Tag: Supreme Court hearing

  • दहेज के लिए मानसिक प्रताड़ना को सुप्रीम कोर्ट ने बताया गंभीर सामाजिक अपराध, आरोपी की याचिका खारिज

    दहेज के लिए मानसिक प्रताड़ना को सुप्रीम कोर्ट ने बताया गंभीर सामाजिक अपराध, आरोपी की याचिका खारिज

    नई दिल्ली । दहेज प्रताड़ना और विवाह के बाद महिलाओं के साथ होने वाले मानसिक उत्पीड़न को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर चिंता व्यक्त की है। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी के बाद बहू और उसके परिवार का अपमान करना समाज में एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है और ऐसे मामलों में सख्त संदेश देना बेहद जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह किसी परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का माध्यम नहीं बन सकता।

    मामला छत्तीसगढ़ के एक दहेज मृत्यु प्रकरण से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की शादी के कुछ वर्षों के भीतर ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। जांच और अभियोजन पक्ष के अनुसार महिला को लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था और उसके परिवार पर आर्थिक दबाव बनाया जा रहा था। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि महिला के परिवार को अपमानजनक शब्द कहे गए और अतिरिक्त धन तथा वाहन की मांग लगातार जारी रही।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि समाज में पढ़े-लिखे और जागरूक लोग भी दहेज जैसी कुप्रथा में शामिल पाए जाते हैं। अदालत ने कहा कि शादी जैसे पवित्र सामाजिक संबंध को लालच और अपमान से जोड़ना बेहद चिंताजनक है। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह समझ से परे है कि लोग विवाह करने के बाद लड़की और उसके परिवार को अपमानित क्यों करते हैं। अदालत के अनुसार यह केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक समस्या भी है, जिस पर कठोर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

    मेडिकल रिपोर्ट में महिला की मौत फांसी लगने से दम घुटने के कारण बताई गई थी, लेकिन अदालत ने माना कि लगातार मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का उसकी मौत से सीधा संबंध था। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष हिंसा के साथ-साथ मानसिक उत्पीड़न को भी गंभीरता से देखने की आवश्यकता है, क्योंकि यह पीड़ित महिला को गहरे तनाव और असुरक्षा की स्थिति में पहुंचा देता है।

    इस मामले में निचली अदालत और उच्च न्यायालय पहले ही आरोपी पक्ष को दोषी ठहरा चुके थे। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में सजा को चुनौती दी गई थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों और परिस्थितियों से प्रताड़ना के आरोप स्पष्ट रूप से साबित होते हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में केवल तकनीकी आधारों पर राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे समाज में गलत संदेश जाएगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज प्रताड़ना के मामलों में समाज को स्पष्ट संकेत मिलना चाहिए कि महिलाओं और उनके परिवारों का अपमान स्वीकार नहीं किया जाएगा। न्यायालय की इस टिप्पणी को महिलाओं की सुरक्षा और दहेज विरोधी कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    देश में दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और पारिवारिक सोच में बदलाव भी बेहद जरूरी है ताकि विवाह संस्था सम्मान और समानता के आधार पर मजबूत हो सके।

  • बैंक फ्रॉड केस में नया मोड़-RCOM मामले पर कोर्ट में पेश हुई स्टेटस रिपोर्ट, सभी की नजर फैसले पर

    बैंक फ्रॉड केस में नया मोड़-RCOM मामले पर कोर्ट में पेश हुई स्टेटस रिपोर्ट, सभी की नजर फैसले पर

    नई दिल्ली । रिलायंस कम्युनिकेशन से जुड़े कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में कानूनी प्रक्रिया एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है। इस केस में जांच कर रही एजेंसियों ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी है, जिसके बाद मामले पर फिर से गंभीर बहस शुरू हो गई है। यह मामला लंबे समय से जांच के दायरे में है और अब अदालत में इसकी सुनवाई तेज हो गई है।

    सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों ने अदालत को जानकारी दी कि उन्होंने अपनी-अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। हालांकि, गिरफ्तारी या आगे की कार्रवाई को लेकर कोई सीधा जवाब देने से बचा गया। एजेंसियों की ओर से यह भी कहा गया कि जांच की प्रक्रिया के तहत सभी पहलुओं पर विचार किया जा रहा है और निर्णय तथ्यों के आधार पर ही लिया जाएगा।

    इसी बीच याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया गया कि मामले में जिन लोगों को प्रमुख भूमिका में बताया जा रहा है, उनके खिलाफ अब तक सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस मुद्दे पर अदालत में चर्चा के दौरान कई कानूनी बिंदु सामने रखे गए।

    सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि रिपोर्ट को अदालत में औपचारिक रूप से रिकॉर्ड में लिया गया है और मामले को आगे की सुनवाई के लिए निर्धारित किया गया है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सभी पक्षों को सुनने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम ने मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े इस केस पर अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां आगे की कानूनी दिशा तय होने की संभावना है।

  • सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की सुनवाई तेज, आस्था और समानता के बीच संतुलन को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की संभावना

    सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की सुनवाई तेज, आस्था और समानता के बीच संतुलन को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की संभावना

    नई दिल्ली:   केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े संवेदनशील और लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई एक बार फिर तेज हो गई है। नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तार से विचार कर रही है। यह मामला अब केवल एक धार्मिक परंपरा का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की एक व्यापक संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने यह संकेत दिया कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं को केवल कानूनी दृष्टिकोण से देखना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें करोड़ों लोगों की भावनाएं और विश्वास जुड़े होते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी सामाजिक सुधार की प्रक्रिया में धार्मिक संरचनाओं की मूल भावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों से मामले की गंभीरता और जटिलता और अधिक स्पष्ट हो गई है।

    यह पूरा विवाद वर्ष 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को उचित माना था। 2018 के फैसले के बाद देशभर में इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और इसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब विस्तार से सुनवाई जारी है।

    मंदिर के प्रबंधन से जुड़े पक्ष का कहना है कि यह परंपरा भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी स्वरूप की मान्यता पर आधारित है और सदियों से इसका पालन होता आ रहा है। उनके अनुसार यह मामला केवल प्रशासनिक व्यवस्था या सार्वजनिक अधिकारों का नहीं, बल्कि एक गहरी धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा है, जिसे सामाजिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

    सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया और कहा कि धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि किसी भी प्रकार का लिंग आधारित प्रतिबंध समानता के अधिकार और मौलिक अधिकारों की भावना के खिलाफ है, इसलिए इसे संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

    यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसी सुनवाई के दौरान धार्मिक स्थलों में महिलाओं की भूमिका, विभिन्न समुदायों की परंपराएं और धार्मिक संस्थाओं में लैंगिक समानता जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार किया जा रहा है। इसमें विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े संवेदनशील प्रश्न भी शामिल हैं, जिससे यह मामला और अधिक व्यापक बन गया है।

    माना जा रहा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय न केवल धार्मिक परंपराओं की व्याख्या को प्रभावित करेगा, बल्कि देश में आस्था, समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की दिशा भी तय कर सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट में सरकार के जवाब से पहले विजय शाह का भावुक संदेश कहा सेना और समाज के प्रति कोई दुर्भावना नहीं

    सुप्रीम कोर्ट में सरकार के जवाब से पहले विजय शाह का भावुक संदेश कहा सेना और समाज के प्रति कोई दुर्भावना नहीं

    मध्यप्रदेश / कर्नल सोफिया को लेकर दिए विवादित बयान पर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से ठीक पहले मध्यप्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने एक बार फिर माफी मांगी है। सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में उन्होंने कहा कि उनके शब्द किसी महिला अधिकारी भारतीय सेना या किसी समाज के अपमान के उद्देश्य से नहीं थे बल्कि वे देशभक्ति के उत्साह और आवेश में निकल गए थे।

    विजय शाह ने कहा कि उन्होंने पहले भी कई बार क्षमा याचना की है और आज एक बार फिर अंतकरण से माफी मांग रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि सार्वजनिक जीवन में शब्दों की मर्यादा और संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक होती है और इस घटना से उन्होंने आत्ममंथन किया है। मंत्री ने भरोसा दिलाया कि भविष्य में वाणी पर पूर्ण नियंत्रण रहेगा और ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी।

    उन्होंने कहा कि यह उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक है कि एक छोटी सी त्रुटि से इतना बड़ा विवाद खड़ा हो गया। उन्होंने भारतीय सेना के प्रति अपने सम्मान को दोहराते हुए कहा कि सेना के लिए उनके मन में हमेशा सम्मान रहा है और रहेगा।

    यह विवाद पिछले साल 11 मई को इंदौर के महू क्षेत्र के रायकुंडा गांव में दिए गए भाषण से शुरू हुआ था। एक कार्यक्रम के दौरान ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए मंत्री विजय शाह ने ऐसा बयान दिया जिसे लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। विपक्षी दलों के साथ साथ पूर्व सैन्य अधिकारियों और सामाजिक संगठनों ने बयान को आपत्तिजनक बताया।

    मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा जहां मंत्री के खिलाफ अभियोजन की अनुमति को लेकर मध्यप्रदेश सरकार को जवाब दाखिल करना है। कोर्ट ने पहले ही राज्य सरकार को 15 दिन के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे। अब 9 फरवरी को इस मामले में अहम सुनवाई प्रस्तावित है।सरकारी और राजनीतिक सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट से और समय मांग सकती है। तर्क दिया जा सकता है कि मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई है और विस्तृत परीक्षण जरूरी है। यही रुख इस मामले की जांच कर रही तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम का भी रहा है।

    विजय शाह मामले की जांच एसआईटी कर रही है जिसमें प्रमोद वर्मा कल्याण चक्रवर्ती और वाहिनी सिंह शामिल हैं। एसआईटी पहले भी अतिरिक्त समय की मांग कर चुकी है। इसी बीच मध्यप्रदेश सरकार ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करने के लिए दिल्ली भेज दी है। गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी इस संबंध में दिल्ली पहुंचे हैं।सूत्र बताते हैं कि सरकार ने इस मामले में पार्टी नेतृत्व के साथ साथ अटॉर्नी जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से भी कानूनी सलाह ली है। संभावना है कि 9 फरवरी को अभियोजन से जुड़े बिंदुओं पर सुनवाई होगी जबकि 11 फरवरी को अन्य पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।

  • बंगाल में संवैधानिक संकट: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी पर लगाया भड़काने का आरोप; चुनाव अधिकारियों के लिए मांगी विशेष सुरक्षा

    बंगाल में संवैधानिक संकट: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी पर लगाया भड़काने का आरोप; चुनाव अधिकारियों के लिए मांगी विशेष सुरक्षा


    नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन SIR को लेकर निर्वाचन आयोग ECI और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रही जंग अब सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में पहुँच गई है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक बेहद तीखे हलफनामे में चुनाव आयोग ने बंगाल की स्थिति को ‘असाधारण’ करार देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आयोग का कहना है कि राज्य में चुनाव अधिकारियों को न केवल डराया-धमकाया जा रहा है, बल्कि मुख्यमंत्री के सार्वजनिक भाषणों से अधिकारियों के खिलाफ नफरत और हिंसा का माहौल बनाया जा रहा है।

    अधिकारियों की जान को खतरा और पुलिस की चुप्पी चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल में चुनावी मशीनरी को पंगु बनाने का प्रयास किया जा रहा है। आयोग ने हलफनामे में जिक्र किया कि मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘हरि दास’ नामक एक माइक्रो-ऑब्जर्वर का नाम सार्वजनिक रूप से लिया, जिससे उस अधिकारी की जान खतरे में पड़ गई है। हालात इतने बेकाबू हैं कि मुर्शिदाबाद के 9 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने सामूहिक इस्तीफा देते हुए काम करने से मना कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन पर जानलेवा हमले हो रहे हैं और राज्य पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। उत्तर दिनाजपुर में तो 700 लोगों की भीड़ ने उस केंद्र पर ही धावा बोल दिया जहाँ सूची संशोधन का कार्य चल रहा था। आयोग ने स्पष्ट कहा कि पुलिस FIR दर्ज करने में भी आनाकानी कर रही है।

    देश का इकलौता राज्य जहाँ CEO को मिली ‘Y+’ सुरक्षा चुनाव आयोग ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि बंगाल की जमीनी हकीकत देश के अन्य राज्यों से पूरी तरह अलग और डरावनी है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को ‘Y+ श्रेणी’ की सुरक्षा प्रदान करनी पड़ी है। पूरे भारत में बंगाल इकलौता ऐसा राज्य बन गया है जहाँ एक चुनाव अधिकारी को अपनी सुरक्षा के लिए कमांडो के घेरे में रहना पड़ रहा है। आयोग ने दलील दी कि जहाँ अन्य राज्यों में SIR प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है, वहीं बंगाल में राजनीतिक हस्तक्षेप ने संकट खड़ा कर दिया है।

    ममता बनर्जी का पक्ष:लोकतंत्र को खतरा दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका की पैरवी करते हुए चुनाव आयोग की नीयत पर हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर केवल बंगाल में ही ‘माइक्रो-ऑब्जर्वर्स’ की नियुक्ति क्यों की जा रही है? मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि करीब 58 लाख वैध मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने मांग की कि 2026 का विधानसभा चुनाव पुरानी सूची के आधार पर ही हो और वर्तमान संशोधन प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए।

    सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फिलहाल चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह नामों की त्रुटियों को सुधारते समय संवेदनशीलता बरते ताकि किसी भी असली नागरिक का मताधिकार न छीने। अब सोमवार को होने वाली अगली सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं कि क्या बंगाल में चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो पाएगी या हिंसा का यह साया गहराता जाएगा।