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  • स्ट्रे डॉग्स विवाद पर गरमाई बहस, सोनम बाजवा ने उठाई संवेदनशील समाधान की मांग

    स्ट्रे डॉग्स विवाद पर गरमाई बहस, सोनम बाजवा ने उठाई संवेदनशील समाधान की मांग


    नई दिल्ली। देश में स्ट्रे डॉग्स को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है, जहां सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। इसी मुद्दे पर अभिनेत्री सोनम बाजवा ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से अपील करते हुए बेजुबान जानवरों के लिए उचित व्यवस्था और शेल्टर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि समस्या का समाधान केवल हटाने से नहीं बल्कि एक व्यवस्थित और मानवीय दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।

    सोनम बाजवा ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गलत तरीके से समझा जा रहा है। उनके अनुसार अदालत ने स्ट्रे डॉग्स को पूरी तरह हटाने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल, वैक्सीनेशन और शेल्टरिंग जैसे उपायों के जरिए समस्या के समाधान की बात कही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली सवाल यह है कि आखिर इन जानवरों के लिए पर्याप्त शेल्टर और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर कहां है।

    अभिनेत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ दया और जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जाए और ऐसा समाधान निकाला जाए जो मानव और पशु दोनों के हित में हो।

    उन्होंने सुझाव दिया कि इस विषय पर पशु कल्याण से जुड़े विशेषज्ञों, एनजीओ, पशु चिकित्सकों और प्रशासनिक अधिकारियों को एक साथ बैठाकर एक व्यावहारिक योजना तैयार की जानी चाहिए। उनके अनुसार केवल सख्त कदम उठाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता, बल्कि एक व्यवस्थित नीति और मजबूत ढांचे की जरूरत है।

    यह मुद्दा उस समय और अधिक चर्चा में आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने स्ट्रे डॉग्स से जुड़े मामलों में राज्य सरकारों को एबीसी कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि कई क्षेत्रों में इस कार्यक्रम के सही तरीके से लागू न होने के कारण समस्या लगातार बढ़ रही है और इससे सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर चिंता भी बढ़ी है।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कई राज्यों में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है, जहां एक तरफ सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात हो रही है तो दूसरी तरफ पशु अधिकारों और उनके संरक्षण की मांग भी उठ रही है। सोनम बाजवा की यह अपील इसी बहस को एक नया दृष्टिकोण देती है, जिसमें समाधान को केवल नियंत्रण तक सीमित न रखकर एक संवेदनशील और व्यवस्थित नीति की जरूरत पर जोर दिया गया है।

  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: कैंपस में आवारा कुत्तों की अनुमति जिम्मेदारी और शर्तों के साथ ही संभव

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: कैंपस में आवारा कुत्तों की अनुमति जिम्मेदारी और शर्तों के साथ ही संभव


    नई दिल्ली ।  देश में आवारा कुत्तों को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए शैक्षणिक संस्थानों में उनकी उपस्थिति पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में कॉलेज कैंपसों में आवारा कुत्तों को रखने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन यह सुविधा बिना जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही के नहीं दी जाएगी। इस फैसले को लेकर शिक्षा और पशु कल्याण से जुड़े वर्गों में नई चर्चा शुरू हो गई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शैक्षणिक परिसर में यदि छात्र संगठन या पशु कल्याण से जुड़े समूह आवारा कुत्तों को रखने या उनकी देखभाल करने की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें पहले संस्थान के प्रमुख के समक्ष लिखित रूप में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। इस शर्त का पालन अनिवार्य होगा और इसके बिना किसी भी प्रकार की अनुमति मान्य नहीं मानी जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि परिसर में किसी भी प्रकार की कुत्तों से जुड़ी घटना होती है, चाहे वह काटने की हो या किसी अन्य प्रकार की क्षति की, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित समूहों पर होगी।

    अदालत ने अपने विचार में यह भी स्पष्ट किया कि पशु कल्याण के प्रयासों को मानव सुरक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। शिक्षा संस्थानों का प्राथमिक उद्देश्य सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है, जहां छात्र बिना किसी खतरे के अध्ययन कर सकें। इसलिए किसी भी नीति या व्यवस्था में मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अनिवार्य है।

