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  • टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में 29 साल से कायम है श्रीलंका का 952 रनों का ऐतिहासिक और अटूट ऑल-टाइम रिकॉर्ड।

    टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में 29 साल से कायम है श्रीलंका का 952 रनों का ऐतिहासिक और अटूट ऑल-टाइम रिकॉर्ड।

    नई दिल्ली ।टी20 क्रिकेट के आधुनिक दौर में बल्लेबाजी के तौर-तरीकों और रन बनाने की गति में व्यापक परिवर्तन आया है। पावर हिटिंग, उन्नत फिटनेस और नई रणनीतियों के कारण खेल का स्वरूप काफी आक्रामक हो चुका है। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट के लंबे इतिहास में एक ऐसा रिकॉर्ड दर्ज है, जिसे लगभग तीन दशकों के बीत जाने के बाद भी कोई देश पार नहीं कर सका है। वर्ष 1997 में श्रीलंका की राष्ट्रीय टीम द्वारा भारत के विरुद्ध कोलंबो में बनाया गया 952 रनों का ऐतिहासिक स्कोर आज भी सर्वोच्च बना हुआ है।

    कोलंबो के आर. प्रेमदासा स्टेडियम में आयोजित उस ऐतिहासिक टेस्ट मुकाबले में भारतीय टीम ने अपनी पहली पारी में 537 रनों का विशाल स्कोर बनाकर पारी घोषित की थी। भारत की ओर से कप्तान सचिन तेंदुलकर, मोहम्मद अजहरुद्दीन और नवजोत सिंह सिद्धू ने शानदार शतकीय पारियां खेली थीं। उस दौर में 500 से अधिक रनों का स्कोर मैच में बेहद मजबूत स्थिति माना जाता था, किंतु इसके जवाब में उतरी श्रीलंकाई टीम ने ऐसी बल्लेबाजी की जिसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के इतिहास के पन्नों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया।

    श्रीलंका की पहली पारी में सलामी बल्लेबाज सनत जयसूर्या ने 340 रनों की मैराथन पारी खेली, जबकि रोशन महानामा ने 225 रनों का योगदान दिया। इन दोनों दिग्गजों ने दूसरे विकेट के लिए 576 रनों की रिकॉर्ड साझेदारी निभाई, जो आज भी टेस्ट इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी साझेदारी मानी जाती है। इसके अतिरिक्त मध्यक्रम के प्रमुख बल्लेबाज अरविंद डी सिल्वा ने भी 126 रन बनाए। श्रीलंकाई टीम ने 271 ओवरों की लंबी बल्लेबाजी के बाद 6 विकेट पर 952 रन बनाकर अपनी पारी घोषित की थी।

    क्रिकेट आंकड़ों के दृष्टिकोण से श्रीलंका का यह स्कोर टेस्ट इतिहास का सबसे बड़ा टीम स्कोर है। इस सूची में इंग्लैंड द्वारा बनाया गया 903/7 का स्कोर दूसरे स्थान पर आता है, जबकि हाल के वर्षों में इंग्लैंड ने पाकिस्तान के खिलाफ 823/7 का स्कोर बनाकर इस आंकड़े के समीप पहुंचने का प्रयास अवश्य किया था। हालांकि 952 रनों की यह ऐतिहासिक उपलब्धि पिछले 29 वर्षों से एवरेस्ट की भांति अडिग खड़ी है।

    वर्तमान टी20 युग में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या आधुनिक टेस्ट क्रिकेट में कोई टीम 1000 रनों के तिलिस्म को तोड़ सकती है। खेल विशेषज्ञों के अनुसार, 1000 रन के आंकड़े को छूने के लिए केवल तेज गति से रन बनाना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अत्यंत सपाट पिच, दो से तीन बड़ी और लंबी साझेदारियों तथा विपक्षी गेंदबाजों के पूरी तरह प्रभावहीन रहने की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही टीम के कप्तान को व्यक्तिगत या टीम रिकॉर्ड तथा मैच के परिणाम के बीच संतुलन बनाना होगा। मध्य प्रदेश सहित देश भर के खेल प्रेमी इस रिकॉर्ड के महत्व को भली-भांति समझते हैं।

