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  • ‘जीव-जगत-जगदीश्वर’ थीम पर सजा आध्यात्मिक मंच, आधुनिक तकनीक और ध्यान के संगम ने दिया शांति का संदेश

    ‘जीव-जगत-जगदीश्वर’ थीम पर सजा आध्यात्मिक मंच, आधुनिक तकनीक और ध्यान के संगम ने दिया शांति का संदेश


    भोपाल  । भोपाल में Healing for World Peace 2.0 का आयोजन व्यक्तिगत शांति और वैश्विक सद्भाव के संदेश के साथ संपन्न हुआ। इस आध्यात्मिक पहल का उद्देश्य लोगों को ध्यान योग और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने भीतर शांति तलाशने के लिए प्रेरित करना रहा। कार्यक्रम की केंद्रीय थीम जीव-जगत-जगदीश्वर रही। इसके जरिए मानव जीवन प्रकृति और परम चेतना के बीच संबंध को समझने तथा सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया। आयोजन में पारंपरिक आध्यात्मिक विधाओं के साथ आधुनिक तकनीक का अनूठा मेल देखने को मिला।

    Healing for World Peace 2.0 को एक ऐसे साझा मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया जहां लोग रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर होकर अपने मन और विचारों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। कार्यक्रम में 360 डिग्री इमर्सिव विजुअल अनुभव और हेडफोन आधारित ऑडियो के माध्यम से प्रतिभागियों को एक अलग तरह का अनुभव देने का प्रयास किया गया। योग ध्यान एनर्जी हीलिंग और कथा जैमिंग जैसी गतिविधियों ने आयोजन को विशेष स्वरूप दिया। इन गतिविधियों के माध्यम से लोगों को आत्मचिंतन करने और मानसिक संतुलन की अहमियत समझने का अवसर मिला।

    कार्यक्रम में ऊर्जा गुरु आयुष गुप्ता योगिनी आरविका गुप्ता और कथावाचिका पलक किशोरी की उपस्थिति ने आध्यात्मिक वातावरण को खास बनाया। आयोजन के दौरान यह संदेश दिया गया कि विश्व शांति की शुरुआत किसी बड़े बदलाव से पहले व्यक्ति के अपने भीतर से होती है। जब मनुष्य अपने विचारों भावनाओं और व्यवहार में संतुलन विकसित करता है तो उसका असर उसके परिवार और आसपास के समाज पर भी पड़ता है। इसी सकारात्मक प्रभाव को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाकर अधिक संवेदनशील और शांतिपूर्ण समाज की कल्पना की जा सकती है।

    आयोजन का उद्देश्य केवल लोगों को कुछ समय के लिए ध्यान और आध्यात्मिकता से जोड़ना नहीं था बल्कि शांति के विचार को निरंतर जनअभियान का रूप देना भी रहा। कार्यक्रम ने अलग अलग स्थानों और देशों से जुड़े प्रतिभागियों को साझा उद्देश्य के साथ जोड़ने का प्रयास किया। सामूहिक प्रार्थना सकारात्मक संकल्प और आध्यात्मिक जागरूकता के जरिए लोगों को यह समझाने पर जोर दिया गया कि समाज में शांति और सद्भाव कायम करने के लिए हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है।

    आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तनाव और मानसिक दबाव के बीच ऐसे आयोजन लोगों को अपने लिए समय निकालने और जीवन को अधिक सजगता से देखने की प्रेरणा दे सकते हैं। योग और ध्यान के अभ्यास से व्यक्ति अपने विचारों को समझने तथा भावनात्मक संतुलन विकसित करने की दिशा में प्रयास कर सकता है। कार्यक्रम में प्रस्तुत आध्यात्मिक विचारों का केंद्र भी यही रहा कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए और व्यक्ति की सकारात्मकता उसके व्यवहार के जरिए दूसरों तक पहुंच सकती है।

    आयोजकों की दीर्घकालिक परिकल्पना भोपाल को ध्यान आध्यात्मिकता आत्म-अन्वेषण और विश्व शांति से जुड़े आयोजनों के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने की है। इस दिशा में ऐसे कार्यक्रमों को अहम माना जा रहा है जो विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोगों को साझा मंच पर लाकर संवाद और सकारात्मक सोच को बढ़ावा दें।

    इस आयोजन को सफल बनाने में कई शैक्षणिक संस्थानों संगठनों और सहयोगी भागीदारों का योगदान रहा। इनमें SAGE University Manasrovar College LNCT Sagar Group Taj Lakefront Sukoon-e-Bhopal WiseLife Madhya Pradesh Tourism MP Culture Department Media Square GA Studios Anantam Agarwal Jewellers और The Fifth Veda सहित अन्य सहयोगी शामिल रहे। आयोजकों ने दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक दिलीप सूर्यवंशी और SAGE University के संजीव अग्रवाल सहित सभी सहयोगियों प्रतिभागियों और समर्थकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

    Healing for World Peace 2.0 का मूल संदेश यही रहा कि शांति की शुरुआत स्वयं से होती है। व्यक्ति जब अपने भीतर करुणा सकारात्मकता और संतुलन विकसित करता है तो वह अपने आसपास भी बेहतर वातावरण बनाने में योगदान दे सकता है। इसी सोच के साथ भोपाल में आयोजित यह पहल व्यक्तिगत जागरूकता को व्यापक सामाजिक सद्भाव और विश्व शांति के विचार से जोड़ने का प्रयास बनी।

  • विराट-अनुष्का 2023 से 2026 तक आठ बार पहुंचे प्रेमानंद महाराज के आश्रम, 5 करोड़ रुपये के दावे को क्रिकेटर के प्रवक्ता ने बताया निराधार

    विराट-अनुष्का 2023 से 2026 तक आठ बार पहुंचे प्रेमानंद महाराज के आश्रम, 5 करोड़ रुपये के दावे को क्रिकेटर के प्रवक्ता ने बताया निराधार

