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  • 16वें भारत-जापान शिखर सम्मेलन को मिली वैश्विक सराहना, रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने पर जापानी मीडिया का जोर

    16वें भारत-जापान शिखर सम्मेलन को मिली वैश्विक सराहना, रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने पर जापानी मीडिया का जोर

    नई दिल्ली। भारत और जापान के बीच आयोजित 16वें वार्षिक शिखर सम्मेलन को लेकर जापानी मीडिया ने सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विभिन्न समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा सहयोग में लगातार बढ़ती साझेदारी को क्षेत्रीय स्थिरता और दीर्घकालिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण बताया है। विश्लेषणों में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत और जापान के संबंध पहले की तुलना में अधिक व्यापक और मजबूत होते जा रहे हैं।

    शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की और भविष्य में सहयोग को और विस्तार देने पर सहमति जताई। बातचीत में आर्थिक सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने, ऊर्जा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, उन्नत प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र में साझेदारी जैसे विषय प्रमुख रूप से शामिल रहे। दोनों देशों ने क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों का मिलकर सामना करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई।

    जापानी मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की उपलब्धता जापान की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। ऐसे समय में भारत का विशाल बाजार, तेजी से विकसित होता विनिर्माण क्षेत्र और कुशल मानव संसाधन जापान के लिए एक विश्वसनीय और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में उभर रहे हैं। इसी कारण दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    विश्लेषणों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को भी प्रमुख विषय बताया गया। रिपोर्टों के अनुसार जापान भारत को स्वतंत्र, खुला और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण सहयोगी मानता है। क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा के संदर्भ में दोनों देशों के बीच सहयोग को भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

    शिखर सम्मेलन के दौरान रक्षा सहयोग को लेकर भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी। दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा अभ्यासों को और मजबूत करने, नौसैनिक सहयोग बढ़ाने, रक्षा उपकरणों के विकास तथा आधुनिक सैन्य तकनीकों के आदान-प्रदान को गति देने पर जोर दिया। साथ ही रक्षा उत्पादन में सहयोग और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में भी सकारात्मक प्रगति दर्ज की गई।

    बातचीत के दौरान ऊर्जा सुरक्षा और आवश्यक खनिज संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी विशेष बल दिया गया। दोनों देशों ने वैश्विक आपूर्ति में आने वाली संभावित बाधाओं से निपटने के लिए आपसी सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर सहमति जताई। इसके अलावा उच्च तकनीक आधारित संचार प्रणालियों और रक्षा उपकरणों से जुड़े सहयोग को भी नई गति देने का निर्णय लिया गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और जापान के बीच लगातार मजबूत होते संबंध केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता, आर्थिक विकास और सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। हालिया शिखर सम्मेलन से स्पष्ट संकेत मिला है कि दोनों देश रणनीतिक विश्वास, साझा हितों और दीर्घकालिक सहयोग के आधार पर अपनी साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आने वाले समय में व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्रों में इस सहयोग के और विस्तार की संभावना जताई जा रही है।

  • व्यापार से लेकर रक्षा और तकनीक तक नई ऊंचाइयों पर भारत-अमेरिका संबंध, पूर्व अमेरिकी राजदूत ने बताया लोगों के रिश्तों को सबसे बड़ी शक्ति

    व्यापार से लेकर रक्षा और तकनीक तक नई ऊंचाइयों पर भारत-अमेरिका संबंध, पूर्व अमेरिकी राजदूत ने बताया लोगों के रिश्तों को सबसे बड़ी शक्ति

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की सबसे बड़ी ताकत दोनों देशों के नागरिकों के बीच गहरा विश्वास और लंबे समय से बना मानवीय जुड़ाव है। भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ आई. जस्टर ने कहा कि सरकारी स्तर पर समय-समय पर परिस्थितियां बदलती रही हैं, लेकिन दोनों देशों के लोगों के बीच विकसित रिश्तों ने हमेशा इस साझेदारी को स्थिर और मजबूत बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि यही भरोसा आज भारत-अमेरिका संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला बन चुका है।