    अधिकांश अवसरों पर टेस्ट मैच जीतने के लिए कप्तानों को समय रहते पारी घोषित करनी पड़ती है, ताकि विपक्षी टीम के 20 विकेट निकाले जा सकें। ऐसे में केवल रिकॉर्ड बनाने के उद्देश्य से बल्लेबाजी जारी रखना मैच के नतीजे को जोखिम में डाल सकता है। श्रीलंका ने 1997 में यह दर्शाया था कि टेस्ट क्रिकेट में धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी की क्या सीमाएं हो सकती हैं। आज के आक्रामक दौर में भी 952 रनों की यह क्रिकेटीय दीवार पूरी मजबूती से खड़ी है।

  • भारत और श्रीलंका के बीच पहले टेस्ट मैच से पूर्व गॉल की पिच और मौसम को लेकर रणनीतिक खींचतान तेज।

    भारत और श्रीलंका के बीच पहले टेस्ट मैच से पूर्व गॉल की पिच और मौसम को लेकर रणनीतिक खींचतान तेज।

    नई दिल्ली ।भारत और श्रीलंका के बीच 15 अगस्त से शुरू होने वाले पहले टेस्ट मैच से पूर्व गॉल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में पिच के मिजाज को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुकाबले से दो दिन पहले तक भारतीय टीम प्रबंधन के सामने यह तस्वीर पूरी तरह से साफ नहीं हो सकी है कि मैदान पर तीन तेज गेंदबाजों के कॉम्बिनेशन के साथ उतरा जाए या फिर स्पिन आक्रमण पर ज्यादा भरोसा जताया जाए। इसी असमंजस के बीच भारतीय टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर और बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक ने अभ्यास सत्र के दौरान स्वयं 22 गज की पट्टी का विस्तृत जायजा लिया।

    श्रीलंकाई टीम के बंद दरवाजों के पीछे चल रहे अभ्यास सत्र के दौरान दोनों भारतीय कोच मैदान पर पहुंचे, जहां ग्राउंड स्टाफ ने उनके लिए विशेष रूप से मुख्य कवर हटाए। गंभीर और कोटक ने विकेट की नमी, कठोरता और सतह की स्थिति का गहराई से निरीक्षण किया। हालांकि दोनों अधिकारियों के वहां से लौटते ही ग्राउंड स्टाफ ने पिच को दोबारा ढक दिया। इस निरीक्षण का मुख्य उद्देश्य उस पिच की व्यवहारिक प्रकृति को समझना था जिस पर दो मैचों की श्रृंखला का पहला मुकाबला आयोजित होना है।

    भारतीय कोचों के जाने के लगभग दो घंटे पश्चात मैदान पर पिच से मुख्य कवर पूरी तरह हटा दिए गए और घास काटने वाली मशीन उतारी गई। ग्राउंड स्टाफ द्वारा पिच पर कई बार मशीन चलाने के बाद सॉफ्ट रोलर का इस्तेमाल किया गया और सतह को कुछ समय के लिए धूप में खुला छोड़ दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में पिच पर पानी देने की मात्रा और रोलर के उपयोग से ही गॉल की इस पारंपरिक पिच का अंतिम मिजाज निर्धारित हो सकेगा।

    गॉल के मैदान को ऐतिहासिक रूप से स्पिन गेंदबाजों के लिए मददगार माना जाता रहा है, किंतु भारतीय टीम प्रबंधन केवल पुराने आंकड़ों के आधार पर अपनी अंतिम एकादश का चयन करने से बच रहा है। यदि टेस्ट मैच के शुरुआती दिन पिच पर नमी और तेजी बनी रहती है तो भारतीय टीम तीन प्रमुख तेज गेंदबाजों को प्लेइंग इलेवन में अवसर दे सकती है। इस स्थिति में मोहम्मद सिराज, प्रसिद्ध कृष्णा और गुरनूर बरार की तिकड़ी को नई गेंद की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