    नई दिल्ली: क्रिकेटर विराट कोहली और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा का संत प्रेमानंद महाराज से मिलने के लिए वृंदावन जाना एक बार फिर चर्चा में है। इसकी वजह विराट को आश्रम ले जाने के लिए पांच करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा, जिन्हें फलाहारी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, ने यह दावा किया था। इस मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखे जाने की जानकारी भी सामने आई। हालांकि, विराट कोहली के प्रवक्ता ने इस दावे को गलत, निराधार और तथ्यहीन बताते हुए खारिज कर दिया। उनके मुताबिक, विराट प्रेमानंद महाराज के दर्शन गहरी आस्था और श्रद्धा के कारण करते हैं, न कि किसी आर्थिक समझौते के तहत। इस दावे को साबित करने वाला कोई सार्वजनिक भुगतान रिकॉर्ड या स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण भी सामने नहीं आया है। विवाद के बीच विराट और अनुष्का की आध्यात्मिक यात्राओं का सिलसिला फिर चर्चा में आ गया है।

    विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की प्रेमानंद महाराज से पहली सार्वजनिक रूप से सामने आई मुलाकात 4 जनवरी 2023 को हुई थी। दोनों अपनी बेटी वामिका के साथ वृंदावन पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पहले बाबा नीम करोली के आश्रम में दर्शन किए और फिर प्रेमानंद महाराज के आश्रम जाकर सत्संग सुना और आशीर्वाद लिया। उस समय उनकी यात्रा निजी रखी गई थी, लेकिन बाद में तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद यह जानकारी सार्वजनिक हुई। करीब दो साल बाद 10 जनवरी 2025 को दोनों अपने बच्चों वामिका और अकाय के साथ दोबारा आश्रम पहुंचे। उस समय विराट ऑस्ट्रेलिया दौरे पर अपने प्रदर्शन को लेकर चर्चा में थे। मुलाकात के दौरान प्रेमानंद महाराज ने उनसे पूछा कि क्या उनका मन प्रसन्न है। विराट ने मुस्कुराकर हां में जवाब दिया। अनुष्का ने भी महाराज से बातचीत में कहा कि उन्हें प्रेम भक्ति चाहिए। उन्होंने बताया कि पिछली मुलाकात में वह कुछ सवाल पूछना चाहती थीं, लेकिन दूसरे लोगों ने वही सवाल पहले पूछ लिए थे।

    13 मई 2025 को विराट और अनुष्का फिर प्रेमानंद महाराज के पास पहुंचे। इस बार दोनों ने उनके साथ एकांत में बातचीत की। यह मुलाकात विराट के टेस्ट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा के ठीक बाद हुई थी। इसके बाद 16 दिसंबर 2025 को दोनों दोबारा आश्रम पहुंचे और जमीन पर बैठकर सत्संग सुना। इस दौरान अनुष्का भावुक नजर आईं। उन्होंने महाराज से कहा था कि वे उनके हैं। जवाब में महाराज ने समझाया कि सभी श्रीजी के हैं। फरवरी 2026 में दोनों फिर वृंदावन पहुंचे और आम श्रद्धालुओं के बीच बैठकर सत्संग में शामिल हुए। अप्रैल 2026 में भी उन्होंने आश्रम पहुंचकर महाराज का आशीर्वाद लिया। इन मुलाकातों में दोनों का सादगी से सत्संग में शामिल होना भी चर्चा में रहा।

    विराट कोहली की टीम रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के आईपीएल 2026 का खिताब जीतने के बाद 2 जून 2026 को विराट और अनुष्का फिर प्रेमानंद महाराज के आश्रम पहुंचे। दोनों ने वहां सत्संग सुना और आध्यात्मिक बातचीत में हिस्सा लिया। इसके बाद 22 जुलाई 2026 को दोनों श्रीहित राधा केली कुंज आश्रम पहुंचे। बारिश के कारण रास्तों पर कीचड़ था, फिर भी दोनों नंगे पैर आश्रम से बाहर निकलते दिखाई दिए। उनके हाथों में प्रसाद था और चेहरे पर मास्क लगा हुआ था। वहां मौजूद लोगों का उन्होंने ‘राधे-राधे’ कहकर अभिवादन किया। जनवरी 2023 से जुलाई 2026 तक दोनों की आठ सार्वजनिक रूप से सामने आई मुलाकातों की जानकारी सामने आ चुकी है। इन यात्राओं में कभी वे बच्चों के साथ पहुंचे, तो कभी सत्संग और एकांत बातचीत में शामिल हुए।

    पांच करोड़ रुपये के दावे के सामने आने के बाद विराट के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि प्रेमानंद महाराज से मिलने के लिए किसी तरह की आर्थिक डील नहीं हुई थी। उन्होंने मीडिया से भी अपील की कि विराट से जुड़े ऐसे दावों को आगे बढ़ाने से पहले उनकी तथ्यात्मक जांच की जाए। फिलहाल इस कथित भुगतान के समर्थन में कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण सामने नहीं आया है। वहीं, विराट और अनुष्का की वृंदावन यात्राओं का सिलसिला पिछले साढ़े तीन वर्षों से सार्वजनिक रूप से चर्चा में रहा है। इस पूरे मामले में एक ओर पांच करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा है, जबकि दूसरी ओर विराट की टीम ने इसे स्पष्ट रूप से नकारा है। ऐसे में इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

  • विराट कोहली के टैटू सिर्फ डिजाइन नहीं, जिंदगी के अहम पड़ावों की कहानी हैं; परिवार, आस्था और क्रिकेट से जुड़ी खास यादें

    विराट कोहली के टैटू सिर्फ डिजाइन नहीं, जिंदगी के अहम पड़ावों की कहानी हैं; परिवार, आस्था और क्रिकेट से जुड़ी खास यादें

    नई दिल्ली । क्रिकेट के मैदान पर विराट कोहली को याद करते ही सबसे पहले उनके शॉट्स, आक्रामक अंदाज, जोशीले जश्न और खेल के प्रति जुनून की तस्वीर सामने आती है। इसके बाद उनके रिकॉर्ड और रन याद आते हैं, लेकिन कोहली ने सिर्फ बल्लेबाजी से ही एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित नहीं किया। उनकी दाढ़ी, हेयरस्टाइल, पहनावा और अंदाज भी युवाओं के बीच चर्चा का हिस्सा रहे हैं। इन सबके बीच उनके शरीर पर बने टैटू उनकी पहचान का एक ऐसा हिस्सा हैं, जो मैदान से बाहर कोहली के व्यक्तित्व की बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं।

    कोहली के दोनों हाथों पर कई टैटू हैं। पहली नजर में ये डिजाइन किसी रॉकस्टार की तरह बहुत ज्यादा शोर मचाने वाले नहीं लगते, लेकिन इनके पीछे की कहानियां काफी व्यक्तिगत हैं। कहीं परिवार है, कहीं आध्यात्मिकता, कहीं अनुशासन और कहीं जिंदगी को देखने का नजरिया। यही वजह है कि कोहली के लिए टैटू महज शरीर पर बना डिजाइन नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की डायरी जैसा है।

    कोहली के टैटू में क्या-क्या छिपा है?

