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  • शहरी रोजगार रिपोर्ट: देश के 46 बड़े शहरों में सात साल में तेजी से घटी बेरोजगारी दर, महिलाओं की स्थिति में भी बड़ा सुधार

    शहरी रोजगार रिपोर्ट: देश के 46 बड़े शहरों में सात साल में तेजी से घटी बेरोजगारी दर, महिलाओं की स्थिति में भी बड़ा सुधार

    नई दिल्ली। देश के बड़े शहरों में रोजगार के मोर्चे पर एक राहत भरी और सकारात्मक खबर सामने आई है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, 10 लाख से अधिक आबादी वाले देश के 46 प्रमुख शहरों में पिछले सात वर्षों के दौरान बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2018 से 2025 के बीच इन शहरों की कुल बेरोजगारी दर 7.9 फीसदी से घटकर अब महज 4.9 फीसदी के स्तर पर आ गई है। यह बदलाव दर्शाते हैं कि देश के बड़े महानगरीय और शहरी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां तेज हुई हैं, जिससे नए अवसर सृजित हो रहे हैं।

    इस रिपोर्ट में महिला और पुरुष दोनों ही श्रेणियों में बेरोजगारी दर में निरंतर आ रही कमी का विशेष उल्लेख किया गया है। पुरुषों की बात करें तो उनकी बेरोजगारी दर जो साल 2017-18 में 7.5 प्रतिशत थी, वह लगातार गिरते हुए वर्ष 2025 में 4.5 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है। इसी तरह महिलाओं के मामले में भी काफी बड़ा सुधार देखने को मिला है। साल 2018-19 में महिला बेरोजगारी दर बढ़कर 10.4 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, लेकिन इसके बाद इसमें लगातार गिरावट दर्ज की गई और साल 2025 में यह घटकर 6.1 प्रतिशत रह गई। यह आंकड़े कामकाजी महिलाओं के लिए शहरी क्षेत्रों में बढ़ते अवसरों को रेखांकित करते हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, इन 46 शहरों में रोजगार की सामान्य स्थिति 4.9 प्रतिशत रही, जबकि वर्तमान साप्ताहिक स्थिति के आधार पर यह 6.8 प्रतिशत दर्ज की गई। यह आंकड़े लगभग पूरे शहरी भारत के औसत के समान ही हैं, जहां क्रमशः यह दर 4.8 प्रतिशत और 6.8 प्रतिशत रही है। एक खास बात यह भी सामने आई है कि इन बड़े शहरों में काम करने वाले पुरुष और महिला श्रमिक पूरे देश के अन्य शहरी इलाकों के मुकाबले औसतन अधिक घंटे काम कर रहे हैं। इसके अलावा, 15 से 29 वर्ष के ऐसे युवाओं का अनुपात जो किसी भी प्रकार के रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण का हिस्सा नहीं हैं, इन शहरों में 22.2 फीसदी रहा, जो पूरे शहरी भारत के औसत (25.0 फीसदी) से काफी बेहतर है।

    मंत्रालय की रिपोर्ट में श्रम बल से बाहर रहने के मुख्य कारणों का भी विश्लेषण किया गया है। पुरुषों के मामले में 53.5 प्रतिशत ने श्रम बल से बाहर रहने की मुख्य वजह अपनी पढ़ाई जारी रखना बताया। वहीं, महिलाओं के मामले में 68.7 प्रतिशत ने बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों को रोजगार न करने या उससे बाहर रहने का प्राथमिक कारण बताया। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर बढ़ते देश में शहर आर्थिक गतिविधियों, नवाचार और रोजगार सृजन के मुख्य केंद्र बन चुके हैं, इसलिए इनकी आर्थिक संरचना को समझना बेहद जरूरी है।

