधुनिक अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (APXS) अब तक 1761 नमूनों की जांच कर 3943 वैज्ञानिक रिपोर्ट पृथ्वी तक भेज चुका है। यह हाईटेक उपकरण मंगल की मिट्टी और चट्टानों के रहस्यों को समझने में वैज्ञानिकों की बड़ी मदद कर रहा है।

    कनाडाई स्पेस एजेंसी के अनुसार, APXS का मुख्य उद्देश्य मंगल ग्रह की सतह पर मौजूद रासायनिक तत्वों की पहचान करना और यह पता लगाना है कि क्या कभी वहां जीवन के अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थीं।

    आकार में रूबिक क्यूब जैसा दिखने वाला यह उपकरण क्यूरियोसिटी रोवर की रोबोटिक भुजा के सिरे पर लगा है। जब रोवर किसी चट्टान या मिट्टी के नमूने के करीब पहुंचता है, तब APXS उस पर एक्स-रे और अल्फा कणों की बौछार करता है। इसके बाद नमूने से निकलने वाली ऊर्जा का विश्लेषण कर उसकी रासायनिक संरचना का पता लगाया जाता है।

    वैज्ञानिकों के मुताबिक यह उपकरण बेहद सूक्ष्म तत्वों की भी पहचान करने में सक्षम है। किसी नमूने की विस्तृत जांच में लगभग दो से तीन घंटे का समय लगता है, जबकि त्वरित विश्लेषण करीब 10 मिनट में पूरा हो जाता है।

    APXS ने साल 2024 में एक अहम खोज में भी बड़ी भूमिका निभाई थी। क्यूरियोसिटी रोवर के गुजरने के दौरान एक चट्टान टूट गई थी, जिसके अंदर शुद्ध सल्फर के क्रिस्टल मिले थे। मंगल ग्रह पर पहली बार इस तरह के क्रिस्टल मिलने से वैज्ञानिकों में उत्साह बढ़ गया था। माना जा रहा है कि इससे मंगल के प्राचीन वातावरण और वहां की प्राकृतिक परिस्थितियों को समझने में मदद मिलेगी।

    कनाडाई स्पेस एजेंसी ने बताया कि APXS दिन और रात दोनों समय काम कर सकता है। यह उपकरण थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर से संचालित होता है, जिससे रोवर को सौर ऊर्जा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। यही वजह है कि क्यूरियोसिटी रोवर मंगल की कड़ाके की सर्दी में भी सक्रिय बना रहता है।

    1 फरवरी 2026 तक क्यूरियोसिटी रोवर मंगल ग्रह पर 36.2 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि APXS से मिलने वाले आंकड़े भविष्य में मानव मिशनों और मंगल पर जीवन की संभावनाओं को समझने में बेहद अहम साबित होंगे।

  • सीएम मोहन यादव करेंगे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन, उज्जैन बनेगा ग्लोबल टाइम सेंटर

    सीएम मोहन यादव करेंगे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन, उज्जैन बनेगा ग्लोबल टाइम सेंटर


    भोपाल । मध्यप्रदेश के उज्जैन में 3 अप्रैल से एक ऐतिहासिक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का आयोजन होने जा रहा है, जहां विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। मुख्यमंत्री मोहन यादव महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करेंगे। यह सम्मेलन 3 से 5 अप्रैल तक उज्जैन के समीप डोंगला डिजिटल प्लेनेटेरियम परिसर में आयोजित होगा।

    इस अवसर पर उज्जैन में नव-निर्मित साइंस सेंटर का भी लोकार्पण किया जाएगा, जो आधुनिक वैज्ञानिक सोच और नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से बने इस साइंस सेंटर में साइंस गैलरी, आउटडोर साइंस पार्क, इनोवेशन हॉल और हेरिटेज आधारित प्रदर्शनी जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं।

    सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन सहित देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और विचारक शामिल होंगे।

    उज्जैन, जिसे बाबा महाकाल और सम्राट विक्रमादित्य की नगरी के रूप में जाना जाता है, प्राचीन काल से खगोल विज्ञान और काल गणना का प्रमुख केंद्र रहा है। यही कारण है कि इस सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक स्पेस टेक्नोलॉजी के समन्वय पर विशेष चर्चा की जाएगी।

    तीन दिवसीय इस आयोजन में वैज्ञानिक, खगोलविद, शोधार्थी और नीति-निर्माता एक मंच पर आकर अंतरिक्ष विज्ञान, एस्ट्रोफिजिक्स, कॉस्मोलॉजी और स्पेस इकोनॉमी जैसे विषयों पर अपने विचार साझा करेंगे। इसके साथ ही यूएवी तकनीक, सैटेलाइट निर्माण, रिमोट कंट्रोल सिस्टम और टेलीस्कोप से आकाशीय अध्ययन जैसी गतिविधियों पर कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी।

    सम्मेलन का एक प्रमुख आकर्षण उज्जैन-डोंगला को वैश्विक मेरिडियन के रूप में स्थापित करने की संभावनाओं पर चर्चा है। डोंगला, जहां से कर्क रेखा गुजरती है, प्राचीन काल से खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। राज्य सरकार उज्जैन को फिर से वैश्विक टाइम स्केल सेंटर के रूप में स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रही है।

    इस आयोजन में ISRO, CSIR, DRDO और नीति आयोग जैसे संस्थानों के विशेषज्ञ भी भाग लेंगे। इसके अलावा टेक्नोलॉजी एक्सपो, स्टार्ट-अप कॉन्फ्रेंस, प्रदर्शनी और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस आयोजन का हिस्सा होंगे।

    उज्जैन का यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नई दिशा देगा, बल्कि युवाओं में नवाचार और तकनीकी कौशल को भी प्रोत्साहित करेगा। साथ ही, यह आयोजन आगामी सिंहस्थ 2028 की तैयारियों को भी नई गति देने में सहायक साबित होगा। इस प्रकार ‘महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम’ सम्मेलन उज्जैन को एक बार फिर वैश्विक वैज्ञानिक मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।