    विराट कोहली के टैटू कलेक्शन को देखें तो इसमें कई अलग-अलग प्रतीक दिखाई देते हैं। इनमें ऑल-सीइंग आई शामिल है, जिसे कोहली ने इस सोच से जोड़ा है कि इंसान जो कुछ करता है, उसे कोई न कोई देख रहा है और उसके कर्मों का हिसाब रखा जा रहा है। जापानी समुराई का टैटू भी उनके शरीर पर है, जिससे कोहली ताकत, वफादारी, आत्म-अनुशासन और नैतिक व्यवहार जैसे मूल्यों को जोड़ते हैं।

    इसके अलावा उनकी वनडे और टेस्ट कैप के नंबर, उनके पिता और मां के नाम, भगवान शिव का टैटू, जिसमें शिव को कैलाश पर्वत पर ध्यान करते हुए दिखाया गया है, और एक मठ की तस्वीर भी उनके टैटू में शामिल हैं। स्कॉर्पियो, ओम और ट्राइबल डिजाइन भी उनके शरीर पर मौजूद हैं। इन सभी टैटू को एक साथ देखें तो कोहली की मैदान वाली आक्रामक छवि के पीछे एक शांत, आध्यात्मिक और आत्मचिंतन करने वाला पक्ष भी नजर आता है।

    बाएं हाथ की स्लीव अभी भी पूरी क्यों नहीं हुई?

    कोहली के टैटू की खास बात यह भी है कि उनका बायां हाथ अभी पूरी तरह ‘पूरा’ नहीं हुआ है। यह अधूरापन जानबूझकर रखा गया है। इसके पीछे एक दिलचस्प सोच है। कोहली की जिंदगी लगातार बदलती रही है। क्रिकेट करियर में नई उपलब्धियां आईं, निजी जिंदगी में बदलाव हुए और सोच भी समय के साथ विकसित हुई। ऐसे में उनका टैटू भी किसी एक दौर की स्थिर तस्वीर नहीं है। वह लगातार आगे बढ़ रही कहानी की तरह है।

    उनके साथ काम करने वाले कलाकारों के मुताबिक, पिछले तीन साल से ज्यादा समय से कोहली के टैटू पर काम चल रहा है और अभी भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। बाएं हाथ के डिजाइन का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है, लेकिन दाहिने हिस्से पर अभी काम बाकी है। हाल में उनके टैटू कलेक्शन में एक और डिजाइन जुड़ा, जो पानी की सतह पर एक बूंद गिरने के बाद बनने वाली लहरों जैसा दिखाई देता है। यानी एक छोटी सी चीज का असर लगातार दूर तक फैलता जाता है।

    क्या कोहली खुद तय करते हैं कि शरीर पर क्या बनेगा?

    कोहली के टैटू को खास बनाने वाली एक और बात यह है कि वह डिजाइन तैयार करने की प्रक्रिया में खुद बेहद सक्रिय रहते हैं। उनके साथ काम करने वाले टैटू आर्टिस्ट बताते हैं कि कोहली सिर्फ कलाकार के सामने बैठकर यह इंतजार नहीं करते कि कलाकार उनके लिए कुछ बना दे। वह हर चीज को समझना चाहते हैं। टैटू आर्टिस्ट के मुताबिक, कोहली टैटू डिजाइन की तकनीकी प्रक्रिया को भी समझने की कोशिश करते हैं। वह डिजाइन की प्रक्रिया में शुरुआत से अंत तक सक्रिय रूप से शामिल रहते हैं।

    क्या टैटूज में हैं कोहली की जिंदगी की कहानी?

    एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर, ये डिजाइन बहुत बोल्ड नहीं लगते और इनके तत्व शांत दिखाई देते हैं। लेकिन विराट के लिए ये सभी तत्व बोल्ड हैं, क्योंकि ये खुद उनका प्रतिबिंब हैं। उनका टैटू उनके भीतर की भावनाओं और एहसासों की अभिव्यक्ति है। यही उनकी खूबसूरती है। वह जीवन, अपने करियर और हर चीज के बारे में जो मानते हैं, जो महसूस करते हैं और उनकी जो सोच है, उनका डिजाइन उसी को दर्शाता है। कोहली टैटू की सुंदरता से ज्यादा उसके पीछे की कहानी को महत्व देते हैं।

    किसी क्रिकेटर का टैटू बनाना कितना अलग होता है?

    क्या किसी आम व्यक्ति और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर के लिए टैटू बनाने की प्रक्रिया अलग होती है? इसका जवाब है, डिजाइन बनाने की मूल प्रक्रिया लगभग एक जैसी रहती है, लेकिन टैटू का टॉपिक अलग हो सकता है। कोई अपने साथी का नाम चाहता है, कोई किसी उपलब्धि को याद रखना चाहता है, तो किसी के लिए कोई धार्मिक विश्वास महत्वपूर्ण होता है, लेकिन इसके बाद कलाकार गहराई में जाकर उस विचार के पीछे की असली भावना तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। यहीं से टैटू सिर्फ शरीर पर बनाया जाने वाला डिजाइन नहीं रह जाता। वह व्यक्ति के अनुभव का हिस्सा बनने लगता है।

    मैच से पहले टैटू? खिलाड़ियों की रिकवरी कैसे होती है?

