Tag: Suspension

  • निलंबन और इस्तीफे के बाद भी नहीं थमा सड़क सुरक्षा अभियान, पूर्व ट्रैफिक कर्मी के वायरल वीडियो ने यातायात व्यवस्था पर उठाए सवाल

    निलंबन और इस्तीफे के बाद भी नहीं थमा सड़क सुरक्षा अभियान, पूर्व ट्रैफिक कर्मी के वायरल वीडियो ने यातायात व्यवस्था पर उठाए सवाल

    मध्य प्रदेश: के शहडोल में पूर्व ट्रैफिक हेड कांस्टेबल विवेकानंद तिवारी एक बार फिर चर्चा में हैं। पुलिस विभाग से निलंबन और बाद में स्वैच्छिक इस्तीफा देने के बावजूद उन्होंने सड़क सुरक्षा को लेकर अपना अभियान जारी रखा है। सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स रखने वाले विवेकानंद तिवारी का नया वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने यातायात नियमों के उल्लंघन की कई घटनाओं को कैमरे में रिकॉर्ड कर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया है।

    हाल ही में साझा किए गए वीडियो में उन्होंने शहर के एक प्रमुख चौराहे पर यातायात व्यवस्था का वास्तविक दृश्य दिखाया। वीडियो में मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाना, बिना हेलमेट दोपहिया चलाना, रॉन्ग साइड ड्राइविंग, एक बाइक पर तीन लोगों का सफर करना और नाबालिग के वाहन चलाने जैसी कई लापरवाहियां दिखाई गई हैं। उनका कहना है कि ऐसी छोटी दिखने वाली गलतियां ही अधिकांश सड़क दुर्घटनाओं की बड़ी वजह बनती हैं।

    वीडियो के माध्यम से उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि सड़क सुरक्षा केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भी समान जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यातायात नियमों का पालन करके अनेक दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। इसी उद्देश्य से वह लगातार लोगों को जागरूक करने वाले वीडियो तैयार कर रहे हैं।

    विवेकानंद तिवारी पहले ट्रैफिक पुलिस में कार्यरत थे और ड्यूटी के दौरान भी सड़क सुरक्षा से जुड़े उनके वीडियो सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुए थे। उनके जागरूकता अभियान को व्यापक समर्थन मिला और बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें डिजिटल माध्यमों पर फॉलो करना शुरू किया। समय के साथ उनके वीडियो सड़क सुरक्षा से जुड़े जनजागरूकता अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

    हालांकि कुछ समय पहले विभाग ने उन्हें लंबे समय तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और सेवा नियमों के उल्लंघन के आरोप में निलंबित कर दिया था। विभागीय जांच में यह भी उल्लेख किया गया कि अनुपस्थिति के दौरान वह सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। इसके बाद उन्होंने अपनी ओर से स्वास्थ्य संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए और बताया कि उन्होंने अपनी बीमारी की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई थी।

    बाद में उन्होंने स्वेच्छा से पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया। उनका कहना था कि निलंबन की कार्रवाई से उनकी सार्वजनिक छवि प्रभावित हुई है, इसलिए उन्होंने सेवा छोड़ने का निर्णय लिया। विभाग से अलग होने के बाद भी उन्होंने सड़क सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी और स्वतंत्र रूप से जागरूकता अभियान चलाना जारी रखा।

    वर्तमान में वह हेलमेट उपयोग, सुरक्षित वाहन संचालन और यातायात नियमों के पालन को लेकर लगातार लोगों को जागरूक कर रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से वह सड़क पर दिखाई देने वाली लापरवाहियों को सामने लाते हैं और लोगों से जिम्मेदार नागरिक बनने की अपील करते हैं। उनके हालिया वीडियो को भी बड़ी संख्या में लोग देख रहे हैं और इस पर सड़क सुरक्षा तथा यातायात व्यवस्था को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए कानून के साथ-साथ जनजागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है। ऐसे अभियानों से लोगों में यातायात नियमों के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। शहडोल से सामने आया यह मामला भी इस बात की ओर संकेत करता है कि सड़क सुरक्षा का संदेश किसी पद या वर्दी का मोहताज नहीं होता, बल्कि सामाजिक सहभागिता और व्यक्तिगत पहल के माध्यम से भी प्रभावी बदलाव लाया जा सकता है।

