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  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पूर्व CJI के बेटों की संपत्ति और कमाई का फिर खंगाला जाएगा हिसाब, 2015 का नोटिस वैध

    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पूर्व CJI के बेटों की संपत्ति और कमाई का फिर खंगाला जाएगा हिसाब, 2015 का नोटिस वैध


    नई दिल्ली। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल के बेटों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आयकर विभाग को उनके वित्तीय लेन-देन और कमाई की दोबारा जांच करने की अनुमति दे दी है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पूर्व सीजेआई के बेटों की अपील खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि आयकर विभाग की ओर से वर्ष 2015 में जारी किया गया नोटिस कानूनी रूप से वैध था। इस फैसले के बाद अब आयकर विभाग एक बार फिर दोनों भाइयों की कमाई और संपत्ति से जुड़े पुराने वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर सकेगा। यह मामला कंपनियों के शेयरों की बिक्री और उनसे प्राप्त रकम के मूल्यांकन में कथित अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने की। पीठ ने चेतन सभरवाल और नितिन सभरवाल की ओर से दाखिल अपील को खारिज करते हुए कहा कि आयकर विभाग के पास दोबारा जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद थे। अदालत के अनुसार 31 मार्च 2015 को आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत जारी किया गया नोटिस ठोस तथ्यों और आयकर विभाग की जांच इकाई की रिपोर्ट पर आधारित था। इस रिपोर्ट में वित्तीय लेन-देन से जुड़े ऐसे तथ्य सामने आए थे जिनकी आगे जांच किया जाना जरूरी था। अदालत ने माना कि विभाग की कार्रवाई को केवल इस आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि संबंधित लेन-देन कई साल पुराने हैं।

    इस पूरे मामले की शुरुआत दो कंपनियों पवन इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के शेयरों की बिक्री से हुई थी। जांच में सामने आया कि इन कंपनियों के शेयरों का मूल्य उनकी जमीन और इमारतों की वास्तविक लागत की तुलना में काफी अधिक दिखाया गया था। आरोपों के मुताबिक चेतन सभरवाल और उनके भाई नितिन सभरवाल ने दो अन्य शेयरधारकों के साथ मिलकर जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के साथ शेयर बिक्री का समझौता किया था। इस समझौते के तहत पवन इम्पेक्स के 7.5 लाख शेयर 195 करोड़ रुपये में बेचे गए थे। वहीं एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर के 2.5 लाख शेयरों की बिक्री 60 करोड़ रुपये में हुई थी। इस तरह दोनों कंपनियों के शेयरों का कुल सौदा 255 करोड़ रुपये का बताया गया। समझौते के अनुसार कुल बिक्री राशि में चारों शेयरधारकों को बराबर हिस्सा मिलना था। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में शेयरों के मूल्यांकन और प्राप्त रकम को लेकर सवाल उठे थे।

    आयकर विभाग की जांच इकाई ने दोनों कंपनियों के शेयरों की कीमत और उनसे जुड़े वित्तीय लेन-देन की पड़ताल की। जांच के दौरान अप्रैल 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित एक संपत्ति की खरीद का मामला भी सामने आया। बताया गया कि सभरवाल भाइयों ने अदालत की नीलामी के माध्यम से इस संपत्ति में आधा हिस्सा खरीदा था। जांच में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि संपत्ति में निवेश के लिए कंपनियों के शेयरों की बिक्री से प्राप्त रकम का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद आयकर विभाग ने इस निवेश और शेयर बिक्री के बीच संबंधों की जांच शुरू की।

    जांच रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने निर्धारित चार साल की समयसीमा बीतने के बाद आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत दोबारा आकलन का नोटिस जारी किया था। सभरवाल भाइयों ने इस कार्रवाई को चुनौती दी थी लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के नोटिस को सही माना था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद आयकर विभाग के लिए पुराने वित्तीय लेन-देन की जांच का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि अदालत के इस फैसले का अर्थ किसी को दोषी ठहराना नहीं है बल्कि इसका मतलब है कि विभाग को कानून के तहत दोबारा जांच करने का अधिकार है।