    इस निर्णय में यह भी कहा गया कि यदि परिसर में आवारा कुत्तों को भोजन देने या उनकी देखभाल की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित और जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। बिना निगरानी या अनियंत्रित तरीके से ऐसी गतिविधियाँ स्वीकार नहीं की जाएंगी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर जानवरों के प्रबंधन को लेकर नियमों का पालन बेहद जरूरी है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटनाओं को रोका जा सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह रुख भी दोहराया कि देशभर में कुत्ता काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं के साथ हुई घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी। इसी कारण शैक्षणिक परिसरों में किसी भी नीति को लागू करते समय सुरक्षा मानकों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।

    इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कॉलेज या विश्वविद्यालय परिसर में आवारा कुत्तों की मौजूदगी अब पूरी तरह अनियंत्रित नहीं हो सकती। यदि कोई समूह या संगठन इस दिशा में काम करना चाहता है, तो उसे न केवल प्रशासनिक अनुमति लेनी होगी, बल्कि सभी कानूनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करना होगा।

    कुल मिलाकर, यह निर्णय पशु कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें स्पष्ट संदेश दिया गया है कि संवेदनशील मुद्दों पर भावनाओं के साथ-साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

  • डर के बिना जीने का अधिकार सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट का आवारा कुत्तों पर सख़्त फैसला, राज्यों को सख़्त चेतावनी

    डर के बिना जीने का अधिकार सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट का आवारा कुत्तों पर सख़्त फैसला, राज्यों को सख़्त चेतावनी



    नई‍ दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़ी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि नागरिकों को बिना डर के जीने का अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों, बुजुर्गों और आम लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है और राज्य सरकारें इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।

    मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ ने अपने पहले के निर्देशों में बदलाव की मांग ठुकरा दी। कोर्ट ने 2025 के अपने पुराने आदेश को दोहराते हुए कहा कि अस्पतालों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थानों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को नसबंदी या टीकाकरण के बाद वापस नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उन्हें शेल्टर होम में रखा जाएगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के समय में बच्चों, बुजुर्गों और यहां तक कि विदेशी यात्रियों पर कुत्तों के हमले की घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। अदालत ने यह भी माना कि कई जगहों पर प्रशासन की लापरवाही के कारण यह समस्या लगातार बढ़ रही है।

    अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि “गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमले के डर के बिना जीवन जी सके।” साथ ही अदालत ने चेतावनी दी कि आदेशों का पालन न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

    इससे पहले 2025 के आदेश में भी सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि हाईवे, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक परिसरों से आवारा कुत्तों और मवेशियों को हटाया जाए और ऐसे स्थानों की उचित बाड़बंदी की जाए।

    अदालत के इस ताज़ा रुख के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है, और अब राज्यों पर इन निर्देशों को सख्ती से लागू करने का दबाव बढ़ गया है।

  • सार्वजनिक सुरक्षा पर सख्ती: स्कूल, अस्पताल और स्टेशनों से हटेंगे आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    सार्वजनिक सुरक्षा पर सख्ती: स्कूल, अस्पताल और स्टेशनों से हटेंगे आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    नई दिल्ली । देश में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों और डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस विषय में किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जा सकती। इसी क्रम में अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है जिनमें पहले दिए गए आदेश में बदलाव की मांग की गई थी, जिसमें सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश शामिल था। अदालत ने यह भी दोहराया कि डॉग बाइट जैसी घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि ये आम नागरिकों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं।

    सुनवाई के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि कई सार्वजनिक संस्थानों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। अदालत ने यह माना कि इन स्थानों पर सुरक्षा और स्वच्छता दोनों ही प्रभावित होते हैं और ऐसे माहौल में लोगों का आना-जाना जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण से पहले दिए गए निर्देशों को बनाए रखने पर जोर दिया गया है, जिसमें इन क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें दोबारा वहीं न छोड़े जाने की बात शामिल है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी टिप्पणी की कि देश में पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल का क्रियान्वयन कई जगहों पर असमान और कमजोर है। कहीं संसाधनों की कमी है तो कहीं व्यवस्था सही तरीके से लागू नहीं हो पा रही है। इस कारण आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा, जिसका सीधा असर सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ रहा है।