    यदि परिस्थितियों को देखते हुए अतिरिक्त स्पिनर को खिलाने का निर्णय लिया जाता है तो कुलदीप यादव की दावेदारी सर्वाधिक मजबूत नजर आ रही है। कप्तान शुभमन गिल को सपाट पिचों पर भी विकेट निकालने वाले गेंदबाज की आवश्यकता होगी, जिसमें कुलदीप कारगर सिद्ध हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त रवींद्र जडेजा अपनी ऑलराउंड क्षमता से टीम को संतुलन प्रदान करेंगे। मध्य प्रदेश और देश भर के क्रिकेट प्रशंसक भी इस महत्वपूर्ण टेस्ट सीरीज के आगाज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

    गॉल में मौसम की स्थिति भी मुकाबला की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पिछले कुछ दिनों में क्षेत्र में अचानक तेज बारिश दर्ज की गई है, हालांकि हाल के समय में धूप खिलने से मैदान सूखा है। मैच के दौरान बादलों की मौजूदगी और हवा में नमी रहने पर तेज गेंदबाजों को मदद मिलने की संभावना है, जबकि तेज धूप की स्थिति में पिच जल्दी टूट सकती है और स्पिनरों का प्रभाव बढ़ सकता है। भारतीय टीम अभ्यास सत्र के माध्यम से अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रही है।

  • दिग्गज फुटबॉलर लियोनेल मेसी के सिर से उठा पिता का साया, 68 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

    दिग्गज फुटबॉलर लियोनेल मेसी के सिर से उठा पिता का साया, 68 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

    नई दिल्ली । विश्व फुटबॉल के दिग्गज खिलाड़ी और अर्जेंटीना के कप्तान लियोनेल मेसी के पिता जॉर्ज मेसी का 68 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने अर्जेंटीना के रोसारियो शहर में लंबी बीमारी से जूझने के बाद अंतिम सांस ली। खेल जगत और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से शनिवार को उनके निधन की दुखद खबर सामने आई।

    जॉर्ज मेसी का अपने बेटे लियोनेल मेसी के जीवन और पेशेवर करियर में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे केवल एक पिता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने वर्षों तक मेसी के आधिकारिक एजेंट के रूप में भी जिम्मेदारियां संभालीं। मेसी के बचपन से लेकर पेशेवर फुटबॉल में वैश्विक पहचान बनाने और करियर से जुड़े बड़े फैसलों को आकार देने में उनकी मुख्य भूमिका मानी जाती है।

    बीते जून महीने में जॉर्ज मेसी के स्वास्थ्य को लेकर विभिन्न प्रकार की खबरें सामने आने लगी थीं, जिसके बाद मेसी परिवार को सार्वजनिक रूप से एक बयान जारी करना पड़ा था। उस समय परिवार ने पुष्टि की थी कि वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित हैं और चिकित्सकों की सख्त देखरेख में इलाज करा रहे हैं। परिवार ने उस वक्त लोगों और मीडिया से निजता का सम्मान करने तथा अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की थी।

    पिता की गंभीर स्थिति का प्रभाव लियोनेल मेसी की खेल गतिविधियों पर भी देखा गया था। एक महत्वपूर्ण मैच के दौरान गोल करने के बाद वे काफी भावुक नजर आए थे और उन्होंने स्वीकार किया था कि व्यक्तिगत जीवन में उनके लिए समय कठिन चल रहा है। इसके अलावा, हाल ही में आयोजित एक प्रमुख प्रदर्शनी मैच से भी उन्होंने दूरी बनाई थी, जिसे उनके पिता के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा गया था।

