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  • Survey: भारत में कम नहीं हुए रोजगार के अवसर… लेकिन AI के दौर में पहली नौकरी पाना हुआ मुश्किल

    Survey: भारत में कम नहीं हुए रोजगार के अवसर… लेकिन AI के दौर में पहली नौकरी पाना हुआ मुश्किल


    नई दिल्ली।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) (Artificial Intelligence – AI) भारत (India) में नौकरियों को निगल नहीं रहा लेकिन कॅरिअर की पहली सीढ़ी को संकरा जरूर कर रहा है। विश्व बैंक (World Bank) की ताजा रिपोर्ट इंडिया डेवलपमेंट अपडेट अक्तूबर 2026 में यह दावा किया गया है। 

    रिपोर्ट के मुताबिक, 10 शहरों की 651 आईटी कंपनियों के सर्वे में एआई के कारण कुल रोजगार में कमी नहीं मिली लेकिन 55 फीसदी कंपनियों ने नए कर्मचारियों की भर्ती घटा दी। मध्यम स्तर की भर्ती घटाने वाली कंपनियां 25 फीसदी और वरिष्ठ पदों पर घटाने वाली 14% थीं। रिपोर्ट का आकलन है कि समायोजन अब तक मुख्यतः धीमी भर्ती के रास्ते हुआ है, मौजूदा कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी से नहीं। रूटीन कोडिंग, टेस्टिंग, डॉक्यूमेंटेशन और डेटा प्रोसेसिंग जैसे काम, जो आम तौर पर फ्रेशर्स के हिस्से आते थे, एआई के लिए सबसे आसान हैं।

    आईटी क्षेत्र की तस्वीर बंटी हुई है। छह सबसे बड़ी आईटी-सेवा कंपनियों ने 17 लाख के संयुक्त कार्यबल में से करीब 64 हजार कम किए। इसी दौरान जीसीसी (ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर) समेत बाकी टेक-सेवा क्षेत्र ने तीन साल में करीब सात लाख लोगों को जोड़ा। इससे इस क्षेत्र का कुल रोजगार लगभग 44 लाख पहुंच गया। रिपोर्ट इसे पूरे उद्योग का सिकुड़ना नहीं, चुनिंदा बड़ी कंपनियों में कर्मचारी संख्या की छंटाई मानती है।

    नोमुरा के मुताबिक, 2022 से अगस्त 2026 के बीच एशिया की 69 कंपनियों की घोषणाओं में करीब 1.31 लाख एआई-संबंधी भर्तियां और 61 हजार छंटनी दर्ज हुए। भारत में 83,100 भर्तियां और 31,921 छंटनी हुईं, यानी शुद्ध करीब 51 हजार पदों की बढ़त।


    किस पर और कितना प्रभाव?

    भारत में कुल रोजगार का केवल 22 प्रतिशत हिस्सा एआई के ‘उच्च जोखिम’ के दायरे में आता है, जबकि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में यह आंकड़ा लगभग 60 प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण भारत में कृषि और मैनुअल कार्यों की अधिकता है।

    22 प्रतिशत हिस्से में से 8 प्रतिशत कार्य ऐसे हैं जहां एआई काम का स्वरूप बदल देगा (जैसे वित्तीय और दूरसञ्चार सेवाएं), जबकि 14 प्रतिशत हिस्से (जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा) में उत्पादकता बढ़ने की संभावना है। एआई का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी, उच्च शिक्षित और पेशवर युवाओं पर पड़ रहा है, जबकि खेत मजदूरों और निर्माण श्रमिकों पर इसका असर नगण्य है।


    कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी हो रहा इस्तेमाल

    एआई और भारत का श्रम बाजार आमने-सामने नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बनकर खड़े हो रहे हैं। वैश्विक मंच पर एआई को अपनाने के मामले में भारत 83 अर्थव्यवस्थाओं में 10वें स्थान पर है।


    कृषि में क्रांति:

    केरल का काथिर प्लेटफॉर्म (केरल कृषि प्रौद्योगिकी केंद्र और सूचना भंडार) और महाराष्ट्र का महाविस्तार-एआई उपग्रह तस्वीरों और एआई एनालिटिक्स के जरिये किसानों को उनकी अपनी स्थानीय भाषा में बोलकर कीट नियंत्रण, मौसम और मंडी भाव की सटीक जानकारी दे रहे हैं।


    स्वास्थ्य सेवा में चमत्कार:

    एआई-संचालित चेस्ट एक्स-रे टूल्स दूरदराज के गांवों में बिना इंटरनेट के भी गंभीर बीमारियों की पहचान पारंपरिक तरीकों से कहीं अधिक सटीकता और बेहद कम खर्च में कर रहे हैं।

  • जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई

    जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के जातिगत सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने दलितों, पिछड़े समुदायों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की बात कही है। उनकी इस मांग ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

    कांग्रेस देशभर में जातिगत जनगणना के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है। पार्टी का तर्क है कि प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संसाधनों के बंटवारे से जुड़े फैसलों के लिए अलग-अलग समुदायों की वास्तविक संख्या का पता होना जरूरी है।

    लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने एक अलग ही सवाल खड़ा हो गया है। राज्य में जातिगत सर्वे पहले ही हो चुका है और उसकी नई रिपोर्ट नवंबर 2025 से तैयार है। ऐसे में सिद्धारमैया अब अपनी ही पार्टी की सरकार पर इस रिपोर्ट को लागू करने का दबाव बना रहे हैं।

    बेंगलुरु में 6 सितंबर को कर्नाटक स्टेट बैकवर्ड कास्ट्स फेडरेशन के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने जातिगत सर्वे लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर सभी को सामाजिक न्याय देना है तो कम से कम 75 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए।

    सिद्धारमैया का कहना है कि आरक्षण अलग-अलग समुदायों की आबादी के अनुपात में होना चाहिए। उन्होंने केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात नहीं की। उनका तर्क है कि सामाजिक और राजनीतिक समानता के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी प्रतिनिधित्व जाति और आबादी के अनुरूप होना चाहिए।

    कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि विश्वसनीय जातिगत आंकड़ों के बिना सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व से जुड़े दावे अनुमानों पर आधारित रहेंगे। लेकिन कर्नाटक में स्थिति अलग है। यहां कांग्रेस सरकार के पास पहले से ही जातिगत सर्वे की रिपोर्ट मौजूद है।

    यही वजह है कि सिद्धारमैया की मांग कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है। अगर जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण और प्रतिनिधित्व में बदलाव की मांग उठती है, तो राज्य में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

    कर्नाटक में जातिगत सर्वे की शुरुआत सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री रहते उनके पिछले कार्यकाल में हुई थी। 2015 में एच. कंठराज के नेतृत्व में यह सर्वे कराया गया और 2017 तक पूरा हो गया था। हालांकि, इसकी रिपोर्ट कभी राजनीतिक रूप से लागू नहीं हो सकी। राज्य के प्रभावशाली लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों की ओर से आपत्तियां सामने आई थीं।

    इसके बाद जेडीएस-कांग्रेस और बीजेपी की सरकारों ने भी इसे बड़े नीतिगत फैसले के आधार के तौर पर आगे बढ़ाने से परहेज किया। 2023 में सिद्धारमैया के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। 2025 में उनकी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन इसके साथ आंकड़ों की विश्वसनीयता और उनकी पुरानापन को लेकर सवाल भी उठे।

    इसके बाद सिद्धारमैया ने नए सिरे से जातिगत सर्वे का आदेश दिया। नई कवायद का उद्देश्य ज्यादा मौजूदा आंकड़े तैयार करना और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के तौर पर भी देखा गया।

    मई में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सिद्धारमैया ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है। इसके बावजूद जातिगत जनगणना और समानुपातिक आरक्षण का मुद्दा उठाकर उन्होंने कर्नाटक की मौजूदा कांग्रेस सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लिए सिद्धारमैया की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। ऐसा करने पर कांग्रेस पर यह सवाल उठ सकता है कि वह बीजेपी के खिलाफ जातिगत न्याय की बात तो करती है, लेकिन अपने शासन वाले राज्य में उसी सिद्धांत को लागू करने से पीछे क्यों हट रही है।

    दूसरी ओर, सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की अपनी राजनीतिक कीमत भी हो सकती है। कर्नाटक में कई प्रभावशाली समुदाय आरक्षण, प्रतिनिधित्व और राज्य के संसाधनों को लेकर अलग-अलग दावे रखते हैं। ऐसे में जातिगत आंकड़ों के आधार पर बदलाव करने से कुछ समुदायों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है।

    कांग्रेस 2027 की जनगणना में जातियों की गणना को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी ने ओबीसी की संख्या दर्ज किए जाने को लेकर भी केंद्र पर निशाना साधा है और जनगणना के प्रश्नपत्र में ओबीसी श्रेणी को कथित तौर पर शामिल नहीं किए जाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    2027 की जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य जातियों की भी राष्ट्रीय स्तर पर गणना की जाएगी। आजादी के बाद यह पहली बार होगा जब इस तरह जातियों की गणना राष्ट्रीय स्तर पर की जाएगी। लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने 2027 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है। राज्य में पहले ही जातिगत सर्वे हो चुका है और नई रिपोर्ट भी तैयार है। यही स्थिति कांग्रेस के लिए असली परीक्षा बन गई है।

  • दक्षिण एशियाई देशों में भारत की वैश्विक छवि पर प्यू रिसर्च सर्वे, श्रीलंका में भारत के प्रति सर्वाधिक सकारात्मक दृष्टिकोण

    दक्षिण एशियाई देशों में भारत की वैश्विक छवि पर प्यू रिसर्च सर्वे, श्रीलंका में भारत के प्रति सर्वाधिक सकारात्मक दृष्टिकोण

    नई दिल्ली ।अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा दक्षिण एशिया के चार प्रमुख देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में किए गए एक ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े सामने आए हैं। इस सर्वेक्षण में अंतरराष्ट्रीय संबंधों, पड़ोसी देशों की धारणाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर वयस्कों की राय ली गई। रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका दक्षिण एशिया का एकमात्र ऐसा मुल्क उभरकर सामने आया है, जहां के नागरिक भारत के प्रति अत्यधिक सकारात्मक रुख रखते हैं।

    सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, श्रीलंका में 79 प्रतिशत लोगों ने भारत के पक्ष में अपनी राय दी है, जबकि 63 प्रतिशत श्रीलंकाई नागरिकों ने भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी देश माना है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में केवल सात प्रतिशत लोगों ने ही भारत के प्रति सकारात्मक भावना व्यक्त की। बांग्लादेश में 42 प्रतिशत लोगों का रुख भारत के प्रति सकारात्मक पाया गया, हालांकि वहां भारत को खतरा मानने वालों की संख्या भी उल्लेखनीय रही।

    रिपोर्ट में बांग्लादेश और भारत के बीच द्विपक्षीय धारणाओं में आई गिरावट को भी रेखांकित किया गया है। वर्तमान में केवल 25 प्रतिशत भारतीय बांग्लादेश के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर धारणा में कमी दर्ज की गई है। ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, वर्ष 2024 में जहां 57 प्रतिशत बांग्लादेशी भारत के पक्ष में थे, वहीं भारत में यह आंकड़ा 35 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

    भारत और पाकिस्तान के बीच पारस्परिक संबंधों पर सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि दोनों देशों की बहुसंख्यक आबादी एक-दूसरे को अपने लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा मानती है। वहीं वैश्विक सहयोगियों के प्रश्न पर 36 प्रतिशत भारतीयों ने रूस को अपना सबसे प्रमुख और भरोसेमंद सहयोगी बताया, जबकि 16 प्रतिशत ने अमेरिका का नाम लिया। मध्य प्रदेश सहित देश भर के विदेश नीति विशेषज्ञों की नजरें इस रणनीतिक रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।

    वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को लेकर अमेरिका में किए गए अध्ययन में 54 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि वैश्विक मंच पर भारत का प्रभाव स्थिर बना हुआ है। वहीं 30 प्रतिशत अमेरिकियों ने माना कि भारत का प्रभाव वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ा है। राजनीतिक आधार पर अमेरिकी डेमोक्रेट्स के बीच भारत के प्रति समर्थन अधिक देखने को मिला। यह सर्वेक्षण दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक और क्षेत्रीय समीकरणों की एक स्पष्ट झलक पेश करता है।

  • ग्यूपी में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा में हलचल, सर्वे रिपोर्ट से कई विधायकों की बढ़ी चिंता

    ग्यूपी में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा में हलचल, सर्वे रिपोर्ट से कई विधायकों की बढ़ी चिंता

    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आंतरिक सर्वे ने मुरादाबाद मंडल के कई विधायकों की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी के लिए कराए गए सर्वे में कई क्षेत्रों में विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी सामने आने की चर्चा है। सूत्रों के मुताबिक, एंटी इनकंबेंसी से बचने के लिए सर्वे एजेंसी ने करीब 35 प्रतिशत विधायकों के टिकट बदलने का सुझाव दिया है।

    तीन सर्वे पूरे, चौथा अगस्त-सितंबर में संभव
    भाजपा प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के तहत अब तक तीन चरणों में सर्वे करा चुकी है। बताया जा रहा है कि तीनों सर्वे में कई क्षेत्रों में विधायकों के प्रति असंतोष एक समान रूप से सामने आया है। अगस्त-सितंबर में चौथे चरण का सर्वे भी कराए जाने की संभावना है, जिसके बाद पार्टी आगे की रणनीति तय कर सकती है।

    मुरादाबाद मंडल में बढ़ी बेचैनी
    मुरादाबाद मंडल को समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है। यहां की 27 विधानसभा सीटों में से फिलहाल भाजपा के पास 12 सीटें हैं, जबकि 14 सीटों पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है। रामपुर की स्वार सीट भाजपा के सहयोगी दल अपना दल (एस) के खाते में है।

    मंडल के 12 भाजपा विधायकों में से 10 लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। केवल रामवीर सिंह (कुंदरकी) और आकाश सक्सेना (रामपुर) उपचुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं।

    35% टिकट बदलने की चर्चा
    पार्टी सूत्रों के अनुसार, सर्वे एजेंसी ने जिन क्षेत्रों में जन असंतोष अधिक पाया है, वहां नए उम्मीदवार उतारने की सिफारिश की है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि किन विधायकों के नाम इस सूची में हैं, लेकिन यह चर्चा तेज है कि मुरादाबाद मंडल के कुछ विधायक भी इस दायरे में आ सकते हैं। इससे संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच हलचल बढ़ गई है।

    भाजपा का आधिकारिक रुख
    भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर ने कहा कि पार्टी समय-समय पर सर्वे कराती रहती है। फिलहाल विधानसभा चुनाव के लिए टिकट आवेदन की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है और पार्टी का मुख्य फोकस एमएलसी चुनाव पर है।

    मंडल के लगातार दूसरी बार चुने गए भाजपा विधायक

    बलदेव सिंह औलख (बिलासपुर)
    राजबाला (मिलक)
    गुलाब देवी (चंदौसी)
    रितेश गुप्ता (मुरादाबाद नगर)
    राजीव तरारा (मंडी धनौरा)
    महेंद्र खड़गवंशी (हसनपुर)
    सुचि चौधरी (बिजनौर)
    सुशांत सिंह (बढ़ापुर)
    अशोक राणा (धामपुर)
    ओम कुमार (नहटौर)

