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  • चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने CJI सूर्यकांत को लिखा पत्र, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग

    चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने CJI सूर्यकांत को लिखा पत्र, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग

    नई दिल्ली । देश की चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इंडिया गठबंधन से जुड़े 23 राजनीतिक दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संयुक्त पत्र भेजकर चुनावी व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चिंता व्यक्त की है। विपक्षी दलों ने पत्र में न्यायपालिका से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की मूल आधारशिला हैं और इनकी विश्वसनीयता बनाए रखना सभी संवैधानिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।

    संयुक्त पत्र में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि वर्तमान परिस्थितियों में चुनावी प्रक्रिया को लेकर व्यापक स्तर पर संदेह और अविश्वास का वातावरण बन रहा है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने वाले हों। इसी उद्देश्य से उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से संवैधानिक दायरे में आवश्यक हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है।

    पत्र में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान आयोग का रवैया पूरी तरह निष्पक्ष दिखाई नहीं देता। उनका कहना है कि आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े मामलों में समान मानकों का पालन नहीं किया गया और कई अवसरों पर सत्ताधारी दल के नेताओं के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि कई मामलों में विपक्षी दलों के प्रति आयोग का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत कठोर रहा।

    पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। विपक्षी दलों का कहना है कि जब किसी भी संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो न्यायपालिका नागरिकों और राजनीतिक दलों के लिए अंतिम संवैधानिक मंच के रूप में सामने आती है। इसलिए उन्होंने न्यायपालिका से चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया है।

    इससे पहले भी चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ मुद्दों को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग सामने आ चुकी है। हाल के दिनों में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया तथा अन्य चुनाव संबंधी विषयों को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित करने के प्रयास किए गए थे। अब विपक्षी दलों के संयुक्त पत्र ने इस पूरे मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

    विपक्षी दलों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था की गरिमा को चुनौती देना नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखना है। पत्र में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि मजबूत लोकतंत्र के लिए सभी संवैधानिक संस्थाओं का स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह तरीके से कार्य करना आवश्यक है। उनका मानना है कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता लोकतंत्र की स्थिरता और जनविश्वास से सीधे जुड़ी हुई है।

    फिलहाल इस संयुक्त पत्र पर सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की ओर से भी इस पत्र में लगाए गए आरोपों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी जारी नहीं की गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर न्यायिक और राजनीतिक स्तर पर होने वाली गतिविधियों पर सभी की नजर बनी रहेगी।

  • चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा संयुक्त पत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा संयुक्त पत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । देश में चुनावी प्रक्रिया और निर्वाचन व्यवस्था को लेकर विपक्षी दलों ने एक बार फिर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी गठबंधन से जुड़े 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र लिखकर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया, चुनाव आयोग की निष्पक्षता तथा चुनावी व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है। अब इस पत्र को सार्वजनिक किए जाने के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

    संयुक्त पत्र में विपक्षी दलों ने दावा किया है कि देश की चुनावी प्रक्रिया के संबंध में कई गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। पत्र में कहा गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हैं तथा इस व्यवस्था की रक्षा करना न्यायपालिका का महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व है। विपक्ष का कहना है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तब न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान की भावना के अनुरूप आवश्यक हस्तक्षेप करे।

    पत्र में चुनाव आयोग की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि आयोग की निष्पक्षता को लेकर जनता के बीच संदेह की स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रियाओं के दौरान आयोग का रवैया कई अवसरों पर पक्षपातपूर्ण प्रतीत हुआ है। विपक्ष का यह भी कहना है कि आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघनों पर समान रूप से कार्रवाई नहीं होने के कारण चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई है।

    विपक्षी दलों ने अपने पत्र में यह भी आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संस्थागत तंत्र अपेक्षित स्तर पर प्रभावी दिखाई नहीं दे रहा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में सभी संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास बना रहना आवश्यक है और यदि किसी संस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं तो उसका समाधान संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए।

    पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि विपक्ष न्यायपालिका की भूमिका और स्वतंत्रता का सम्मान करता है तथा उसका उद्देश्य किसी संस्था की गरिमा पर प्रश्न उठाना नहीं है। इसके विपरीत, विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब विभिन्न स्तरों पर मतभेद या विवाद उत्पन्न होते हैं, तब न्यायपालिका अंतिम संवैधानिक मंच के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी आधार पर मुख्य न्यायाधीश से चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने और आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया गया है।

    विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनके अनुसार यदि चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर संदेह बढ़ता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी कारण उन्होंने चुनावी प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    इस घटनाक्रम के बाद चुनावी सुधार, निर्वाचन आयोग की भूमिका और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज होने की संभावना है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों, संवैधानिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाएगी। फिलहाल विपक्ष का यह संयुक्त पत्र देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर जारी बहस का एक अहम राजनीतिक दस्तावेज बनकर सामने आया है।

  • SIR विवाद पर विपक्ष की न्यायपालिका से दखल की मांग, 23 राजनीतिक दल और एक निर्दलीय सांसद एकजुट, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर जताई गहरी चिंता


    नई दिल्ली । देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन- SIR) अभियान को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। विपक्षी गठबंधन ‘INDIA जनबंधन’ से जुड़े 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संयुक्त पत्र भेजकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची के सत्यापन की वर्तमान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक मानकों के अनुरूप बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित न हों।

    विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है और इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि या विवाद चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकता है। इसी कारण सभी दलों ने एकजुट होकर सर्वोच्च न्यायपालिका का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करने का निर्णय लिया है। उनका मानना है कि इस विषय पर न्यायिक स्तर पर आवश्यक मार्गदर्शन और निगरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने पहले भी आपसी स्तर पर कई दौर की चर्चा की थी। हाल ही में आयोजित बैठक में विभिन्न दलों ने चुनाव आयोग द्वारा संचालित SIR प्रक्रिया और उससे जुड़े अन्य चुनावी विषयों पर साझा रणनीति तैयार की। बैठक में यह सहमति बनी कि इन चिंताओं को औपचारिक रूप से देश के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए। बाद में इस पहल को व्यापक समर्थन मिला और संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले दलों की संख्या बढ़कर 23 हो गई।

    संयुक्त पत्र को कई प्रमुख विपक्षी नेताओं और राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है। इसमें विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के दल भी शामिल हैं। एक निर्दलीय सांसद ने भी इस पहल का समर्थन करते हुए हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का कहना है कि यह कदम किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    विवाद का केंद्र चुनाव आयोग द्वारा संचालित स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन अभियान है। इस प्रक्रिया के तहत घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। साथ ही परिवार आधारित विवरण का मिलान, रिकॉर्ड का अद्यतन तथा फर्जी या डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हटाने की कार्रवाई भी की जा रही है। चुनाव आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना बताया जा रहा है, ताकि भविष्य में चुनाव प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय हो सके।

    हालांकि विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान कई स्थानों पर वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। उनका कहना है कि यदि सत्यापन अभियान पूरी पारदर्शिता और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के साथ नहीं चलाया गया तो बड़ी संख्या में पात्र नागरिक अपने मतदान अधिकार से वंचित हो सकते हैं। विपक्ष ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों की स्वतंत्र समीक्षा और प्रभावी निगरानी आवश्यक है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बहस का विषय बन सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजे गए इस संयुक्त पत्र पर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है और चुनाव आयोग इस संबंध में उठाई गई चिंताओं पर किस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया देता है। आने वाले समय में यह मुद्दा चुनावी सुधार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़ी चर्चा का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है।

  • साइबर ठगी पर CJI सूर्यकांत का सख्त संदेश, जमानत से इनकार करते हुए बोले- ‘परजीवी हो, समाज के लिए जेल में रहना ही बेहतर’

    साइबर ठगी पर CJI सूर्यकांत का सख्त संदेश, जमानत से इनकार करते हुए बोले- ‘परजीवी हो, समाज के लिए जेल में रहना ही बेहतर’

