Tag: Supreme Court India

  • विनेश फोगाट को कोर्ट से राहत, एशियन गेम्स ट्रायल में वापसी का रास्ता साफ

    विनेश फोगाट को कोर्ट से राहत, एशियन गेम्स ट्रायल में वापसी का रास्ता साफ


    नई दिल्ली । Vinesh Phogat को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एशियन गेम्स 2026 के चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी है। यह ट्रायल 30 और 31 मई को आयोजित किए जाएंगे। अदालत के इस फैसले से उनका अंतरराष्ट्रीय मंच पर वापसी का रास्ता एक बार फिर खुल गया है।

    डब्ल्यूएफआई के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रो
    पूरा मामला तब शुरू हुआ जब Wrestling Federation of India (WFI) ने विनेश फोगाट को चयन ट्रायल में भाग लेने से रोक दिया था। फेडरेशन का कहना था कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और डोपिंग से जुड़े नियमों के उल्लंघन के मामले लंबित हैं, इसलिए वे ट्रायल में हिस्सा नहीं ले सकतीं।

    WFI ने इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें विनेश को ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी गई थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में WFI को नोटिस प्रक्रिया में देरी और पारदर्शिता की कमी पर फटकार भी लगाई थी।

    हाई कोर्ट के निर्देश और पारदर्शिता पर जो
    हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि चयन ट्रायल की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य होगी। इसके साथ ही भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की मौजूदगी भी सुनिश्चित की जाएगी ताकि चयन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष रहे। कोर्ट ने यह भी कहा था कि खेल में खिलाड़ियों के अधिकार और उनके करियर को ध्यान में रखना जरूरी है, और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता से समझौता नहीं किया जा सकता।

    WFI का पक्ष और लगाए गए आरो
    WFI ने विनेश फोगाट को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कई सवालों के जवाब मांगे थे। फेडरेशन ने उन पर अनुशासनहीनता और डोपिंग रोधी नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए थे। इसके बाद उन्हें 26 जून 2026 तक किसी भी घरेलू प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था।

    फेडरेशन का तर्क था कि संन्यास से वापसी करने वाले खिलाड़ियों को नियमों के अनुसार निर्धारित अवधि का पालन करना जरूरी होता है। इसी आधार पर उन्हें ट्रायल से बाहर रखा गया था।

    कोर्ट में पहुंचा मामला, फिर मिली राहत
    WFI के फैसले के खिलाफ विनेश फोगाट ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए उन्हें ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अंतिम सुनवाई में अदालत ने उनकी भागीदारी को मंजूरी दे दी।

    खेल करियर के लिए अहम मोड
    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विनेश फोगाट के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। अब सबकी नजरें 30-31 मई को होने वाले ट्रायल पर टिकी हैं, जहां उनका प्रदर्शन यह तय करेगा कि वे एशियन गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व कर पाएंगी या नहीं।

  • अब 100, 101, 108 नहीं… इमरजेंसी में सिर्फ 112 करेगा मदद, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

    अब 100, 101, 108 नहीं… इमरजेंसी में सिर्फ 112 करेगा मदद, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश


    नई दिल्ली। देश में आपातकालीन सेवाओं को लेकर अब बड़ा बदलाव होने जा रहा है। पुलिस, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस और महिला हेल्पलाइन जैसे अलग-अलग नंबरों की जगह अब सिर्फ एक नंबर ‘112’ ही लोगों की मदद के लिए इस्तेमाल होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि अगले तीन महीने के भीतर सभी इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबरों को तकनीकी और संचालन स्तर पर ‘112’ से जोड़ दिया जाए।

    सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सड़क हादसों और आपातकालीन स्थितियों में समय पर मदद नहीं मिलने के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि नागरिकों को समय पर ट्रॉमा केयर और आपातकालीन इलाज मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि देशभर में इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम को एक समान और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है।