    उल्लेखनीय है कि लियोनेल मेसी की कप्तानी में अर्जेंटीना की टीम ने वर्ष 2022 में कतर में आयोजित फीफा विश्व कप का खिताब अपने नाम किया था। इसके अलावा हालिया दौर में भी उनकी टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण प्रतियोगिताओं के फाइनल तक का सफर तय किया है। पिता के निधन की खबर से वैश्विक फुटबॉल समुदाय और मेसी के प्रशंसकों में शोक की लहर व्याप्त है।

  • गोल्ड मेडल की असली सच्चाई आई सामने, जानें किस धातु से बनता है स्वर्ण पदक और क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत

    गोल्ड मेडल की असली सच्चाई आई सामने, जानें किस धातु से बनता है स्वर्ण पदक और क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में जब कोई एथलीट स्वर्ण पदक जीतता है, तो उसकी चमक पूरे देश को गौरवान्वित करती है। आम तौर पर लोगों की धारणा यही रहती है कि यह पदक पूरी तरह से ठोस सोने का बना होता है। हालांकि वास्तविक सच इससे काफी अलग है। आधुनिक ओलंपिक और बड़ी वैश्विक खेल प्रतियोगिताओं में दिए जाने वाले गोल्ड मेडल पूरी तरह सोने के नहीं होते, बल्कि इन्हें खास अंतरराष्ट्रीय मानकों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के तहत तैयार किया जाता है।

    खेल नियमों के अनुसार एक स्वर्ण पदक का मुख्य हिस्सा चांदी का बना होता है। किसी भी मानक गोल्ड मेडल में कम से कम 92.5 प्रतिशत शुद्ध चांदी का उपयोग किया जाता है। इसके ऊपरी हिस्से पर ही केवल असली सोने की एक पतली परत चढ़ाई जाती है। यही परत पदक को उसकी खास सुनहरी चमक और पहचान प्रदान करती है, जिससे यह देखने में पूरी तरह सोने का प्रतीत होता है।

    अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के नियमों के तहत एक स्वर्ण पदक का कुल वजन सामान्यतः 500 ग्राम के आसपास रखा जाता है। इतने वजन वाले पदक में मात्र 6 ग्राम शुद्ध सोना होना अनिवार्य होता है, जो ऊपर से कोटेड होता है। बाकी का पूरा हिस्सा उच्च गुणवत्ता वाली चांदी से ही निर्मित होता है। यदि पूरा पदक शुद्ध सोने से तैयार किया जाए, तो इसकी लागत काफी अधिक बढ़ जाएगी और यह व्यावहारिक नहीं रहेगा।

    शुद्ध सोना एक बेहद मुलायम धातु मानी जाती है, जिससे यदि पूरा मेडल बनाया जाए तो उसके आसानी से मुड़ने या खराब होने का जोखिम बना रहता है। चांदी अधिक मजबूत, टिकाऊ और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली धातु है। इसी कारण चांदी के आधार पर सोने की कोटिंग करना सबसे उपयुक्त और टिकाऊ विकल्प माना जाता है।

    अगर इतिहास की बात करें तो वर्ष 1912 के स्टॉकहोम ओलंपिक तक खिलाड़ियों को पूरी तरह सोने के बने मेडल ही दिए जाते थे। इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और बढ़ती लागत के चलते नियमों में बदलाव किया गया। वर्तमान व्यवस्था में केवल सोने की परत चढ़ाने का नियम लागू है, जिससे पदकों की गुणवत्ता और मजबूती दोनों बनी रहती है।

    किसी भी खिलाड़ी के लिए स्वर्ण पदक की असली कीमत उसकी धातु की बाजार दर से नहीं तय होती। यह पदक वर्षों की कड़ी मेहनत, त्याग, अनुशासन और अपने देश को शीर्ष पर पहुंचाने के गौरव का प्रतीक होता है। यही ऐतिहासिक और भावनात्मक सम्मान इस पदक को दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार बनाता है।

  • खेलों में सफलता की राह आसान बना सकती हैं घर की ये 3 दिशाएं, वास्तु संतुलन से बढ़ सकता है आत्मविश्वास और प्रदर्शन

