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  • आत्मनिर्भर बैटरी इकोसिस्टम के लिए सेकंड-लाइफ तकनीक जरूरी, पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    आत्मनिर्भर बैटरी इकोसिस्टम के लिए सेकंड-लाइफ तकनीक जरूरी, पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत में मजबूत, आत्मनिर्भर और सर्कुलर बैटरी इकोसिस्टम विकसित करने के लिए केवल बैटरी निर्माण क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने बैटरियों के निर्माण से लेकर उनके उपयोग, सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन और जीवनचक्र समाप्त होने के बाद प्रबंधन तक पूरी व्यवस्था को एक साथ विकसित करने की जरूरत बताई है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में बैटरी क्षेत्र से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसमें नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं और अन्य हितधारकों ने भारत में तेजी से विकसित हो रहे बैटरी इकोसिस्टम को लेकर विचार साझा किए।

    द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने कहा कि बैटरी क्षेत्र पर चर्चा केवल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल के बाद भी जिन बैटरियों में पर्याप्त क्षमता बची रहती है, उनके सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन की संभावनाओं पर ध्यान देना जरूरी है। इससे बैटरियों के उपयोगी जीवन को बढ़ाया जा सकता है और उनकी आर्थिक उपयोगिता का बेहतर इस्तेमाल संभव होगा।

    भारी उद्योग मंत्रालय के संयुक्त सचिव विजय मित्तल ने घरेलू विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ सेकंड-लाइफ बैटरियों, ट्रेसबिलिटी, मानकों और रीसाइक्लिंग से जुड़े ढांचे के विकास की जरूरत बताई। उनके अनुसार ऐसे प्रयास भारत में प्रतिस्पर्धी और सर्कुलर बैटरी अर्थव्यवस्था विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

    नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के वैज्ञानिक कुलदीप राणा ने कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों का इस्तेमाल केवल इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़े क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। इनका उपयोग घरेलू उपकरणों, रूफटॉप सोलर पीवी सिस्टम और यूपीएस सिस्टम जैसे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

    सम्मेलन के दौरान बैटरी वैल्यू चेन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई। इनमें घरेलू एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल निर्माण क्षमता का विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विकास और इस्तेमाल की जा चुकी बैटरियों के पुन: उपयोग, पुनर्प्रयोजन तथा रीसाइक्लिंग की बढ़ती जरूरत शामिल रही।

    वरिष्ठ निदेशक ए.के. सक्सेना ने कहा कि बैटरी क्षेत्र में केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के बजाय मूल्य सृजन को स्थानीय स्तर पर बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने बैटरियों को शुरुआती डिजाइन चरण से ही सर्कुलर दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तैयार करने की आवश्यकता बताई।

    उन्होंने यह भी कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों की बची हुई क्षमता और प्रदर्शन का सही आकलन जरूरी है। इससे इन बैटरियों के इस्तेमाल को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    इंडिया एनर्जी स्टोरेज एलायंस के प्रबंध निदेशक विनायक वालिम्बे ने भारत में मजबूत और प्रतिस्पर्धी बैटरी उद्योग के निर्माण के लिए घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर जोर दिया।

    वहीं, बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड की वरिष्ठ प्रबंधक सुगंधिता वाधेरा ने भविष्य में बढ़ने वाली बिजली मांग के प्रभावी प्रबंधन पर बात रखी। उन्होंने राज्यों के लिए क्षमता नियोजन, मजबूत भुगतान सुरक्षा व्यवस्था और वितरण क्षेत्र में अधिक लचीले ऊर्जा संसाधनों की जरूरत बताई। उनके अनुसार इससे ऊर्जा तंत्र को अधिक मजबूत बनाने और बदलती जरूरतों के अनुसार तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद मिल सकती है।

  • भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 में नई दिल्ली का फोकस, समावेशी वैश्विक व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की आवाज पर जोर

    भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 में नई दिल्ली का फोकस, समावेशी वैश्विक व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की आवाज पर जोर

    नई दिल्ली ।कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले आर्थिक शब्द के रूप में सामने आया ब्रिक्स अब चार महाद्वीपों तक फैले प्रभावशाली भू-राजनीतिक समूह का रूप ले चुका है। नए सदस्य देशों के जुड़ने के साथ इसकी आर्थिक और रणनीतिक ताकत में लगातार विस्तार हुआ है। वर्ष 2026 में संगठन की अध्यक्षता भारत के पास है और नई दिल्ली इसे अधिक समावेशी, प्रभावी तथा समाधान-केंद्रित मंच बनाने की दिशा में काम कर रही है।