    यह आदेश जस्टिस जेके माहेश्वरी और एएस चंदूरकर की पीठ ने जारी किया। अदालत ने कहा कि मौजूदा समय में अलग-अलग सेवाओं के लिए कई नंबर होने से आम लोगों को भ्रम की स्थिति का सामना करना पड़ता है। ऐसे में एकीकृत हेल्पलाइन नंबर लागू करना जरूरी हो गया है।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, अब 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 जैसे सभी हेल्पलाइन नंबरों को ‘112’ में समाहित किया जाएगा। इसका मतलब यह होगा कि किसी भी तरह की इमरजेंसी में नागरिकों को सिर्फ एक नंबर डायल करना होगा और संबंधित सेवा तुरंत उपलब्ध कराई जाएगी।

    अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अगले तीन महीने में इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू करें और इसके बाद अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘हेल्पलाइन 112’ को लेकर व्यापक स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाया जाए, ताकि देश के हर नागरिक तक इसकी जानकारी पहुंच सके।

    सिर्फ हेल्पलाइन नंबर को एकीकृत करने तक ही अदालत ने खुद को सीमित नहीं रखा। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को ‘गुड समैरिटन कानून’ के तहत एक प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली विकसित करने का भी आदेश दिया है। इसका उद्देश्य सड़क हादसों में घायल लोगों की मदद करने वाले नागरिकों को कानूनी सुरक्षा और प्रोत्साहन देना है।

    इसके अलावा अदालत ने केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय और सड़क परिवहन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि तीन महीने के भीतर ट्रॉमा मामलों के लिए एक राष्ट्रीय ‘मेडिकल रेस्क्यू प्रोटोकॉल’ तैयार किया जाए। यह प्रोटोकॉल जारी होने के बाद राज्यों को अगले तीन महीने में उसे अपने यहां लागू करना होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश में आपातकालीन सेवाओं को तेज, सरल और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। एकीकृत हेल्पलाइन सिस्टम लागू होने से हादसों और संकट की घड़ी में लोगों को तेजी से सहायता मिल सकेगी और कई जानें बचाई जा सकेंगी।

  • 242 पन्नों के फैसले का होगा कानूनी परीक्षण, मुस्लिम पक्ष ने जताई अपील की बात

    242 पन्नों के फैसले का होगा कानूनी परीक्षण, मुस्लिम पक्ष ने जताई अपील की बात

    इंदौर/धार। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच द्वारा भोजशाला मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यह कानूनी विवाद एक नए चरण में प्रवेश करता नजर आ रहा है। फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी शुरू कर दी है। पक्षकारों का कहना है कि वे 242 पन्नों के विस्तृत फैसले का गहन अध्ययन करने के बाद इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।

    हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका को स्वीकार करते हुए भोजशाला परिसर में हिंदू पक्ष को पूजा का विशेष अधिकार प्रदान किया है। साथ ही, वर्ष 2003 में दिए गए उस आदेश को भी निरस्त कर दिया गया है, जिसमें मुस्लिम पक्ष को सीमित समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट को इस फैसले का प्रमुख आधार माना है।

    ASI की रिपोर्ट को मामले में निर्णायक माना गया है, जिसमें 98 दिनों के सर्वे और लगभग 2100 पन्नों की जांच रिपोर्ट शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर ऐतिहासिक रूप से मां वाग्देवी और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। कोर्ट ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर परिसर को हिंदू धार्मिक स्वरूप से जुड़ा माना है।

    हिंदू पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट रूप से माना है कि भोजशाला का स्वरूप मंदिर जैसा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद से अलग प्रकृति का है, क्योंकि यह रिट याचिका के रूप में सुना गया था।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया है कि वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करते और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती देंगे। उनका कहना है कि पूरे फैसले का कानूनी और तथ्यात्मक विश्लेषण करने के बाद ही अगला कदम तय किया जाएगा।

    इस बीच, हिंदू पक्ष ने इस फैसले को अपनी बड़ी जीत बताते हुए इसे ऐतिहासिक न्याय करार दिया है। वहीं, क्षेत्र में फिलहाल स्थिति शांत बनी हुई है, लेकिन कानूनी लड़ाई के अगले चरण को लेकर दोनों पक्षों में सक्रियता बढ़ गई है।

  • भारत-नेपाल सीमा पर ₹100 के सामान पर टैक्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सरकार के आदेश पर लगाई रोक

    भारत-नेपाल सीमा पर ₹100 के सामान पर टैक्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सरकार के आदेश पर लगाई रोक

    काठमांडू। भारत-नेपाल सीमा पर रोजमर्रा के सामान की खरीदारी करने वाले आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। नेपाल की सर्वोच्च अदालत ने प्रधानमंत्री बालेन शाह सरकार के उस विवादित फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें भारत से नेपाल ले जाए जाने वाले 100 रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर कस्टम ड्यूटी वसूली जा रही थी।

    सीमा पर बढ़ी सख्ती से लोगों को हुई परेशानी
    सरकार के इस नियम के लागू होने के बाद भारत-नेपाल सीमा पर स्थित कस्टम चौकियों पर हालात काफी तनावपूर्ण हो गए थे। दैनिक उपयोग की वस्तुओं के साथ यात्रा करने वाले लोगों को लगातार दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। चिप्स, बिस्कुट, केले और अन्य छोटे-मोटे सामानों पर भी कस्टम विभाग की सख्ती देखी जा रही थी। ₹100 की सीमा तय होने के कारण आम नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों के बीच कई बार कहासुनी और विवाद की स्थिति भी बन गई थी।

    अधिवक्ताओं ने कोर्ट में दी थी चुनौती
    इस फैसले के खिलाफ अधिवक्ता अमितेश पंडित, आकाश महतो, सुयोग्य सिंह और बिक्रम शाह ने नेपाल की सर्वोच्च अदालत में रिट याचिका दायर की थी। इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को हुई, जिसमें न्यायाधीश हरि प्रसाद फुयाल और न्यायाधीश टेक प्रसाद ढुंगाना की संयुक्त पीठ ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।

    सुप्रीम कोर्ट का अहम अंतरिम आदेश
    न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि अर्थ मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन द्वारा दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर इस तरह की सख्ती उचित नहीं है। कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए निर्देश दिया कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक बॉर्डर पर आम लोगों से दैनिक उपयोग के सामान पर कोई टैक्स नहीं वसूला जाएगा और स्थिति पूर्ववत सामान्य रखी जाएगी।

    व्यापारियों और यात्रियों को राहत
    इस फैसले के बाद सीमा क्षेत्र के छोटे व्यापारियों और रोजाना आवागमन करने वाले लोगों ने राहत की सांस ली है। व्यापारियों का कहना है कि इस आदेश से अनावश्यक जांच-पड़ताल, विवाद और परेशानियों में कमी आएगी, जिससे सीमा पर व्यापार और आवाजाही पहले की तरह सुचारु हो सकेगी।

  • कानून और तकनीक का संगम: जबलपुर में CJI और जजों की अहम बैठक, सीएम-कानून मंत्री भी शामिल

    कानून और तकनीक का संगम: जबलपुर में CJI और जजों की अहम बैठक, सीएम-कानून मंत्री भी शामिल



    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश का जबलपुर शनिवार को देश की न्यायपालिका के एक महत्वपूर्ण आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है। हाईकोर्ट द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सहित सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीश शामिल होंगे। इस कार्यक्रम में केंद्रीय कानून मंत्री और मुख्यमंत्री भी मौजूद रहेंगे।

    यह सेमिनार “फ्रेगमेंटेशन टू फ्यूजन: एम्पॉवरिंग जस्टिस वाया यूनाइटेड डिजिटल प्लेटफॉर्म इंटीग्रेशन” विषय पर आधारित है, जिसका उद्देश्य न्याय व्यवस्था में तकनीक और डिजिटल एकीकरण को मजबूत करना है। कार्यक्रम सुबह 10:30 बजे से नेताजी सुभाषचंद्र बोस कल्चरल एंड इन्फॉर्मेशन सेंटर में आयोजित किया जाएगा।

