Tag: strategic alliance

  • अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़

    अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़


    नई दिल्ली:अमेरिका और इज़रायल का रिश्ता आज के समय में केवल दोस्ती नहीं बल्कि एक गहरा रणनीतिक गठबंधन बन चुका है, जिसे वैश्विक राजनीति का सबसे मजबूत समीकरण माना जाता है, यह रिश्ता केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि सुरक्षा, तकनीक, खुफिया जानकारी और आर्थिक हितों पर आधारित है, अमेरिका इज़रायल को मध्य पूर्व में अपना एक ऐसा मजबूत ठिकाना मानता है जो पूरे क्षेत्र में उसके हितों की रक्षा करता है, इज़रायल अमेरिका के लिए एक ऐसा सहयोगी है जो उसके रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

    मध्य पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां तेल और गैस के विशाल भंडार हैं, वहां इज़रायल अमेरिका के लिए एक सुरक्षा ढाल की तरह काम करता है, ईरान जैसे देशों के साथ तनाव के दौरान इज़रायल न केवल अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के हितों की भी सुरक्षा करता है, यही कारण है कि अमेरिका इज़रायल को हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देता है, हालांकि यह सहायता अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही वापस मिल जाती है क्योंकि इज़रायल इन पैसों से अमेरिकी हथियार खरीदता है

    युद्ध के मैदान में इन हथियारों के उपयोग से अमेरिका को वास्तविक समय का डेटा मिलता है जिससे वह अपने हथियारों को और उन्नत बना सकता है, मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे आयरन डोम में भी अमेरिका की अहम भागीदारी है, यह सहयोग दोनों देशों को तकनीकी रूप से और मजबूत बनाता है

    खुफिया जानकारी के क्षेत्र में भी इज़रायल अमेरिका का बेहद भरोसेमंद साझेदार है, इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का नेटवर्क दुनिया के कई हिस्सों में फैला हुआ है, खासकर इस्लामिक देशों और ईरान के अंदर इसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है, इस एजेंसी से मिलने वाली जानकारियां अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, जिससे वह अपने देश पर संभावित खतरों को समय रहते रोक पाता है

    तकनीकी और आर्थिक साझेदारी भी इस रिश्ते का अहम हिस्सा है, इज़रायल को स्टार्टअप नेशन कहा जाता है, जहां दुनिया की बड़ी कंपनियां जैसे इंटेल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट अपने रिसर्च सेंटर स्थापित कर चुकी हैं, इज़रायल और अमेरिका के बीच टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का गहरा संबंध है, जिसने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है

    अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी इज़रायल का प्रभाव साफ देखा जा सकता है, अमेरिकी इज़रायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी जैसी शक्तिशाली लॉबी वहां की विदेश नीति को प्रभावित करती है, कोई भी अमेरिकी नेता इज़रायल के खिलाफ खुलकर नहीं जा सकता क्योंकि इससे उसका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है

    इसके अलावा अमेरिका में एक बड़ा ईसाई वर्ग इज़रायल को धार्मिक दृष्टिकोण से समर्थन देता है, वे इसे अपनी आस्था का हिस्सा मानते हैं और इज़रायल की सुरक्षा को अपना कर्तव्य समझते हैं, यह धार्मिक और सांस्कृतिक समर्थन भी इस रिश्ते को मजबूत बनाता है

    इतिहास की बात करें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप से आए कई यहूदी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों को शरण दी, जिनमें अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक शामिल थे, जिन्होंने परमाणु अनुसंधान और मैनहट्टन प्रोजेक्ट की नींव रखने में भूमिका निभाई, एडवर्ड टेलर और जॉन वॉन न्यूमैन जैसे वैज्ञानिकों ने अमेरिका को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने में योगदान दिया

    ऑपरेशन पेपरक्लिप के जरिए भी अमेरिका ने जर्मन वैज्ञानिकों को अपने साथ जोड़ा, जिससे अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक में बड़ी प्रगति हुई, इस तरह यह रिश्ता केवल आज का नहीं बल्कि दशकों पुरानी रणनीतिक सोच का परिणाम है

  • अमेरिका की नई योजना: 50 देशों के साथ चीन के खनिज प्रभुत्व को देगा चुनौती, भारत की भूमिका अहम

    अमेरिका की नई योजना: 50 देशों के साथ चीन के खनिज प्रभुत्व को देगा चुनौती, भारत की भूमिका अहम


    नई दिल्ली। अमेरिका चीन के वर्चस्व वाले क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम उठा रहा है। 4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ बैठक में अमेरिका ने करीब 50 देशों का एक ट्रेडिंग ब्लॉक बनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के उत्पादन, प्रोसेसिंग और कीमतों को स्थिर करना और चीन के प्रभुत्व को तोड़ना है।

    अमेरिका की रणनीति
    उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बैठक में कहा कि सदस्य देशों के उत्पादकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम कीमत और टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं की जाएंगी। उनका कहना था कि अमेरिका अपनी क्रिटिकल मिनरल्स इंडस्ट्री को पुनर्जीवित करना चाहता है और चीन जैसी बाजार-सक्रियता से बचाव जरूरी है। वेंस ने इसे “साथी और सहयोगी के बीच सुरक्षित जोन” बताया, जिसमें अमेरिकी उद्योग को आवश्यक खनिजों की निर्बाध आपूर्ति और मित्र देशों में संयुक्त उत्पादन बढ़ाने पर जोर होगा।

    ब्लॉक का उद्देश्य
    चीन वर्तमान में दुनिया के लगभग 70% रेयर अर्थ माइनिंग और 90% प्रोसेसिंग पर नियंत्रण रखता है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, जेट इंजन, सेमीकंडक्टर और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम के लिए ये खनिज जरूरी हैं। अमेरिका का यह ब्लॉक चीन के एकाधिकार को तोड़ने और सप्लाई चेन को ‘डी-रिस्क’ De-risk करने की वैश्विक रणनीति है।

    भारत की भागीदारी और अवसर
    भारत ने इस बैठक में सक्रिय भूमिका निभाई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आपूर्ति शृंखला में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत के पास लिथियम और कॉपर के बड़े भंडार हैं, और इस ब्लॉक के माध्यम से उसे माइनिंग और प्रोसेसिंग में अमेरिकी तकनीक और फंड का लाभ मिल सकता है। इससे भारत अपनी चिप-मैन्युफैक्चरिंग और EV योजनाओं के लिए चीन पर निर्भर नहीं रहेगा।

    जयशंकर ने सोशल मीडिया पर कहा अत्यधिक संकेंद्रण से जुड़ी चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से आपूर्ति शृंखलाओं के जोखिम को कम करने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कनाडा, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, इटली, मलेशिया, बहरीन, मंगोलिया, पोलैंड, रोमानिया, इजराइल और उज्बेकिस्तान के मंत्रियों के साथ भी बैठक की।