    मंडल में भाजपा की स्थिति

    जिला भाजपा विधायक
    बिजनौर 4
    रामपुर 3
    मुरादाबाद 2
    अमरोहा 2
    संभल 1

    हालांकि टिकटों को लेकर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है, लेकिन आंतरिक सर्वे की चर्चाओं ने चुनाव से करीब एक साल पहले ही भाजपा के भीतर राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।

  • यूपी चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा, मुरादाबाद की छह सीटों पर तीसरा सर्वे पूरा, 20 दावेदारों के नाम चर्चा में

    यूपी चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा, मुरादाबाद की छह सीटों पर तीसरा सर्वे पूरा, 20 दावेदारों के नाम चर्चा में


    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने मुरादाबाद जिले की छह विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन के लिए तीसरे चरण का सर्वे पूरा कर लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, अब तक हुए तीनों सर्वे में करीब 20 संभावित दावेदारों के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं। इनमें मौजूदा विधायक, पूर्व विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख, नगर पालिका चेयरमैन और संगठन से जुड़े कई पदाधिकारी शामिल हैं।

    तीन चरण पूरे, अभी दो सर्वे बाकी
    भाजपा विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर लगातार सक्रिय है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य भी हाल के महीनों में मुरादाबाद का दौरा कर चुके हैं। इसके साथ ही पार्टी विभिन्न अभियानों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है।

    उम्मीदवार चयन के लिए भाजपा अलग-अलग एजेंसियों से सर्वे करा रही है। पहला सर्वे जनवरी में, दूसरा मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर करीब एक महीने तक चला, जबकि तीसरा सर्वे जून में कराया गया, जिसकी प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है।

    इन सीटों पर ये नाम सबसे अधिक चर्चा में

    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, तीनों सर्वे में निम्न विधानसभा क्षेत्रों से इन संभावित दावेदारों के नाम सबसे अधिक चर्चा में रहे—
    मुरादाबाद नगर: विधायक रितेश गुप्ता, पूर्व महानगर अध्यक्ष मनोज गुप्ता, महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला।
    मुरादाबाद देहात: डॉ. के.के. मिश्रा, श्याम बिहारी मिश्रा, क्षेत्रीय उपाध्यक्ष (अनुसूचित मोर्चा) रजनीकांत जाटव।
    कांठ: पूर्व विधायक राजेश कुमार सिंह ‘चुन्नू’, डिलारी ब्लॉक प्रमुख पूनम चौधरी, जिला पंचायत सदस्य विनोद सैनी और राजपाल सिंह।
    ठाकुरद्वारा: पूर्व जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह चौहान, अजय प्रताप सिंह और पूर्व सांसद सर्वेश सिंह की पत्नी साधना सिंह।
    बिलारी: परमेश्वर लाल सैनी, पूर्व जिलाध्यक्ष सुरेश सैनी, नगर पालिका चेयरमैन रघुराज सिंह यादव और ऋषिपाल चौधरी।
    कुंदरकी: विधायक रामवीर सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. शैफाली सिंह और किसान मोर्चा के क्षेत्रीय महामंत्री दिनेश ठाकुर।

    सर्वे में पूछे गए ये प्रमुख सवाल

    भाजपा की सर्वे एजेंसियों ने मतदाताओं और स्थानीय लोगों से कई बिंदुओं पर फीडबैक लिया। प्रमुख सवालों में शामिल रहे—
    – विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की वर्तमान स्थिति कैसी है?
    – मौजूदा विधायक या संभावित दावेदार की लोकप्रियता कितनी है?
    – केंद्र सरकार की योजनाओं को जनता किस नजरिए से देख रही है?
    – योगी सरकार के कामकाज को लेकर लोगों की क्या राय है?
    – विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार चुनने का आधार क्या होना चाहिए?
    – यदि पहला विकल्प न हो तो दूसरे संभावित उम्मीदवार का नाम कौन हो सकता है?

    सितंबर या दिसंबर में होगा अंतिम सर्वे
    भाजपा सूत्रों के अनुसार, उम्मीदवारों के चयन से पहले कुल पांच चरणों में सर्वे कराए जाने हैं। फिलहाल दो सर्वे बाकी हैं। यदि विधानसभा चुनाव समय से पहले नवंबर या दिसंबर में होते हैं, तो सितंबर में होने वाला चौथा सर्वे अंतिम माना जाएगा। वहीं, यदि चुनाव तय समय पर हुए तो दिसंबर में पांचवां और अंतिम सर्वे कराया जाएगा।

    क्षेत्रीय पदाधिकारी का नाम तीसरे सर्वे में आया
    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, एक क्षेत्रीय पदाधिकारी का नाम पहले दो सर्वे में चर्चा में नहीं था, लेकिन तीसरे सर्वे में वह सामने आया। हालांकि, एजेंसी को यह नाम मुख्य रूप से पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा में मिला, जबकि आम जनता के बीच उनकी पहचान सीमित पाई गई।

    भाजपा महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला ने कहा कि सर्वे की प्रक्रिया लगातार चल रही है और यह अंतिम सर्वे नहीं है। वहीं, भाजपा जिलाध्यक्ष आकाश पाल का कहना है कि पार्टी एजेंसियों के माध्यम से जमीनी स्तर पर फीडबैक लेकर संगठन और संभावित उम्मीदवारों की स्थिति का आकलन करती है।