    उन्होंने अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम के लीडरशिप समिट को संबोधित करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका की निकटता केवल आधुनिक रणनीतिक समझौतों का परिणाम नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क कई सदियों पुराने हैं। उन्होंने कहा कि भौगोलिक दूरी के बावजूद दोनों देशों के संबंध दुनिया के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक साझेदारों में शामिल हैं।

    केनेथ जस्टर ने बताया कि अमेरिका ने अपने शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशनों में भारत को विशेष महत्व दिया था। अमेरिका ने वर्ष 1792 में तत्कालीन कलकत्ता और 1794 में मद्रास में अपने शुरुआती राजनयिक मिशन स्थापित किए थे। उन्होंने कहा कि यह तथ्य दर्शाता है कि भारत लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता आया है।

    उन्होंने भारत की स्वतंत्रता से पहले के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के समर्थन में ब्रिटेन पर दबाव बनाया था। इसके अलावा अमेरिका ने सितंबर 1946 में भारत की अंतरिम सरकार के साथ औपचारिक संबंध स्थापित कर दिए थे, जबकि भारत की स्वतंत्रता में तब भी लगभग 11 महीने का समय शेष था।

    पूर्व राजदूत ने कहा कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत के आर्थिक सुधारों ने दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दी। हालांकि वर्ष 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद संबंधों में कुछ समय के लिए तनाव पैदा हुआ, लेकिन दोनों देशों के वरिष्ठ नेतृत्व के बीच लगातार संवाद ने इस दूरी को कम किया। इसी प्रक्रिया ने बाद में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा का मार्ग भी प्रशस्त किया और द्विपक्षीय संबंधों को नई गति मिली।

    उन्होंने कहा कि इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव आया। उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग और असैन्य परमाणु समझौता इस परिवर्तन के प्रमुख आधार बने। आगे चलकर बराक ओबामा प्रशासन ने भारत को प्रमुख रक्षा साझेदार का दर्जा दिया, जबकि ट्रंप प्रशासन के दौरान 2+2 मंत्रीस्तरीय संवाद और क्वाड सहयोग को नई मजबूती मिली। इसके बाद जो बाइडेन प्रशासन ने क्वाड को शीर्ष नेतृत्व के स्तर तक पहुंचाकर रणनीतिक सहयोग को और व्यापक बनाया।

    जस्टर ने कहा कि हाल के वर्षों में रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, निवेश और व्यापार जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 19 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर करीब 250 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। दोनों देश इस दशक के अंत तक इसे 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    पूर्व अमेरिकी राजदूत ने कहा कि भारतवंशी समुदाय ने भी दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई देने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अमेरिका में रहने वाले 50 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोगों ने आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। उन्होंने 2019 के “हाउडी मोदी” और 2020 के “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कार्यक्रम दोनों देशों के नागरिकों के बीच बढ़ते विश्वास और आपसी सद्भाव के प्रतीक हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में यही जनसंपर्क भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को और अधिक व्यापक तथा मजबूत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रहेगा।

  • भारत-सेशेल्स रिश्तों को नई मजबूती, रक्षा, डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष और ब्लू इकोनॉमी समेत 19 क्षेत्रों में बढ़ा सहयोग

    भारत-सेशेल्स रिश्तों को नई मजबूती, रक्षा, डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष और ब्लू इकोनॉमी समेत 19 क्षेत्रों में बढ़ा सहयोग


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन दिवसीय सेशेल्स दौरा भारत और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान भारत और सेशेल्स के बीच कुल 19 महत्वपूर्ण समझौतों और सहयोगी पहलों पर सहमति बनी, जिनका उद्देश्य रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई दिशा देना है। इन समझौतों को दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग का मजबूत आधार माना जा रहा है।

    दौरे के दौरान भारत ने सेशेल्स को एक फास्ट पेट्रोल वेसल, कई यूटिलिटी वाहन, लेजर रेडियल क्लास बोट्स और छह एम्बुलेंस भेंट कीं। इन पहलों का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, मानवीय सहयोग बढ़ाना और हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी को और प्रभावी बनाना है। साथ ही सेशेल्स कोस्ट गार्ड के जहाज की मरम्मत और डोर्नियर विमान के आधुनिकीकरण जैसे प्रोजेक्ट भी सहयोग के प्रमुख केंद्र रहे।

    आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई गति देने के लिए भारत और सेशेल्स के बीच यूपीआई आधारित डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू करने पर सहमति बनी। इस दिशा में दोनों देशों के संबंधित वित्तीय संस्थानों के बीच समझौते किए गए, जिससे डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा और भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रणाली का अंतरराष्ट्रीय विस्तार भी मजबूत होगा। इसके साथ ही आर्थिक सहयोग और वित्तीय समावेशन को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई गई है।

    स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दोनों देशों ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जन औषधि योजना के तहत सस्ती और गुणवत्तापूर्ण भारतीय दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। इसके अलावा नए राष्ट्रीय अस्पताल की शुरुआती तैयारियों और स्वास्थ्य सेवाओं के विकास से जुड़े समझौतों पर भी सहमति बनी, जिससे सेशेल्स की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।

    कृषि, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने सहयोग का दायरा विस्तारित किया है। कृषि अनुसंधान, प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त कार्ययोजना तैयार की गई है। वहीं प्रोफेशनल और टेक्निकल एजुकेशन सेंटर की स्थापना तथा विदेश सेवा से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए संस्थागत सहयोग को भी नई मजबूती मिलेगी। इन पहलों का उद्देश्य स्थानीय क्षमता निर्माण के साथ दीर्घकालिक विकास साझेदारी को मजबूत करना है।

    ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और ब्लू इकोनॉमी जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी दोनों देशों ने मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई। ग्रीन हाइड्रोजन, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे, समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर साझा प्रयासों पर जोर दिया गया। इसके साथ ही सेशेल्स ने आपदा-रोधी अवसंरचना से जुड़े वैश्विक गठबंधन की सदस्यता भी ग्रहण की, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में सहयोग और मजबूत होगा।

    दौरे के दौरान अंतरिक्ष सहयोग, प्रत्यर्पण संधि, नाविकों के प्रशिक्षण, खाद्य सुरक्षा, विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता तथा बुनियादी ढांचे के विकास जैसे कई महत्वपूर्ण समझौते भी किए गए। भारत ने सेशेल्स को चावल और सीमेंट की आपूर्ति के साथ विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराया। इन पहलों से स्पष्ट है कि दोनों देश केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि व्यापक आर्थिक, रणनीतिक और विकासात्मक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका को और मजबूत करने के साथ भारत-सेशेल्स संबंधों को नई ऊंचाई देने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

  • रूस के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का संदेश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री बोले- भरोसा और आपसी समझ ही भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत

    रूस के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का संदेश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री बोले- भरोसा और आपसी समझ ही भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा देते हुए विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने रूसी फेडरेशन के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस अवसर पर उन्होंने रूस को राष्ट्रीय दिवस की शुभकामनाएं देते हुए दोनों देशों के बीच विकसित हुए मजबूत और भरोसेमंद संबंधों को वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बताया।

    समारोह को संबोधित करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत और रूस के संबंध केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसी साझेदारी है जिसने समय की हर परीक्षा में अपनी मजबूती साबित की है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच स्थापित विश्वास और परस्पर सम्मान ने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को निरंतर विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई है।

    उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत-रूस विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी और अधिक सुदृढ़ हुई है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच नियमित संवाद तथा उच्च स्तरीय यात्राओं ने संबंधों को नई दिशा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि एक-दूसरे की प्राथमिकताओं, हितों और संवेदनशीलताओं को समझने की क्षमता ही इस संबंध की सबसे बड़ी विशेषता है।

    विदेश सचिव ने वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चुनौतियों और तनावों के बीच भारत और रूस के संबंध संतुलन और सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश केवल अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में भी सकारात्मक योगदान दे रहे हैं।

    उन्होंने पिछले वर्ष आयोजित भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। इस दौरान कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण समझौतों और सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए। शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, समुद्री सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र, कौशल विकास और अकादमिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई गति मिली है।

    आर्थिक संबंधों पर चर्चा करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत और रूस के बीच व्यापारिक सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। लगातार दो वित्तीय वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार 60 अरब डॉलर से अधिक रहा है, जो दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की बढ़ती गहराई को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के नेताओं ने वर्ष 2030 तक व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि रक्षा सहयोग भारत-रूस संबंधों का महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है। इसके अलावा नागरिक परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग निरंतर आगे बढ़ रहा है। नई तकनीकों, नवाचार और औद्योगिक विकास के क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।

