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  • चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा- निष्पक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन

    चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा- निष्पक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन

    नई दिल्ली । देश में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के लिए कराए जाने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी विशेष गहन संशोधन को पूरी तरह संवैधानिक और वैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूची का समय-समय पर सुधार और शुद्धिकरण आवश्यक है तथा यह चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग को कानून के तहत विशेष परिस्थितियों में मतदाता सूची का विशेष संशोधन कराने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर इस प्रक्रिया को गलत नहीं ठहराया जा सकता कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है। यदि चुनाव आयोग को उचित कारण दिखाई देते हैं तो वह किसी भी समय मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का आदेश दे सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की व्यापक जिम्मेदारी देता है। इसी संवैधानिक दायित्व को प्रभावी बनाने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में आयोग को मतदाता सूची के संशोधन और शुद्धिकरण की शक्तियां दी गई हैं। अदालत ने माना कि विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया इन प्रावधानों के अनुरूप है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का कार्य करती है।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मतदाता के दस्तावेजों में गंभीर विसंगति दिखाई देती है या नागरिकता को लेकर संदेह उत्पन्न होता है तो चुनाव आयोग को संबंधित नामों की जांच और आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि दस्तावेज मांगने या सत्यापन कराने का अर्थ यह नहीं माना जा सकता कि संबंधित व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम रूप से सवाल खड़ा किया जा रहा है। यह केवल मतदाता सूची को अधिक सटीक और त्रुटिरहित बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव आयोग ने मतदाताओं को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए थे। नाम जोड़ने, सुधार कराने, आपत्ति दर्ज करने और अपील करने जैसी व्यवस्थाएं प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाती हैं। नोटिस जारी करना, सार्वजनिक सूचना देना और कानूनी उपाय उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप माना गया।

    दरअसल, इस मामले में कई याचिकाएं दायर कर चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इतने बड़े स्तर पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराने का अधिकार चुनाव आयोग को प्राप्त नहीं है और यह प्रक्रिया नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। कुछ याचिकाओं में यह भी कहा गया था कि पूर्वजों से जुड़े दस्तावेज मांगना अत्यधिक कठोर शर्त है।

    अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए मतदाता सूची का शुद्ध और अद्यतन होना अनिवार्य है। यदि गलत या अपात्र नाम सूची में बने रहते हैं तो इससे लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों की बड़ी पुष्टि माना जा रहा है और आने वाले समय में यह निर्णय चुनावी सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, किसी भी पात्र मतदाता को वोट से वंचित नहीं किया जाएगा..

    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, किसी भी पात्र मतदाता को वोट से वंचित नहीं किया जाएगा..


    नई दिल्ली:   पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले मतदाता सूची को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और निर्णायक आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित नहीं रहेगा और यदि मतदान से ठीक अंतिम समय तक भी किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से राहत मिलती है तो उसे वोट डालने का पूरा अधिकार होगा। इस निर्णय को चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अधिकार भी है। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि अपीलीय निर्णयों के आधार पर तुरंत एक पूरक संशोधित मतदाता सूची तैयार की जाए, ताकि किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदान के समय तक सूची में शामिल किया जा सके और उसे मतदान का अवसर मिल सके।

    अदालत ने व्यवस्था दी है कि जिन मामलों में अपील पर ट्रिब्यूनल मतदान से दो दिन पहले तक निर्णय देता है, उन सभी मतदाताओं के नाम संशोधित सूची में जोड़े जाएंगे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि अपीलीय प्रक्रिया का दुरुपयोग कर चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, जिससे चुनाव की समयबद्धता और सुचारु संचालन प्रभावित हो।

    सुप्रीम कोर्ट ने मतदान की तिथियों के अनुसार स्पष्ट समय सीमा भी निर्धारित की है। पहले चरण के मतदान के लिए यह निर्देश दिया गया है कि जिन अपीलों पर समय रहते निर्णय हो जाता है, उनके नाम निर्धारित समय सीमा के भीतर अंतिम सूची में शामिल किए जाएं। इसी तरह दूसरे चरण के मतदान के लिए भी अपीलीय निर्णयों को आधार बनाकर संशोधित सूची जारी करने का आदेश दिया गया है, ताकि किसी भी पात्र मतदाता को मतदान से वंचित न रहना पड़े।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि ट्रिब्यूनल के निर्णय के तुरंत बाद मतदाता सूची संबंधित अधिकारियों और संबंधित पक्षों तक पहुंचाई जाए, जिससे मतदान के दिन किसी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक बाधा उत्पन्न न हो। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य चुनावी प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तेज और न्यायसंगत बनाना बताया गया है।

    यह पूरा मामला राज्य में चल रही मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में अपीलें लंबित थीं। कम समय में इन सभी मामलों का निपटारा करना एक बड़ी चुनौती बन गया था। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि किसी भी पात्र नागरिक का अधिकार प्रभावित न हो।

    इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मतदाता अधिकारों को 

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना रूह अफजा को फ्रूट ड्रिंक, टैक्स विवाद खत्म, जाने क्‍या दिया फैसला?