    अदालत ने राज्यों और संबंधित एजेंसियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि यदि समय रहते इन नियमों का प्रभावी पालन किया गया होता तो आज यह स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। कोर्ट ने यह भी माना कि समस्या केवल आदेश देने से हल नहीं होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्यान्वयन और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।

    इस फैसले के बाद सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए जाने की संभावना बढ़ गई है। स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अब प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत होगी ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। अदालत का यह रुख स्पष्ट संकेत देता है कि जन सुरक्षा से जुड़े मामलों में अब किसी भी प्रकार की लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जाएगा और व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर रहेगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को दिया अल्टीमेटम: हर 50 किलोमीटर पर गौशाला बनाएं, आवारा जानवरों के लिए CSR से समाधान जरूरी

    सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को दिया अल्टीमेटम: हर 50 किलोमीटर पर गौशाला बनाएं, आवारा जानवरों के लिए CSR से समाधान जरूरी


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को गुरुवार को निर्देश दिया कि वह सड़क निर्माण में लगे ठेकेदारों से राजमार्गों पर आवारा जानवरों की देखभाल के लिए CSR के तहत गौशाला/पशु आश्रय बनाने पर विचार करने को कहे। अदालत ने कहा कि लगभग हर 50 किलोमीटर के बाद ऐसे आश्रय बनाकर आवारा पशुओं को संरक्षित किया जा सकता है।

    न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आवारा कुत्तों के स्थानांतरण और बधियाकरण संबंधी 7 नवंबर, 2025 के आदेश में संशोधन की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

    पंजाब, राजस्थान, यूपी और तमिलनाडु पर कोर्ट ने जताया असंतोष
    सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों के निर्देशों के अनुपालन पर असंतोष जताया। कोर्ट ने पंजाब सरकार के दैनिक 100 कुत्तों के बधियाकरण प्रयास को अपर्याप्त बताते हुए इसे “ऊंट के मुंह में जीरे” जैसा बताया।

    NHAI से ऐप बनाने का निर्देश
    कोर्ट ने NHAI से कहा कि वह एक ऐप विकसित करे, जिसमें लोग राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा जानवरों को देखने पर तुरंत सूचना दे सकें। इससे सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिलेगी।

    राज्यों की रिपोर्टों पर कोर्ट ने उठाए सवाल
    NHAI ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर 1300 से अधिक संवेदनशील स्थान हैं। कुछ राज्यों ने कदम उठाए हैं, लेकिन महाराष्ट्र, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों ने अभी तक समस्या के समाधान के लिए ठोस कार्रवाई नहीं की।

    राजस्थान ने कहा कि राज्य में बधियाकरण केंद्र बनाए गए हैं और संस्थानों के आसपास बाड़बंदी की गई है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि केवल 45 वैन से यह काम संभव नहीं है।

    कोर्ट ने दी चेतावनी: समस्या बढ़ती जाएगी
    पीठ ने कहा कि यदि अभी कार्रवाई नहीं हुई तो आवारा कुत्तों की संख्या हर साल 10-15% तक बढ़ेगी। कोर्ट ने कहा कि 100 कुत्तों का रोज़ाना बधियाकरण कोई समाधान नहीं है।

    AWBI के पास 250+ आवेदन लंबित, कोर्ट ने फटकार लगाई
    भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) ने बताया कि 7 नवंबर के आदेश के बाद 250 से अधिक बधियाकरण केंद्र और आश्रय खोलने के आवेदन आए हैं, लेकिन कई आवेदन पर अभी भी निर्णय नहीं लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने AWBI से कहा कि वे जल्दी से जल्दी निर्णय लें।

    कोर्ट ने राज्यों को दिया चेतावनी संकेत
    सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को कहा था कि यदि कुत्ते के काटने की घटनाएं बढ़ती हैं तो राज्यों को भारी हर्जाना देना होगा और कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।
    सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं की समस्या पर सख्त रुख अपनाया है और NHAI को CSR के जरिए गौशाला बनाने, ऐप बनाने और ठेकेदारों को जिम्मेदार बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राज्यों को चेतावनी दी है कि यदि वे निर्देशों का पालन नहीं करेंगे तो कानूनी कार्रवाई और भारी जुर्माना हो सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को निर्देश दिया: 50 किलोमीटर के बाद गौशाला बनाएं, आवारा पशुओं की देखभाल CSR से हो

    सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को निर्देश दिया: 50 किलोमीटर के बाद गौशाला बनाएं, आवारा पशुओं की देखभाल CSR से हो


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) से कहा है कि सड़क निर्माण में लगे ठेकेदारों को आवारा जानवरों की समस्या से निपटने के लिए CSR (कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) के तहत गौशाला/पशु आश्रय बनाने के निर्देश दिए जाएं। कोर्ट ने कहा कि हर 50 किलोमीटर के बाद ऐसे आश्रय बनाकर आवारा पशुओं की देखभाल सुनिश्चित की जा सकती है। कोर्ट ने कई राज्यों पर जताया असंतोष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के निर्देशों के पालन पर नाराजगी जताई।
    कोर्ट ने विशेषकर पंजाब सरकार के दैनिक 100 कुत्तों के बधियाकरण प्रयास को अपर्याप्त बताया और इसे “ऊंट के मुंह में जीरे” जैसा बताया। NHAI को ऐप बनाने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने NHAI से कहा कि वह एक ऐप विकसित करे, जिसमें आम लोग राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा जानवरों को देखने पर सूचना (report) कर सकें।
    इससे तुरंत कार्रवाई संभव होगी और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। राज्यों की रिपोर्ट पर कोर्ट ने उठाए सवाल राजस्थान सरकार ने कहा कि उन्होंने बधियाकरण केंद्र बनाए हैं और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास बाड़बंदी की गई है, लेकिन कोर्ट ने इस पर भी संदेह जताया कि केवल 45 वैन से कैसे काम चलेगा।
    न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि जयपुर के लिए ही लगभग 20 वैन की जरूरत होगी और विभिन्न शहरों में वैन की संख्या बढ़ानी होगी। कोर्ट का सख्त संदेश: समस्या बढ़ती जा रही है पीठ ने चेतावनी दी कि अगर आवारा कुत्तों की समस्या पर तुरंत नियंत्रण नहीं हुआ तो हर साल उनकी संख्या 10-15% बढ़ती जाएगी। कोर्ट ने कहा कि 100 कुत्तों का बधियाकरण रोज़ाना कोई बड़ी मदद नहीं है।
    AWBI की स्थिति: 250 से अधिक आवेदन लंबित भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) ने बताया कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 250 से अधिक बधियाकरण केंद्र और आश्रय खोलने के लिए आवेदन आए, लेकिन अभी तक कई आवेदन पर कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने AWBI से कहा कि वे अभ्यर्थियों के आवेदन को जल्द निर्णय दें। कोर्ट ने राज्यों को दिया चेतावनी का संकेत सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को कहा था कि यदि कुत्ते के काटने की घटनाओं में वृद्धि होती है तो राज्यों को भारी हर्जाना देना होगा और कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।
    सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को आवारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए हैंगौशाला, ऐप, CSR के तहत पहलऔर राज्यों को चेतावनी दी है कि इस समस्या को हल न किया गया तो कानूनी कार्रवाई और भारी जुर्माना हो सकता है।
  • ग्वालियर में स्ट्रीट डॉग का तांडव, कोचिंग जा रहे मासूम पर हमला, 10 दिन में 872 लोग डॉग बाइट के शिकार

    ग्वालियर में स्ट्रीट डॉग का तांडव, कोचिंग जा रहे मासूम पर हमला, 10 दिन में 872 लोग डॉग बाइट के शिकार


    ग्वालियर । ग्वालियर में शनिवार सुबह कोचिंग जा रहे आठ वर्षीय मासूम अहिम पर अचानक एक स्ट्रीट डॉग ने हमला कर दिया। बच्चे की जांघ को जबड़े में दबाकर कुत्ते ने सड़क पर घसीटना शुरू किया। आसपास के लोग और राहगीर तुरंत मौके पर पहुंचे और बच्चे को डॉग के चंगुल से छुड़ाया। घायल मासूम को तुरंत जेएएच अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसकी जांघ पर टांके लगाए।