    खेलों में सफलता की राह आसान बना सकती हैं घर की ये 3 दिशाएं, वास्तु संतुलन से बढ़ सकता है आत्मविश्वास और प्रदर्शन

    नई दिल्ली । खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन केवल प्रतिभा, कड़ी मेहनत और नियमित अभ्यास पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि कई लोग मानते हैं कि सकारात्मक वातावरण और ऊर्जा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर या प्रशिक्षण स्थल की दिशाओं का संतुलन व्यक्ति के आत्मविश्वास, मानसिक शक्ति और कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से खेल जगत से जुड़े लोगों के लिए दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-दक्षिण-पूर्व और दक्षिण दिशा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार ये तीनों दिशाएं मिलकर अग्नि तत्व का क्षेत्र बनाती हैं। अग्नि तत्व को ऊर्जा, उत्साह, साहस और सक्रियता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि यदि यह क्षेत्र संतुलित और दोषमुक्त हो तो खिलाड़ी के भीतर प्रतिस्पर्धा की भावना मजबूत होती है और वह अपने लक्ष्य पर अधिक एकाग्रता के साथ काम कर पाता है। इससे मानसिक दृढ़ता और आत्मविश्वास में भी सकारात्मक वृद्धि हो सकती है।

    दक्षिण-दक्षिण-पूर्व दिशा को विशेष रूप से साहस और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इस दिशा का संतुलित होना खिलाड़ी को कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखने और बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकता है। कुछ वास्तु मान्यताओं के अनुसार इस दिशा में बैठकर भोजन करना भी लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इससे शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने की बात कही जाती है।

    दक्षिण दिशा को यश, सम्मान और पहचान की दिशा माना जाता है। वास्तु मान्यता के अनुसार यदि इस दिशा में किसी प्रकार का दोष हो तो व्यक्ति को अपनी मेहनत के अनुरूप सफलता या पहचान मिलने में कठिनाई आ सकती है। वहीं यदि यह दिशा संतुलित रहे तो खेल के क्षेत्र में उपलब्धियों के साथ सामाजिक सम्मान और पहचान मिलने की संभावनाएं बढ़ने की बात कही जाती है। हालांकि सफलता के लिए निरंतर अभ्यास और प्रदर्शन सबसे महत्वपूर्ण आधार बने रहते हैं।

    दक्षिण-पूर्व दिशा को संसाधनों और आर्थिक स्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रशिक्षण, उपकरण, प्रतियोगिताओं में भागीदारी और अन्य आवश्यक सुविधाओं की जरूरत होती है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार इस दिशा का संतुलन व्यक्ति को संसाधनों के बेहतर उपयोग और आर्थिक सहयोग प्राप्त करने में सहायक माना जाता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र को व्यवस्थित और सकारात्मक बनाए रखने की सलाह दी जाती है।

    अग्नि कोण में रसोई का होना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह अग्नि तत्व के स्वाभाविक स्वरूप के अनुरूप माना जाता है। वहीं इस क्षेत्र में जल तत्व से जुड़ी वस्तुएं, अत्यधिक नीले या काले रंग का उपयोग तथा अनावश्यक पानी की व्यवस्था करने से बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी मान्यताओं के अनुसार इससे ऊर्जा का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

    वास्तु शास्त्र को मानने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि जो युवा या पेशेवर खिलाड़ी खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपने घर या अभ्यास स्थल की इन दिशाओं को स्वच्छ, व्यवस्थित और वास्तुदोष से मुक्त रखने का प्रयास करना चाहिए। हालांकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि खेलों में सफलता का सबसे बड़ा आधार नियमित अभ्यास, अनुशासन, उचित प्रशिक्षण और दृढ़ संकल्प ही है, जबकि वास्तु संबंधी उपाय व्यक्तिगत आस्था और मान्यता का विषय हैं।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए पीएम मोदी का भारतीय दल को संदेश, कहा- खिलाड़ियों का जज्बा देश को नई प्रेरणा देगा