    पेशेवर क्रिकेटरों के मामले में टैटू बनवाने के साथ एक और सवाल जुड़ा होता है- अगर कुछ दिन बाद मैच हो तो शरीर पर टैटू का असर क्या होगा? टैटू आर्टिस्ट के मुताबिक, कलाकार खिलाड़ियों को अपनी सलाह देते हैं, लेकिन विराट कोहली और हार्दिक पांड्या जैसे खिलाड़ी अपने शरीर और रिकवरी को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। ऐसा भी हुआ है कि विराट ने मैच से कुछ दिन पहले टैटू बनवाया और इसके बाद भी मैचों में अच्छा प्रदर्शन किया। हार्दिक के साथ भी कुछ ऐसा ही है। हालांकि, आम व्यक्ति के लिए इसे सीधे अपनाना सही नहीं माना जाना चाहिए। एक पेशेवर खिलाड़ी की ट्रेनिंग, खान-पान, चिकित्सकीय निगरानी और रिकवरी व्यवस्था आम व्यक्ति से अलग हो सकती है।

    विराट ही नहीं, पूरी क्रिकेट पीढ़ी ने भी अपनाया यह अंदाज?

    भारत में टैटू हमेशा से मौजूद रहे हैं, लेकिन लंबे समय तक इसे लेकर कई तरह की धारणाएं थीं। टैटू को विद्रोह, अलग तरह के व्यक्तित्व या सिर्फ फैशन से जोड़कर देखा जाता था। पुरानी पीढ़ी के कई बड़े क्रिकेटरों की सार्वजनिक पहचान में टैटू का हिस्सा बहुत कम दिखाई देता था। सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे खिलाड़ियों की छवि टैटू के बजाय उनके खेल और सादगी से जुड़ी रही। मौजूदा पीढ़ी में तस्वीर काफी अलग है। विराट कोहली, हार्दिक पांड्या और दूसरे खिलाड़ियों ने टैटू को अपनी व्यक्तिगत पहचान का हिस्सा बनाया है।

    और कौन-कौन से भारतीय क्रिकेटर्स ने बनवाए टैटू?

    टैटू अब सिर्फ विराट कोहली की पहचान नहीं हैं। भारतीय क्रिकेट के कई मौजूदा सितारों ने अपनी जिंदगी की अलग-अलग कहानियों को शरीर पर जगह दी है। हार्दिक पांड्या ने अपने रिश्ते से जुड़ी भावना को टैटू के जरिए याद किया है। तिलक वर्मा ने भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था और माता-पिता के प्रति प्रेम को टैटू के जरिए जाहिर किया है। स्मृति मंधाना ने महिला विश्व कप जीत की याद को अपने दाहिने हाथ पर बने टैटू से जोड़ा। वहीं, अर्शदीप सिंह ने भी अपनी गर्लफ्रेंड समरीन कौर के साथ टैटू बनवाकर इस बढ़ती सूची में अपना नाम जोड़ा है। इसके अलावा केएल राहुल और शिखर धवन जैसे क्रिकेटर्स ने भी काफी टैटू बनवाए हैं। यानी भारतीय क्रिकेटरों के लिए टैटू अब केवल फैशन का हिस्सा नहीं रह गया है। यह निजी रिश्तों, उपलब्धियों, आस्था और जिंदगी के महत्वपूर्ण पलों को याद रखने का तरीका भी बनता जा रहा है।

    आखिर खिलाड़ी बार-बार टैटू क्यों बनवाते हैं?

    यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। अगर टैटू बनवाना सिर्फ फैशन है तो खिलाड़ी बार-बार इसके लिए क्यों लौटते हैं? टैटू को लेकर लोगों की सोच में बदलाव सिर्फ खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है। टैटू कलाकारों के पेशे को लेकर नजरिया भी बदला है। टैटू सिर्फ स्टाइल और फैशन के बारे में नहीं हैं। यह भावनाओं का प्रतिबिंब है।

    विराट के लिए टैटू अभी खत्म हुई कहानी नहीं?

    शायद यही वजह है कि विराट कोहली का टैटू कलेक्शन आज भी बढ़ रहा है। उनके लिए यह किसी एक उपलब्धि की याद में बनवाया गया स्थिर चित्र नहीं है। यह उनकी जिंदगी के साथ आगे बढ़ता हुआ एक सफर है। एक माता-पिता की याद हो सकती है। कोई रिश्ता हो सकता है। बचपन की कोई भावना, कोई विश्वास, भगवान के प्रति आस्था, क्रिकेट की कोई उपलब्धि या जिंदगी का कोई बड़ा बदलाव, हर नया अध्याय शरीर पर जगह पा सकता है।

    विराट ने कुछ साल पहले टैटू और अपनी जिंदगी के रिश्ते को बेहद खास तरीके से समझाया था। उन्होंने कहा, ‘मुझे यह समझने के लिए कहीं और देखने की जरूरत नहीं है कि मैं कहां था और अब कहां पहुंच गया हूं। मैं अपने दोनों हाथों को देखकर यह समझ सकता हूं।’ विराट कोहली की क्रिकेट कहानी रन, रिकॉर्ड, शतक और ट्रॉफियों से लिखी गई है, लेकिन उनकी जिंदगी की एक दूसरी डायरी भी है, जिसे हर कोई मैदान के बाहर देख सकता है। वह डायरी उनके दोनों हाथों पर लिखी हुई है।

  • हनुमान भक्ति, सादगी और रहस्यमयी किस्से… क्यों दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए बाबा नीम करौली, जानिए उनकी पूरी कहानी

    हनुमान भक्ति, सादगी और रहस्यमयी किस्से… क्यों दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए बाबा नीम करौली, जानिए उनकी पूरी कहानी


    नई दिल्ली । बाबा नीम करौली का नाम आज सिर्फ एक संत के रूप में नहीं बल्कि गहरी आस्था और आध्यात्मिक प्रेरणा के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। उत्तराखंड के कैंची धाम से लेकर देश विदेश तक उनके अनुयायियों की बड़ी संख्या है। कंबल ओढ़े रहने वाले बाबा को भक्त प्यार से महाराजजी कहकर बुलाते थे। उनकी सादगी हनुमान भक्ति और मानव सेवा से जुड़ी शिक्षाओं ने उन्हें दूसरे संतों से अलग पहचान दी। हाल के समय में फिल्म हनुमान अंश की चर्चा के बीच एक बार फिर बाबा नीम करौली के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को जानने में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है।