    ब्रिक्स प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक नीतियों के समन्वय का महत्वपूर्ण मंच बन गया है। सदस्य देश यहां वैश्विक शासन, विकास, व्यापार और आर्थिक सुधारों से जुड़े मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करते हैं। लगातार संवाद और सहयोग के जरिए संगठन ने वैश्विक दक्षिण की आवाज को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाई है।

    भारत की 2026 की अध्यक्षता “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” विषय पर केंद्रित है। इसी थीम के तहत 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जाएगी। भारत का लक्ष्य संगठन की संस्थागत क्षमता को मजबूत करना, विकास और नवाचार को प्राथमिकता देना तथा वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में प्रमुख स्थान दिलाना है।

    वर्तमान में ब्रिक्स में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात सहित 11 सदस्य देश हैं। ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे संगठन की आर्थिक और जनसांख्यिकीय पहुंच का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    ब्रिक्स के विस्तार का बड़ा चरण जनवरी 2024 में आया, जब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद जनवरी 2025 में इंडोनेशिया 11वां पूर्ण सदस्य बना। इन देशों के शामिल होने से संगठन का प्रभाव एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक और व्यापक हुआ।

    विस्तार के साथ ब्रिक्स में पार्टनर कंट्री श्रेणी भी बनाई गई। वर्ष 2025 के दौरान बेलारूस, बोलिविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम इस ढांचे से जुड़े। इससे संगठन की पहुंच और प्रभाव क्षेत्र में और विस्तार हुआ।

    समय के साथ ब्रिक्स का एजेंडा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, कृषि, श्रम एवं रोजगार, दूरसंचार, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियां भी इसके प्रमुख विषयों में शामिल हैं।

    ब्रिक्स विश्व व्यापार संगठन और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व तथा संतुलित भागीदारी की वकालत करता है। इसके प्रयासों का उद्देश्य वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाना तथा बदलती वैश्विक चुनौतियों के प्रति उसे अधिक उत्तरदायी बनाना है।

  • इंसानी कचरे से बने बायोचार से मजबूत होगा कंक्रीट, रिसर्च में इमारतों की मजबूती और टिकाऊपन बढ़ने का दावा

    इंसानी कचरे से बने बायोचार से मजबूत होगा कंक्रीट, रिसर्च में इमारतों की मजबूती और टिकाऊपन बढ़ने का दावा

    नई दिल्ली । वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है जो आने वाले समय में निर्माण उद्योग (Construction Industry) का चेहरा बदल सकती है। ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ जर्नल में प्रकाशित एक हालिया स्टडी के अनुसार, सेप्टिक टैंकों और सैनिटेशन सिस्टम से मिलने वाले इंसानी कचरे को प्रोसेस करके ‘बायोचार’ बनाया गया है। इस बायोचार का इस्तेमाल कंक्रीट में सीमेंट की जगह आंशिक रूप से (Partial Replacement) किया जा सकता है, जिससे इमारतें न केवल अधिक मजबूत बनेंगी, बल्कि पर्यावरण को भी बड़ा फायदा पहुंचेगा।

    वैज्ञानिकों ने पाया है कि ट्रीट किए गए मल के कचरे से बना मटीरियल कंक्रीट में सीमेंट की जगह कुछ हद तक इस्तेमाल किया जा सकता है और सही मात्रा में मिलाने पर यह कंक्रीट की मज़बूती को काफ़ी बढ़ा सकता है। ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में छपी इस रिसर्च में मल के कचरे (सेप्टिक टैंक और सैनिटेशन सिस्टम से इकट्ठा किया गया ट्रीट किया हुआ इंसानी कचरा) से बने बायोचार का कंक्रीट में सीमेंट के आंशिक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावनाओं को परखा गया। खास ट्रीटमेंट प्लांट मल के कचरे को इकट्ठा करते हैं और उसे प्रोसेस करते हैं।