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए पीएम मोदी का भारतीय दल को संदेश, कहा- खिलाड़ियों का जज्बा देश को नई प्रेरणा देगा

    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के शुभारंभ के साथ भारत ने भी अपने अभियान की शुरुआत कर दी है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय दल को शुभकामनाएं देते हुए विश्वास जताया कि देश के खिलाड़ी पूरे जोश, दृढ़ संकल्प और उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ प्रतियोगिता में उतरेंगे। उन्होंने कहा कि भारतीय एथलीट केवल पदक जीतने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अनुशासन, मेहनत और समर्पण से देश के करोड़ों लोगों को प्रेरित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय आया है जब भारतीय खेल जगत की निगाहें ग्लासगो में होने वाले मुकाबलों पर टिकी हैं।

    प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि भारतीय खिलाड़ियों की प्रतिभा और कठिन परिश्रम हमेशा देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस बार भी भारतीय दल खेल भावना का परिचय देते हुए शानदार प्रदर्शन करेगा और अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगे का मान बढ़ाएगा। उनके संदेश को खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों के लिए उत्साहवर्धक माना जा रहा है।

    स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का उद्घाटन रंगारंग समारोह के साथ हुआ। उद्घाटन की औपचारिक घोषणा किंग चार्ल्स तृतीय ने की। वर्ष 2014 के बाद दूसरी बार ग्लासगो इस बहु-खेल प्रतियोगिता की मेजबानी कर रहा है। उद्घाटन समारोह में विभिन्न देशों के खिलाड़ियों ने परेड ऑफ नेशंस में भाग लिया और अपनी सांस्कृतिक पहचान का प्रदर्शन किया।

    भारतीय दल की अगुवाई इस बार ओलंपिक पदक विजेता मीराबाई चानू और मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन ने की। मीराबाई चानू ने हाथों में तिरंगा लेकर भारतीय खिलाड़ियों का नेतृत्व किया, जबकि लवलीना बोरगोहेन ने कॉमनवेल्थ बैटन के साथ समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया। दोनों खिलाड़ियों की मौजूदगी ने भारतीय दल का उत्साह और बढ़ा दिया।

    भारत ने इस बार 126 सदस्यीय दल भेजा है, जो पैरा स्पोर्ट्स सहित 13 खेलों में चुनौती पेश करेगा। भारतीय खिलाड़ियों का लक्ष्य कॉमनवेल्थ खेलों में अपने मजबूत प्रदर्शन की परंपरा को आगे बढ़ाना है। प्रतियोगिता के शुरुआती चरण में ही भारत का अभियान शुरू हो चुका है और कुछ खिलाड़ियों ने प्रभावशाली शुरुआत भी की है। मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन पहले ही सेमीफाइनल में पहुंचकर भारत के लिए एक पदक सुनिश्चित कर चुकी हैं, जिससे दल का आत्मविश्वास बढ़ा है।

    भारत की पदक उम्मीदें कई अनुभवी और स्टार खिलाड़ियों पर टिकी हैं। भाला फेंक में नीरज चोपड़ा, वेटलिफ्टिंग में मीराबाई चानू और मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन से शानदार प्रदर्शन की अपेक्षा की जा रही है। इनके अलावा कई युवा खिलाड़ी भी पहली बार बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए तैयार हैं। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय खिलाड़ी अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करते हैं तो इस बार भी पदक तालिका में भारत मजबूत स्थान हासिल कर सकता है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 74 देशों और क्षेत्रों के खिलाड़ी 11 दिनों तक विभिन्न खेलों में प्रतिस्पर्धा करेंगे। यह आयोजन न केवल खिलाड़ियों के कौशल की परीक्षा है, बल्कि खेल भावना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी महत्वपूर्ण मंच माना जाता है। भारतीय दल का लक्ष्य बेहतर प्रदर्शन के साथ देश का गौरव बढ़ाना और वैश्विक खेल मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना रहेगा।

