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  • सोनम वांगचुक फिर आंदोलन की तैयारी में, लद्दाख हिंसा की जांच रिपोर्ट और राज्य के दर्जे की मांग पर बढ़ेगा दबाव

    सोनम वांगचुक फिर आंदोलन की तैयारी में, लद्दाख हिंसा की जांच रिपोर्ट और राज्य के दर्जे की मांग पर बढ़ेगा दबाव

    नई दिल्ली ।लद्दाख में पिछले साल हुई हिंसा की बरसी से पहले सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक बार फिर आंदोलन तेज करने का संकेत दिया है। लेह में 24 सितंबर 2025 की हिंसक घटना में मारे गए लोगों की याद में कैंडल मार्च निकाला गया। इस दौरान वांगचुक ने कहा कि आने वाले दिनों में लद्दाख की लंबित मांगों और पिछले साल की घटना की जवाबदेही को लेकर कार्यक्रमों को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जाएगा।

    वांगचुक के मुताबिक 24 अगस्त से 24 सितंबर तक का समय पिछले साल की घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए रखा गया है। उन्होंने कहा कि शुरुआती कार्यक्रम को सीमित रखा गया है, क्योंकि इस समय दलाई लामा लद्दाख में हैं। उनके लद्दाख से जाने के बाद बड़े स्तर पर प्रदर्शन शुरू करने का संकेत दिया गया है।

    24 सितंबर 2025 को लद्दाख में राज्य के दर्जे और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने समेत कई मांगों को लेकर चल रहा आंदोलन हिंसक हो गया था। इस दौरान सरकारी और राजनीतिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा, वाहनों में आगजनी हुई और सुरक्षा बलों के साथ झड़प की स्थिति बनी। हिंसा के दौरान कई लोगों की मौत हुई और सुरक्षा बलों के जवान भी घायल हुए थे।

    इस घटना से पहले वांगचुक ने 10 सितंबर 2025 को भूख हड़ताल शुरू की थी। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में लद्दाख को राज्य का दर्जा देना, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा क्षेत्र के प्रशासन में स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना शामिल रहा है।

    24 सितंबर की घटना के बाद केंद्र सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। आयोग का उद्देश्य हिंसा की परिस्थितियों, घटनाक्रम और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच करना है। वांगचुक और आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग अब यह है कि आयोग की रिपोर्ट जल्द सार्वजनिक की जाए।

    वांगचुक ने कहा है कि घटना को एक साल पूरा होने के करीब है, लेकिन जांच रिपोर्ट सामने नहीं आने से लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं। उनके अनुसार रिपोर्ट सार्वजनिक होने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि 24 सितंबर को परिस्थितियां किस तरह बिगड़ीं और हिंसा तथा पुलिस कार्रवाई के पीछे क्या घटनाक्रम रहा।

    लद्दाख की राजनीतिक मांगों को लेकर केंद्र और क्षेत्र के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत भी जारी रही है। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस लंबे समय से राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची जैसी मांगों को लेकर केंद्र के साथ बातचीत कर रहे हैं। मई 2026 में भी केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच महत्वपूर्ण बैठक हुई थी।

    मई की बातचीत में लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर चर्चा हुई थी। बातचीत के दौरान कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी विचार सामने आया, लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग अब भी आंदोलनकारी पक्ष के प्रमुख मुद्दों में बनी हुई है। दोनों पक्षों के बीच आगे की बातचीत को लेकर भी उम्मीद बनी हुई है।

    सोनम वांगचुक की भूमिका इस आंदोलन में महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 की घटनाओं के बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में उनकी हिरासत रद्द कर दी, जिसके बाद वह दोबारा सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय हुए। इसके बाद उन्होंने बातचीत और शांतिपूर्ण आंदोलन के जरिए लद्दाख की मांगों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

    अब सितंबर की बरसी के दौरान लद्दाख में होने वाले कार्यक्रमों पर सबकी नजर रहेगी। वांगचुक ने स्पष्ट संकेत दिया है कि कैंडल मार्च केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में आंदोलन का स्वरूप बड़ा हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि लद्दाख की मांगों को आगे बढ़ाने का रास्ता शांतिपूर्ण होना चाहिए। जांच रिपोर्ट, राज्य के दर्जे और संवैधानिक सुरक्षा जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में केंद्र और लद्दाख प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के केंद्र में रहेंगे।

  • मीरवाइज को दिल्ली बुलाने के फैसले पर कायम रहे उमर अब्दुल्ला, राज्य का दर्जा बहाली की मांग से ध्यान भटकाने का लगाया आरोप

    मीरवाइज को दिल्ली बुलाने के फैसले पर कायम रहे उमर अब्दुल्ला, राज्य का दर्जा बहाली की मांग से ध्यान भटकाने का लगाया आरोप

    नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्रस्तावित दिल्ली रैली के लिए मीरवाइज उमर फारूक को भेजे गए निमंत्रण का खुलकर बचाव किया है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से विवाद का रूप देकर राज्य का दर्जा बहाल करने की उनकी पार्टी की मांग से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि रैली का मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाना है।