  • Survey: एथेनॉल मिक्स E 20 पेट्रोल से सहज नहीं लोग…. NDA के 53% वोटर्स भी हिचक रहे

    Survey: एथेनॉल मिक्स E 20 पेट्रोल से सहज नहीं लोग…. NDA के 53% वोटर्स भी हिचक रहे


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) देशभर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिक्स E20 पेट्रोल (E20 Ethanol-Blended Petrol) को बढ़ावा दे रही है. सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, प्रदूषण कम होगा और गन्ना किसानों को फायदा मिलेगा. हालांकि, C-Voter के हालिया सर्वे से सामने आया है कि बड़ी संख्या में लोग अभी भी E20 पेट्रोल को लेकर सहज नहीं हैं. सर्वे के मुताबिक, आधे से अधिक लोग न केवल E20 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, बल्कि उन्हें यह भी डर है कि इससे उनकी गाड़ी की माइलेज कम हो सकती है और इंजन को नुकसान पहुंच सकता है।


    NDA समर्थकों में भी E20 को लेकर हिचक

    सर्वे में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सत्ता पर काबिज NDA के समर्थकों में भी E20 पेट्रोल को लेकर उत्साह नहीं दिखा. सर्वे के अनुसार, 52.5 प्रतिशत NDA समर्थकों ने कहा कि वे अपनी गाड़ियों में E20 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करना चाहेंगे. केवल 18.1 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया, जबकि 29.5 प्रतिशत लोग अभी भी इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर पाए हैं. विपक्षी दलों के समर्थकों में E20 के प्रति विरोध और ज्यादा देखने को मिला।


    E20 से बचने का महंगा रास्ता चुन रहे लोग, 5 गुना बढ़ी प्रीमियम पेट्रोल की मांग

    57.9 प्रतिशत विपक्षी समर्थकों ने कहा कि वे अपनी गाड़ियों में E20 पेट्रोल नहीं डलवाना चाहते. वहीं, अन्य राजनीतिक दलों के समर्थकों में भी 55 प्रतिशत लोगों ने इसे अस्वीकार किया. कुल मिलाकर 55.1 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे E20 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, जबकि केवल 17.1 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया।


    गडकरी के बयान के बाद बढ़ी चर्चा

    यह सर्वे ऐसे समय सामने आया है जब केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने E20 पेट्रोल के विरोधियों को चुनौती देते हुए कहा था कि वे ऐसा एक भी व्यक्ति सामने लाएं जिसकी गाड़ी को एथेनॉल मिक्स पेट्रोल से नुकसान हुआ हो. इसके जवाब में प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उनके पास ऐसे छह लोग हैं, जिनकी गाड़ियों पर E20 का प्रतिकूल असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि वे मीडिया के सामने आने से पहले गडकरी से मिलना चाहते हैं।

    सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि E20 पूरी तरह सुरक्षित है और विशेषज्ञों की राय भी इसी के पक्ष में है. दूसरी ओर, कई वाहन मालिकों का कहना है कि E20 पेट्रोल से माइलेज कम हो जाती है और खासकर E10 या उससे पुराने मानकों के लिए बनी गाड़ियों में इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।


    सरकार की नीति को भी सीमित समर्थन

    सर्वे में केवल E20 पेट्रोल ही नहीं, बल्कि एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी पर भी लोगों की राय ली गई. इसमें 52 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की सरकारी पॉलिसी का समर्थन नहीं करते. इसके मुकाबले सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों ने इस नीति का समर्थन किया, जबकि बाकी लोग असमंजस में रहे. NDA समर्थकों में भी 48.2 प्रतिशत लोगों ने इस नीति का विरोध किया. केवल 24.4 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया, जबकि 27.4 प्रतिशत लोग निर्णय नहीं ले सके।


    माइलेज घटने और इंजन खराब होने की चिंता

    सर्वे के अनुसार, लोगों की सबसे बड़ी चिंता वाहन की परफॉर्मेंस को लेकर है. 52.8 प्रतिशत लोगों का मानना है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों की माइलेज कम हो जाती है. NDA समर्थकों में 51.2 प्रतिशत और विपक्षी समर्थकों में 55.4 प्रतिशत लोगों ने भी यही चिंता जताई. इंजन को नुकसान पहुंचने को लेकर भी लोगों की आशंकाएं काफी मजबूत हैं. 54.2 प्रतिशत लोगों का मानना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अधिकांश वाहनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है. NDA समर्थकों में यह आंकड़ा 49.9 प्रतिशत रहा, जबकि विपक्षी समर्थकों में 60.2 प्रतिशत लोगों ने ऐसा माना।

    इसके अलावा 14.3 प्रतिशत लोगों का मानना है कि E20 केवल कुछ विशेष प्रकार के वाहनों को नुकसान पहुंचा सकता है. वहीं, केवल 10.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इससे वाहनों को कोई नुकसान नहीं होता।