  • हेली मैथ्यूज का तूफानी शतक, आयरलैंड को 9 विकेट से रौंदकर वेस्टइंडीज ने सीरीज में बनाई बढ़त

    हेली मैथ्यूज का तूफानी शतक, आयरलैंड को 9 विकेट से रौंदकर वेस्टइंडीज ने सीरीज में बनाई बढ़त


    नई दिल्ली। ब्रेडी क्रिकेट ग्राउंड पर खेले गए पहले महिला वनडे मुकाबले में वेस्टइंडीज ने कप्तान हेली मैथ्यूज के शानदार ऑलराउंड प्रदर्शन की बदौलत आयरलैंड को 9 विकेट से हराकर तीन मैचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली। मैथ्यूज ने पहले गेंद से तीन महत्वपूर्ण विकेट झटके और फिर बल्ले से नाबाद 159 रन की विस्फोटक पारी खेलकर मैच को पूरी तरह एकतरफा बना दिया। उनके इस प्रदर्शन के लिए उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया।

    टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने उतरी वेस्टइंडीज की टीम ने आयरलैंड को 49 ओवर में 269 रन पर समेट दिया। आयरलैंड की ओर से विकेटकीपर बल्लेबाज एमी हंटर ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 90 गेंदों में 96 रन बनाए। उन्होंने अपनी पारी में छह चौके लगाए और शतक से केवल चार रन दूर रह गईं। कप्तान गेबी लेविस ने 39 रन, ओर्ला प्रेंडरगैस्ट ने 30 और लुइस लिटिल ने 27 रन का योगदान दिया, लेकिन कोई भी बल्लेबाज बड़ी साझेदारी नहीं बना सका।

    वेस्टइंडीज की गेंदबाजी में एफी फ्लेचर सबसे सफल रहीं। उन्होंने 10 ओवर में 49 रन देकर चार विकेट हासिल किए। कप्तान हेली मैथ्यूज ने भी शानदार गेंदबाजी करते हुए 10 ओवर में 52 रन देकर तीन विकेट लिए। जैनिलेया ग्लासगो और करिश्मा रामहरक ने एक-एक विकेट लेकर आयरलैंड की पारी को समेटने में अहम भूमिका निभाई।

    270 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी वेस्टइंडीज ने शुरुआत से ही मुकाबले पर पकड़ बना ली। कप्तान हेली मैथ्यूज और रीलियाना ग्रिमंड ने पहले विकेट के लिए 258 रन की रिकॉर्ड साझेदारी कर आयरलैंड की उम्मीदों को पूरी तरह खत्म कर दिया। यह महिला वनडे क्रिकेट में वेस्टइंडीज की ओर से पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी बन गई।

    मैथ्यूज ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 123 गेंदों में 24 चौकों और दो छक्कों की मदद से नाबाद 159 रन बनाए। यह उनके वनडे करियर का 11वां शतक होने के साथ-साथ इस प्रारूप में उनकी अब तक की सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी भी रही। दूसरी ओर रीलियाना ग्रिमंड शतक से चूक गईं और 107 गेंदों में 91 रन बनाकर आउट हुईं। उन्होंने अपनी पारी में 11 चौके लगाए। इसके बाद स्टेफनी टेलर दो रन बनाकर नाबाद लौटीं और वेस्टइंडीज ने केवल एक विकेट खोकर लक्ष्य हासिल कर लिया।

    इस शानदार जीत के साथ वेस्टइंडीज ने तीन मैचों की वनडे सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली है। कप्तान हेली मैथ्यूज का ऑलराउंड प्रदर्शन टीम के लिए बड़ा आत्मविश्वास लेकर आया है। अब दूसरे वनडे में आयरलैंड वापसी की कोशिश करेगा, जबकि वेस्टइंडीज की नजर सीरीज अपने नाम करने पर होगी।

