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  • बॉलीवुड गलियारों के कथित सीक्रेट रिलेशनशिप पर नया खुलासा, इंटरव्यू के इंतजार के दौरान वैनिटी से बाहर निकली थीं अभिनेत्री।

    बॉलीवुड गलियारों के कथित सीक्रेट रिलेशनशिप पर नया खुलासा, इंटरव्यू के इंतजार के दौरान वैनिटी से बाहर निकली थीं अभिनेत्री।

    नई दिल्ली। बॉलीवुड उद्योग में सितारों के व्यक्तिगत जीवन और आपसी संबंधों को लेकर चर्चाएं अक्सर सुर्खियों में बनी रहती हैं। इसी क्रम में अभिनेता सनी देओल और अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया के कथित संबंधों को लेकर एक बार फिर नई चर्चा शुरू हो गई है। फिल्म उद्योग में दशकों से चल रही इन अफवाहों के बीच वरिष्ठ फिल्म पत्रकार ज्योति वेंकटेश ने एक पुराने वाकये का जिक्र करते हुए इस विषय पर बड़ा दावा किया है, जिससे सिनेमा जगत के गलियारों में पुरानी यादें और अटकलें फिर से ताजा हो गई हैं।

    वरिष्ठ पत्रकार ने एक हालिया साक्षात्कार में दावा किया कि फिल्म उद्योग में कई ऐसे संबंध होते हैं, जिनकी जानकारी लगभग सभी को होती है लेकिन उन पर सार्वजनिक रूप से कम ही बात की जाती है। अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि सालों पहले वह अभिनेता सनी देओल का साक्षात्कार लेने के लिए मुंबई स्थित प्रसिद्ध कमालिस्तान स्टूडियो पहुंचे थे। जब वे निर्धारित बातचीत के लिए अभिनेता की वैनिटी वैन की ओर बढ़े, तो वहां मौजूद निजी कर्मचारियों ने उन्हें रोक दिया और थोड़ा इंतजार करने का अनुरोध किया।

    पत्रकार के अनुसार, लगभग आधे घंटे के लंबे इंतजार के बाद अभिनेता स्वयं वैनिटी वैन से बाहर आए और विलंब के लिए शिष्टाचारपूर्वक खेद व्यक्त किया। हालांकि, साक्षात्कार शुरू होने से ठीक पहले जो दृश्य देखने को मिला, वह काफी चौंकाने वाला था। पत्रकार ने दावा किया कि उसी वैनिटी वैन का दरवाजा दोबारा खुला और उसमें से प्रसिद्ध अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया बाहर निकलीं। अभिनेत्री ने वहां मौजूद पत्रकार को देखकर औपचारिक अभिवादन किया और फिर वहां से चली गईं, जिसके बाद साक्षात्कार की प्रक्रिया शुरू हो सकी।

    इस पूरी घटना के बाद जब पत्रकार ने वैनिटी वैन के भीतर जाकर अभिनेता से मुलाकात की, तो माहौल को सहज बनाने का प्रयास किया गया। पत्रकार का कहना है कि अभिनेता ने इस मुलाकात को पूरी तरह व्यावसायिक बताते हुए स्पष्ट किया कि वे दोनों किसी आगामी प्रोजेक्ट की पटकथा पर चर्चा कर रहे थे। हालांकि, इस घटना के बाद से ही दोनों कलाकारों के बीच के समीकरणों को लेकर उद्योग के भीतर कई तरह के कयास लगाए जाने लगे थे, जो समय-समय पर मीडिया की सुर्खियों का हिस्सा बनते रहे हैं।

    बॉलीवुड के इतिहास में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं जो पर्दे के पीछे की कहानियों को सामने लाते हैं। दोनों कलाकारों ने हमेशा अपने निजी जीवन को मीडिया की चकाचौंध से दूर रखने की कोशिश की है और इन दावों पर कभी सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि, दशकों पुराने इस वाकये के सार्वजनिक मंच पर आने के बाद एक बार फिर मनोरंजन जगत में दोनों के रिश्तों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।

  • संगीतकारों की पहली और आखिरी उम्मीद थे स्वर कोकिला के हमसफर मोहम्मद रफी: जानिए कैसे बिना किसी पूर्व योजना के रच दिया था संगीत का नया इतिहास

    संगीतकारों की पहली और आखिरी उम्मीद थे स्वर कोकिला के हमसफर मोहम्मद रफी: जानिए कैसे बिना किसी पूर्व योजना के रच दिया था संगीत का नया इतिहास

