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  • अनुराग कश्यप का गुस्सा बना ‘गुलाल’, 8 साल की मेहनत के बाद बनी कल्ट फिल्म..

    अनुराग कश्यप का गुस्सा बना ‘गुलाल’, 8 साल की मेहनत के बाद बनी कल्ट फिल्म..


    नई दिल्ली: बॉलीवुड के ऑफ-बीट और बोल्ड निर्देशक अनुराग कश्यप हमेशा अपनी कहानियों के लिए चर्चित रहे हैं। लेकिन उनकी एक खास फिल्म ऐसी है जो उनके जीवन के गुस्से और समाज में व्याप्त असमानताओं का नतीजा बनी। यह फिल्म है गुलाल जिसे बनाने में पूरे 8 साल लगे और यह आज भी दर्शकों की पसंदीदा फिल्मों में शामिल है।

    गुलाल की कहानी की शुरुआत हुई साल 2001 में। उस वक्त अनुराग कश्यप जीवन के ऐसे पड़ाव पर थे जब उन्हें हर चीज़ पर गुस्सा आता था। उन्होंने कहा कि उस साल सेंसर बोर्ड ने उनकी फिल्म को पांच सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था और उन्हें महसूस हुआ कि वे हर चीज़ से नाराज हैं-चाहे वह नए राज्य बनना हो या प्यार में पड़ने की घटनाएं। इसी गुस्से और असंतोष ने उन्हें गुलाल बनाने की प्रेरणा दी।फिल्म की कहानी उन्हें तब मिली जब अभिनेता पंकज सारस्वत ने उन्हें राजा चौधरी से मिलवाया। राजा ने कॉलेज पॉलिटिक्स पर लिखी एक कहानी साझा की जिसे अनुराग ने पृष्ठभूमि देने का निर्णय लिया। इसके लिए वे जयपुर गए और वहां कई राजपरिवारों के सदस्यों से मुलाकात की। इन मुलाकातों ने फिल्म की कहानी को वास्तविकता और इतिहास से जोड़ने में मदद की।

    गुलाल की रिसर्च में अनुराग कश्यप ने इतिहासकार शारदा द्विवेदी रोमिला थापर और कई अन्य लेखकों के लेख पढ़े। उन्होंने भारत गणराज्य में राजपूतों की भूमिका और पटियाला रिपोर्ट जैसी ऐतिहासिक जानकारियों को फिल्म की कहानी में समाहित किया। इस तरह फिल्म की पटकथा तैयार हुई।फिल्म का संगीत भी खास रहा। जब अनुराग कश्यप फिल्म लिख रहे थे तब पीयूष मिश्रा ने संगीत की दुनिया में अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने फिल्म के लिए ऐसे गाने लिखे जो आज भी याद किए जाते हैं। शुरुआत में प्रोड्यूसर नहीं मिलने की वजह से फिल्म का निर्माण अटक गया लेकिन बाद में जी मोशन पिक्चर्स ने फिल्म को उठाया और आखिरकार यह रिलीज हो सकी।

    गुलाल बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही लेकिन इसके बावजूद इसने दर्शकों के बीच कल्ट फिल्म का दर्जा पा लिया। इसकी कहानी राजनीति और संगीत आज भी फिल्म प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। IMDb पर इस फिल्म को 8 रेटिंग मिली है जो इसे और भी खास बनाती है।गुलाल सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि अनुराग कश्यप के गुस्से शोध और जुनून का परिणाम है। 8 साल की मेहनत और सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर तीव्र नजर ने इसे भारतीय सिनेमा की यादगार फिल्मों में शामिल कर दिया।

  • JNU नारेबाजी पर उमर खालिद के पिता का बड़ा हमला: बोले-विरोध अब अपराध बन गया, कन्हैया कुमार राजनीतिक दबाव में चुप

    JNU नारेबाजी पर उमर खालिद के पिता का बड़ा हमला: बोले-विरोध अब अपराध बन गया, कन्हैया कुमार राजनीतिक दबाव में चुप


    नई दिल्ली।  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हाल ही में हुई नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन को लेकर उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मौजूदा हालात पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश में अब विरोध करना अपराध बनता जा रहा है, जबकि गंभीर अपराधों के दोषियों को आसानी से जमानत मिल जाती है। उनका कहना है कि यह स्थिति लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए बेहद चिंताजनक है।
    सैयद कासिम रसूल इलियास ने बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि उमर खालिद और शरजील इमाम को मिली जमानत के खिलाफ कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था। इस दौरान कुछ नारे जरूर लगाए गए, लेकिन कोई आधिकारिक बयान या भड़काऊ भाषण नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, “यह विरोध न तो हिंसक था और न ही किसी कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने वाला, फिर भी एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट तैयार कर दी गई। यह दर्शाता है कि असहमति को दबाने का एक चलन बन चुका है।”

    उमर खालिद के पिता ने आरोप लगाया कि उनके बेटे के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं होने के बावजूद उसे लंबे समय तक जेल में रखा गया।

    उन्होंने कहा कि दंगों के समय उमर खालिद की मौजूदगी तक साबित नहीं हो पाई, इसके बावजूद उसे जमानत नहीं दी गई, जबकि उसी एफआईआर में नामजद कुछ अन्य आरोपियों को राहत मिल चुकी है। उन्होंने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दिया और कहा कि यह सब एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।

    कासिम रसूल इलियास ने इस पूरे मामले में कन्हैया कुमार का जिक्र करते हुए भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि कन्हैया कुमार और उमर खालिद दोनों जेएनयू में सहपाठी रहे हैं और 2016 के मामले में दोनों को आरोपी बनाया गया था। इसके बावजूद कन्हैया कुमार इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं।

    उन्होंने कहा, “कन्हैया कुमार अब एक राजनेता हैं और किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। पार्टी और राजनीति से जुड़े दबावों के कारण वे उमर खालिद के मुद्दे पर सवाल उठाने से पीछे हट रहे हैं। यह स्थिति अजीब जरूर है, लेकिन उनकी राजनीतिक मजबूरियां उनके पैरों में बेड़ियों की तरह हैं।”

    सैयद कासिम का मानना है कि मौजूदा दौर में छात्रों और युवा वर्ग के लिए शांतिपूर्ण विरोध करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि जब देश में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपी भी जमानत पा जाते हैं, तो केवल नारे लगाने या विरोध दर्ज कराने वालों को निशाना बनाना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

    उन्होंने आगे कहा कि राजनीति और निजी स्वार्थों के चलते असल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है। यदि राजनीतिक हस्तक्षेप न हो, तो उमर खालिद जैसे मामलों में निष्पक्ष और त्वरित न्याय संभव हो सकता है। उनके अनुसार, प्रशासन और न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर काम करना चाहिए।

    सैयद कासिम रसूल इलियास ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में विरोध और असहमति की आवाज़ को दबाना समाज के लिए खतरनाक संकेत है।

    उन्होंने उम्मीद जताई कि समाज, न्यायपालिका और संस्थाएं मिलकर यह सुनिश्चित करेंगी कि छात्रों और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

    इस बयान से साफ है कि उमर खालिद के परिवार के लिए न्याय की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उनके पिता का मानना है कि न्याय और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, और यदि इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंच सकती है।