  • बांग्लादेश में राम प्रतिमा परियोजना पर लगी रोक से बढ़ा विवाद, कट्टरपंथी दबाव के आरोपों के बीच हिंदू समुदाय में गहरी नाराजगी

    बांग्लादेश में राम प्रतिमा परियोजना पर लगी रोक से बढ़ा विवाद, कट्टरपंथी दबाव के आरोपों के बीच हिंदू समुदाय में गहरी नाराजगी

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में भगवान राम की विशाल प्रतिमा के निर्माण पर लगी रोक ने देश के भीतर धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक सह-अस्तित्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है। गाइबंदा जिले के पलाशबाड़ी क्षेत्र में प्रस्तावित इस परियोजना को प्रशासन द्वारा निलंबित किए जाने के बाद हिंदू समुदाय के बीच असंतोष बढ़ गया है, जबकि कट्टरपंथी संगठनों ने इसे अपनी मांगों की सफलता बताया है।

    यह परियोजना स्थानीय मंदिर परिसर में भगवान राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। इसे क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं में शामिल माना जा रहा था। निजी सहयोग और श्रद्धालुओं के योगदान से शुरू हुए इस निर्माण कार्य को एशिया की सबसे बड़ी राम प्रतिमा के रूप में विकसित किए जाने की योजना थी। मंदिर परिसर में पहले से कई देवी-देवताओं की बड़ी प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिसके कारण यह स्थान धार्मिक पर्यटन और आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

    हालांकि निर्माण कार्य आगे बढ़ने के साथ ही कुछ इस्लामिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। विरोध करने वाले समूहों ने परियोजना की फंडिंग, उद्देश्य और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना है कि इतनी बड़ी धार्मिक संरचना के निर्माण से स्थानीय सामाजिक संतुलन और राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं। कुछ संगठनों ने परियोजना से जुड़े वित्तीय स्रोतों की जांच कराने तथा निर्माण कार्य को पूरी तरह बंद करने की मांग भी की है।

    प्रशासन द्वारा परियोजना पर रोक लगाए जाने के बाद मंदिर प्रबंधन और स्थानीय हिंदू संगठनों ने इस फैसले पर निराशा जताई है। उनका कहना है कि निर्माण कार्य वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत और समाज के सहयोग से आगे बढ़ रहा था। उनके अनुसार यह केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी पहल थी, जिसे अनावश्यक विवाद का विषय बना दिया गया। कई सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि किसी भी धार्मिक परियोजना का मूल्यांकन कानूनी और प्रशासनिक मानकों के आधार पर होना चाहिए, न कि दबाव समूहों की मांगों के आधार पर।

    इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को लेकर चल रही चर्चाओं को भी फिर से केंद्र में ला दिया है। पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक स्थलों, मूर्तियों और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों ने सामाजिक सौहार्द और धार्मिक सहिष्णुता को लेकर चिंता बढ़ाई है। कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सभी समुदायों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का समान अधिकार मिलना चाहिए।

    इस मुद्दे पर विभिन्न बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि विभिन्न धर्मों के पूजा स्थल और धार्मिक स्मारक देश के अन्य हिस्सों में स्वतंत्र रूप से स्थापित हो सकते हैं, तो किसी एक समुदाय की धार्मिक परियोजना को लेकर अलग मानदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए। उनका तर्क है कि धार्मिक विविधता किसी भी समाज की सांस्कृतिक शक्ति होती है और उसे संरक्षण मिलना चाहिए।

    फिलहाल प्रशासनिक स्तर पर परियोजना की स्थिति स्पष्ट नहीं है और आगे की कार्रवाई को लेकर संबंधित पक्षों की निगाहें सरकार पर टिकी हुई हैं। इस बीच यह मामला केवल एक धार्मिक निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक समावेशन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़ी व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है। आने वाले समय में सरकार का रुख और जांच प्रक्रिया इस विवाद की दिशा तय करेगी।