    जम्मू में आयोजित ‘दिल्ली चलो’ रैली को संबोधित करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन के लिए 50 से अधिक लोगों को आमंत्रण भेजा था, लेकिन केवल एक नाम को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतने लोगों को निमंत्रण भेजा गया, तब केवल मीरवाइज उमर फारूक के नाम को ही प्रमुखता से क्यों उठाया गया। उनके अनुसार यह पूरी बहस वास्तविक राजनीतिक मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास है।

    मुख्यमंत्री ने भाजपा और मीडिया के एक वर्ग पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ मंचों पर इस निमंत्रण को इस तरह प्रस्तुत किया गया, मानो पार्टी ने किसी अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने का प्रयास किया हो। उन्होंने कहा कि यह व्याख्या तथ्यों के अनुरूप नहीं है और इससे केवल भ्रम पैदा किया जा रहा है। उनके अनुसार राज्य का दर्जा बहाल करने जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा होने के बजाय राजनीतिक विमर्श को दूसरे मुद्दों की ओर मोड़ा जा रहा है।

    उमर अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में केंद्र सरकार के उन दावों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियां अब समाप्त हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि यदि यह दावा सही है, तो फिर उसी आधार पर किसी व्यक्ति को अलगाववादी बताकर विवाद खड़ा करना विरोधाभासी प्रतीत होता है। उनका कहना था कि दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं और इस विषय पर स्पष्टता आवश्यक है।

    मुख्यमंत्री ने दोहराया कि उनकी पार्टी का प्रमुख लक्ष्य जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाना है। उन्होंने कहा कि इसी उद्देश्य से दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन आयोजित किया जा रहा है, ताकि इस मांग को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सके। उनके अनुसार यह अभियान किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक अपेक्षाओं से जुड़ा हुआ है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू में आयोजित रैली में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है। उनके अनुसार जनता इस मुद्दे को लेकर गंभीर है और राजनीतिक दलों को भी इसी विषय पर सार्थक चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि लोकतांत्रिक माध्यमों से उठाई जा रही यह मांग आगे भी मजबूती के साथ जारी रहेगी।

    दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले इस निमंत्रण को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस इसे राज्य का दर्जा बहाल करने के अभियान का हिस्सा बता रही है, वहीं विपक्षी दल इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भी महत्वपूर्ण बना रह सकता है।

  • जम्मू-कश्मीर को जल्द मिल सकता है राज्य का दर्जा, केंद्र के संकेत ने बढ़ाई उम्मीदें

    जम्मू-कश्मीर को जल्द मिल सकता है राज्य का दर्जा, केंद्र के संकेत ने बढ़ाई उम्मीदें


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा जल्द मिलने की संभावना फिर से सुर्खियों में आ गई है। केंद्रीय कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने हाल ही में कहा कि यह मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है, लेकिन जब संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया है, तो जम्मू-कश्मीर को उसका अधिकार निश्चित रूप से मिलेगा। मेघवाल ने यह भी संकेत दिए कि प्रक्रिया चल रही है और जल्द ही इस पर फैसला सुनने को मिल सकता है।

    अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित किया गया। तब से ही क्षेत्रीय राजनीतिक दल लगातार पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि राज्य का दर्जा लौटने से स्थानीय प्रशासनिक निर्णयों में जनता की भागीदारी बढ़ेगी और विकास की गति तेज होगी।

    मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस मामले पर अपनी चिंता और उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केंद्र के साथ इस मुद्दे पर लगातार बातचीत कर रही है और लंबे इंतजार के बावजूद वे उम्मीद नहीं खो रहे हैं। अब, केंद्रीय मंत्री के हालिया बयान के बाद उन्हें विश्वास है कि राज्य का दर्जा जल्द ही बहाल किया जा सकता है। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यह मामला जनता की संवेदनशील भावनाओं से जुड़ा हुआ है और देर होने से लोगों में बची हुई उम्मीद भी खत्म हो सकती है।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर का राज्य दर्जा बहाल होना न केवल प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता और विकास को भी मजबूती मिलेगी। स्थानीय प्रशासन को अधिक अधिकार मिलेंगे, जिससे विकास योजनाओं और कानून-व्यवस्था के मामलों में बेहतर निर्णय लेने में सुविधा होगी।

    हालांकि, अभी तक कोई निश्चित तारीख या आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से लगातार सकारात्मक संकेत दिए जा रहे हैं। मेघवाल के बयान और पहले दिए गए लोकसभा आश्वासनों से यह स्पष्ट होता है कि राज्य का दर्जा बहाल करने की प्रक्रिया पूरी तरह बंद नहीं हुई है और यह मुद्दा उच्च स्तरीय समीक्षा के बाद जल्द ही संसद या केंद्र सरकार के माध्यम से अंतिम रूप ले सकता है।

    निष्कर्ष: जम्मू-कश्मीर के लोगों और राजनीतिक दलों के लिए यह बड़ी उम्मीद की खबर है। लंबे समय से प्रतीक्षित यह फैसला क्षेत्रीय राजनीति, प्रशासनिक सुधार और विकास की दिशा में एक नया अध्याय खोल सकता है। केंद्रीय मंत्रियों के संकेतों और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की उम्मीदों के बीच लगता है कि अब राज्य के दर्जे की बहाली बहुत दूर नहीं है।