    विक्रम मिस्री ने कौशल आधारित मानव संसाधन सहयोग को भविष्य की बड़ी संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि भारत का विशाल पेशेवर और प्रशिक्षित कार्यबल रूस की बढ़ती कौशल आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही दोनों देश नए कनेक्टिविटी और परिवहन नेटवर्क विकसित करने की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं, जिससे व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को और गति मिलेगी।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पारंपरिक सहयोग के क्षेत्रों को और मजबूत करने तथा नए अवसरों की तलाश के माध्यम से भारत और रूस की साझेदारी आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक तथा प्रभावशाली बनेगी।

  • भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा साझेदारी को नई गति: इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक मजबूती के बड़े संकेत

    भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा साझेदारी को नई गति: इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक मजबूती के बड़े संकेत

    नई दिल्ली ।  में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने के उद्देश्य से उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, स्थिरता और रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने पर व्यापक सहमति जताई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ऑस्ट्रेलिया के उपप्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के बीच हुई इस वार्ता को बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में दोनों देशों के बढ़ते भरोसे और साझा हितों का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। बैठक में समुद्री सुरक्षा, संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा उद्योग में सहयोग, तकनीकी आदान-प्रदान और सह-विकास जैसे अहम विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई, जिससे भविष्य की रणनीतिक दिशा स्पष्ट होती दिखाई दी।

    बैठक के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऑस्ट्रेलिया की नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति का स्वागत करते हुए कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदार देशों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र वैश्विक व्यापार और सुरक्षा का केंद्र बन चुका है, ऐसे में इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि रक्षा उद्योग में सहयोग, तकनीकी नवाचार और संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं दोनों देशों के संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जा सकती हैं। राजनाथ सिंह ने विश्वास जताया कि आने वाले समय में यह साझेदारी केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यापक रणनीतिक और आर्थिक सहयोग में भी परिवर्तित होगी।

    दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया पहले से कहीं अधिक रणनीतिक रूप से एकजुट हैं और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बढ़ता विश्वास और नियमित संवाद इस साझेदारी को और अधिक स्थिर और प्रभावी बना रहा है। मार्ल्स ने यह भी स्पष्ट किया कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था और मुक्त नौवहन सुनिश्चित करना दोनों देशों की साझा प्राथमिकता है, जिसके लिए सहयोगात्मक प्रयासों को और गति दी जाएगी।

    बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने, संयुक्त अभ्यासों को विस्तार देने और रक्षा उपकरणों के सह-विकास को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक सहयोग के नए अवसरों पर भी विचार किया गया, जिससे आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता दोनों को मजबूती मिल सके।

    यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह बढ़ता सहयोग न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आने वाले समय में दोनों देशों की यह साझेदारी वैश्विक सुरक्षा ढांचे में एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरने की संभावना रखती है।

  • सिबी जॉर्ज ने माल्टा के डिप्टी पीएम से की बैठक, द्विपक्षीय और रक्षा सहयोग को नई दिशा

    सिबी जॉर्ज ने माल्टा के डिप्टी पीएम से की बैठक, द्विपक्षीय और रक्षा सहयोग को नई दिशा

    नई दिल्ली : भारत के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने शनिवार को यूरोपीय देश माल्टा के डिप्टी पीएम और विदेश मंत्री डॉ. इयान बोर्ग तथा सेना के वरिष्ठ अधिकारी ब्रिगेडियर क्लिंटन जे ओ’ नील से मुलाकात की। इस मुलाकात का मकसद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय और रक्षा संबंधों को और मजबूत करना था। विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस अहम बैठक की जानकारी साझा की और बताया कि बैठक में भारत और माल्टा के बीच साझेदारी को नई दिशा देने पर चर्चा हुई।

    सिबी जॉर्ज और माल्टा के उप प्रधानमंत्री इयान बोर्ग ने द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के उपायों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया। दोनों नेताओं ने अपनी रुचि के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा की और साझा दृष्टिकोण पर जोर दिया। बैठक में आर्थिक सहयोग, व्यापार और निवेश, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने के तरीकों पर विशेष ध्यान दिया गया।