    मुख्य अतिथि के रूप में CJI की उपस्थिति रहेगी, जबकि राज्य के मुख्यमंत्री और केंद्रीय कानून मंत्री विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ न्यायाधीश भी इस सेमिनार का हिस्सा बनेंगे।

    इस आयोजन में ई-कोर्ट सिस्टम, डेटा इंटीग्रेशन, यूनिफाइड डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीक के माध्यम से न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी और तेज बनाने जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सेमिनार देश में डिजिटल न्याय प्रणाली के भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    कार्यक्रम को देखते हुए जबलपुर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है।

  • Pawan Khera केस पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, तेलंगाना HC के आदेश पर लगी रोक

    Pawan Khera केस पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, तेलंगाना HC के आदेश पर लगी रोक


    नई दिल्ली। कांग्रेस नेता Pawan Khera को लेकर बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम राहत (ट्रांजिट अग्रिम जमानत) के आदेश पर रोक लगा दी है। इससे अब यह मामला (Pawan Khera Case) और ज्यादा गंभीर हो गया है और कानूनी लड़ाई शीर्ष अदालत तक पहुंच गई है।

    दरअसल, तेलंगाना हाईकोर्ट ने पवन खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी, ताकि वे असम की अदालत में जाकर नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकें।

    क्या है Pawan Khera Case?
    यह विवाद उस बयान से जुड़ा है जिसमें पवन खेड़ा ने असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की पत्नी पर कुछ आरोप लगाए थे। इसके बाद असम में उनके खिलाफ कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया।

    एफआईआर दर्ज होने के बाद असम पुलिस उनकी तलाश में जुट गई थी, जिसके चलते उन्होंने गिरफ्तारी से बचने के लिए तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया। वहां से उन्हें सीमित अवधि के लिए राहत मिली थी।

    अब सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
    असम सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार का कहना है कि इस तरह की राहत जांच को प्रभावित कर सकती है और मामला गंभीर है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी गई है, जिससे अब पवन खेड़ा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अब इस मामले में आगे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी, जहां यह तय होगा कि उन्हें राहत मिलती है या नहीं।

    कुल मिलाकर, यह मामला अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद का रूप ले चुका है, जिस पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।

  • अब सिर्फ CJI ही सुनेंगे अर्जेंट केस सुप्रीम कोर्ट का बड़ा नियम बदलाव

    अब सिर्फ CJI ही सुनेंगे अर्जेंट केस सुप्रीम कोर्ट का बड़ा नियम बदलाव


    नई दिल्ली । देश की न्यायिक व्यवस्था में एक अहम बदलाव करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अत्यावश्यक मामलों की सुनवाई को लेकर नया नियम लागू किया है इस नए निर्देश के मुताबिक अब ऐसे मामले जिनमें तुरंत सुनवाई जरूरी हो और जिन्हें नियमित सूचीबद्ध प्रक्रिया का इंतजार नहीं कराया जा सकता उनका उल्लेख केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI के समक्ष ही किया जाएगा

    इस फैसले के बाद अब किसी भी अन्य जज या पीठ के सामने ऐसे मामलों को पेश करने की अनुमति नहीं होगी भले ही मुख्य न्यायाधीश किसी संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हों यह बदलाव 6 अप्रैल को जारी एक आधिकारिक परिपत्र के माध्यम से लागू किया गया है

    पहले की व्यवस्था में यह प्रावधान था कि यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध नहीं हैं या किसी अन्य महत्वपूर्ण पीठ में व्यस्त हैं तो अत्यावश्यक मामलों को उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ जज के सामने उल्लेख किया जा सकता था इससे मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती थी लेकिन अब इस प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया गया है