    रिसर्चर ने इस मटीरियल को बायोचार (कार्बन से भरपूर पदार्थ) में बदला और इसे कंक्रीट में मिलाकर देखा कि क्या इससे कंस्ट्रक्शन मटीरियल ज़्यादा मज़बूत और टिकाऊ बन सकता है। नतीजे चौंकाने वाले थे। जिस कंक्रीट में सीमेंट की जगह 10% बायोचार (मल के कचरे से बना) मिलाया गया था, उसमें 91 दिनों की क्योरिंग (पकने की प्रक्रिया) के बाद कंप्रेसिव स्ट्रेंथ में 21% और फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ में 42% की बढ़ोतरी देखी गई।

    कंप्रेसिव स्ट्रेंथ यह बताती है कि कंक्रीट कितना दबाव झेल सकता है, जबकि फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ यह बताती है कि वह मुड़ने और टूटने (क्रैकिंग) का कितना अच्छा मुकाबला कर सकता है। रिसर्चर ने बायोचार की अलग-अलग मात्राओं का टेस्ट किया और कई गुणों की जांच की, जिनमें मज़बूती, पानी सोखने की क्षमता, पोरॉसिटी (छिद्रों की मात्रा) और सूखने पर सिकुड़न (drying shrinkage) शामिल हैं।

    नतीजों से पता चला कि सीमेंट की जगह 5% से 10% तक बायोचार का इस्तेमाल करने से कंक्रीट की परफॉर्मेंस बेहतर हो सकती है। 15% बायोचार मिलाने पर, 28 दिनों के बाद पानी सोखने की क्षमता और पोरॉसिटी पारंपरिक कंक्रीट के बराबर ही पाई गई। यह मटीरियल समय के साथ स्थिर भी रहा। 120 दिनों के बाद, 10% बायोचार वाले मोर्टार में सूखने पर सिकुड़न साधारण पोर्टलैंड सीमेंट मोर्टार जैसी ही देखी गई, जिससे पता चलता है कि यह मटीरियल लंबे समय तक अपना आकार और स्थिरता बनाए रख सकता है।

    स्टडी में यह भी पाया गया कि जैसे-जैसे बायोचार की मात्रा बढ़ाई गई, कंक्रीट के नमूनों में भारी धातुओं की मात्रा कम होती गई, जिससे पर्यावरण में हानिकारक पदार्थों के रिसने (leaching) की संभावना कम हो सकती है।

    इस रिसर्च से पर्यावरण को दोहरा फ़ायदा हो सकता है: ट्रीट किए गए इंसानी कचरे का उपयोगी इस्तेमाल और कंक्रीट में सीमेंट की ज़रूरत में कमी। सीमेंट बनाने में बहुत ज़्यादा ऊर्जा लगती है और यह दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा कारण है। हालांकि, निर्माण कार्य में मल-कीचड़ से बने बायोचार का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले और रिसर्च और असल दुनिया में टेस्टिंग की ज़रूरत होगी। लेकिन यह स्टडी बताती है कि भविष्य की इमारतें कुछ हद तक उस चीज़ से बन सकती हैं जिसे हम आज फ्लश करके बहा देते हैं।

  • अदाणी पावर का ईएसजी स्कोर बढ़कर 66 अंक हुआ, एनएसई सस्टेनेबिलिटी ने कंपनी की ‘एस्पायरिंग’ रेटिंग बरकरार रखी

    अदाणी पावर का ईएसजी स्कोर बढ़कर 66 अंक हुआ, एनएसई सस्टेनेबिलिटी ने कंपनी की ‘एस्पायरिंग’ रेटिंग बरकरार रखी

    नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत उत्पादक कंपनी अदाणी पावर लिमिटेड ने सोमवार को बताया कि उसके पर्यावरण, सामाजिक और सुशासन यानी ईएसजी प्रदर्शन में सुधार दर्ज किया गया है। कंपनी का ईएसजी स्कोर पिछले मूल्यांकन के 65 अंक से बढ़कर 66 अंक हो गया है। कंपनी के अनुसार, इस सुधार के साथ उसने भारतीय ताप विद्युत, मिश्रित ईंधन और एकीकृत ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों के बीच अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखी है।

    कंपनी को एनएसई सस्टेनेबिलिटी के नवीनतम आकलन में एक बार फिर ‘एस्पायरिंग’ श्रेणी में रखा गया है। एनएसई सस्टेनेबिलिटी सेबी-पंजीकृत ईएसजी रेटिंग प्रदाता और एनएसई इंडिसीज की सहायक कंपनी है। यह सूचीबद्ध कंपनियों के पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक प्रदर्शन का मूल्यांकन करती है।