    सुप्रीम कोर्ट ने माना रूह अफजा को फ्रूट ड्रिंक, टैक्स विवाद खत्म, जाने क्‍या दिया फैसला?


    नई दिल्ली। भारत में गर्मियों का लोकप्रिय पेय रूह अफ़जा अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्पष्ट रूप से फ्रूट ड्रिंक के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है। लंबे समय से चल रही टैक्स विवाद में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रूह अफ़जा को सिर्फ इसलिए उच्च टैक्स वाले ब्रैकेट में नहीं रखा जा सकता क्योंकि इसे शरबत के रूप में बेचा जाता है।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की बेंच ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि रूह अफ़जा फलों से बनाया जाता है और इसे केवल पानी में मिलाकर पीया जाता है। इसलिए इसे टैक्स कानून के तहत फ्रूट ड्रिंक माना जाएगा।

    विवाद की जड़

    यह मामला हमदर्द वक्फ लैबोरेटरीज की अपील पर सुना गया। सवाल यह था कि रूह अफ़जा, जिसमें केवल 10% फ्रूट जूस होता है और जिसे इनवर्ट शुगर सिरप व हर्बल डिस्टिलेट के साथ मिलाया जाता है, कानूनी रूप से फ्रूट ड्रिंक कहलाया जा सकता है या नहीं।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट और टैक्स अधिकारियों के 2018 के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। इन फैसलों में रूह अफ़जा को उत्तर प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट के तहत 12.5% टैक्सेबल अनक्लासिफाइड आइटम के रूप में देखा गया था।

    सुप्रीम कोर्ट का आदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रूह अफ़जा UPVAT एक्ट की शेड्यूल II पार्ट A की एंट्री 103 के तहत फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट के रूप में आएगा। इस श्रेणी पर 1 जनवरी 2008 से 31 मार्च 2012 तक 4% रियायती VAT दर लागू होती थी।

    मामले में अधिकारियों ने फूड सेफ्टी रेगुलेशन का हवाला देते हुए कहा था कि फ्रूट सिरप में कम से कम 25% फ्रूट जूस होना चाहिए। चूंकि रूह अफ़जा में केवल 10% जूस होता है, इसलिए इसे नॉन-फ्रूट सिरप बताया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि फूड सेफ्टी कानून टैक्सिंग कानून की व्याख्या को नियंत्रित नहीं कर सकता।

  • महाकाल मंदिर में VIP एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: याचिका खारिज, CJI बोले- सब कुछ कोर्ट तय नहीं कर सकता

    महाकाल मंदिर में VIP एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: याचिका खारिज, CJI बोले- सब कुछ कोर्ट तय नहीं कर सकता


    नई दिल्ली। उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध भगवान महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश को लेकर चल रहा कानूनी विवाद अब शांत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर याचिका पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिर परिसर के भीतर किसे प्रवेश दिया जाए और किसे नहीं, यह तय करना पूरी तरह से मंदिर प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों के विवेक का विषय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इन प्रबंधकीय कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

    समानता के अधिकार की दलील खारिज याचिकाकर्ता दर्पण सिंह अवस्थी की ओर से पेश हुए प्रसिद्ध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि या तो सभी श्रद्धालुओं को जलाभिषेक के लिए गर्भगृह में जाने दिया जाए या फिर किसी को भी नहीं। उन्होंने दलील दी कि कलेक्टर की सिफारिश पर ‘वीआईपी’ को प्रवेश देना आम भक्तों के अधिकारों का हनन है। हालांकि, CJI सूर्यकांत ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यदि मंदिर के भीतर मौलिक अधिकारों को इस तरह लागू किया गया, तो व्यवस्था संभालना नामुमकिन हो जाएगा।

    कोर्ट की तल्ख टिप्पणी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाएं श्रद्धा से प्रेरित नहीं लगतीं, बल्कि इनके पीछे कुछ और ही उद्देश्य प्रतीत होता है। बेंच ने चेतावनी दी कि अगर आज गर्भगृह में प्रवेश को समानता के अधिकार से जोड़ा गया, तो कल लोग वहां जाकर अपनी पसंद के मंत्रोच्चार करने या अन्य गतिविधियों के लिए अनुच्छेद 19 वाक् स्वतंत्रता का दावा करने लगेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मंदिर प्रशासन को सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ विवेकपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार है।

    हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली। इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भी इसी तरह का फैसला सुनाया था, जिसे अब शीर्ष अदालत ने भी सही माना है। इस फैसले से साफ है कि महाकाल मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश के नियम यथावत रहेंगे और मंदिर समिति के दिशा-निर्देशों का ही पालन होगा।