  • इतिहास की सबसे मजबूत टी20 टीम ,रिकी पोंटिंग ने भारतीय टीम की ताकत को किया सलाम

    इतिहास की सबसे मजबूत टी20 टीम ,रिकी पोंटिंग ने भारतीय टीम की ताकत को किया सलाम


    नई दिल्ली । हाल ही में संपन्न आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप में भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग ने बड़ा बयान देते हुए मौजूदा भारतीय टीम को अब तक की सबसे मजबूत टी20 अंतरराष्ट्रीय टीम करार दिया है। पोंटिंग के अनुसार इस टीम की असली ताकत उसकी गहराई अनुभव और लगातार शानदार प्रदर्शन है जिसने उसे सफेद गेंद के क्रिकेट में एक अलग ही मुकाम पर पहुंचा दिया है। अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में खेले गए फाइनल मुकाबले में भारत ने न्यूजीलैंड को 96 रन से हराकर अपना तीसरा टी20 विश्व कप खिताब जीता और इतिहास रचते हुए लगातार दूसरी बार इस ट्रॉफी को अपने नाम किया।

    भारतीय टीम का प्रदर्शन केवल इस एक टूर्नामेंट तक सीमित नहीं रहा है बल्कि पिछले कुछ वर्षों में उसने सीमित ओवरों के क्रिकेट में लगातार दबदबा बनाए रखा है। 2023 के अंत से अब तक खेले गए चार बड़े आईसीसी टूर्नामेंट में टीम को केवल दो मैचों में हार का सामना करना पड़ा है। इनमें एक हार 2023 के एकदिवसीय विश्व कप फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ और दूसरी 2026 टी20 विश्व कप के सुपर-8 चरण में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आई। इसके बावजूद टीम ने जिस तरह से वापसी की वह उसकी मानसिक मजबूती और सामूहिक क्षमता को दर्शाता है।

    आईसीसी हॉल ऑफ फेम में शामिल पोंटिंग ने आईसीसी के कार्यक्रम द आईसीसी रिव्यू में कहा कि मौजूदा भारतीय टीम की श्रेष्ठता पर सवाल उठाना आसान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि बीते पांच-छह वर्षों में भारत का रिकॉर्ड बेहद शानदार रहा है और टीम ने हर बड़े मंच पर अपनी क्षमता साबित की है। पोंटिंग के मुताबिक इस टीम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अनुभव और युवा ऊर्जा का बेहतरीन संतुलन मौजूद है जो उसे हर परिस्थिति में मजबूत बनाता है।

    पोंटिंग ने यह भी माना कि इंडियन प्रीमियर लीग का भारतीय खिलाड़ियों के विकास में बड़ा योगदान रहा है। उनका कहना है कि आईपीएल में खेलने से खिलाड़ियों को बड़े मैचों के दबाव को संभालने की आदत हो जाती है क्योंकि यहां हर मुकाबला अंतरराष्ट्रीय स्तर जैसा ही चुनौतीपूर्ण होता है। यही कारण है कि भारतीय खिलाड़ी किसी भी बड़े मंच पर घबराते नहीं हैं और आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन करते हैं।

    सुपर-8 चरण में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मिली हार को पोंटिंग ने टीम के लिए एक जरूरी झटका बताया। उनका मानना है कि लगातार जीत के बीच कभी-कभी हार टीम को अपनी कमियों को समझने और सुधार करने का मौका देती है। भारत ने इस हार के बाद शानदार वापसी करते हुए अपने बाकी मुकाबलों में आक्रामक बल्लेबाजी का प्रदर्शन किया और तीन मैचों में 250 से अधिक का स्कोर खड़ा किया जिसमें सेमीफाइनल और फाइनल जैसे अहम मुकाबले भी शामिल थे। इस तरह भारतीय टीम ने न सिर्फ खिताब जीता बल्कि अपने खेल संतुलन और निरंतरता से यह साबित कर दिया कि वह टी20 क्रिकेट के इतिहास की सबसे प्रभावशाली और मजबूत टीमों में से एक बन चुकी है।