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  • पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    नई दिल्ली। सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को नैवेद्य यानी भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना भोग लगाए कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। ईश्वर को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार मिठाई, खीर और विभिन्न प्रकार के ताजे फलों का अर्पण करते हैं। हालांकि, पूजा में फलों के चुनाव और उन्हें अर्पित करने के सही तरीकों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है। विशेषकर बीज वाले फलों को भगवान के समक्ष चढ़ाने के नियमों को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

    धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार पूजा-पाठ में फलों का अर्पण अत्यंत सात्विक और उत्तम माना जाता है। मौसम के अनुसार उपलब्ध ताजे फलों का भोग लगाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। जहां तक बीज वाले फलों का प्रश्न है, तो ऐसे फलों को भगवान को अर्पित किया जा सकता है, परंतु इसके लिए एक निश्चित विधि का पालन करना आवश्यक है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वयं भोजन ग्रहण करते समय या बच्चों को फल देते समय बीज अलग करता है, उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ भगवान को भी बीज निकालकर ही फल अर्पित करने चाहिए।

    भोग लगाने की विधि में शुद्धता और भाव का सबसे अधिक महत्व होता है। बड़े या अधिक बीज वाले फल जैसे आम, तरबूज या अन्य मौसमी फलों का भोग लगाते समय पहले उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ जल से धोना चाहिए। इसके बाद पूजा के समय ही उन्हें काटकर उनके बीजों को अलग कर देना चाहिए। पहले से काटकर रखे गए बासी या दूषित फलों को पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान विष्णु या उनके अवतारों को भोग अर्पित करते समय उसमें तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।

    पूजा-पाठ में नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त के मन का भाव पूरी तरह से निष्काम और अहंकार रहित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि भोग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए सही नियमों का पालन करते हुए, स्वच्छता और मर्यादा के साथ अर्पित किया गया साधारण सा भोग भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं और साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

  • रामनवमी पर अयोध्या में अद्भुत सूर्य तिलक से आलोकित हुआ रामलला का दरबार

    रामनवमी पर अयोध्या में अद्भुत सूर्य तिलक से आलोकित हुआ रामलला का दरबार


    नई दिल्ली:रामनगरी अयोध्या एक बार फिर भक्ति और आस्था के अद्भुत संगम की साक्षी बनी जब रामनवमी के पावन अवसर पर राम जन्मभूमि मंदिर में भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का भव्य और दिव्य आयोजन संपन्न हुआ दोपहर ठीक 12 बजे अभिजीत मुहूर्त में जैसे ही सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचीं वैसे ही रामलला के ललाट पर सूर्य तिलक का अलौकिक दृश्य साकार हो उठा यह क्षण न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था बल्कि इसे देखने वाले श्रद्धालुओं के लिए जीवन भर की अविस्मरणीय अनुभूति बन गया

    सूर्य तिलक का यह अद्भुत दृश्य करीब नौ मिनट तक बना रहा जिसमें सूर्य की किरणें सटीक कोण से रामलला के मस्तक पर केंद्रित रहीं मंदिर परिसर इस दौरान दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा और हर ओर जय श्रीराम के जयघोष गूंजने लगे इस विशेष आयोजन को भगवान श्रीराम के जन्म क्षण का प्रतीकात्मक पुनर्सृजन माना गया जिससे श्रद्धालुओं की आस्था और भी गहरी हो गई

    इस दिव्य क्षण को संभव बनाने के पीछे आधुनिक विज्ञान और प्राचीन आस्था का अद्भुत मेल देखने को मिला करीब 65 फीट लंबी विशेष प्रणाली के माध्यम से सूर्य की किरणों को गर्भगृह तक पहुंचाया गया इस प्रणाली में अष्टधातु के पाइप लेंस और दर्पणों का उपयोग किया गया जिनकी सहायता से सूर्य प्रकाश को परावर्तित कर सटीक स्थान तक लाया गया परिणामस्वरूप रामलला के ललाट पर लगभग 75 मिमी का तेजस्वी तिलक उभर कर सामने आया

    इससे पहले इस पूरी प्रक्रिया का लगातार तीन दिनों तक परीक्षण किया गया ताकि निर्धारित समय पर किसी भी प्रकार की त्रुटि न हो और सूर्य तिलक पूरी सटीकता के साथ संपन्न हो सके मंदिर प्रशासन और वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया

    धार्मिक अनुष्ठानों की बात करें तो गर्भगृह में 14 पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजा अर्चना की और पंचामृत अभिषेक संपन्न कराया इसके बाद भगवान की भव्य आरती की गई और उन्हें स्वर्ण जड़ित पीतांबर मुकुट और आभूषणों से अलंकृत किया गया जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में भगवान को 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग भी अर्पित किया गया जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा

    रामनवमी के इस विशेष अवसर पर अयोध्या में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा राम पथ भक्ति पथ और जन्मभूमि पथ पर लंबी कतारें देखी गईं श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जगह जगह एलईडी स्क्रीन लगाई गईं जिनके माध्यम से पूरे आयोजन का सीधा प्रसारण किया गया ताकि हर कोई इस दिव्य क्षण का साक्षी बन सके

    मंदिर प्रशासन ने भी विशेष व्यवस्था करते हुए दर्शन का समय बढ़ा दिया जिससे अधिक से अधिक श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर सकें सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक मंदिर के द्वार खुले रहे इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए

    इस बार की रामनवमी को धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत विशेष माना जा रहा है क्योंकि रवि योग और सर्वार्थसिद्धि योग का दुर्लभ संयोग बना जिसने इस पर्व की महत्ता को और अधिक बढ़ा दिया पूरे आयोजन के दौरान अयोध्या नगरी भक्ति उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आई साधु संत और श्रद्धालु भजन कीर्तन में लीन रहे और हर ओर उत्सव का वातावरण छाया रहा इस प्रकार रामनवमी का यह पर्व अपने चरम उल्लास और भव्यता के साथ संपन्न हुआ

  • कल्प नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा के दर्शन से मिलेगा यश और आशीर्वाद इन मंदिरों में करें पूजा

    कल्प नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा के दर्शन से मिलेगा यश और आशीर्वाद इन मंदिरों में करें पूजा


    नई दिल्ली: चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर दिन का अपना विशेष महत्व होता है नवरात्रि का चौथा दिन मां कुष्मांडा को समर्पित होता है जिन्हें सृष्टि की आदिशक्ति और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है भक्तों का विश्वास है कि मां कुष्मांडा की आराधना करने से जीवन में यश बल और समृद्धि की प्राप्ति होती है

    देशभर में मां कुष्मांडा के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं जहां दर्शन करने से भक्तों को विशेष कृपा का अनुभव होता है इन मंदिरों में आस्था और चमत्कार से जुड़ी मान्यताएं लोगों को दूर दूर से आकर्षित करती हैं

    मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित लमान माता मंदिर एक प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है इस मंदिर को नौकरी देने वाली देवी के रूप में भी जाना जाता है स्थानीय मान्यता है कि जो व्यक्ति रोजगार की समस्याओं से जूझ रहा हो वह यहां दर्शन करके मां से प्रार्थना करे तो उसकी मनोकामना पूरी हो सकती है नवरात्रि के चौथे दिन यहां विशेष रूप से मालपुए का भोग लगाया जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं

    उत्तर प्रदेश में भी मां कुष्मांडा के कई प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं कानपुर में स्थित मां कुष्मांडा देवी मंदिर एक प्राचीन शक्तिपीठ है जहां का पवित्र जल विशेष महत्व रखता है मान्यता है कि इस जल को आंखों पर लगाने से नेत्र रोगों में राहत मिलती है और कई भक्त इस जल को अपने साथ भी लेकर जाते हैं यहां मां की प्रतिमा लेटी हुई अवस्था में विराजमान है जो इस मंदिर को और भी खास बनाती है

    इसके अलावा वाराणसी में स्थित दुर्गाकुंड मंदिर भी मां कुष्मांडा के दर्शन के लिए एक प्रमुख स्थान है इस मंदिर के पास स्थित विशाल जलकुंड इसे और भी विशेष बनाता है नवरात्रि के दौरान यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और कुंड में स्नान कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं इस मंदिर में मां लक्ष्मी सरस्वती और काली के रूप में भी पूजा होती है और नवरात्रि के चौथे दिन इन्हें मां कुष्मांडा के रूप में सजाया जाता है

    मां कुष्मांडा की उपासना का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वे अपने भक्तों के जीवन से अंधकार दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं उनकी पूजा से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है बल्कि जीवन में नई ऊर्जा और आत्मविश्वास भी आता है

    नवरात्रि का चौथा दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है और मां कुष्मांडा के इन पावन मंदिरों में दर्शन करने से भक्तों को आशीर्वाद और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है