    बाबा नीम करौली का मूल नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के टुंडला क्षेत्र के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में उनका संबंध फर्रुखाबाद जिले के नीब करोरी गांव से जुड़ा और इसी वजह से उन्हें बाबा नीब करोरी के नाम से जाना जाने लगा। समय के साथ नीब करोरी का प्रचलित रूप नीम करौली हो गया और आज दोनों नाम इसी संत के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने नीब करोरी में गुफा के भीतर कठिन साधना की थी और बाद में उसी स्थान पर हनुमान मंदिर का निर्माण हुआ।

    बाबा के जीवन से जुड़ी ट्रेन वाली कहानी भी बेहद प्रसिद्ध है। भक्तों के बीच प्रचलित कथा के अनुसार बाबा बिना टिकट ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। टिकट जांच के दौरान उन्हें नीब करोरी के पास ट्रेन से उतार दिया गया। बाबा पास ही एक नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए। मान्यता है कि इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। कई कोशिशों के बाद भी इंजन नहीं चला तो अधिकारियों और यात्रियों ने बाबा से क्षमा मांगी और उन्हें वापस ट्रेन में बैठाया गया। बाबा के ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी। इस घटना को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं और इसे बाबा से जुड़े चमत्कारों में गिना जाता है।

    बाबा का बचपन और गृहस्थ जीवन भी उनकी कहानी का अहम हिस्सा है। बताया जाता है कि कम उम्र में ही उनका विवाह हुआ था और आध्यात्म के प्रति गहरा आकर्षण होने के कारण उन्होंने घर छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने अलग अलग स्थानों पर साधना की। गुजरात के बावनिया गांव में तालाब के पास साधना करने के कारण उन्हें तलैया बाबा भी कहा गया। बाद में वे परिवार के पास लौटे और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां निभाईं। उनके दो बेटे और एक बेटी होने की जानकारी मिलती है।

    बाबा नीम करौली की सबसे बड़ी पहचान उनकी हनुमान भक्ति रही। उनके भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश या अवतार तक मानते हैं। हालांकि यह आस्था और धार्मिक मान्यता का विषय है इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। बाबा की शिक्षाओं में प्रेम सेवा सादगी और सभी को समान दृष्टि से देखने का भाव प्रमुख था। वे लोगों को ईश्वर का स्मरण करने दूसरों की सेवा करने और सत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते थे। उनका संदेश सब एक यानी सभी में एक ही ईश्वर का अंश देखने की भावना से जुड़ा माना जाता है।

    बाबा से जुड़े अनेक चमत्कारिक किस्से भी भक्तों के बीच प्रचलित रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे लोगों की परेशानियों को बिना बताए समझ लेते थे और कई बार अलग अलग स्थानों पर एक साथ दिखाई देने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। इन कथाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है लेकिन उनके अनुयायियों की आस्था में इनका विशेष स्थान है। अमीर हो या गरीब अलग धर्म का हो या अलग सामाजिक वर्ग का बाबा के पास आने वाले लोगों के साथ समान व्यवहार की बातें उनके संस्मरणों में मिलती हैं।

    यही वजह है कि बाबा नीम करौली की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। कैंची धाम आज उनकी सबसे प्रसिद्ध पहचान बन चुका है जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनकी सादगी हनुमान भक्ति और प्रेम सेवा का संदेश आज भी लोगों को आकर्षित करता है। बाबा का जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि किसी संत की पहचान केवल उसके चमत्कारों की कहानियों से नहीं बल्कि उसकी शिक्षाओं और लोगों के जीवन पर पड़े प्रभाव से भी बनती है।

  • सुबह सूर्यदेव को जल चढ़ाने का सही तरीका क्या है? जानिए लोटे से लेकर मंत्र तक के जरूरी नियम

    सुबह सूर्यदेव को जल चढ़ाने का सही तरीका क्या है? जानिए लोटे से लेकर मंत्र तक के जरूरी नियम


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है और नियमित रूप से उनकी पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। मान्यता है कि सुबह के समय सूर्यदेव को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है और व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल सम्मान प्रतिष्ठा पिता स्वास्थ्य और नेतृत्व क्षमता का कारक माना गया है। यही कारण है कि सूर्यदेव की उपासना को विशेष महत्व दिया जाता है। हालांकि सूर्य को जल चढ़ाते समय कुछ नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है ताकि पूजा विधि पूर्ण और व्यवस्थित तरीके से की जा सके।

    सूर्यदेव को जल चढ़ाने के लिए सुबह का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। कोशिश करनी चाहिए कि सूर्योदय के आसपास स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाएं। इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्यदेव को जल अर्पित करना चाहिए। जल चढ़ाने के लिए तांबे के पात्र का इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है। तांबे का लोटा उपलब्ध न हो तो स्वच्छ पात्र का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाला पात्र साफ होना चाहिए।

    सूर्यदेव को जल अर्पित करते समय लोटे को दोनों हाथों से पकड़कर धीरे धीरे जल छोड़ना चाहिए। इस दौरान सूर्य की ओर सीधे देखने के बजाय जल की धार के बीच से सूर्यदेव के दर्शन करना पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता है। जल चढ़ाते समय मन को शांत रखना चाहिए और किसी तरह की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। पूजा में श्रद्धा और एकाग्रता को महत्वपूर्ण माना गया है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्यदेव को जल में लाल फूल अक्षत या रोली मिलाकर भी अर्पित किया जा सकता है। हालांकि जल में ऐसी कोई सामग्री नहीं डालनी चाहिए जिससे पर्यावरण या आसपास की जगह को नुकसान पहुंचे। पूजा के दौरान आदित्य देव का ध्यान करते हुए सूर्य मंत्र का जाप किया जा सकता है। ॐ सूर्याय नमः या ॐ आदित्याय नमः जैसे सरल मंत्रों का जाप श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।