    इसके साथ ही, इन 46 बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की औसत आय देश के अन्य शहरी हिस्सों की तुलना में काफी बेहतर पाई गई है। आंकड़ों के मुताबिक, स्वरोजगार से जुड़े लोगों की पिछले 30 दिनों की औसत आय 30,858 रुपये रही, जबकि नियमित वेतन पाने वाले कर्मचारियों की औसत आय 28,808 रुपये दर्ज की गई। दिहाड़ी या आकस्मिक श्रमिकों की बात करें तो वे रोजाना औसतन 624 रुपये कमा रहे हैं। इसके विपरीत, पूरे शहरी भारत में स्वरोजगार की औसत आय 23,013 रुपये, नियमित वेतनभोगियों की 26,258 रुपये और दिहाड़ी मजदूरों की कमाई 550 रुपये प्रतिदिन रही।

  • GDP केवल आंकड़ों का खेल नहीं… लोगों की जिंदगी पर पड़ता है इसका सीधा असर

    GDP केवल आंकड़ों का खेल नहीं… लोगों की जिंदगी पर पड़ता है इसका सीधा असर


    नई दिल्ली।
    जीडीपी (GDP) किसी देश की सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष या तिमाही) में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य है। यह अर्थव्यवस्था (Economy) के आकार और स्वास्थ्य को दर्शाती है। जीडीपी सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होता। इसका सीधा और अप्रत्यक्ष असर नौकरी (Jobs), महंगाई (Inflation), आमदनी (Income), कर्ज (Debt), टैक्स (Taxes) और सरकारी सुविधाओं (Government services) पर पड़ता है।


    1. रोजगार और नौकरी के मौके

    ऊंची जीडीपी ग्रोथ (7% या उससे ज्यादा) का मतलब है कि अर्थव्यवस्था में गतिविधियां तेज हैं। इससे नई नौकरियां बनती हैं, खासकर निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी और सर्विस सेक्टर में। कम ग्रोथ होने पर कंपनियां भर्ती रोकती हैं या छंटनी करती हैं। नौकरी मिलने की संभावना बढ़ती है, वेतन वृद्धि बेहतर हो सकती है।


    2. महंगाई और खर्च

    तेज जीडीपी से मांग बढ़ती है, जिससे कभी-कभी महंगाई का दबाव भी आता है। अगर विकास दर संतुलित रहे, तो आपूर्ति बढ़ने से महंगाई काबू में रहती है। आम आदमी के लिए बहुत तेज विकास दर का मतलब महंगाई का खतरा होती है वहीं इसकी धीमी रफ्तार से आमदनी पर असर होता है। इसका मध्यम और स्थिर विकास सबसे बेहतर होता है।


    3. आपकी आमदनी और व्यापार

    अच्छी जीडीपी दर से छोटे कारोबार, दुकानदार, ट्रांसपोर्ट, होटल और सर्विस सेक्टर को फायदा होता है। ग्रामीण इलाकों में बेहतर विकास का मतलब कृषि से जुड़े रोजगार और आमदनी में सुधार होता है। आम आदमी के लिए बेहतर है काम-धंधा चलता है, आमदनी बढ़ने की उम्मीद बनती है।


    4. कर्ज, ईएमआई और ब्याज दर

    अगर जीडीपी दर मजबूत और महंगाई काबू में हो, तो आरबीआई ब्याज दरें घटा सकता है। इससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन सस्ते होते हैं। ईएमआई कम हो सकती है, नया कर्ज लेना आसान होता है।


    5. सरकार की कमाई और योजनाएं

    ज्यादा जीडीपी दर से सरकार को ज्यादा टैक्स राजस्व मिलता है। इससे सड़क, अस्पताल, स्कूल, सब्सिडी और सामाजिक योजनाओं पर खर्च बढ़ सकता है। आम आदमी के लिए बेहतर सरकारी सेवाएं तैयार होती हैं और योजनाओं का लाभ मिलता है।


    6. शेयर बाजार और निवेश

    अच्छी जीडीपी दर के अनुमान से शेयर बाजार में तेजी आती है। म्यूचुअल फंड, पीएफ और रिटायरमेंट फंड पर सकारात्मक असर पड़ता है। आम आदमी के लिए निवेश से बेहतर रिटर्न की संभावनाएं बनती हैं।