    सेक्रेटरी (वेस्ट) ने माल्टा की सैन्य बल के कमांडर ब्रिगेडियर क्लिंटन जे ओ’ नील के साथ भी बैठक की, जिसमें रक्षा और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के उपायों पर विचार किया गया। दोनों पक्षों ने भारत और माल्टा के बीच सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और सामरिक साझेदारी को मजबूत करने के अवसरों पर चर्चा की।

    शुक्रवार से भारत और माल्टा के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने के उद्देश्य से विदेश कार्यालय परामर्श का चौथा दौर वैलेटा में शुरू हुआ। इस महत्वपूर्ण बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया और क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण को रेखांकित किया। वैलेटा में आयोजित बैठक की सह-अध्यक्षता विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज और माल्टा के विदेश मंत्रालय के स्थायी सचिव क्रिस्टोफर कुटाजार ने की।

    बैठक में व्यापार, निवेश, आईसीटी, स्वास्थ्य सेवा, नवीकरणीय ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, शिक्षा और समुद्री क्षेत्र समेत विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर व्यापक चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान को बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया। साथ ही भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते के संदर्भ में आर्थिक जुड़ाव को बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।

    बैठक में दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों के संपूर्ण दायरे की समीक्षा की और बहुपक्षीय मंचों पर निरंतर सहयोग बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। यह मुलाकात भारत और माल्टा के बीच रणनीतिक साझेदारी और सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    इस तरह की बैठकों से न केवल व्यापारिक और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा बल्कि रक्षा, सुरक्षा और वैश्विक मंचों पर आपसी समझ को भी मजबूती मिलेगी। दोनों पक्षों ने आगे भी नियमित बातचीत और संयुक्त पहल के जरिए द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प लिया।

  • ब्राजील बना भारत का 'सुपर पार्टनर': रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर एयरोस्पेस तक 9 बड़े समझौते, चीन के एकाधिकार पर मोदी का सीधा प्रहार!

    ब्राजील बना भारत का 'सुपर पार्टनर': रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर एयरोस्पेस तक 9 बड़े समझौते, चीन के एकाधिकार पर मोदी का सीधा प्रहार!


    नई दिल्ली ।दुनिया भर में ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ दुर्लभ खनिजों की प्रोसेसिंग और खनन पर लगभग 70% से 90% तक नियंत्रण रखने वाला चीन अब मुश्किल में पड़ सकता है। अपनी इस ताकत के दम पर समय-समय पर दुनिया को आंख दिखाने वाले चीन की हेकड़ी को शांत करने के लिए भारत ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला है। शनिवार को भारत और ब्राजील के बीच एक ऐसी ऐतिहासिक ट्रेड डील हुई है, जो न केवल चीन पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन के समीकरण को भी पूरी तरह बदल कर रख देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा के बीच हुई उच्च स्तरीय वार्ता के बाद दोनों देशों ने जरूरी मिनरल्स और स्टील सप्लाई चेन में सहयोग के लिए समझौतों पर मुहर लगा दी है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इस साझेदारी को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि ब्राजील के साथ हुए इस खनिज समझौते से चीन पर भारत की निर्भरता काफी हद तक कम होगी और यह एक मजबूत, सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। इस मुलाकात के दौरान भारत और ब्राजील ने साल 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब अमेरिकी डॉलर तक ले जाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी निर्धारित किया है। आपको बता दें कि 2006 में जहां यह व्यापार महज 2.4 अरब डॉलर था, वहीं अब यह 15 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन दोनों नेताओं का मानना है कि दोनों देशों की क्षमता इससे कहीं अधिक है।

    इस ऐतिहासिक अवसर पर कुल 9 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें सबसे प्रमुख है ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ के क्षेत्र में सहयोग और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए बनाई गई ‘डिजिटल साझेदारी’। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि ब्राजील के पास नायोबियम, लिथियम और लौह अयस्क जैसे बहुमूल्य खनिज संसाधनों का भंडार है, जबकि भारत के पास विश्व स्तरीय तकनीक और विनिर्माण क्षमता है। जब ये दोनों शक्तियां हाथ मिलाएंगी, तो दुनिया को एक वैकल्पिक और विश्वसनीय औद्योगिक पार्टनर मिलेगा।

    व्यापारिक मोर्चे पर भी बड़े कदम उठाए गए हैं। एनएमडीसी, वेल और अडानी गंगावरम पोर्ट के बीच करीब 500 मिलियन डॉलर की लागत से लौह अयस्क ब्लेंडिंग सुविधा स्थापित करने पर सहमति बनी है। इसके अलावा, एयरोस्पेस क्षेत्र में एक बड़ी सफलता तब मिली जब ब्राजील की दिग्गज कंपनी ‘एम्ब्रेयर’ और ‘अडानी डिफेंस’ ने भारत में ई175 रीजनल जेट की असेंबली लाइन स्थापित करने का फैसला किया। फार्मा क्षेत्र में भी कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं के संयुक्त शोध के लिए हाथ मिलाया गया है। साफ है कि भारत और ब्राजील की यह नई जुगलबंदी न केवल चीन के आर्थिक दबदबे को चुनौती दे रही है, बल्कि विकासशील देशों के हितों को वैश्विक मंच पर मजबूती से स्थापित भी कर रही है।

  • राष्ट्रपति भवन से हैदराबाद हाउस तक भारत ब्राजील रिश्तों को नई ऊंचाई देने की दिशा में निर्णायक वार्ता

    राष्ट्रपति भवन से हैदराबाद हाउस तक भारत ब्राजील रिश्तों को नई ऊंचाई देने की दिशा में निर्णायक वार्ता


    नई दिल्ली का पारा शनिवार को कूटनीतिक गर्मी से चढ़ा रहा जब भारत और ब्राजील के प्रगाढ़ संबंधों के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डी सिल्वा का राष्ट्रपति भवन के भव्य प्रांगण में पूरे राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया गया। इस औपचारिक समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति लूला का गर्मजोशी से अभिनंदन किया। राष्ट्रपति भवन में दी गई ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ और पारंपरिक औपचारिकताओं के बीच दोनों देशों के झंडे एक साथ लहराते हुए ग्लोबल साउथ की दो महाशक्तियों की अटूट मित्रता की गवाही दे रहे थे।

    औपचारिक स्वागत के बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति लूला दिल्ली के ऐतिहासिक हैदराबाद हाउस पहुंचे जहाँ दोनों नेताओं के बीच एक उच्च स्तरीय द्विपक्षीय वार्ता का दौर शुरू हुआ। इस बैठक के केंद्र में व्यापार निवेश रक्षा ऊर्जा और कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र रहे। विशेष रूप से ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ में राष्ट्रपति लूला की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देश केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहते बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भविष्य की डिजिटल तकनीकों में भी एक-दूसरे का हाथ थामने को तैयार हैं।

    राष्ट्रपति लूला की यह पांच दिवसीय18-22 फरवरी यात्रा केवल औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है। उनके साथ ब्राजील के 14 कद्दावर मंत्रियों और शीर्ष कंपनियों के सीईओ का एक विशाल प्रतिनिधिमंडल भारत आया है। यह दर्शाता है कि ब्राजील भारत के विशाल बाजार और बढ़ती आर्थिक ताकत को कितनी गंभीरता से ले रहा है। द्विपक्षीय वार्ता के अलावा दोनों देशों के बीच व्यापारिक संभावनाओं को तलाशने के लिए एक विशेष ‘बिजनेस फोरम’ का भी आयोजन किया जा रहा है जो आने वाले समय में निवेश के नए द्वार खोलेगा।

    इससे पहले भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी राष्ट्रपति लूला और ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा से मुलाकात कर कूटनीतिक जमीन तैयार की। जयशंकर ने भरोसा जताया कि यह यात्रा ‘ग्लोबल गवर्नेंस’ और बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देशों की साझा आवाज को और बुलंद करेगी। राष्ट्रपति लूला की यह छठी भारत यात्रा न केवल उनके व्यक्तिगत लगाव को दर्शाती है बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि नई वैश्विक व्यवस्था में भारत और ब्राजील की रणनीतिक साझेदारी अब एक अपरिहार्य शक्ति बन चुकी है।