    सूर्यदेव को जल चढ़ाने के बाद हाथ जोड़कर अपनी मनोकामना और जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रार्थना करनी चाहिए। मान्यता है कि नियमित सूर्य उपासना व्यक्ति में अनुशासन और सकारात्मक सोच को बढ़ावा दे सकती है। इसके साथ ही सुबह की प्राकृतिक रोशनी में कुछ समय बिताना दिनचर्या के लिए भी उपयोगी माना जाता है।

    सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय कुछ सावधानियां भी रखनी चाहिए। बिना स्नान किए पूजा करने से बचना चाहिए और गंदे या अस्वच्छ पात्र से जल अर्पित नहीं करना चाहिए। जल चढ़ाते समय मन में नकारात्मक विचार रखने के बजाय शांत और सकारात्मक भाव बनाए रखना चाहिए। पूजा को केवल किसी लाभ की इच्छा से करने के बजाय श्रद्धा और आस्था के साथ करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं में सूर्य को मजबूत करने के लिए रविवार का दिन विशेष माना जाता है। इस दिन सूर्यदेव को जल अर्पित करने के साथ जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना और अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भी शुभ माना जाता है। हालांकि किसी विशेष ग्रह दोष या स्वास्थ्य समस्या के लिए किए जाने वाले उपायों को अपनाने से पहले योग्य ज्योतिष विशेषज्ञ या चिकित्सकीय सलाह लेना उचित रहता है।

    इस तरह सूर्यदेव को जल चढ़ाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई नहीं है बल्कि यह सुबह जल्दी उठने स्नान करने प्रार्थना करने और दिन की शुरुआत सकारात्मक भाव से करने की एक अनुशासित दिनचर्या भी बन सकती है। श्रद्धा स्वच्छता और सही विधि के साथ की गई सूर्य उपासना मन में शांति और सकारात्मकता का भाव पैदा कर सकती है।

  • भगवान शिव के भस्म धारण करने की परंपरा का क्या है महत्व, धार्मिक मान्यताओं में छिपा है गहरा जीवन दर्शन

    भगवान शिव के भस्म धारण करने की परंपरा का क्या है महत्व, धार्मिक मान्यताओं में छिपा है गहरा जीवन दर्शन


    नई दिल्ली ।
    सनातन धर्म में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विलक्षण और आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण माना गया है। जहां अन्य देवी-देवताओं को दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित देखा जाता है, वहीं महादेव अपने शरीर पर श्मशान की भस्म धारण करते हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य को दर्शाने वाला एक गहरा दर्शन है।

    वैदिक मान्यताओं के अनुसार भस्म धारण करना इस बात का प्रतीक है कि यह भौतिक संसार अनित्य है। मनुष्य जिस शरीर और सांसारिक वस्तुओं पर गर्व करता है, वे सब अंततः राख में बदल जाने वाली हैं। महादेव इस स्वरूप के माध्यम से मनुष्य को यह सीख देते हैं कि नश्वर चीज़ों से मोह बांधने के बजाय शाश्वत सत्य और आत्मज्ञान की खोज करनी चाहिए।

    पौराणिक संदर्भों में भस्म से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं। एक कथा के अनुसार जब कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तो महादेव ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से उन्हें भस्म कर दिया। इसके बाद उन्होंने उस राख को अपने शरीर पर लगाया, जो वासना और भौतिक इच्छाओं पर पूर्ण विजय का संदेश देती है।

    धार्मिक दृष्टिकोण से अग्नि में जलने के बाद बचा हुआ अवशेष ही भस्म कहलाता है, जिसमें किसी प्रकार की अशुद्धि शेष नहीं रहती। इसीलिए इसे परम पवित्र माना गया है। भगवान शिव इसे अपने अंग पर लगाकर संसार को यह समझाते हैं कि व्यक्ति को अपने भीतर की बुराइयों, अहंकार और वासनाओं को भस्म करके पवित्रता प्राप्त करनी चाहिए।

    सामान्य श्रद्धालुओं के लिए भी विभूति धारण करने का विशेष नियम बताया गया है। जनसामान्य को श्मशान की राख के स्थान पर यज्ञ अथवा विधिवत पूजित भस्म का प्रयोग करना चाहिए। इसे मस्तक पर त्रिपुंड के रूप में लगाया जाता है। यह त्रिपुंड भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार होता है।

    महादेव का यह अलौकिक वेश आज भी हर जीव को समभाव, संयम और वैराग्य का मार्ग दिखाता है। यह संदेश देता है कि जीवन की वास्तविक सुंदरता बाहरी आभूषणों में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और ईश्वर के प्रति समर्पण में निहित है।

  • रोज सुबह सूर्य देव को अर्घ्य देने से पहले जान लें ये जरूरी नियम, तभी मिलेगा पूर्ण फल और दूर होंगी जीवन की बाधाएं

    रोज सुबह सूर्य देव को अर्घ्य देने से पहले जान लें ये जरूरी नियम, तभी मिलेगा पूर्ण फल और दूर होंगी जीवन की बाधाएं


    नई दिल्ली। सनातन धर्म में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है क्योंकि वे प्रतिदिन सभी को अपने प्रकाश और ऊर्जा से जीवन प्रदान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्य देव की नियमित पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आत्मविश्वास के साथ कार्यक्षमता भी बढ़ती है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही सुबह उगते सूर्य को जल अर्पित करने और आदित्य हृदय स्तोत्र तथा गायत्री मंत्र का जाप करने की परंपरा चली आ रही है। माना जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक सूर्य उपासना करने से व्यक्ति को मानसिक शांति उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में उन्नति प्राप्त होती है।

    सूर्य पूजा का सबसे उपयुक्त समय सूर्योदय के तुरंत बाद माना जाता है। इस समय वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा अधिक होती है और सूर्य की कोमल किरणें शरीर के लिए भी लाभकारी मानी जाती हैं। पूजा से पहले स्नान करके स्वच्छ और हल्के रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद तांबे के लोटे में स्वच्छ जल भरकर उसमें लाल फूल अक्षत और यदि संभव हो तो थोड़ा सा रोली या लाल चंदन डालकर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय जल की धारा के बीच से सूर्य के दर्शन करना शुभ माना जाता है। इस दौरान ॐ सूर्याय नमः या ॐ घृणि सूर्याय नमः मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य देव की पूजा करते समय मन और वचन की पवित्रता का विशेष महत्व होता है। पूजा केवल दिखावे के लिए नहीं बल्कि सच्ची श्रद्धा और सकारात्मक भाव से करनी चाहिए। यदि संभव हो तो रविवार के दिन विशेष रूप से सूर्य उपासना करें और जरूरतमंद लोगों को गेहूं गुड़ लाल वस्त्र या तांबे से जुड़ी वस्तुओं का दान करें। इसे पुण्यदायी माना गया है।