    घटना माधौगंज थाना क्षेत्र के लक्कड़खाना नाले के पास हुई। बच्चे के पिता दीन मोहम्मद ने बताया कि हमला करने वाला कुत्ता मानसिक रूप से अस्वस्थ है और लंबे समय से इलाके में घूम रहा है। इसके झुंड ने पहले भी कई लोगों पर हमला किया, लेकिन नगर निगम से शिकायत के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

    अहिम पर हमला इतने अचानक हुआ कि बच्चे को कोई तैयारी नहीं थी। कुत्ते ने उसकी जांघ को जबड़े में दबाकर सड़क पर घसीटा। मौके पर पहुंचे लोगों ने कुत्ते को भगाया और बच्चे को सुरक्षित किया। अब अहिम गहरे सदमे और डर में है।

    ग्वालियर में डॉग बाइट का डर:
    पिछले कुछ दिनों में शहर में आवारा कुत्तों का आतंक बढ़ गया है। सिर्फ 1 जनवरी से 10 जनवरी 2026 तक 872 लोग कुत्तों के काटने का शिकार हो चुके हैं। आंकड़े बताते हैं कि बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों सभी को डॉग बाइट की घटनाओं में शामिल किया गया।

    जयारोग्य अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, जनवरी 2024 से दिसंबर 2024 तक 18,993, जबकि 2025 में 8,606 डॉग बाइट के मामले सामने आए। इस तरह केवल दो साल में कुल 27,593 लोग कुत्तों के काटने से प्रभावित हुए।

    नगर निगम का कहना है कि रोजाना करीब 40 कुत्ते पकड़े जाते हैं और 25 कुत्तों की नसबंदी की जाती है। शहर में केवल एक एबीसी सेंटर है, जो बिरला नगर पुल के नीचे संचालित होता है। इसके बावजूद आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रण से बाहर है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खतरनाक स्थिति है। शहर के गलियों, मोहल्लों और चौराहों तक डॉग बाइट का डर आम हो गया है।

    नगर निगम से जनता की मांग है कि आवारा कुत्तों की संख्या कम करने और नसबंदी पर विशेष ध्यान दिया जाए।

    ग्वालियर में इस तरह की घटनाएं आवारा कुत्तों के असंगठित झुंडों की वजह से लगातार बढ़ रही हैं। इस घटना ने एक बार फिर नगर निगम की सुरक्षा व्यवस्था और सक्रियता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन समय रहते प्रभावी कदम उठाएगा और शहरवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
    यह घटना बच्चों की सुरक्षा, नगर निगम की जवाबदेही और आवारा कुत्तों के नियंत्रण की आवश्यकता को उजागर करती है। ग्वालियरवासियों की चिंता बढ़ती जा रही है, और समय रहते कदम न उठाए जाने पर हालात और गंभीर हो सकते हैं।

  • राष्ट्रपति के 14 सवालों पर चर्चा.. अरावली से लेकर आवारा कुत्ते तक… 2025 में SC ऐतिहासिक फैसले

    राष्ट्रपति के 14 सवालों पर चर्चा.. अरावली से लेकर आवारा कुत्ते तक… 2025 में SC ऐतिहासिक फैसले


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के कुछ ऐतिहासिक फैसलों (Historic decisions) के साथ 2025 का अंत होने जा रहा है। इन फैसलों में अरावली की परिभाषा (Definition of Aravalli) तय करने से लेकर आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां, निठारी कांड में चौंकाने वाला फैसला, राष्ट्रपति के 14 सवालों पर बेहद जरूरी चर्चा के अलावा बहुत कुछ शामिल है।

    दूसरी ओर विधि मंत्रालय ने लगभग 50 पुराने कानूनों को इतिहास के पन्नों में समेट दिया, जिससे रोजमर्रा का कानूनी प्रशासन और सरल और जन-केंद्रित बन गया। मंत्रालय ने वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों (एडीआर) को तेज करके लंबित मामलों को कम करने के लिए भी सराहनीय कोशिशें कीं। मंत्रालय ने इस साल न्यायपालिका के प्रति उदार रुख अपनाते हुए खुद सरकार द्वारा दायर किए गए बड़ी संख्या में लंबित मामलों को वापस ले लिया। ज्ञात हो कि अदालतों में सरकार सबसे बड़ी वादी है।