    पुराने वाहनों के मालिकों की चिंता

    सर्वे में यह भी सामने आया कि 56.3 प्रतिशत लोगों का मानना है कि E20 पेट्रोल को अनिवार्य बनाना पुराने वाहनों के मालिकों के साथ अन्याय होगा. NDA समर्थकों में 49.2 प्रतिशत और विपक्षी समर्थकों में 65.8 प्रतिशत लोगों ने इस राय से सहमति जताई।


    लोग चाहते हैं विकल्प मिले

    हालांकि E20 को लेकर विरोध काफी अधिक है, लेकिन सर्वे में एक बात पर लगभग सभी वर्गों में सहमति दिखाई दी. 75.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि बाजार में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल और सामान्य पेट्रोल दोनों उपलब्ध रहने चाहिए, ताकि उपभोक्ता अपनी जरूरत और वाहन के अनुसार विकल्प चुन सकें. NDA समर्थकों में भी 72.4 प्रतिशत लोगों ने इस मांग का समर्थन किया. इसी तरह 74.5 प्रतिशत लोगों का मानना है कि यदि E20 पेट्रोल बेचा जाता है तो इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल से कम होनी चाहिए. NDA समर्थकों में 75.6 प्रतिशत लोगों ने भी यही राय दी।

    हालांकि कीमत कम होने पर भी लोगों का भरोसा पूरी तरह नहीं बनता दिखा. केवल 40.8 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर E20 सस्ता होगा तो वे इसका इस्तेमाल करेंगे, जबकि 40.4 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि कम कीमत होने के बावजूद वे इसे नहीं अपनाएंगे।


    सरकार के दावे पर बंटी राय

    केंद्र सरकार का कहना है कि E20 नीति से भारत का कच्चे तेल का आयात कम होगा. इस दावे पर 37.2 प्रतिशत लोगों ने पूरी तरह सहमति जताई, जबकि 19.5 प्रतिशत लोगों ने आंशिक सहमति व्यक्त की. दूसरी ओर, 17.1 प्रतिशत लोगों ने इस दावे से पूरी तरह असहमति जताई और 14.1 प्रतिशत लोगों ने आंशिक असहमति व्यक्त की. जब लोगों से पूछा गया कि सरकार E20 पेट्रोल को बढ़ावा क्यों दे रही है, तो 27.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल के आयात को कम करना है. 21.3 प्रतिशत लोगों का मानना था कि सरकार गन्ना किसानों को लाभ पहुंचाना चाहती है, जबकि 11 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसका प्रमुख उद्देश्य प्रदूषण कम करना है।


    कैसे हुआ सर्वे?

    यह सर्वे C-Voter ने 8 और 9 जुलाई के बीच Computer Assisted Telephone Interviewing (CATI) पद्धति से कराया. इसमें देशभर के 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के 1,641 लोगों से बातचीत की गई. C-Voter के अनुसार, सर्वे के आंकड़ों को जनगणना और चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के आधार पर देश की जनसांख्यिकीय संरचना के अनुरूप वेटेज दिया गया. सर्वे का मार्जिन ऑफ एरर मैक्रो स्तर पर ±3 प्रतिशत और माइक्रो स्तर पर ±5 प्रतिशत बताया गया है।

  • गोल्ड खरीदारी को लेकर बदल रही सोच: सर्वे में सामने आया पीएम मोदी की अपील का प्रभाव

    गोल्ड खरीदारी को लेकर बदल रही सोच: सर्वे में सामने आया पीएम मोदी की अपील का प्रभाव

    नई दिल्ली । देश में बढ़ती आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सोने की खरीदारी को लेकर लोगों की सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में हुए एक सर्वे में यह सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का असर अब आम लोगों के व्यवहार पर भी दिखाई देने लगा है। बड़ी संख्या में भारतीयों ने अगले एक साल तक गैर-जरूरी सोना खरीदने से बचने की बात कही है।

    कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और अनावश्यक सोने की खरीद पर नियंत्रण रखने की अपील की थी। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करना बताया गया था। अब एक सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि लोगों ने इस अपील को गंभीरता से लिया है और अपनी खरीदारी की आदतों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है।

    सर्वे में शामिल लोगों में से लगभग 61 प्रतिशत ने कहा कि वे अगले एक वर्ष तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी से बचने का प्रयास करेंगे। इनमें कई ऐसे लोग भी शामिल हैं जो नियमित रूप से सोना खरीदते रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक परिस्थितियों और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के चलते लोग अब खर्च को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं।

    भारत में सोने की खरीदारी केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और पारिवारिक महत्व भी काफी गहरा है। शादियों, त्योहारों और पारंपरिक आयोजनों में सोना खरीदना लंबे समय से भारतीय समाज का हिस्सा रहा है। इसके बावजूद सर्वे में बड़ी संख्या में लोगों का सोना खरीदने को लेकर संयम दिखाना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बीते वित्तीय वर्ष में भारत का सोना आयात बिल काफी बढ़ गया। वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में तेज उछाल के कारण आयात की कुल लागत रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई। हालांकि आयात की मात्रा में बहुत ज्यादा वृद्धि नहीं हुई, लेकिन ऊंची कीमतों ने विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पैदा किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग गैर-जरूरी सोना खरीदने में कमी करते हैं तो इससे देश की आर्थिक स्थिति को कुछ हद तक राहत मिल सकती है। विदेशी मुद्रा की बचत होने से आयात संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी और आर्थिक दबाव कम किया जा सकेगा।

    हालांकि सर्वे में यह भी सामने आया कि सभी लोग अपनी पारंपरिक आदतें बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। करीब 19 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे शादियों और पारिवारिक जरूरतों के लिए सोना खरीदना जारी रखेंगे। कई लोगों का यह भी मानना है कि आर्थिक अस्थिरता के दौर में सोना अब भी सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में से एक है।

    इस सर्वे ने यह साफ कर दिया है कि देश में आर्थिक मुद्दों को लेकर लोगों की जागरूकता बढ़ रही है और सरकारी अपीलों का असर अब आम नागरिकों की सोच और फैसलों में भी दिखाई देने लगा है।

  • एमसीडी क्षेत्रों में जनगणना अभियान की शुरुआत, हर घर से जुटाई जाएगी विस्तृत जनसांख्यिकी जानकारी

    एमसीडी क्षेत्रों में जनगणना अभियान की शुरुआत, हर घर से जुटाई जाएगी विस्तृत जनसांख्यिकी जानकारी


    नई दिल्ली ।  देश की राजधानी में जनसंख्या और आवास से जुड़े आंकड़ों को अधिक सटीक और व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से जनगणना 2027 की तैयारियां तेज कर दी गई हैं। इस प्रक्रिया के पहले चरण की शुरुआत एमसीडी क्षेत्रों में घर-घर सर्वेक्षण के साथ की गई है, जिसमें मकानों की सूची तैयार करने और परिवारों से संबंधित विस्तृत जानकारी एकत्र करने का कार्य किया जा रहा है। इस अभियान का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी घर या परिवार का डेटा छूट न जाए और शहर की वास्तविक जनसंख्या संरचना को सही ढंग से समझा जा सके।

    इस व्यापक अभियान के तहत लगभग 32 लाख मकानों का विस्तृत सर्वे किया जाएगा, जिसके लिए पूरे क्षेत्र को 46 हजार से अधिक छोटे ब्लॉकों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक ब्लॉक में करीब 180 से 200 घर शामिल किए गए हैं और अनुमान है कि हर ब्लॉक में 700 से 800 लोग निवास करते हैं। इस कार्य के लिए लगभग 50 हजार जनगणना कर्मियों को तैनात किया गया है, जो निर्धारित क्षेत्रों में जाकर डिजिटल टैबलेट के माध्यम से जानकारी एकत्र करेंगे और उसे सीधे ऑनलाइन सिस्टम में दर्ज करेंगे।

    इस प्रक्रिया में प्रत्येक जनगणना कर्मी को एक निश्चित ब्लॉक सौंपा गया है और उन्हें घर-घर जाकर परिवारों की स्थिति, मकान की संरचना, उपलब्ध सुविधाओं और संपत्तियों से जुड़े लगभग 33 प्रश्नों के उत्तर दर्ज करने होंगे। इस बार विशेष रूप से किरायेदारों के आंकड़ों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि शहर की बड़ी आबादी किराए के मकानों में रहती है। इस डेटा के आधार पर शहरी विकास और भविष्य की योजनाओं को अधिक प्रभावी और वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जाएगा।

    सर्वेक्षण के दौरान यदि किसी घर में ताला लगा हुआ मिलता है तो संबंधित कर्मी दोबारा वहां जाएंगे और यदि कोई परिवार दिन में उपलब्ध नहीं होता है तो उनके घर का दौरा देर रात तक भी किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर परिवार का डेटा सही तरीके से दर्ज किया जाए। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जनगणना कर्मियों और सुपरवाइजरों की निगरानी व्यवस्था भी मजबूत की गई है, जहां हर छह कर्मियों पर एक पर्यवेक्षक तैनात किया गया है।

    इसके साथ ही नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा के लिए जनगणना कर्मियों की पहचान को भी सत्यापित करने की व्यवस्था की गई है, जिसमें उनके पहचान पत्र और क्यूआर कोड स्कैन करके उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सकती है। पहले से ही कई लोगों ने स्व-गणना के माध्यम से अपनी जानकारी दर्ज कर दी है, जिसे आगे चलकर फील्ड सर्वे के दौरान सत्यापित किया जाएगा।

    कुल मिलाकर यह पूरा अभियान न केवल जनसंख्या के सटीक आंकड़े जुटाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह शहरी नियोजन, संसाधन प्रबंधन और विकास योजनाओं के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करेगा, जिससे आने वाले वर्षों में शहर के विकास को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