  • कर्मचारियों के पूरे वेतन पर बढ़ा कानूनी पेच हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने SC में लगाई याचिका

    कर्मचारियों के पूरे वेतन पर बढ़ा कानूनी पेच हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने SC में लगाई याचिका


    भोपाल । मध्यप्रदेश में सीधी भर्ती से नियुक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के प्रोबेशन पीरियड में वेतन को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें प्रोबेशन के दौरान लागू 70 80 और 90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया गया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। मामले में अगली सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है।

    राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कई आधार रखते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम निर्धारित करने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला दिया गया है। सरकार का कहना है कि प्रोबेशन के दौरान चरणबद्ध वेतन की व्यवस्था किसी मनमाने फैसले के तहत लागू नहीं की गई थी बल्कि वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में प्रक्रिया और विचार विमर्श के बाद सक्षम स्तर की मंजूरी से इसे लागू किया गया था।

    सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि प्रोबेशन की अवधि केवल नौकरी की शुरुआती अवधि नहीं बल्कि प्रशिक्षण और कर्मचारी की दक्षता के आकलन से जुड़ी प्रक्रिया है। राज्य ने 1966 के सेवा नियमों और वित्तीय नियमों का उल्लेख करते हुए कहा है कि नियुक्ति के शुरुआती दौर में कर्मचारियों को निर्धारित प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। इसी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध भुगतान का प्रावधान किया गया था। सरकार का कहना है कि नीतिगत और सेवा शर्तों से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होना चाहिए जब तक किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान का उल्लंघन सामने न आए।

    मामले का एक अहम पहलू वित्तीय भार भी है। सरकार के मुताबिक यदि 2019 से अब तक प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन के आधार पर अंतर की राशि का भुगतान करना पड़ा तो राज्य के खजाने पर बड़ा अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा। इसके अलावा पुराने कर्मचारियों के एरियर के भुगतान के बाद बढ़े हुए वेतन का असर भविष्य में होने वाली सरकारी भर्तियों के बजट प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।

    सरकार ने अपनी याचिका में पुलिस पटवारी और शिक्षक जैसी बड़ी भर्तियों का भी उल्लेख किया है। राज्य का तर्क है कि पुराने एरियर और वेतन संबंधी अतिरिक्त वित्तीय दायित्व का प्रभाव पूंजीगत कार्यों और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए निर्धारित बजट पर पड़ सकता है। सरकार ने दूसरे राज्यों की व्यवस्था का उदाहरण भी दिया है। इसमें छत्तीसगढ़ में प्रोबेशन के दौरान स्टाइपेंड या कम वेतन की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। हालांकि वहां 2023 में यह व्यवस्था समाप्त कर 100 प्रतिशत वेतन लागू किया गया था लेकिन पुराने समय का एरियर नहीं दिया गया।

    इस विवाद में हाईकोर्ट पहले भी कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दे चुका है। 6 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने और बकाया राशि का 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया था। इसके बाद डबल बेंच ने 12 दिसंबर 2019 से लागू 70 80 और 90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त करते हुए नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया।

    अब राज्य सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। ऐसे में आगे की स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आदेश पर निर्भर करेगी। फिलहाल मामला न्यायिक विचाराधीन है और कर्मचारियों के पूरे वेतन तथा पुराने एरियर को लेकर अंतिम स्थिति शीर्ष अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • हरीश राणा को SC ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दी, देश में पहली बार हुआ ऐसा फैसला

    हरीश राणा को SC ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दी, देश में पहली बार हुआ ऐसा फैसला


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐसा फैसला सुनाया जो आज तक कभी भी किसी मामले में नहीं सुनाया गया। दरअसल, जस्टिस पारदीवाला की बेंच एक मामलें में इच्छा मृत्यु की मांग पर सुनावाई कर रही थी। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। हरीश बीते 13 साल से 100 प्रतिशत दिव्यांगता से जूझ रहे हैं और अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हुए हैं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को पूरी डिग्निटी के साथ पूरा किया जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए दुख जताया
    सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजात दे दी है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान हरीश के घरवालों से भी बात की थी जिसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि ये बेहद दुखद मामला है। लेकिन लड़के की तकलीफ को देखते हुए हमें किसी भी अंतिम फैसले पर पहुंचना होगा जिसके बाद उन्हें इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी गई। कोर्ट ने कहा है कि हरीश राणा को AIIMS के पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाएगा ताकि मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जा सके। बता दें कि भारत में ये पैसिव यूथेनेसिया का पहला मामला है।