  • समीक्षा बैठक में देर से पहुंचे अधिकारी पर स्वास्थ्य मंत्री का बड़ा एक्शन, डीडीपीओ तत्काल निलंबित

    समीक्षा बैठक में देर से पहुंचे अधिकारी पर स्वास्थ्य मंत्री का बड़ा एक्शन, डीडीपीओ तत्काल निलंबित


    नई दिल्ली ।
    हरियाणा सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही और अनुशासन पर जोर देने की नीति के बीच नारनौल में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली। जिले के विकास कार्यों और विभिन्न विभागों की प्रगति की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक के दौरान स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव ने जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी (डीडीपीओ) प्रमोद कुमार के खिलाफ तत्काल प्रभाव से निलंबन की कार्रवाई के निर्देश दिए। मंत्री के इस निर्णय के बाद प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।

    नारनौल स्थित पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में आयोजित समीक्षा बैठक में जिले के विकास कार्यों, पंचायत योजनाओं और विभिन्न विभागों की प्रगति का आकलन किया जा रहा था। बैठक में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई। इसी दौरान कुछ विभागों के कार्यों को लेकर शिकायतें और अनियमितताओं से जुड़ी बातें भी सामने आईं, जिन पर मंत्री ने नाराजगी व्यक्त की।

    जानकारी के अनुसार, समीक्षा बैठक के लिए सभी संबंधित अधिकारियों को निर्धारित समय पर उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए थे। बैठक को प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि इसमें विकास परियोजनाओं की प्रगति और जनहित से जुड़े कार्यों की समीक्षा की जानी थी। इसके बावजूद जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी प्रमोद कुमार समय पर बैठक में उपस्थित नहीं हो सके। इस स्थिति को मंत्री ने गंभीरता से लिया और इसे प्रशासनिक अनुशासन के उल्लंघन के रूप में देखा।

    बैठक के दौरान मंत्री ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकारी योजनाओं और जनहित के कार्यों के संचालन में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। उन्होंने अधिकारियों को समयबद्ध कार्यप्रणाली अपनाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए। इसी क्रम में डीडीपीओ के खिलाफ तत्काल निलंबन की कार्रवाई के आदेश जारी किए गए।

    प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई का उद्देश्य केवल किसी एक अधिकारी के खिलाफ कदम उठाना नहीं होता, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र को जवाबदेही और अनुशासन का संदेश देना भी होता है। सरकारें अक्सर विकास योजनाओं की प्रभावी निगरानी और समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर विशेष ध्यान देती हैं।

    बैठक में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ उपायुक्त और विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। इस दौरान सड़क, पंचायत, स्वास्थ्य और अन्य विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। अधिकारियों को लंबित कार्यों को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करने और जनता से जुड़े मामलों में तत्परता दिखाने के निर्देश दिए गए।

    स्वास्थ्य मंत्री की इस कार्रवाई को प्रशासनिक सख्ती और कार्यसंस्कृति में सुधार के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में कई राज्य सरकारें अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और विकास परियोजनाओं की निगरानी को लेकर अधिक सक्रिय हुई हैं। ऐसे में नारनौल में हुई यह कार्रवाई भी उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समय की पाबंदी, कार्य निष्पादन और विभागीय जिम्मेदारियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि इस कार्रवाई का प्रभाव भविष्य में अधिकारियों की कार्यशैली और सरकारी बैठकों में अनुशासन के पालन पर भी दिखाई दे सकता है।

  • पीएम मोदी की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, बेंगलुरु में विस्फोटक मिलने के बाद प्रशासन का बड़ा कदम

    पीएम मोदी की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, बेंगलुरु में विस्फोटक मिलने के बाद प्रशासन का बड़ा कदम