    नए नियम के तहत अदालत संख्या 1 यानी मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में ही ऐसे मामलों का उल्लेख किया जाएगा और किसी अन्य पीठ के समक्ष इसे प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं होगी इस कदम को न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और स्पष्टता लाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है

    इस बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हाल ही में न्यायिक ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया उन्होंने विभिन्न राज्यों में न्यायिक परिसरों के शिलान्यास के दौरान कहा कि देशभर में न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है

    उन्होंने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओं ने न्याय तक आसान पहुंच को बेहद महत्वपूर्ण माना था और इसी सोच के तहत हर राज्य में उच्च न्यायालय की स्थापना को संवैधानिक जिम्मेदारी बनाया गया उनका मानना है कि न्याय व्यवस्था को मजबूत करना केवल कानूनी जरूरत नहीं बल्कि लोकतंत्र के प्रति एक गंभीर प्रतिबद्धता भी है सुप्रीम कोर्ट का यह नया नियम न्यायिक कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव माना जा रहा है अब देखना यह होगा कि इससे अत्यावश्यक मामलों के निपटारे की प्रक्रिया कितनी प्रभावी और तेज हो पाती है

  • सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी विकास पर राजनीति नहीं चलेगी ममता सरकार को फटकार

    नई दिल्ली: कोलकाता मेट्रो परियोजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई इस सुनवाई की अध्यक्षता कर रहे Surya Kant ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विकास कार्यों को चुनाव या त्योहारों के बहाने टालना संवैधानिक कर्तव्य की अवहेलना है और इस तरह की प्रवृत्ति स्वीकार्य नहीं है

    मामला कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन परियोजना में हो रही देरी से जुड़ा था राज्य सरकार की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि चुनाव और त्योहारों के कारण प्रशासनिक दिक्कतें आ रही हैं जिससे परियोजना की गति प्रभावित हो रही है इसके साथ ही सरकार ने यह भी अनुरोध किया कि मेट्रो कार्यों के लिए ट्रैफिक ब्लॉक को मई तक टाल दिया जाए

    राज्य सरकार ने यह तर्क भी दिया कि संबंधित क्षेत्र से एंबुलेंस और अंग प्रत्यारोपण से जुड़े वाहनों की आवाजाही होती है इसलिए वहां काम रोकने या सीमित करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि ये केवल बहाने हैं और वास्तविकता में विकास कार्यों को टालने का प्रयास किया जा रहा है

    सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि चुनाव आयोग जैसे संस्थान चुनाव के दौरान भी अपने काम को जारी रख सकते हैं तो राज्य सरकार को भी विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए उन्होंने कहा कि जनता के हित से जुड़े कामों को त्योहारों या अन्य कारणों से रोकना उचित नहीं है

    कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में पहले ही हाईकोर्ट ने राज्य को पर्याप्त छूट दी थी लेकिन इसके बावजूद परियोजना में कोई खास प्रगति नहीं हुई अदालत ने राज्य सरकार के रवैये को कर्तव्य में लापरवाही और जिद्दी व्यवहार का उदाहरण बताया

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक प्रशासनिक देरी का मामला नहीं है बल्कि यह जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है अदालत ने यहां तक संकेत दिया कि इस मामले में राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के खिलाफ कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है

    इसके साथ ही अदालत ने कोलकाता हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया कोर्ट ने कहा कि परियोजना को तय समय सीमा में पूरा किया जाना चाहिए और इसमें किसी भी तरह की अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जाएगी

    सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब कोलकाता मेट्रो की ओर से याचिका वापस लेने की कोशिश की गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति नहीं दी और मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया

    कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन परियोजना शहर की यातायात व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है यह परियोजना न केवल आवागमन को सुगम बनाएगी बल्कि शहर में ट्रैफिक दबाव को भी कम करेगी ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी इस परियोजना को गति देने के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखी जा रही है

