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  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: कैंपस में आवारा कुत्तों की अनुमति जिम्मेदारी और शर्तों के साथ ही संभव

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: कैंपस में आवारा कुत्तों की अनुमति जिम्मेदारी और शर्तों के साथ ही संभव


    नई दिल्ली ।  देश में आवारा कुत्तों को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए शैक्षणिक संस्थानों में उनकी उपस्थिति पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में कॉलेज कैंपसों में आवारा कुत्तों को रखने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन यह सुविधा बिना जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही के नहीं दी जाएगी। इस फैसले को लेकर शिक्षा और पशु कल्याण से जुड़े वर्गों में नई चर्चा शुरू हो गई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शैक्षणिक परिसर में यदि छात्र संगठन या पशु कल्याण से जुड़े समूह आवारा कुत्तों को रखने या उनकी देखभाल करने की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें पहले संस्थान के प्रमुख के समक्ष लिखित रूप में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। इस शर्त का पालन अनिवार्य होगा और इसके बिना किसी भी प्रकार की अनुमति मान्य नहीं मानी जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि परिसर में किसी भी प्रकार की कुत्तों से जुड़ी घटना होती है, चाहे वह काटने की हो या किसी अन्य प्रकार की क्षति की, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित समूहों पर होगी।

    अदालत ने अपने विचार में यह भी स्पष्ट किया कि पशु कल्याण के प्रयासों को मानव सुरक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। शिक्षा संस्थानों का प्राथमिक उद्देश्य सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है, जहां छात्र बिना किसी खतरे के अध्ययन कर सकें। इसलिए किसी भी नीति या व्यवस्था में मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अनिवार्य है।

    इस निर्णय में यह भी कहा गया कि यदि परिसर में आवारा कुत्तों को भोजन देने या उनकी देखभाल की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित और जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। बिना निगरानी या अनियंत्रित तरीके से ऐसी गतिविधियाँ स्वीकार नहीं की जाएंगी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर जानवरों के प्रबंधन को लेकर नियमों का पालन बेहद जरूरी है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटनाओं को रोका जा सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह रुख भी दोहराया कि देशभर में कुत्ता काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं के साथ हुई घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी। इसी कारण शैक्षणिक परिसरों में किसी भी नीति को लागू करते समय सुरक्षा मानकों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।

    इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कॉलेज या विश्वविद्यालय परिसर में आवारा कुत्तों की मौजूदगी अब पूरी तरह अनियंत्रित नहीं हो सकती। यदि कोई समूह या संगठन इस दिशा में काम करना चाहता है, तो उसे न केवल प्रशासनिक अनुमति लेनी होगी, बल्कि सभी कानूनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करना होगा।

    कुल मिलाकर, यह निर्णय पशु कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें स्पष्ट संदेश दिया गया है कि संवेदनशील मुद्दों पर भावनाओं के साथ-साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

  • सार्वजनिक सुरक्षा पर सख्ती: स्कूल, अस्पताल और स्टेशनों से हटेंगे आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    सार्वजनिक सुरक्षा पर सख्ती: स्कूल, अस्पताल और स्टेशनों से हटेंगे आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    नई दिल्ली । देश में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों और डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस विषय में किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जा सकती। इसी क्रम में अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है जिनमें पहले दिए गए आदेश में बदलाव की मांग की गई थी, जिसमें सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश शामिल था। अदालत ने यह भी दोहराया कि डॉग बाइट जैसी घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि ये आम नागरिकों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं।

    सुनवाई के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि कई सार्वजनिक संस्थानों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। अदालत ने यह माना कि इन स्थानों पर सुरक्षा और स्वच्छता दोनों ही प्रभावित होते हैं और ऐसे माहौल में लोगों का आना-जाना जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण से पहले दिए गए निर्देशों को बनाए रखने पर जोर दिया गया है, जिसमें इन क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें दोबारा वहीं न छोड़े जाने की बात शामिल है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी टिप्पणी की कि देश में पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल का क्रियान्वयन कई जगहों पर असमान और कमजोर है। कहीं संसाधनों की कमी है तो कहीं व्यवस्था सही तरीके से लागू नहीं हो पा रही है। इस कारण आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा, जिसका सीधा असर सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ रहा है।

    अदालत ने राज्यों और संबंधित एजेंसियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि यदि समय रहते इन नियमों का प्रभावी पालन किया गया होता तो आज यह स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। कोर्ट ने यह भी माना कि समस्या केवल आदेश देने से हल नहीं होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्यान्वयन और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।

    इस फैसले के बाद सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए जाने की संभावना बढ़ गई है। स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अब प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत होगी ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। अदालत का यह रुख स्पष्ट संकेत देता है कि जन सुरक्षा से जुड़े मामलों में अब किसी भी प्रकार की लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जाएगा और व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर रहेगा।