    नई दिल्ली ।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक संवेदनशील मामले में बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया गया है। बेंगलुरु दौरे के दौरान प्रधानमंत्री के निर्धारित कार्यक्रम के आसपास संदिग्ध विस्फोटक सामग्री मिलने के मामले ने सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस महकमे की चिंता बढ़ा दी थी। अब इस पूरे प्रकरण में शुरुआती जांच के आधार पर छह पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है। यह कार्रवाई सुरक्षा में संभावित लापरवाही और चूक को गंभीरता से लेते हुए की गई है, जबकि मामले की जांच अभी भी जारी है।

    जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री 10 मई को बेंगलुरु दौरे पर पहुंचे थे। इसी दौरान शहर के बाहरी इलाके में ऐसी जगह पर दो जिलेटिन की छड़ें मिलने की सूचना सामने आई जो प्रधानमंत्री के प्रस्तावित कार्यक्रम स्थल से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित बताई गई। जैसे ही इस घटना की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस प्रशासन तक पहुंची, पूरे विभाग में हलचल मच गई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तत्काल सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा शुरू कर दी गई और आंतरिक जांच बैठा दी गई।

    इस मामले में पुलिस विभाग ने शुरुआती स्तर पर कार्रवाई करते हुए छह पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया है। जिन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है उनमें एक पुलिस सब इंस्पेक्टर, एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर और चार कांस्टेबल शामिल बताए जा रहे हैं। अधिकारियों को जांच पूरी होने तक निलंबित रखने का फैसला लिया गया है। प्रशासनिक स्तर पर यह संदेश देने की कोशिश भी मानी जा रही है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

    घटना सामने आने के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक रूप भी ले लिया था। इसे प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय मानते हुए सवाल उठाए गए कि इतने संवेदनशील दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में ऐसी स्थिति कैसे उत्पन्न हुई। मामले को लेकर राज्य की कानून व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंधन पर भी चर्चा तेज हो गई थी। साथ ही इस घटना के पीछे की परिस्थितियों और जिम्मेदार लोगों की पहचान को लेकर भी जांच एजेंसियां सक्रिय हो गई थीं।

    प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा को देश की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में गिना जाता है। ऐसे में किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि या विस्फोटक सामग्री मिलने की सूचना को अत्यधिक गंभीरता से लिया जाता है। यही कारण है कि इस मामले में भी प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

    अब सभी की नजरें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, क्योंकि यह रिपोर्ट तय करेगी कि सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक चूक कहां हुई और इसके पीछे किन परिस्थितियों ने भूमिका निभाई। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि यह केवल लापरवाही का मामला था या इसके पीछे कोई और गंभीर पहलू छिपा हुआ है। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने सुरक्षा प्रबंधन को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • PM मोदी की सुरक्षा में बड़ी चूक पर सख्त एक्शन: बेंगलुरु में रूट के पास विस्फोटक मिलने के बाद 6 पुलिसकर्मी सस्पेंड

    PM मोदी की सुरक्षा में बड़ी चूक पर सख्त एक्शन: बेंगलुरु में रूट के पास विस्फोटक मिलने के बाद 6 पुलिसकर्मी सस्पेंड


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की चूक को बेहद गंभीर माना जाता है और बेंगलुरु में सामने आए एक मामले ने सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और जिम्मेदारियों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री के निर्धारित दौरे के दौरान उनके रूट के पास विस्फोटक सामग्री मिलने के मामले में अब प्रशासन ने सख्त कदम उठाया है। सुरक्षा व्यवस्था में कथित लापरवाही को गंभीर मानते हुए छह पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इस कार्रवाई ने पुलिस विभाग के भीतर भी हलचल तेज कर दी है और पूरे मामले को अत्यधिक संवेदनशील माना जा रहा है।

    बताया जा रहा है कि यह घटना प्रधानमंत्री के निर्धारित कार्यक्रम के दौरान सामने आई थी। जिस इलाके से विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, वह सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा था। सबसे बड़ी चिंता की बात यह रही कि उस इलाके में पहले से सुरक्षा बलों की तैनाती मौजूद थी और संबंधित अधिकारियों को विशेष जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। इसके बावजूद संदिग्ध सामग्री का समय पर पता न चलना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    मामले की जानकारी सामने आते ही प्रशासनिक स्तर पर हड़कंप मच गया था। प्रधानमंत्री की सुरक्षा देश की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होती है और इस तरह की घटनाओं को किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं माना जाता। घटना के तुरंत बाद पूरे मामले की आंतरिक जांच शुरू की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर सुरक्षा घेरे के भीतर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्यों की समीक्षा की गई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।