    इस पूरे मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका अब विकास परियोजनाओं में किसी भी प्रकार की ढिलाई या राजनीतिक बहाने को स्वीकार करने के मूड में नहीं है और भविष्य में इस तरह की लापरवाही पर और भी सख्त रुख अपनाया जा सकता है

    English Tags

  • विजय शाह विवाद सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई पूर्व कानून मंत्री पीसी शर्मा बोले मंत्री पद से हाथ धोना पड़ेगा

    विजय शाह विवाद सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई पूर्व कानून मंत्री पीसी शर्मा बोले मंत्री पद से हाथ धोना पड़ेगा


    मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय शाह की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। उनका विवादित बयान कर्नल सोफिया कुरैशी पर 2025 में दिया गया था और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। आज सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अहम सुनवाई हो रही है। यह विवाद ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शाह द्वारा कथित आपत्तिजनक बयान देने से शुरू हुआ था। आरोप है कि यह बयान सेना अधिकारी की गरिमा को ठेस पहुंचाने और सांप्रदायिक घृणा फैलाने वाला था।

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पहले FIR दर्ज करने का आदेश दिया था जिसे शाह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने SIT गठित की और अगस्त 2025 में जांच पूरी हुई। जनवरी 2026 में कोर्ट ने सरकार को दो हफ्ते में अभियोजन मंजूरी पर फैसला लेने को कहा था लेकिन अब तक मंजूरी लंबित है। कोर्ट ने पहले ही शाह की माफी को देर से देने के कारण खारिज कर दिया था और कहा कि अब मामले में राहत मिलना मुश्किल है।

    पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेस नेता पीसी शर्मा ने सुनवाई से पहले बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि विजय शाह को अब मंत्री पद से हाथ धोना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि शाह ने चार बार माफी मांगी लेकिन कोर्ट अब राहत नहीं देगी। पीसी शर्मा ने इस मामले को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि महिलाओं की गरिमा और सेना अधिकारी के सम्मान का मुद्दा बताया। उनका कहना था कि सरकार के मंत्री द्वारा दिया गया बयान महिलाओं और सेना के सम्मान के खिलाफ था और इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

    सिंह ने कहा कि कांग्रेस इसे महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा का मुद्दा बनाकर जनता तक पहुंचाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार योजनाओं के नाम पर केवल राजनीतिक दावे कर रही है लेकिन वास्तविकता में अपने मंत्री को बचा रही है। कांग्रेस नेता इसे लाडली बहना जैसी योजनाओं की पोल खोलने का अवसर मान रहे हैं।

    SIT रिपोर्ट में धारा 196 BNS के तहत केस मजबूत पाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चाहे सरकार मंजूरी दे या न दे, केस आगे बढ़ेगा। CJI की बेंच ने सरकार से त्वरित फैसला लेने को कहा है। इससे भाजपा सरकार पर दबाव बढ़ गया है। यदि अभियोजन मंजूरी मिलती है तो शाह पर मुकदमा चलेगा और यह उनके राजनीतिक करियर को प्रभावित करेगा। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में उनके प्रभाव को देखते हुए BJP सतर्क है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट की सख्ती से सरकार को अब निर्णय लेना अनिवार्य होगा।

    राजनीतिक स्तर पर यह मामला विपक्ष को अवसर प्रदान कर रहा है। कांग्रेस इसे चुनावी मुद्दा बना सकती है और महिला सम्मान तथा सेना की गरिमा का संदेश जनता तक पहुंचा सकती है। वहीं भाजपा के लिए यह चुनौती बनी हुई है कि वह मंत्री को बचाने की कोशिश में राजनीतिक दबाव और न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन बनाए।आज की सुनवाई इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि इसका नतीजा न केवल विजय शाह के राजनीतिक भविष्य पर प्रभाव डालेगा बल्कि मध्य प्रदेश में महिला सुरक्षा, सेना सम्मान और राजनीतिक नैतिकता को लेकर बहस को भी नया मोड़ देगा।