    नई दिल्ली । भारतीय संगीत जगत के सुनहरे दौर में पार्श्वगायक मोहम्मद रफी एक ऐसे अनमोल रत्न थे, जिनकी आवाज का जादुई दायरा हर प्रकार के भावों और गीतों को खुद में समेटने की अद्भुत क्षमता रखता था। रफी साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जिस भी अभिनेता के लिए पर्दे पर पार्श्वगायन करते थे, उनकी आवाज हुबहू उस अभिनेता के हाव-भाव और अंदाज में ढल जाती थी। अस्सी और नब्बे के दशक से बहुत पहले, वर्ष 1964 में आई निर्देशक के. शंकर की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘राजकुमार’ की रिकॉर्डिंग के दौरान रफी साहब ने अपनी गायकी का एक ऐसा ही अकल्पनीय करिश्मा दिखाया था, जिसने संगीत के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया।

    इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बैकग्राउंड को समझें तो फिल्म ‘राजकुमार’ में शम्मी कपूर, साधना, पृथ्वीराज कपूर और प्राण जैसे दिग्गज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी उस दौर की सबसे सफल और कल्ट जोड़ी शंकर-जयकिशन के कंधों पर थी। इस फिल्म के गानों को सजाने के लिए मोहम्मद रफी के साथ लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर जैसे महान गायकों को चुना गया था। शम्मी कपूर अपने गानों के फिल्मांकन और उनकी मेकिंग को लेकर हमेशा से बेहद गंभीर रहते थे, इसलिए वे अक्सर गानों की लाइव रिकॉर्डिंग के समय म्यूजिक स्टूडियो में खुद मौजूद रहा करते थे।

    इस फिल्म का एक विशेष और बेहद जोशीला गीत था— ‘दिलरुबा दिल पे तू सितम किए जाए’, जिसे मोहम्मद रफी और आशा भोसले को मिलकर गाना था। कहानी के दृश्य के अनुसार, रात के समय एक अस्तबल (तबेले) में कुछ लोग जश्न मना रहे थे और इसी पृष्ठभूमि के अनुरूप शंकर-जयकिशन ने गाने में बेहद अनूठे और भारी वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया था। आशा भोसले ने अपने हिस्से की रिकॉर्डिंग पूरी सहजता से कर ली थी, जिसके बाद मोहम्मद रफी ने अपनी कड़क आवाज में ‘हम भी तो आग में जलते रहे’ पंक्ति के साथ गाने में शानदार एंट्री ली। गाना अपनी पूरी लय में आगे बढ़ रहा था कि तभी इसके अंतिम अंतरे में कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको चौंका दिया।

    गीत की आखिरी पंक्तियों तक पहुंचते-पहुंचते मोहम्मद रफी ने संगीत की तय धुन से हटकर अचानक अपनी आवाज के स्केल और अंदाज को पूरी तरह से बदल दिया। उनके गले से निकली वह एकदम नई और अप्रत्याशित तान सुनकर रिकॉर्डिस्ट ने घबराकर संगीतकार शंकर-जयकिशन की तरफ देखा, लेकिन अनुभवी संगीतकारों ने तुरंत भांप लिया कि यह कोई गलती नहीं बल्कि एक महान कलाकार की रूहानी कला है और उन्होंने गाने को बिना रोके जारी रखने का इशारा किया। पास ही खड़ीं आशा भोसले भी रफी साहब के इस अचानक बदले और रौद्र-जोशीले अंदाज को देखकर पूरी तरह हैरान रह गईं।

    रिकॉर्डिंग का फाइनल कट पूरा होने के बाद स्टूडियो का माहौल पूरी तरह से बदल चुका था और वहां मौजूद हर व्यक्ति रफी साहब की इस अद्वितीय प्रतिभा की सराहना कर रहा था। तब सह-गायिका आशा भोसले ने राहत की सांस लेते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि यह बेहद अच्छा हुआ कि रफी साहब ने यह चमत्कारी बदलाव उनके गाने के बाद किया, अन्यथा वे डरकर वहीं रुक जातीं। अमूमन माना जाता था कि रफी साहब तय धुनों में बहुत ज्यादा फेरबदल नहीं करते थे, लेकिन जब भी वे अपनी मर्जी से ऐसा करते थे, तो वह गाना मील का पत्थर बन जाता था। यही कारण था कि जब भी कोई कठिन गाना अन्य गायकों के वश का नहीं होता था, तब पूरी इंडस्ट्री आंख मूंदकर मोहम्मद रफी के पास ही पहुंचती थी।

  • जानिए क्यों आर माधवन के लिए आत्मघाती साबित हुआ था 'बी और सी' सेंटर्स को रिझाने का फॉर्मूला

    जानिए क्यों आर माधवन के लिए आत्मघाती साबित हुआ था 'बी और सी' सेंटर्स को रिझाने का फॉर्मूला

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में अपनी बेहतरीन अदाकारी और चॉकलेटी बॉय की छवि से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाने वाले अभिनेता आर माधवन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हाल ही में आई उनकी फिल्म ‘धुरंधर 2’ की शानदार व्यावसायिक सफलता और उसमें उनके अभिनय की चौतरफा तारीफ हो रही है। इस बड़ी कामयाबी के बीच, माधवन ने अपने करियर के उस शुरुआती और अंधकारमय दौर को याद किया है, जब उन्होंने दूसरों की सलाह मानकर फिल्म इंडस्ट्री के ‘थलाइवा’ यानी महानायक रजनीकांत के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश की थी और उन्हें अपने जीवन के सबसे बड़े वित्तीय और व्यावसायिक संकट का सामना करना पड़ा था।

    एक मशहूर मीडिया प्लेटफॉर्म को दिए इंटरव्यू में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए आर माधवन ने बताया कि जब वे साउथ फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, तब कई कथित विशेषज्ञों और शुभचिंतकों ने उन्हें करियर को लेकर एक विशेष सलाह दी थी। उन लोगों का कहना था कि यदि माधवन को दक्षिण भारत का असली सुपरस्टार बनना है, तो उन्हें केवल शहरी दर्शकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सलाहकारों के मुताबिक, जब तक कोई अभिनेता ‘बी और सी’ सेंटर्स यानी ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों के दर्शकों के बीच अपनी पैठ नहीं बनाता और वहां के लोग उसे स्वीकार नहीं करते, तब तक वह रजनीकांत जैसा बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर सकता।

    इस तरह के आंकड़ों और सलाहों के दबाव में आकर माधवन ने अपनी स्वाभाविक शैली के विपरीत जाकर एक ऐसी फिल्म साइन कर ली, जो पूरी तरह ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित थी। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे अनपढ़, बेहद गरीब और कमजोर ग्रामीण युवक की भूमिका निभाई थी जिसके पास खाने के भी लाले थे, लेकिन वह एक पेशेवर क्रिकेटर बनने का सपना देखता था। माधवन के करियर का यह प्रयोग बॉक्स ऑफिस पर इतनी बुरी तरह से पिटा कि फिल्म अपनी लागत निकालना तो दूर, इतिहास की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्मों में शुमार हो गई। इस फिल्म के डूबने का खामियाजा इतना बड़ा था कि फिल्म का निर्माण करने वाले पूरे प्रोडक्शन स्टूडियो को हमेशा के लिए अपना ताला बंद करना पड़ गया था।

    इस बेहद दर्दनाक और अप्रत्याशित विफलता पर बात करते हुए माधवन ने बेहद ईमानदारी से स्वीकार किया कि वह उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। उन्होंने कहा कि फिल्म के इस महाडिजास्टर ने उनके चेहरे पर एक जोरदार थप्पड़ की तरह काम किया, जिसने उन्हें गहरे अवसाद से निकालकर हकीकत का आईना दिखाया। माधवन के अनुसार, उन्हें यह अच्छी तरह समझ आ गया था कि उन्हें किसी दूसरे सुपरस्टार की नकल करने के बजाय अपनी खुद की मौलिकता और पहचान पर भरोसा करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि सलाह देने वाले लोग अपने नजरिए से सही हो सकते थे, लेकिन उनकी गलती यह थी कि उन्होंने बिना सोचे-समझे उस फॉर्मूले को हूबहू अपने ऊपर लागू कर लिया था।

    इस बड़े झटके के बाद माधवन ने सबक लिया और दूसरों की तरह बनने की अंधी दौड़ से खुद को पूरी तरह बाहर कर लिया। उन्होंने इसके बाद अपनी खुद की अनूठी शैली विकसित की और ‘बी और सी’ सेंटर्स के लिए भी ऐसी फिल्मों का चयन किया जो उनके अपने व्यक्तित्व को सूट करती थीं। इस साक्षात्कार में माधवन ने अपनी व्यक्तिगत जिंदगी पर भी खुलकर बात की और मजाकिया अंदाज में बताया कि कैसे वे अपनी पत्नी सरिता के साथ पिछले 27 वर्षों से एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि वे एक सीधे-साधे मिडिल क्लास मद्रासी आदमी हैं और उनकी पत्नी के पास उनके फोन से लेकर ईमेल और बैंक खातों तक का पूरा एक्सेस रहता है, इसलिए उनसे कुछ भी छिपा पाना नामुमकिन है।