  • PM मोदी का वैश्विक लोकप्रियता में दबदबा कायम… सर्वे में शीर्ष पर बरकरार…

    PM मोदी का वैश्विक लोकप्रियता में दबदबा कायम… सर्वे में शीर्ष पर बरकरार…


    नई दिल्ली।
    वैश्विक लोकप्रियता सर्वे (Global Popularity Survey) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) अभी भी शीर्ष पर बरकरार हैं। अमेरिकी ओपिनियन रिसर्च इंस्टीट्यूट मॉर्निंग कंसल्ट की ओर से जारी हालिया सर्वेक्षण के नतीजों में यह बात सामने आई है। सर्वे में यह भी कहा गया कि वैश्विक राजनीति में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का दबदबा साबित कर दिया है। करीब 24 लोकतांत्रिक देशों में किए गए इस सर्वे में शामिल 70 फीसदी लोगों ने उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ अन्य वैश्विक नेताओं की तुलना में काफी ऊंचा है। वहीं, दूसरी ओर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज इस मामले में पिछड़ गए हैं, उन्हें दुनिया का सबसे अलोकप्रिय नेता आंका गया है। इस सूची में दूसरे स्थान पर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग (63 फीसदी) और तीसरे स्थान पर चेक गणराज्य के प्रधानमंत्री आंद्रेज बाबिस (55 फीसदी) रहे। लेकिन मोदी शीर्ष पर रहे।
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    मॉर्निंग कंसल्ट के सर्वे में यह भी कहा गया कि एक ओर जहां भारतीय प्रधानमंत्री की वैश्विक स्वीकार्यता और मजबूत हो रही है। वहीं, यूरोप के प्रमुख देशों के नेताओं को जनता के विरोध और अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति की लोकप्रियता का स्तर भी गिर गया है।

    मैक्रों और ट्रंप की स्थिति
    लोकप्रियता के मामले में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों दूसरे सबसे अलोकप्रिय नेता हैं, जिनसे 75% जनता असंतुष्ट है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस सूची में नीचे से 10वें स्थान पर हैं। ईरान के साथ संघर्ष जैसी चुनौतियों के बावजूद, लगभग 38% अमेरिकियों ने ट्रंप के कामकाज का समर्थन किया है। बता दें, 2025 में दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता रेटिंग लगभग 47-51% के बीच थी। अप्रैल 2026 तक इसका स्तर -18 के पास पहुंच गया, जिससे वे आधुनिक समय के सबसे कम लोकप्रिय राष्ट्रपतियों में से एक बन गए।

  • भोपाल: मिलन स्वीट्स पर इनकम टैक्स की रेड, टैक्स चोरी के शक में दस्तावेज खंगाले, संचालक से पूछताछ जारी

    भोपाल: मिलन स्वीट्स पर इनकम टैक्स की रेड, टैक्स चोरी के शक में दस्तावेज खंगाले, संचालक से पूछताछ जारी


     

    भोपाल। भोपाल के एमपी नगर स्थित प्रतिष्ठित मिलन स्वीट्स और रेस्टोरेंट पर रविवार सुबह इनकम टैक्स विभाग की टीम ने अचानक सर्वे कार्रवाई की, जिससे रेस्टोरेंट में हड़कंप मच गया। टीम ने टैक्स चोरी की आशंका को लेकर रेस्टोरेंट में मौजूद दस्तावेजों और रिटर्न से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले और संचालक से पूछताछ की। जानकारी के मुताबिक, टीम इस जांच में कर चोरी के सबूत जुटाने में जुटी है।

    स्थानीय लोगों के अनुसार, आईटी विभाग की टीम के आने के बाद रेस्टोरेंट में अफरातफरी का माहौल बन गया और भीड़ जमा हो गई। इनकम टैक्स विभाग का उद्देश्य इस कार्रवाई के माध्यम से कर से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना और किसी भी तरह की आर्थिक गड़बड़ी पर नज़र रखना है।

    गौरतलब है कि जून 2024 में भी मिलन स्वीट्स में भीषण आग लगी थी। आग पर काबू पाने के लिए एक दर्जन से अधिक दमकल की गाड़ियां मौके पर आई थीं और लगभग तीन घंटे की मशक्कत के बाद आग पर नियंत्रण पाया गया। इस घटना में रेस्टोरेंट को बड़ा नुकसान हुआ था, जिसमें मिठाइयां, अन्य खाद्य सामग्री और कई दस्तावेज जलकर खाक हो गए थे।

    इस बार की सर्वे कार्रवाई में आईटी टीम ने वही दस्तावेज और रिटर्न रिकॉर्ड खंगाले, जो पहले आग में नष्ट हो चुके थे, ताकि वित्तीय जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और सटीक हो सके। टीम रेस्टोरेंट संचालक से विस्तृत पूछताछ कर रही है और कर चोरी या किसी भी नियम उल्लंघन की पुष्टि करने की कोशिश कर रही है।

    पुलिस भी इस कार्रवाई में सहयोग कर रही है ताकि किसी तरह की अफरातफरी या सुरक्षा संबंधी समस्या न हो। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ऐसे प्रतिष्ठित रेस्टोरेंटों में भी अगर टैक्स नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो विभाग कठोर कार्रवाई करेगा।

    इस मामले में कर विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार इन्वेस्टिगेशन और दस्तावेज़ जांच से न केवल कर चोरी रोकने में मदद मिलेगी, बल्कि अन्य व्यापारियों के लिए भी नैतिक और कानूनी उदाहरण स्थापित होगा।

    यदि जांच में सबूत मिलते हैं, तो मिलन स्वीट्स संचालक के खिलाफ विभाग आवश्यक कानूनी कार्रवाई कर सकता है। फिलहाल, आईटी टीम पूरे रेस्टोरेंट में दस्तावेजों की पड़ताल और पूछताछ जारी रखे हुए है, ताकि सभी वित्तीय रिकॉर्ड का सत्यापन हो सके और कर नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।