  • भोपाल में SIR प्रक्रिया के तहत 4.43 लाख मतदाताओं के नाम कटेआंकड़ा चौंकाने वाला

    भोपाल में SIR प्रक्रिया के तहत 4.43 लाख मतदाताओं के नाम कटेआंकड़ा चौंकाने वाला


    भोपाल ।भोपाल में चुनावी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा है। इस प्रक्रिया में अब तक 39 दिनों में 4 लाख 43 हजार 633 मतदाताओं के नाम कटने की संभावना जताई गई है। ये नाम मुख्य रूप से मृतशिफ्टेडअनुपस्थितडबल एंट्री और अन्य कारणों से कटे हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित वह मतदाता हैं जिनके नाम ‘नो-मैपिंग’ सूची में थेजिनकी संख्या घटकर 1 लाख 35 हजार 765 रह गई है। इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर राजनीति में हलचल तेज हो गई हैऔर विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने निर्वाचन आयोग से प्रक्रिया की पारदर्शिता की मांग की है।

    SIR प्रक्रिया और नाम कटने की वजह

    SIR प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और सही बनाना है ताकि चुनावों में कोई धोखाधड़ी न हो। इस दौरान मृतशिफ्टेड या अनुपस्थित मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैंऔर जिनका नाम डबल एंट्री के रूप में दर्ज हैउनका नाम भी हटाया जाता है। इन कदमों से सूची में वास्तविक और सक्रिय मतदाताओं की संख्या सुनिश्चित होती है।

    भोपाल में जिन 4.43 लाख मतदाताओं के नाम कटने की संभावना जताई गई हैउनमें से अधिकांश मृत और शिफ्टेड मतदाता हैंजिनकी जानकारी नियमित रूप से अपडेट नहीं की गई थी। इसके अलावाकई मतदाताओं के नाम डबल एंट्री के कारण भी कटने जा रहे हैं। इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग ने बूथ लेवल अधिकारी से सभी नामों की वेरिफिकेशन कराने का निर्देश दिया है।

    राजनीतिक दलों का रुख और आयोग की प्रतिक्रिया

    चुनाव आयोग के आब्जर्वर ब्रजमोहन मिश्रा ने शुक्रवार को सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस बैठक में उन्होंने इन नामों को वेरिफाई कराने का सुझाव दिया ताकि कोई भी मतदाता बिना वजह सूची से बाहर न हो जाए। आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि 18 दिसंबर तक गणना पत्रक जमा किए जाएं।

    हालांकिविधानसभा क्षेत्रों में जहां ज्यादा मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा हैआयोग ने कुछ क्षेत्रों में बीएलओ की कामकाजी स्थिति की भी समीक्षा की। नरेलामध्यगोविंदपुरा और हुजूर जैसी विधानसभाओं में बीएलओ के काम को और कड़ी निगरानी में रखने का निर्णय लिया गया थालेकिन आयोग के वरिष्ठ अधिकारी छत्तीसगढ़ के लिए रवाना हो गए।

    भविष्य की दिशा और चुनौती

    इस पुनरीक्षण प्रक्रिया से निश्चित रूप से मतदाता सूची में सुधार होगालेकिन इसके परिणामस्वरूप कुछ राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को असंतोष भी हो सकता हैविशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां नाम काटे गए हैं। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष रहेताकि भविष्य में कोई विवाद न उठे।

    इतना ही नहींराजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को भी मतदाता सूची में सुधार की इस प्रक्रिया को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिएक्योंकि यह चुनावी प्रणाली को मजबूत और निष्पक्ष बनाता है। अगर प्रक्रिया ठीक से लागू होती है तो यह चुनावों की विश्वसनीयता को बढ़ाएगा और लोगों का विश्वास बनाए रखेगा।