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  • NEET पेपर लीक पर मध्य प्रदेश में आक्रोश 20 जिलों में प्रदर्शन इंदौर से उठी सबसे बुलंद आवाज

    NEET पेपर लीक पर मध्य प्रदेश में आक्रोश 20 जिलों में प्रदर्शन इंदौर से उठी सबसे बुलंद आवाज


    भोपाल । NEET पेपर लीक और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में मध्य प्रदेश के 20 से अधिक जिलों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। सबसे बड़ा आंदोलन इंदौर के टंट्या भील चौराहे पर चल रहा है, जहां 30 जून को सिर्फ 5 छात्रों से शुरू हुआ धरना अब हजारों लोगों का आंदोलन बन चुका है।

    इंदौर में शनिवार को एक छात्रा नीम की पत्तियां लेकर प्रदर्शन में पहुंची। उसने कहा कि जिस तरह नीम बैक्टीरिया खत्म करती है, उसी तरह शिक्षा व्यवस्था में फैली गड़बड़ियों को भी साफ करने की जरूरत है। लगातार बारिश के बावजूद छात्र पिछले 25 दिनों से धरने पर डटे हुए हैं। आंदोलन स्थल पर पुलिस ड्रोन से निगरानी कर रही है।

    भोपाल के बोर्ड ऑफिस चौराहे पर भी छात्रों का धरना जारी है। प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।

    ग्वालियर में आंदोलन को लेकर समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए, जबकि जबलपुर में “कॉकरोच जनता पार्टी” के विरोध में “लाल हिट जनता पार्टी” ने प्रदर्शन किया। संगठन ने कहा कि छात्रों की मांगें उचित हैं, लेकिन विरोध का तरीका सही नहीं है।

    धार, मऊगंज, नर्मदापुरम, झाबुआ, सिंगरौली, भिंड, टीकमगढ़, शाजापुर, सतना, सीधी, रतलाम, रीवा, बैतूल, उमरिया, बड़वानी और श्योपुर सहित कई जिलों में भी रैलियां, धरने और ज्ञापन सौंपे गए। कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुई तथा कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।

    प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में NEET पेपर लीक की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग शामिल है। वहीं, विभिन्न छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी आंदोलन को अपना समर्थन दिया है, जिससे यह विरोध अब राज्यव्यापी रूप ले चुका है।

  • छात्रों के मुद्दे पर सियासी संग्राम राहुल गांधी की रिहाई के बाद सरकार पर बड़ा हमला शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज

    छात्रों के मुद्दे पर सियासी संग्राम राहुल गांधी की रिहाई के बाद सरकार पर बड़ा हमला शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज


    नई दिल्ली । देश की राजधानी दिल्ली में छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर मंगलवार को राजनीतिक माहौल बेहद गरम रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी प्रियंका गांधी सहित कई सांसदों और नेताओं को हिरासत में लिया। कुछ घंटों बाद सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया जिसके बाद विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया और संसद में इस मुद्दे पर तत्काल चर्चा कराने की मांग दोहराई।

    रिहाई के बाद राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने सुबह लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर छात्रों के साथ हुई घटना पर संसद में चर्चा कराने का अनुरोध किया था। उनके अनुसार अध्यक्ष ने कहा कि इसके लिए सरकार की सहमति आवश्यक होगी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार इस विषय पर बहस कराने में रुचि नहीं रखती इसलिए विपक्ष ने लोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया।

    राहुल गांधी ने कहा कि छात्रों की प्रमुख मांगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का इस्तीफा संसद मार्च के दौरान छात्रों के साथ कथित मारपीट और दुर्व्यवहार करने वालों पर कार्रवाई तथा छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी मामलों को वापस लेना शामिल है। उन्होंने कहा कि पूरा विपक्ष चाहता है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा हो ताकि छात्रों की चिंताओं का समाधान निकल सके।

    दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने रिहाई के बाद कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि छात्रों की मांगें पूरी तरह जायज हैं और लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार छात्रों की समस्याओं को सुनने के बजाय उनकी आवाज दबाने का प्रयास कर रही है। प्रियंका गांधी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए संसद में कानून लाने की आवश्यकता बताई।

    वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राहुल गांधी छात्रों का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार युवाओं और छात्रों के हित में लगातार काम कर रही है और केवल राजनीतिक बयानबाजी से समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

    भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस के प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन को अनुचित बताते हुए राहुल गांधी के आचरण की आलोचना की और कहा कि विरोध प्रदर्शन की भी एक मर्यादा होती है। भाजपा का कहना है कि संसद के भीतर सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए सरकार तैयार है लेकिन अराजकता फैलाने की राजनीति उचित नहीं है।

    दिनभर चले इस घटनाक्रम के बाद दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी प्रियंका गांधी और अन्य हिरासत में लिए गए नेताओं को रिहा कर दिया। इसके बावजूद छात्रों के मुद्दे को लेकर राजनीतिक टकराव फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है। विपक्ष लगातार संसद में चर्चा और सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहा है जबकि सरकार अपने रुख पर कायम है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस होने की संभावना जताई जा रही है।

  • टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक..UGC के वो 4 नियम कौन से हैं जिनपर बवाल मचा हुआ है?

    टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक..UGC के वो 4 नियम कौन से हैं जिनपर बवाल मचा हुआ है?


    नई दिल्ली । देशभर में UGC के नए नियम को लेकर भारी विरोध देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर यूजीसी आरोलबैक तेजी से ट्रेंड करने लगा, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और इसे भेदभाव बढ़ाने वाला बताया गया। इसी बीच, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस बदलाव का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया। इस पूरे विवाद के बीच सवाल उठता है कि UGC ने कौन से नियम बनाए हैं और आखिर क्यों टीचर्स, स्टूडेंट्स और आम लोग इसमें नाराज हैं।

    UGC का नया नियम क्या है

    UGC ने 13 जनवरी 2026 को नया नियम लागू किया, जिसका नाम है उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के विनियम 2026 । इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव और असमानता को रोकना बताया गया है। नए नियम के तहत सभी विश्वविद्यालय और कॉलेजों को इक्विटी सेंटर, इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी कमेटी बनाने होंगे, साथ ही 24×7 हेल्पलाइन का प्रावधान भी होगा। अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC उनकी मान्यता रद्द कर सकता है या फंड रोक सकता है। UGC का कहना है कि पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ शिकायतों में 2020 से 2025 के बीच 100% से अधिक वृद्धि देखी गई है। इसके अलावा, रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यह नियम बनाया गया है, ताकि उच्च शिक्षा में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    क्यों मचा बवाल

    UGC के नए नियम के कुछ सेक्शन विशेष रूप से विवादित बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका PIL में कहा गया है कि Section 3C अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समाज के छात्र और शिक्षक भी नाराज हैं। बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इसे सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बनाने जैसा बताया। छात्र और शिक्षक दोनों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कार्रवाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, और सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि देशभर में इस नियम को लेकर तीव्र विरोध और बहस चल रही है।

    UGC के 4 विवादित नियम / बदलाव ,इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड का गठन

    नए नियम के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड बनाना अनिवार्य है। हालांकि, छात्रों का कहना है कि इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं है, जिससे निर्णयों में पक्षपात होने का डर है। साथ ही इक्विटी स्क्वाडको बहुत अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ‘भेदभाव’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी कार्यवाही और सीमाओं को लेकर शंका बनी हुई है।

    अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों पर ध्यान
    नए नियम का मुख्य उद्देश्य एससी, एसटी और पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव को रोकना है। हालांकि, सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक इसे एकतरफा मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस नियम के तहत सवर्ण छात्रों को ‘संभावित अपराधी’ मानकर देखा जा सकता है, जिससे वास्तव में भेदभाव बढ़ने और माहौल में तनाव पैदा होने की संभावना है।