    प्रारंभिक जांच में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध और लापरवाहीपूर्ण पाई गई। जांच रिपोर्ट के आधार पर एक पुलिस सब इंस्पेक्टर, एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर और चार कांस्टेबलों पर कार्रवाई की गई है। विभाग का मानना है कि संवेदनशील ड्यूटी के दौरान अपेक्षित सतर्कता नहीं बरती गई, जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई। इसी आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई को जरूरी माना गया।

    सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि प्रधानमंत्री जैसे अति विशिष्ट व्यक्ति की यात्रा के दौरान बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की जाती है। इसमें रूट की जांच, निगरानी और संदिग्ध गतिविधियों पर लगातार नजर रखने की प्रक्रिया शामिल होती है। ऐसे में किसी भी प्रकार की चूक न केवल सुरक्षा तंत्र के लिए चिंता का विषय बनती है बल्कि भविष्य की रणनीतियों पर भी असर डालती है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में छोटी से छोटी गलती भी बड़े खतरे का कारण बन सकती है। प्रशासन अब इस मामले की गहराई से जांच कर रहा है और उम्मीद की जा रही है कि आगे सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाए जाएंगे ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।

  • लोकसभा में टकराव खत्म करने पर सहमति: 8 विपक्षी सांसदों का निलंबन हो सकता है रद्द

    लोकसभा में टकराव खत्म करने पर सहमति: 8 विपक्षी सांसदों का निलंबन हो सकता है रद्द


    नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के बीच सियासी गतिरोध खत्म होने के संकेत मिले हैं। लोकसभा के आठ निलंबित विपक्षी सांसदों का निलंबन मंगलवार को वापस लिया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहमति बन गई है।
    सर्वदलीय बैठक में बनी सहमति
    बताया जा रहा है कि ओम बिरला ने सोमवार को सभी दलों के नेताओं की बैठक बुलाई, जिसमें निलंबन खत्म करने पर सकारात्मक चर्चा हुई। बैठक में यह भी तय हुआ कि भविष्य में सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए सभी दल जिम्मेदारी से व्यवहार करेंगे।

    सदन के आचरण को लेकर भी तय हुए नियम
    दोनों पक्षों के बीच इस बात पर भी सहमति बनी कि—

    कोई भी सदस्य नारेबाजी करते हुए दूसरे पक्ष की सीटों तक नहीं जाएगा

    सदन में कागज फाड़कर नहीं फेंके जाएंगे

    अधिकारियों की मेजों पर चढ़ने जैसी घटनाएं नहीं होंगी

    कांग्रेस ने उठाया था मुद्दा
    सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए स्पीकर से निलंबन रद्द करने की मांग की थी।

    विपक्षी दल पिछले सप्ताह से ही इस फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे थे।

    क्यों हुआ था निलंबन?
    बजट सत्र के पहले चरण में 3 फरवरी को सदन में हंगामे के दौरान आसन की ओर कागज फेंकने और अवमानना के आरोप में आठ सांसदों को शेष सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया था।

    इन सांसदों में मणिकम टैगोर, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, गुरजीत सिंह औजला, हिबी ईडन, डीन कुरियाकोस, प्रशांत पडोले, किरण कुमार रेड्डी और एस. वेंकटेशन शामिल हैं।

    धरने पर बैठे थे सांसद
    निलंबन के बाद से ये सभी सांसद संसद परिसर के मकर द्वार पर धरना दे रहे थे और कार्रवाई को वापस लेने की मांग कर रहे थे।

    अगर मंगलवार को औपचारिक घोषणा होती है, तो इससे संसद के कामकाज में जारी गतिरोध खत्म होने और बजट सत्र के सुचारु संचालन की राह साफ हो सकती है।