    सूर्य पूजा के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना भी आवश्यक माना जाता है। सूर्य को अर्घ्य हमेशा खड़े होकर देना चाहिए और जल धीरे धीरे अर्पित करना चाहिए। पूजा करते समय क्रोध न करें और किसी के प्रति द्वेष की भावना न रखें। धार्मिक मान्यता है कि सकारात्मक विचारों के साथ की गई उपासना अधिक फलदायी होती है। साथ ही पूजा के बाद माता पिता और गुरुजनों का आशीर्वाद लेना भी शुभ माना जाता है।

    ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा सम्मान नेतृत्व क्षमता और सफलता का कारक ग्रह माना गया है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो उसे नियमित सूर्य उपासना करने की सलाह दी जाती है। हालांकि किसी भी ज्योतिषीय उपाय को अपनाने से पहले योग्य विद्वान से सलाह लेना उचित माना जाता है। नियमित सूर्य नमस्कार करना भी शरीर को स्वस्थ रखने और मन को संतुलित बनाने में सहायक माना जाता है। इससे शारीरिक ऊर्जा बढ़ती है और दिनभर कार्य करने की क्षमता में सुधार आता है।

    धार्मिक दृष्टि से सूर्य देव की कृपा पाने के लिए सत्य का पालन ईमानदारी अनुशासन और परिश्रम को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है जितना पूजा पाठ को। केवल पूजा करने से ही नहीं बल्कि अच्छे कर्मों से भी जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। इसलिए सूर्य उपासना के साथ सदाचार और सेवा की भावना अपनाना भी आवश्यक माना जाता है।

    यदि नियमित रूप से श्रद्धा और नियमों के साथ सूर्य देव की आराधना की जाए तो जीवन में आत्मविश्वास सकारात्मक सोच और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। धार्मिक आस्था के अनुसार ऐसी उपासना व्यक्ति को सफलता की ओर प्रेरित करती है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती है।

  • सूर्य ग्रहण के बाद स्नान पूजा और दान का क्या है महत्व जानिए कब जरूरी है और कब नहीं लागू होता यह नियम

    सूर्य ग्रहण के बाद स्नान पूजा और दान का क्या है महत्व जानिए कब जरूरी है और कब नहीं लागू होता यह नियम


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सूर्य ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक महत्व से जुड़ा अवसर माना जाता है। ग्रहण के दौरान और उसके समाप्त होने के बाद कई परंपराओं का पालन किया जाता है जिनमें स्नान पूजा और दान का विशेष महत्व बताया गया है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यताएं और आध्यात्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि सूर्य ग्रहण समाप्त होते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान कर भगवान का स्मरण करते हैं और अपने दिन की शुरुआत शुभ कार्यों से करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार ग्रहण के समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसे में ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करना शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि स्नान करने से व्यक्ति स्वयं को पवित्र बनाकर दोबारा पूजा पाठ और धार्मिक कार्यों के योग्य बनाता है। यह परंपरा केवल बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं बल्कि मन और विचारों की पवित्रता का भी संदेश देती है। हालांकि इस मान्यता का वैज्ञानिक रूप से कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इसे मुख्य रूप से धार्मिक आस्था के रूप में ही देखा जाता है।

    स्नान के बाद भगवान की पूजा करने की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं दीप प्रज्वलित करते हैं मंत्र जाप करते हैं और अपने इष्ट देव की आराधना करते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि ग्रहण के बाद किया गया ईश्वर का स्मरण मन को शांति प्रदान करता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। कई लोग इस अवसर पर गायत्री मंत्र आदित्य हृदय स्तोत्र और सूर्य मंत्रों का जाप भी करते हैं ताकि जीवन में सुख समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना पूरी हो सके।

    ग्रहण समाप्त होने के बाद दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों में अन्न वस्त्र फल दक्षिणा और जरूरतमंदों की सहायता को पुण्यदायी माना गया है। यह भी कहा जाता है कि अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान व्यक्ति के भीतर सेवा और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। धर्म शास्त्रों में दान को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक माना गया है।

    सूर्य ग्रहण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी रहता है कि यदि ग्रहण किसी स्थान पर दिखाई ही नहीं दे तो क्या वहां भी ग्रहण के सभी नियम लागू होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर ग्रहण दिखाई नहीं देता वहां सामान्यतः सूतक काल मान्य नहीं माना जाता। ऐसे में ग्रहण के बाद स्नान करना अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं माना जाता। फिर भी अनेक लोग अपनी पारिवारिक परंपरा और व्यक्तिगत आस्था के अनुसार स्नान पूजा और दान जैसे कार्य करते हैं।

    ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि ग्रहण के बाद स्नान करने की परंपरा नई सकारात्मक शुरुआत का प्रतीक है। उनका कहना है कि इससे व्यक्ति अपने मन में नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लेता है। यदि ग्रहण आपके क्षेत्र में दिखाई नहीं देता तो धार्मिक नियमों का पालन पूरी तरह आपकी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है।

    धार्मिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यह मानी जाती है कि ग्रहण के बाद भगवान का स्मरण किया जाए सकारात्मक विचार अपनाए जाएं और जीवन में सदाचार सेवा तथा आध्यात्मिकता को स्थान दिया जाए। यही ग्रहण की परंपराओं का वास्तविक संदेश भी माना जाता है।

  • शुक्रवार का व्रत कैसे करें सुबह से शाम तक जानें पूजा का सही नियम शुभ मुहूर्त और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय

    शुक्रवार का व्रत कैसे करें सुबह से शाम तक जानें पूजा का सही नियम शुभ मुहूर्त और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय


    नई दिल्ली।  सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन की देवी माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत तथा पूजा करने से घर में सुख समृद्धि धन वैभव और खुशहाली का वास होता है। माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए केवल पूजा करना ही पर्याप्त नहीं माना गया है बल्कि मन की पवित्रता सच्ची श्रद्धा और सात्विक आचरण भी उतना ही आवश्यक माना जाता है। इसलिए शुक्रवार का व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आत्मअनुशासन और सकारात्मक जीवनशैली का भी प्रतीक माना जाता है।

    शुक्रवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ आसन पर स्थापित करें। पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाएं और धूप अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद माता को सफेद पुष्प कमल का फूल यदि उपलब्ध हो तो अवश्य अर्पित करें। चावल हल्दी कुमकुम और अक्षत अर्पित कर श्रद्धा से पूजा करें।

    पूजन के दौरान श्री सूक्त कनकधारा स्तोत्र लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम या लक्ष्मी मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि समय कम हो तो कम से कम 108 बार ओम श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का जप अवश्य करें। इसके बाद माता लक्ष्मी की आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों को आरती में शामिल करें। माना जाता है कि सामूहिक पूजा से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर सात्विक भोजन का पालन करते हैं। कई लोग केवल फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग एक समय बिना लहसुन और प्याज का भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान क्रोध झूठ अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि माता लक्ष्मी स्वच्छता शांति और सदाचार से प्रसन्न होती हैं इसलिए घर और मन दोनों को निर्मल रखना जरूरी माना गया है।

    शुक्रवार के दिन सफेद रंग की मिठाई खीर मखाने की खीर मिश्री बताशे या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद प्रसाद परिवार और जरूरतमंद लोगों में बांटना भी पुण्यदायी माना गया है। यदि संभव हो तो किसी गरीब जरूरतमंद महिला या कन्या को सफेद वस्त्र चावल दूध चीनी या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें। इससे माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार के दिन घर में साफ सफाई बनाए रखना टूटे बर्तन और बेकार वस्तुओं को हटाना तथा शाम के समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है और आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलते हैं। इसके साथ ही अनावश्यक खर्च से बचना और आय के साधनों का सम्मान करना भी माता लक्ष्मी की कृपा बनाए रखने का महत्वपूर्ण उपाय माना गया है।

    मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा विश्वास और नियमपूर्वक लगातार शुक्रवार का व्रत करता है उसके जीवन में आर्थिक परेशानियां धीरे धीरे दूर होने लगती हैं और परिवार में सुख शांति तथा समृद्धि का वातावरण बनता है। हालांकि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है और इसका पालन श्रद्धा तथा विश्वास के साथ ही करना चाहिए।

  • गणेश जी को दूर्वा अर्पित किए बिना क्यों अधूरी मानी जाती है पूजा जानिए धार्मिक मान्यता शास्त्रीय कारण और शुभ फल

    गणेश जी को दूर्वा अर्पित किए बिना क्यों अधूरी मानी जाती है पूजा जानिए धार्मिक मान्यता शास्त्रीय कारण और शुभ फल


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके पूजन से की जाती है ताकि कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो सके। गणेश जी की पूजा में मोदक लाल सिंदूर और दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें भी दूर्वा को भगवान गणपति का अत्यंत प्रिय अर्पण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक गणेश जी को दूर्वा अर्पित करता है उसके जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं और सुख समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

    पौराणिक कथा के अनुसार एक बार अनलासुर नामक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने अपने तेज और अग्नि समान ऊर्जा से तीनों लोकों में भय का वातावरण बना दिया था। देवता और ऋषि मुनि उसकी शक्ति के सामने असहाय हो गए। तब सभी ने भगवान गणेश से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान गणेश ने अनलासुर का अंत करने के लिए उसे अपने मुख में समा लिया। असुर का नाश तो हो गया लेकिन उसके कारण भगवान गणेश के शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो गई। इस असहनीय ताप को शांत करने के लिए अनेक उपाय किए गए लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। अंत में ऋषियों ने भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित की। जैसे ही दूर्वा उनके मस्तक पर रखी गई उनका शरीर शीतल हो गया और उन्हें राहत मिली। तभी से दूर्वा भगवान गणेश को सबसे प्रिय मानी जाने लगी।

    शास्त्रों में दूर्वा को दीर्घायु हरियाली समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक बताया गया है। यह साधारण दिखाई देने वाली घास जीवन में धैर्य विनम्रता और निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देती है। यही कारण है कि गणेश पूजा में दूर्वा अर्पित करना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन के संतुलन का भी प्रतीक माना जाता है।

    धार्मिक मान्यता है कि गणेश जी को तीन पांच इक्कीस या इक्यावन दूर्वा के तिनके अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। दूर्वा हमेशा ताजी हरी और स्वच्छ होनी चाहिए। पूजा के दौरान इसे भगवान के मस्तक पर या चरणों में श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है। सूखी या टूटी हुई दूर्वा चढ़ाने से बचना चाहिए क्योंकि पूजा में शुद्धता और श्रद्धा का विशेष महत्व होता है।

    बुधवार गणेश जी का प्रिय दिन माना जाता है। इस दिन विधिपूर्वक पूजा करके दूर्वा अर्पित करने से बुद्धि विवेक धन समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विद्यार्थियों को ज्ञान व्यापारियों को उन्नति और परिवार को सुख शांति मिलने की मान्यता भी शास्त्रों में वर्णित है। जिन लोगों के जीवन में बार बार रुकावटें आती हैं या कार्य बनते बनते बिगड़ जाते हैं उन्हें नियमित रूप से गणेश जी को दूर्वा अर्पित कर गणपति अथर्वशीर्ष या गणेश मंत्र का जाप करना लाभकारी माना जाता है।

    धार्मिक दृष्टि से दूर्वा केवल एक घास नहीं बल्कि श्रद्धा समर्पण और शुभता का प्रतीक है। भगवान गणेश को श्रद्धा से अर्पित की गई दूर्वा भक्त और भगवान के बीच आस्था का ऐसा सेतु बनती है जो जीवन की बाधाओं को दूर कर सुख शांति और मंगल का मार्ग प्रशस्त करती है।