    सख्त कार्रवाई का अधिकार
    नए नियम के तहत, अगर कोई संस्थान के नियमों का पालन नहीं करता, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है या फंड रोक दिया जा सकता है। छात्र और शिक्षक मानते हैं कि यह कदम संस्थानों पर अत्यधिक दबाव डालता है और बिना पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन के इसे लागू करना मुश्किल और जटिल होगा।
    छात्रों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया
    कई छात्र संगठन और शिक्षक संघ के नए नियम का विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जबकि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर अपना विरोध जताया। छात्रों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कोई रोक नहीं है, और सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

    UGC का पक्ष
    UGC का कहना है कि यह नियम उच्च शिक्षा में समान अवसर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। आयोग के अनुसार, बिना निगरानी और संरचना के पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव रोकना मुश्किल है। यह भी बताता है कि नियम धीरे-धीरे लागू किए जाएंगे और उद्देश्य केवल समान अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। जबकि यह कदम शिक्षा प्रणाली में समानता और सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास है, नियम के कुछ सेक्शन विवादास्पद माने जा रहे हैं।

    सवर्ण छात्रों और शिक्षकों की चिंता और भविष्य की राह

    टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक सभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नया नियम सवर्ण छात्रों और शिक्षकों के अधिकारों के खिलाफ तो नहीं जा रहा। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर हैं, जिससे तय होगा कि नियम में कोई संशोधन या बदलाव करता है या नहीं। फिलहाल, यह मामला शिक्षा जगत में सबसे बड़ा और गर्म चर्चा का विषय बन गया है, और भविष्य में इसके प्रभाव को लेकर बहस जारी रहने की संभावना है।

  • धौलपुर में प्रिंसपल के तबादले के विरोध में छात्राओं का आंदोलन तीसरे दिन भी जारी, प्रशासनिक अधिकारी पर नाराजगी

    धौलपुर में प्रिंसपल के तबादले के विरोध में छात्राओं का आंदोलन तीसरे दिन भी जारी, प्रशासनिक अधिकारी पर नाराजगी


    भरतपुर। राजस्थान के धौलपुर जिले में बाड़ा हैदर शाह सरकारी स्कूल में प्रिंसपल नरेश जैन के तबादले के विरोध में छात्राओं का आंदोलन शुक्रवार को तीसरे दिन भी जारी रहा। प्रिंसपल के झालावाड़ स्थानांतरण के फैसले के विरोध में छात्राओं ने स्कूल परिसर में प्रदर्शन किया और मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय तक अपनी आवाज पहुंचाई।

    इस दौरान छात्राओं के आंदोलन को शांत करने और समझाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी अशोक उपाध्याय और मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी महेश शर्मा स्कूल पहुंचे। लेकिन छात्राओं ने तबादले रद्द करने की मांग पर अड़ी रहीं और अधिकारियों के समझाने के प्रयासों को खारिज कर दिया। वहीं, अधिकारियों के कथित हड़काने और धमकी देने के तरीकों से ग्रामीणों में भी आक्रोश फैल गया। इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसने विवाद को और बढ़ा दिया।

    स्थानीय सूत्रों के अनुसार, छात्राओं का कहना है कि प्रिंसपल नरेश जैन उनके लिए मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत रहे हैं। उनकी अनुपस्थिति से स्कूल की पढ़ाई और अनुशासन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यही कारण है कि छात्राएं तबादले को लेकर किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करना चाह रही हैं। इस मामले में ग्रामीण भी छात्राओं के समर्थन में खड़े हैं। उनका कहना है कि शिक्षा विभाग द्वारा छात्रों और स्थानीय समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। वहीं, अधिकारियों का कहना है कि यह प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है और निर्णय नियमों के तहत लिया गया है।

    विदित हो कि यह विरोध प्रदर्शन लगातार तीसरे दिन तक जारी रहा और छात्राओं ने प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में भी शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों की मांग की। मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग ने हालात पर नजर रखी है और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। इस घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि स्कूल स्तर पर निर्णय लेने में छात्रों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी और उनकी भावनाओं का सम्मान करना अत्यंत आवश्यक है।