    नई दिल्ली । साइबर अपराधों के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। साइबर ठगी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि साइबर अपराधी समाज और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे तत्व हैं, जिनके प्रति नरमी बरतना उचित नहीं होगा। न्यायालय की इस टिप्पणी ने साइबर अपराधों को लेकर न्यायपालिका के सख्त दृष्टिकोण को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि साइबर ठगी में शामिल लोग देशभर के नागरिकों को निशाना बनाते हैं और बड़ी संख्या में लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। अदालत का मानना था कि ऐसे अपराध केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था को प्रभावित नहीं करते, बल्कि व्यापक स्तर पर वित्तीय व्यवस्था और आम लोगों के भरोसे को भी कमजोर करते हैं। इसी कारण अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

    न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि साइबर अपराधी विभिन्न राज्यों में सक्रिय होकर लोगों को ठगी का शिकार बनाते हैं। वे तकनीक का दुरुपयोग कर निवेश, बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन से जुड़े फर्जीवाड़े को अंजाम देते हैं। अदालत के अनुसार ऐसे मामलों में अपराध का दायरा किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव देशभर में फैल जाता है। यही वजह है कि इस प्रकार के अपराधों को गंभीरता से देखना आवश्यक है।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि साइबर अपराध के मामलों में न्यायपालिका को बेहद सतर्क और कठोर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। अदालत का मानना है कि डिजिटल युग में साइबर अपराध लगातार जटिल और संगठित होते जा रहे हैं, जिससे आम नागरिकों की मेहनत की कमाई पर सीधा खतरा पैदा हो रहा है। इसलिए ऐसे आरोपियों को राहत देने से पहले अपराध की प्रकृति और उसके प्रभाव का गंभीरता से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

    इस टिप्पणी के बाद साइबर अपराधों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और न्यायिक सख्ती को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन निवेश के बढ़ते चलन के साथ साइबर ठगी के मामलों में भी वृद्धि हुई है। ऐसे में अदालतों की सख्त टिप्पणियां न केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों का मनोबल बढ़ाती हैं, बल्कि संभावित अपराधियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश का काम करती हैं।

    यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि कुछ समय पहले मुख्य न्यायाधीश की एक अन्य टिप्पणी राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनी थी। उस टिप्पणी को लेकर विभिन्न वर्गों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। हालांकि इस बार साइबर अपराधियों पर की गई सख्त टिप्पणी को लेकर व्यापक स्तर पर लोगों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत अलग दिखाई दे रही है। कई लोग इसे बढ़ते साइबर अपराधों के खिलाफ आवश्यक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं।

    कानूनी जानकारों का कहना है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी चुनौती नहीं रह गए हैं, बल्कि यह आर्थिक सुरक्षा और नागरिकों के डिजिटल विश्वास से भी जुड़ा विषय बन चुका है। ऐसे में अदालतों द्वारा दिए जा रहे कड़े संदेश यह संकेत देते हैं कि भविष्य में भी साइबर ठगी और डिजिटल अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायपालिका का रुख सख्त बना रह सकता है। फिलहाल इस मामले में जमानत से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि व्यापक जनहित को प्रभावित करने वाले साइबर अपराधों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

  • NEET UG पुनर्परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ, CJI सूर्यकांत बोले- मामला पहले से दूसरी बेंच के समक्ष लंबित

    NEET UG पुनर्परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ, CJI सूर्यकांत बोले- मामला पहले से दूसरी बेंच के समक्ष लंबित

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट यूजी) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्परीक्षा के खिलाफ दायर एक नई याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। याचिका में कहा गया था कि कथित पेपर लीक की घटनाएं कुछ सीमित परीक्षा केंद्रों और व्यक्तियों तक सीमित थीं, इसलिए पूरे देश के लगभग 22 लाख अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले पर अलग से सुनवाई करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि नीट से जुड़े सभी मामले पहले से एक अन्य पीठ के समक्ष लंबित हैं और यही याचिका भी उसी पीठ के सामने रखी जा सकती है।

    इस वर्ष 3 मई को आयोजित नीट यूजी परीक्षा के बाद कई राज्यों से पेपर लीक और परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे। इन आरोपों के बाद परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए। मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और कानूनी बहस का रूप ले लिया, जिसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया। अब पुनर्परीक्षा 21 जून को आयोजित की जानी है।

    सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका में तर्क दिया गया कि कथित गड़बड़ियां सीमित दायरे में थीं और पूरे देश के छात्रों को पुनर्परीक्षा के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता ने अदालत से पुनर्परीक्षा के फैसले की समीक्षा करने और प्रभावित छात्रों की स्थिति पर विचार करने की मांग की थी। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस विषय से संबंधित सभी मामलों पर न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ पहले से सुनवाई कर रही है। ऐसे में नई याचिका पर अलग से विचार करना उचित नहीं होगा।

    नीट परीक्षा विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पहले से कई याचिकाएं लंबित हैं। इनमें परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाने, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने और एजेंसी के पुनर्गठन जैसी मांगें भी शामिल हैं। इन मामलों की सुनवाई आने वाले महीनों में जारी रहने की संभावना है और इनके परिणाम भविष्य की परीक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

    इस बीच परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग को लेकर दायर एक अन्य याचिका पर भी अदालत पहले अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। 1 जून को दायर याचिका में पेन-पेपर मोड के बजाय कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली लागू करने की मांग की गई थी। अदालत ने उस याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि परीक्षा आयोजन में अब बहुत कम समय बचा है और अंतिम समय में इतनी बड़ी व्यवस्था परिवर्तन करना व्यावहारिक नहीं होगा।

    न्यायालय ने यह भी माना था कि परीक्षा रद्द होने के बाद दोबारा आयोजन अपने आप में एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। लाखों छात्रों के लिए नए सिरे से परीक्षा आयोजित करना, केंद्रों की व्यवस्था करना और सुरक्षा सुनिश्चित करना पहले ही परीक्षा अधिकारियों के लिए कठिन कार्य है। ऐसे में अतिरिक्त निर्देश या नए बदलाव तैयारियों को प्रभावित कर सकते हैं।

    देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा मानी जाने वाली नीट यूजी के माध्यम से लाखों छात्र मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्राप्त करते हैं। इसलिए परीक्षा से जुड़े हर निर्णय का सीधा प्रभाव छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। फिलहाल 21 जून को प्रस्तावित पुनर्परीक्षा की तैयारियां जारी हैं, जबकि परीक्षा रद्द करने, पेपर लीक, परीक्षा प्रबंधन और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की भूमिका से जुड़े व्यापक मुद्दों पर संबंधित पीठ जुलाई में आगे सुनवाई करेगी। छात्रों, अभिभावकों और शैक्षणिक संस्थानों की निगाहें अब उसी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित विवाद की आगे की दिशा तय हो सकती है।

  • ट्रांसजेंडर संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अलग-अलग हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई पर लगाई रोक; सभी मामलों की होगी एकसाथ सुनवाई

    ट्रांसजेंडर संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अलग-अलग हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई पर लगाई रोक; सभी मामलों की होगी एकसाथ सुनवाई

    नई दिल्ली । ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। देश के विभिन्न हाई कोर्ट में इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग-अलग सुनवाई की स्थिति को देखते हुए शीर्ष अदालत ने संबंधित कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले को एकीकृत रूप से सुनने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अदालत के इस निर्णय को न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार की उस याचिका पर विचार किया, जिसमें विभिन्न हाई कोर्ट में लंबित मामलों को एक स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि एक ही कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़े मामलों की अलग-अलग मंचों पर सुनवाई से परस्पर विरोधी आदेश आने की संभावना बनी रहती है। ऐसे में यह उचित होगा कि सभी मामलों पर या तो एक ही हाई कोर्ट विचार करे या फिर शीर्ष अदालत स्वयं इस विषय पर अंतिम निर्णय दे।

    वर्तमान में इस संशोधन कानून को लेकर राजस्थान, कर्नाटक, केरल और दिल्ली सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संशोधित कानून ट्रांसजेंडर समुदाय के उन अधिकारों को प्रभावित करता है जिन्हें पहले न्यायपालिका द्वारा मान्यता दी जा चुकी है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य अधिकारों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक स्पष्ट बनाना है।

    सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से प्रस्तुत पक्ष में यह दलील दी गई कि मामले की संवैधानिक प्रकृति और इसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए सभी याचिकाओं को एक साथ सुनना आवश्यक है। यह भी कहा गया कि इस विषय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय पहले ही न्यायपालिका द्वारा दिया जा चुका है, इसलिए आगे की सुनवाई व्यापक कानूनी दृष्टिकोण के साथ होनी चाहिए।

    विवाद के केंद्र में वर्ष 2014 का वह ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार मौलिक अधिकारों के दायरे में माना गया था। संशोधन कानून को चुनौती देने वाले पक्षों का कहना है कि नया प्रावधान उस सिद्धांत को कमजोर कर सकता है जिसे न्यायपालिका ने पहले स्वीकार किया था। इसी आधार पर कई याचिकाओं में कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह स्पष्ट संकेत दिया है कि विषय गंभीर संवैधानिक महत्व का है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस मामले पर विचार के लिए बड़ी पीठ गठित करने की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि सभी कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की व्यापक समीक्षा की जा सके।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न न्यायालयों में चल रही कार्यवाही पर रोक लगाने से मामले में एकरूपता आएगी और सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का समान अवसर मिलेगा। साथ ही इससे देशभर में लागू होने वाले किसी भी अंतिम निर्णय को लेकर भ्रम की स्थिति भी कम होगी।

    अब सभी पक्षों की प्रतिक्रियाएं प्राप्त होने के बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि लंबित याचिकाओं को सीधे अपने पास सुनवाई के लिए रखा जाए या किसी एक उच्च न्यायालय को संयुक्त रूप से इन मामलों पर विचार करने की जिम्मेदारी दी जाए। आने वाले समय में इस मामले का फैसला ट्रांसजेंडर अधिकारों, संवैधानिक व्याख्या और सामाजिक न्याय से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को प्रभावित कर सकता है।

  • महिला वकीलों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा रोडमैप, CJI सूर्यकांत ने 50% प्रतिनिधित्व की वकालत कर दिया स्पष्ट संदेश

    महिला वकीलों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा रोडमैप, CJI सूर्यकांत ने 50% प्रतिनिधित्व की वकालत कर दिया स्पष्ट संदेश

    नई दिल्ली । भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि इस दिशा में एक मजबूत और दीर्घकालिक संस्थागत व्यवस्था तैयार की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रवेश स्तर पर अवसर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि महिलाएं अपने पूरे पेशेवर जीवन में आगे बढ़ सकें और नेतृत्वकारी भूमिकाओं तक पहुंच सकें।

    लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी पेशे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि न्यायिक और कानूनी संस्थाओं में संतुलित भागीदारी समय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करने के उद्देश्य से विभिन्न स्तरों पर कई पहलें शुरू की गई हैं और भविष्य में भी इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।

    कार्यक्रम के दौरान उनसे यह सवाल पूछा गया कि बड़ी संख्या में छात्राएं कानून की पढ़ाई तो करती हैं, लेकिन करियर के मध्य चरण तक पहुंचते-पहुंचते अनेक महिलाएं इस पेशे से बाहर हो जाती हैं। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह एक वास्तविक समस्या है और इसे केवल नीतिगत घोषणाओं से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संस्थागत समर्थन, समान अवसर और पेशेवर विकास के अनुकूल वातावरण तैयार करना आवश्यक है।

    उन्होंने बताया कि पहले भी उन्होंने सुझाव दिया था कि सरकारी पैनलों में लॉ ऑफिसर के पदों पर महिलाओं की नियुक्तियों का अनुपात 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की पर्याप्त मौजूदगी न केवल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है बल्कि न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित और समावेशी भी बनाती है।

    मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बार काउंसिल, जिला बार एसोसिएशन और अन्य बार संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। उनका उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें महिला वकीलों को नेतृत्व के अवसर भी मिल सकें। उन्होंने संकेत दिया कि संस्थागत सुधारों के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी को स्थायी रूप से मजबूत करने की योजना पर कार्य जारी है।

    महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे के अलावा मुख्य न्यायाधीश ने भारत की न्यायिक व्यवस्था के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक वास्तविकताओं, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप एक स्वदेशी न्यायशास्त्र विकसित करना चाहिए। उनके अनुसार, भारतीय अदालतों को ऐसे कानूनी सिद्धांतों और व्याख्याओं को बढ़ावा देना चाहिए जो देश की विशिष्ट आवश्यकताओं और सामाजिक संदर्भों को प्रतिबिंबित करें।

    उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी बदलावों के दौर में न्यायपालिका को आत्मनिर्भर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसी सोच के तहत भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तंत्र विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। उनका मानना है कि भविष्य की न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की भूमिका बढ़ेगी, इसलिए भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्वतंत्र और विश्वसनीय डिजिटल ढांचा तैयार करना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश के इन विचारों को न्यायपालिका में लैंगिक समानता, संस्थागत सुधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। उनका संदेश स्पष्ट था कि न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी, प्रतिनिधिक और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने के लिए व्यापक स्तर पर सुधारों की आवश्यकता है, जिन पर लगातार कार्य किया जा रहा है।

  • सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा कदम: हाईकोर्ट में जजों की जल्द बहाली और महिला प्रतिनिधित्व पर जोर

    सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा कदम: हाईकोर्ट में जजों की जल्द बहाली और महिला प्रतिनिधित्व पर जोर


    नई दिल्ली:
    देश की न्यायपालिका में जजों के खाली पदों और लंबित मामलों की समस्या किसी से छिपी नहीं है. सुनवाई का बारी आने तक कई मामलों में न्याय मिलने में लंबा समय लग जाता है. यही नहीं, न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी भी हमेशा चर्चा का विषय रही है. इस गंभीर स्थिति को देखते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सीजेआई सूर्यकांत ने बड़ा कदम उठाया है.

    सीजेआई ने हाल ही में देश के सभी 25 हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को विस्तृत पत्र लिखा है. इस पत्र में उन्होंने हाईकोर्ट्स में जजों की जल्द नियुक्ति करने का निर्देश दिया और महिला जजों के प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देने पर जोर दिया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी जज के रिटायर होने तक खाली पद का इंतजार न किया जाए, बल्कि नियुक्ति की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी जाए ताकि न्यायपालिका में काम बाधित न हो.

    सीजेआई सूर्यकांत ने हाईकोर्ट कॉलेजियम से आग्रह किया है कि वे महिलाओं के लिए नियुक्तियों पर गंभीरता से विचार करें. उन्होंने कहा कि यह अपवाद नहीं बल्कि नियम होना चाहिए कि योग्य और मेधावी महिला वकीलों को उच्च न्यायपालिका में स्थान मिले. इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि जिन महिला वकीलों का संबंध संबंधित राज्यों से है लेकिन वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं, उन्हें भी इस दिशा में देखा जाना चाहिए.

    महिला जजों की नियुक्तियों में सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिला है. वर्तमान में कई हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में महिलाएं कार्यरत हैं. उदाहरण के लिए, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में 18 महिला जज काम कर रही हैं, जबकि मद्रास और बॉम्बे हाईकोर्ट में लगभग एक दर्जन महिला जज अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं. जिला स्तर पर न्यायिक अधिकारियों में भी लगभग 36.3 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं, जिसे सीजेआई ने पीढ़ीगत बदलाव का संकेत बताया है.

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा फरवरी में लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2014 के बाद से हाईकोर्ट में 170 महिला जजों की नियुक्ति हुई है, जिनमें से 96 पिछली पांच वर्षों में हुईं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट में कुल 6 महिला जज नियुक्त हुई हैं. वर्तमान में देश के सभी हाईकोर्ट में कुल 116 महिला जज कार्यरत हैं. हाईकोर्ट में 1122 स्वीकृत पदों में से 308 पद खाली हैं, जबकि कार्यरत जजों की संख्या 814 है. सुप्रीम कोर्ट में 33 जज हैं, जिनमें फिलहाल एक महिला शामिल हैं.

    सीजेआई सूर्यकांत का यह पत्र न्यायपालिका में सुधार और महिलाओं के लिए अवसर बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. उनका कहना है कि न्यायपालिका में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी समय की मांग है और इसके लिए उच्च न्यायालयों को सक्रिय और त्वरित कदम उठाने चाहिए. इस पहल से न केवल जजों के खाली पदों की समस्या हल होगी, बल्कि न्यायपालिका में महिलाओं की भूमिका भी मजबूत होगी और लंबित मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया तेज होगी.

    यह कदम देश की न्यायपालिका में नए युग की शुरुआत का संकेत देता है, जिसमें महिला प्रतिनिधित्व और कार्यकुशलता को प्राथमिकता दी जाएगी.

  • CJI सूर्यकांत के सामने ही गुहार लगने लगीं ममता बनर्जी, बोली-संविधान, लोकतंत्र को बचा लीजिए

    CJI सूर्यकांत के सामने ही गुहार लगने लगीं ममता बनर्जी, बोली-संविधान, लोकतंत्र को बचा लीजिए


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने CJI सूर्यकांत से देश के संविधान, लोकतंत्र और न्यायपालिका की रक्षा करने का शनिवार को आग्रह किया। कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच के भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में बनर्जी ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत से देश के लोगों को ‘‘एजेंसियों’’ द्वारा गलत तरीके से निशाना बनाये जाने से बचाने का भी आह्वान किया।
    बिना विस्तृत जानकारी दिए उन्होंने कहा, ‘कृपया देश के संविधान, लोकतंत्र, न्यायपालिका, इतिहास और भूगोल को विनाश से बचाएं।’ बनर्जी ने कहा, ‘‘आप (प्रधान न्यायाधीश) हमारे संविधान के संरक्षक हैं, हम आपके कानूनी संरक्षण में हैं। कृपया जनता की रक्षा करें।’’
    न्यायमूर्ति सूर्यकांत भी कार्यक्रम में मौजूद थे।
    मीडिया ट्रायल को रोकना होगा

    बनर्जी ने कहा, ‘आजकल मामलों के निपटारे से पहले ही ‘मीडिया ट्रायल’ का चलन है; इसे भी रोकना होगा।’ एक जनसभा के बाद अपने व्हाट्सएप चैनल पर एक पोस्ट में, श्री बनर्जी ने पश्चिम मेदिनीपुर को एक ऐसी भूमि के रूप में चित्रित किया जिसने औपनिवेशिक विरोधी संघर्ष से लेकर 2011 के राजनीतिक उथल-पुथल तक बार-बार दमन के खिलाफ आवाज उठायी है। गौरतलब है कि वर्ष 2011 में टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को समाप्त किया था।

    उन्होंने पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के लंबे राजनीतिक प्रतिरोध के इतिहास का भी इस मौके पर जिक्र किया। बनर्जी ने लिखा, “अविभाजित मेदिनीपुर की धरती ने ब्रिटिश साम्राज्य की कठोर पकड़ को चुनौती देते हुए अत्याचार, शोषण और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की गर्जना की थी। उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए, पश्चिम मेदिनीपुर के लोग 2011 में लोकतंत्र की बहाली के लिए अग्रणी भूमिका में खड़े हुए।”

    राणा संकल्प सभा में भारी जनसमूह की उपस्थिति का जिक्र करते हुए, तृणमूल नेता ने जोर देकर कहा कि यह भीड़ जनता के उस संकल्प को दर्शाती है जो विभाजन और भेदभाव की उन ताकतों को हराना चाहती है, जिन्हें उन्होंने ‘बंगाल-विरोधी विभाजनकारी ताकतें’ बताया।