    राष्ट्रपति के अहम सवाल

    कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका का एक पेचीदा मामला भी इस साल उच्चतम न्यायालय के सामने आया। इसमें मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सुप्रीम कोर्ट किसी राज्यपाल को किसी विधेयक (बिल) पर निर्णय लेने का आदेश दे सकती है, जिसे राज्यपाल ने अपने विवेक से रोक कर रखा हो। इस मामले में अनुच्छेद 200 और 201 पर ‘राष्ट्रपति संदर्भ’ के माध्यम से भी राय मांगी गई थी। राष्ट्रपति यह जानना चाहते थीं कि क्या अदालतें राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिये विधेयक पर अपनी सहमति देने की समय-सीमा तय कर सकती हैं। SC ने फैसला सुनाया कि संवैधानिक अधिकारियों को उचित रूप से कार्य करना चाहिए, लेकिन अदालतें उन पर समय-सीमा नहीं थोप सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि ने यह भी कहा कि राज्यपाल के पास ‘पूर्ण वीटो’ की शक्ति नहीं है और वे अनिश्चितकाल तक विधेयकों को रोक कर नहीं रख सकते। यह फैसला शक्तियों के पृथक्करण और संवैधानिक संतुलन की पुष्टि करता है।


    जब दिल्लीवासी थे परेशान..

    प्रदूषण की मार झेल रहे दिल्लीवासियों की नाराजगी और बेबसी के बीच, चौतरफा आलोचनाओं का सामना कर रही दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि बीएस-4 से पुराने वाहनों पर की जाने वाली कार्रवाई पर लगी रोक हटायी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी। वहीं इसी तरह के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से परहेज किया, लेकिन दिवाली पर निर्धारित घंटों के दौरान प्रमाणित ‘ग्रीन पटाखों’ के सीमित उपयोग की अनुमति दी।


    निठारी कांड में नया मोड़

    कुख्यात निठारी कांड में एक और नया मोड़ आया जब SC ने मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को हत्या और कथित तौर पर बच्चों का मांस खाने के आरोप के मामले में किसी विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। इससे पहले सह-आरोपी मोनिंदर पंढेर को भी बरी कर दिया गया था।


    आवारा कुत्तों पर क्या बोला SC?

    आवारा कुत्तों के काटने और हमले के शिकार पीड़ितों के परिवारों और पशु प्रेमियों के बीच चल रही कानूनी जंग भी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। SC ने स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले आवारा कुत्तों के हमलों पर चिंता जताई। कोर्ट ने आवारा कुत्तों को शिविरों में स्थानांतरित करने के साथ-साथ उनके नसबंदी और टीकाकरण के निर्देश दिए। जब न्यायालय ने पशु प्रेमियों से पूछा कि अगर वे इतने चिंतित हैं तो वे इन कुत्तों को गोद क्यों नहीं ले लेते, तो पशु प्रेमी रक्षात्मक मुद्रा में नजर आए।


    वक्फ मामला पहुंचा SC

    वक्फ बोर्ड से संबंधित मामले में, वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें धार्मिक बंदोबस्ती पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण का आरोप लगाया गया था। SC ने अधिनियम के कुछ चुनिंदा प्रावधानों पर रोक लगा दी, जबकि शेष अधिनियम को बहाल कर दिया।


    अरावली पर हुआ खूब विवाद

    अरावली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणविदों की उस चिंता पर ध्यान दिया जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकार ने चतुराई से नियमों में बदलाव किया है ताकि खनन कंपनियां इस पर्वत श्रृंखला में खनन कर सकें। SC ने अपने पुराने आदेश को पलट दिया जिसमें पिछली समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था और इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को वैसी पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता नहीं है जैसी उच्च पहाड़ियों को है। कोर्ट ने इस विषय पर विशेषज्ञों की अपनी एक नयी समिति बनाने का निर्देश दिया है।