    अदाणी पावर के अनुसार, ईएसजी स्कोर में हुआ सुधार स्थिरता से जुड़ी पहलों और परिचालन दक्षता बढ़ाने के प्रयासों का परिणाम है। कंपनी ने बताया कि उसने अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल तकनीक वाले कम उत्सर्जन संयंत्रों के उपयोग को बढ़ाया है। इसके साथ लगातार उत्सर्जन की निगरानी करने वाली प्रणालियों, ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों, जल संरक्षण उपायों और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी पहलों को भी मजबूत किया गया है।

    सामाजिक क्षेत्र में कंपनी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर केंद्रित कई कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य शिविर और स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका बढ़ाने वाली परियोजनाएं शामिल हैं। कंपनी के मुताबिक इन पहलों का उद्देश्य उसके परिचालन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के जीवन स्तर में सुधार करना है।

    एनएसई सस्टेनेबिलिटी हर वर्ष भारत की 500 सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्यांकन करता है। इसके माध्यम से निवेशकों और अन्य हितधारकों को कंपनियों की दीर्घकालिक मूल्य सृजन क्षमता तथा ईएसजी प्रदर्शन का स्वतंत्र आकलन उपलब्ध कराया जाता है।

    सुशासन के क्षेत्र में अदाणी पावर ने बताया कि उसकी विभिन्न बोर्ड समितियों में स्वतंत्र निदेशकों का प्रतिनिधित्व नियामकीय आवश्यकताओं से अधिक है। कंपनी ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े आपूर्तिकर्ताओं और ठेकेदारों के लिए भी ईएसजी मानकों को अपनाने की बात कही है। इसके पीछे पूरे कारोबारी तंत्र में जिम्मेदार कारोबारी प्रथाओं को बढ़ावा देने का उद्देश्य बताया गया है।

    कंपनी को हाल के वर्षों में कई अन्य वैश्विक और घरेलू स्थिरता रेटिंग्स भी मिली हैं। अदाणी पावर को एसएंडपी ग्लोबल कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट में 100 में से 71 अंक मिले हैं। वहीं एफटीएसई रसेल ने कंपनी को 5 में से 4.3 अंक की रेटिंग दी है।

    इसके अलावा वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केयरएज ईएसजी रेटिंग्स ने अदाणी पावर को 100 में से 80 अंक दिए हैं। इस स्कोर के आधार पर कंपनी को एजेंसी की ‘लीडरशिप’ श्रेणी में रखा गया है, जिसे उद्योग के औसत स्तर से ऊपर माना जाता है।

    अदाणी पावर के अनुसार ये रेटिंग्स उसके कारोबार और दीर्घकालिक विकास रणनीति में स्थिरता संबंधी सिद्धांतों को शामिल करने की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। वहीं शेयर बाजार में सोमवार को एनएसई पर अदाणी पावर का शेयर 204.40 रुपये पर बंद हुआ।

  • भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण अधिकारियों की बैठक, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सहयोग के लिए साझा रणनीति पर बनेगी सहमति

    भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण अधिकारियों की बैठक, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सहयोग के लिए साझा रणनीति पर बनेगी सहमति

    नई दिल्ली ।भारत सोमवार 17 अगस्त को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह यानी ईडब्ल्यूजी के वरिष्ठ अधिकारियों तथा जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर संपर्क समूह की बैठक की मेजबानी करेगा। भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित इस बैठक में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच चर्चा होगी।

    बैठक की शुरुआत वरिष्ठ अधिकारियों के उद्घाटन सत्र से होगी। इसके बाद ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह और जलवायु परिवर्तन तथा सतत विकास पर संपर्क समूह की प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा। चर्चा का प्रमुख उद्देश्य सदस्य देशों के बीच पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर साझा समझ विकसित करना और सहयोग को और मजबूत करना होगा।

    इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मंगलवार को ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की 12वीं बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें सदस्य देशों के पर्यावरण मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, नीति निर्माता और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ भाग लेंगे। दोनों बैठकों के माध्यम से पर्यावरणीय चुनौतियों पर सामूहिक दृष्टिकोण तैयार करने का प्रयास किया जाएगा।

    भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए इस बार की व्यापक थीम ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ रखी गई है। पर्यावरण क्षेत्र में इस थीम के तहत सदस्य देशों के बीच ऐसे क्षेत्रों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर रहेगा, जिनका संबंध जलवायु परिवर्तन से निपटने, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास से है।