    100 प्रतिशत दिव्यांग हैं हरीश राणा
    साल 2013 में हरीश चंडीगढ़ में रहकर अपनी पढाई कर रहे थे जिस दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इसके बाद जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो उनके सिर में गंभीर चोट आई थी। उसके बाद से वह कभी अपने पैर पर नहीं खड़े हो सके। AIIMS के मुताबिक वह 100 प्रतिशत दिव्य़ांग हो गए हैं जिसका इलाज लगभग असंभव है। लगातार बिस्तर पर लेटे रहने के कारण उनके शरीर पर घाव बन गए है। माता-पिता से जब यह तकलीफ नहीं देखी गई तो उन्होंने इच्छा मृत्यु की मांग की जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकृति दे दी।

  • सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एम्स जोधपुर में हुई विशेषज्ञ जांच, मेडिकल रिपोर्ट तलब

    सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एम्स जोधपुर में हुई विशेषज्ञ जांच, मेडिकल रिपोर्ट तलब


    नई दिल्ली । जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद सोनम वांगचुक की तबीयत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट के निर्देश पर शनिवार सुबह कड़ी पुलिस सुरक्षा में सोनम वांगचुक को एम्स जोधपुर ले जाया गया, जहां गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में उनकी करीब डेढ़ घंटे तक विस्तृत चिकित्सकीय जांच की गई। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से पेट दर्द, गैस और गैस्ट्रो से जुड़ी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं और सामान्य इलाज से उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो रहा है।

    सोनम वांगचुक 27 सितंबर 2025 से जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि जेल में उपलब्ध खराब गुणवत्ता वाले पानी के कारण उनके मुवक्किल की तबीयत लगातार बिगड़ रही है। कोर्ट को यह भी बताया गया कि वांगचुक को लगातार पेट से जुड़ी परेशानियां हो रही हैं और जेल में दिया जा रहा सामान्य इलाज उनकी बीमारी के लिए पर्याप्त नहीं है।

    इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिए थे कि सोनम वांगचुक को किसी विशेषज्ञ डॉक्टर, विशेष रूप से गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट को दिखाया जाए। इसी आदेश के तहत शनिवार को उन्हें एम्स जोधपुर ले जाया गया। एम्स सूत्रों के अनुसार, डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति का आकलन किया और जरूरी मेडिकल टेस्ट किए। जांच के बाद उन्हें वापस जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

    गौरतलब है कि सोनम वांगचुक को शुक्रवार को भी मेडिकल जांच के लिए एम्स जोधपुर लाया गया था। डॉक्टरों ने उनकी स्थिति पर नजर रखते हुए आवश्यक जांचें की थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सोनम वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट 2 फरवरी तक अदालत में पेश की जाए, ताकि आगे की कार्रवाई उसी रिपोर्ट के आधार पर तय की जा सके।

    यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की पत्नी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि वांगचुक की सेहत लगातार गिरती जा रही है और जेल की मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाएं उनकी बीमारी के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कैदियों के स्वास्थ्य से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता और जरूरत पड़ने पर उन्हें विशेषज्ञ इलाज उपलब्ध कराना जेल प्रशासन की जिम्मेदारी है।

    इससे पहले हुई सुनवाई में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने जेल अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिया था कि सोनम वांगचुक की जांच गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट से कराई जाए। राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कोर्ट को बताया था कि पिछले चार महीनों में जेल के डॉक्टरों द्वारा सोनम वांगचुक की 21 बार जांच की जा चुकी है और 26 जनवरी को भी उनकी मेडिकल जांच हुई थी। हालांकि कपिल सिब्बल ने इस दलील पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि सामान्य जांच पर्याप्त नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ जेल का खराब पानी है। अब सभी की निगाहें सोनम वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जाएगा और जिसके आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा।