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  • लोकायुक्त के भीतर कथित रिश्वतखोरी का खुलासा, सिस्टम की पारदर्शिता पर बहस तेज

    लोकायुक्त के भीतर कथित रिश्वतखोरी का खुलासा, सिस्टम की पारदर्शिता पर बहस तेज


    जबलपुर। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली लोकायुक्त संस्था खुद गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। एक स्टिंग ऑपरेशन में लोकायुक्त संगठन के कुछ कर्मचारियों पर रिश्वत लेकर ट्रैप मामलों को कमजोर करने और आरोपियों को राहत पहुंचाने की कथित डील करते हुए सामने आने का दावा किया गया है। इस खुलासे ने उस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिसका काम भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है।

    स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिपोर्टर ने रिश्वत लेते पकड़े गए सरकारी कर्मचारियों के रिश्तेदार बनकर लोकायुक्त के कर्मचारियों से संपर्क किया। बातचीत में कुछ कर्मचारियों ने कथित तौर पर ऐसे तरीके बताए, जिनके जरिए ट्रैप मामलों की जांच को प्रभावित किया जा सकता है। इनमें वॉयस सैंपल की प्रक्रिया को प्रभावित करना, जांच को वर्षों तक लंबित रखना और गवाहों को मैनेज करने जैसे दावे शामिल हैं।

    भोपाल लोकायुक्त में पदस्थ टेक्नीशियन अमित विश्वकर्मा के साथ हुई मुलाकात में कथित तौर पर यह दावा किया गया कि जांच को आरोपी की सेवानिवृत्ति तक लंबा खींचा जा सकता है, जिससे पेंशन और अन्य सेवा लाभों पर तत्काल प्रभाव न पड़े। बातचीत के दौरान वॉयस सैंपल को प्रभावित करने और जांच प्रक्रिया को धीमा करने के लिए लाखों रुपये की मांग किए जाने का भी दावा किया गया।

    स्टिंग में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में आरोपी को पहले से यह बताया जा सकता है कि उसे वॉयस सैंपल के दौरान क्या बोलना है और क्या नहीं। कथित तौर पर गवाहों को भी प्रभावित करने की बात कही गई, ताकि जांच की दिशा बदली जा सके। इस पूरी प्रक्रिया के लिए 3 लाख से 5 लाख रुपये तक की डील की चर्चा सामने आई।

    सागर में पदस्थ हेड कॉन्स्टेबल यशवंत सिंह के साथ हुई बातचीत में भी जांच को प्रभावित करने, भाषा और बोलने के तरीके में बदलाव कर वॉयस सैंपल को कमजोर करने तथा फॉरेंसिक रिपोर्ट पर असर डालने जैसे दावे किए गए। उन्होंने कथित तौर पर जांच को कई महीनों तक टालने और दस्तावेजों को मैनेज कराने की बात भी कही।

    वहीं, लोकायुक्त के अन्य कर्मचारियों के नाम भी सामने आए, जिन पर कथित तौर पर आरोपियों और अधिकारियों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के आरोप लगे हैं। एक अन्य कर्मचारी ने तो कथित रूप से 3 लाख रुपये में पूरा मामला “मैनेज” करने का दावा करते हुए पहले किस्त के रूप में रकम देने की बात कही।

    यह खुलासा इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि लोकायुक्त जैसी संस्था पर आम लोगों का भरोसा भ्रष्टाचार के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई के लिए टिका होता है। यदि जांच एजेंसियों के भीतर ही ऐसे नेटवर्क सक्रिय हैं, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

    अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इन आरोपों और स्टिंग में सामने आए तथ्यों पर क्या कार्रवाई होती है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता पर व्यापक बहस खड़ी कर सकता है।

  • MP: सतना में हो रहा था खून का काला कारोबार, SDM ने फिल्मी अंदाज में स्टिंग कर 3 को दबोचा

    MP: सतना में हो रहा था खून का काला कारोबार, SDM ने फिल्मी अंदाज में स्टिंग कर 3 को दबोचा


    सतना।
    मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के सतना जिला अस्पताल (Satna District Hospital) की साख तार-तार हो चुकी है। एक तरफ अस्पताल के भीतर दिल्ली और भोपाल की टीमें थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों (Thalassemia Children) को HIV संक्रमित खून चढ़ाए जाने के मामले की फाइलें खंगाल रही हैं, तो दूसरी तरफ अस्पताल के गेट पर ही खून के सौदागर इंसानी मजबूरी का फायदा उठाकर 5000 रुपए में खून बेच रहे हैं। गुरुवार को प्रशासन ने इस ‘काले खेल’ का पर्दाफाश करने के लिए बिल्कुल फिल्मी अंदाज में जाल बिछाया। एसडीएम सिटी राहुल सिलाड़िया (SDM City Rahul Siladia) और कोतवाली टीआई रावेंद्र द्विवेदी (TI Ravindra Dwivedi) ने एक सुनियोजित स्टिंग ऑपरेशन कर खून की दलाली करने वाले 3 लोगों को रंगे हाथों दबोच लिया।


    नोटों के नंबर नोट किए, वीडियो बनाया और भेजा ‘नकली ग्राहक’

    दलालों को रंगे हाथ पकड़ने के लिए एसडीएम ने पुख्ता सबूत तैयार किए थे। इसके लिए उन्होंने 500, 200 और 100 के नोटों से 4500 रुपए की एक गड्डी तैयार की और इन सभी नोटों के सीरियल नंबर पहले से एक रजिस्टर में दर्ज कर लिए। सबूत के तौर पर नोटों का टाइम स्टैम्प वाला एक वीडियो भी बनाया गया, फिर एक व्यक्ति को ‘नकली ग्राहक’ बनाकर खून खरीदने भेजा गया।

    ग्राहक के रूप में पहुंचे शख्स ने जैसे ही दलाल को पैसे दिए और दलाल ने उससे कहा कि डोनर आ रहा है, वैसे ही इशारा मिलते ही पुलिस और प्रशासन की टीम ने धावा बोल दिया। दलाल की जेब की तलाशी लेने पर वही चिन्हित नोट बरामद हुए, जिनका नंबर प्रशासन ने पहले से नोट कर रखा था।


    ऐसे चल रहा था नेटवर्क

    इस कार्रवाई ने अस्पताल परिसर के बाहर चल रहे खून के अवैध धंधे की पोल खोल दी है। जांच में सामने आया कि अस्पताल के ठीक सामने मौजूद चाय की टपरियों और फलों के ठेलों पर ये दलाल बैठे रहते थे। मरीज के परेशान परिजनों को देखते ही ये उन्हें घेर लेते थे और ब्लड दिलाने के नाम पर मोटी रकम वसूलते थे। पुलिस ने मौके से तीन दलालों को गिरफ्तार किया है, इसमें रजनीश साहू (निवासी करसरा), मोहम्मद कैफ (निवासी कामता टोला), अनिल गुप्ता (निवासी टिकुरिया टोला) शामिल हैं।


    एसडीएम ने किया पर्दाफाश

    इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए एसडीएम राहुल सिलाड़िया ने बताया कि हमें ब्लड की दलाली की सूचना मिली थी। इस पर हमने योजना बनाकर कुछ नोटों को चिन्हित किया और उनका वीडियो रिकॉर्ड कर एक व्यक्ति को ग्राहक बनाकर भेज दिया। अस्पताल के सामने खड़े फल के ठेले पर मिले एक दलाल ने बदले में 4500 रुपए की मांग की। जैसे ही दलाल ने पैसे लिए, हमने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया। आरोपी के पास से वही चिन्हित नोट बरामद हुए हैं। इससे साफ है कि दुकानों की आड़ में खून का अवैध कारोबार चल रहा है। पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है।


    अंदर से कौन कर रहा है मदद?

    सूत्रों के मुताबिक अस्पताल के भीतर की मिलीभगत के बिना यह रैकेट चलना नामुमकिन है। बड़ा सवाल यह है कि दलाल बाहर पैसा ले रहा है, तो अंदर से ब्लड या डोनर कौन मैनेज कर रहा है? क्या ब्लड बैंक का कोई कर्मचारी इस सिंडिकेट का हिस्सा है? फिलहाल पुलिस आरोपियों से कड़ी पूछताछ करते हुए इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश कर रही है।