    बैठक में अंतिम दस्तावेज से जुड़े संभावित परिणामों पर भी चर्चा होगी। इसके अलावा पर्यावरण से संबंधित अन्य प्राथमिक विषयों पर विचार किया जाएगा। इन चर्चाओं के जरिए ब्रिक्स देशों के बीच साझा प्रयासों को आगे बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक कार्रवाई को मजबूत करने की दिशा में सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।

    ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह की स्थापना वर्ष 2015 में मॉस्को में हुई पहली ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर नियमित रूप से सहयोग करने के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था। इसके माध्यम से देश अपने अनुभव साझा करने, प्रभावी कार्यप्रणालियों को एक-दूसरे तक पहुंचाने और संयुक्त पर्यावरणीय कार्रवाई को मजबूत करने पर काम करते रहे हैं।

    वहीं जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर संपर्क समूह की स्थापना वर्ष 2024 में की गई थी। इसका उद्देश्य ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषयों पर सहयोग के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार करना है। यह समूह जलवायु संबंधी प्राथमिकताओं पर संवाद और समन्वय को बढ़ावा देने की दिशा में काम करता है।

    नई दिल्ली में होने वाली बैठक ऐसे समय आयोजित हो रही है जब जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास वैश्विक नीति विमर्श के प्रमुख विषय बने हुए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से साझा नीतिगत अनुभवों और व्यावहारिक उपायों के आदान-प्रदान को गति मिलने की उम्मीद है। बैठकों में होने वाली चर्चा आगे की सामूहिक प्राथमिकताओं और सहयोग के क्षेत्रों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • पर्यावरण से गवर्नेंस तक हर मोर्चे पर मजबूत अदाणी पोर्ट्स, ESG स्कोर बढ़ने से वैश्विक भरोसे को मिली मजबूती

    पर्यावरण से गवर्नेंस तक हर मोर्चे पर मजबूत अदाणी पोर्ट्स, ESG स्कोर बढ़ने से वैश्विक भरोसे को मिली मजबूती


    नई दिल्ली । देश की अग्रणी पोर्ट्स और लॉजिस्टिक्स कंपनी अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड ने पर्यावरण, सामाजिक जिम्मेदारी और कॉरपोरेट गवर्नेंस के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। केयरएज ईएसजी रेटिंग्स ने कंपनी का ईएसजी स्कोर बढ़ाकर 84.3 कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि कंपनी सतत विकास, पारदर्शिता और जिम्मेदार कारोबारी संचालन के मामले में उद्योग की अग्रणी कंपनियों में शामिल है।

    कंपनी का यह स्कोर पिछले मूल्यांकन के 81 अंकों की तुलना में 3.3 अंक अधिक है। इस सुधार के साथ अदाणी पोर्ट्स को केयरएज की ओर से ईएसजी के क्षेत्र में लीडरशिप श्रेणी में स्थान मिला है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि कंपनी पर्यावरणीय जोखिमों के बेहतर प्रबंधन, सामाजिक उत्तरदायित्व और मजबूत कॉरपोरेट गवर्नेंस के मानकों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रही है।

    कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार यह नई रेटिंग वार्षिक समीक्षा के बाद जारी की गई है, जिसमें वित्त वर्ष 2025-26 की इंटीग्रेटेड एनुअल रिपोर्ट में किए गए नए खुलासों और सुधारों को भी शामिल किया गया। रिपोर्ट में पारदर्शिता बढ़ाने और वैश्विक ईएसजी मानकों के अनुरूप नीतियों को मजबूत करने के प्रयासों को विशेष महत्व दिया गया।

    पर्यावरण के क्षेत्र में कंपनी ने कार्बन उत्सर्जन, ऊर्जा उपयोग, जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने और पूरी वैल्यू चेन में पर्यावरणीय मानकों को लागू करने की दिशा में उठाए गए कदमों ने भी कंपनी के प्रदर्शन को नई मजबूती दी है।

    सामाजिक जिम्मेदारी के मोर्चे पर भी अदाणी पोर्ट्स ने कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। कर्मचारियों के लिए सुरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार, शिकायत निवारण प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाना, कार्यस्थल पर विविधता और समान वेतन को बढ़ावा देना तथा कर्मचारियों की भागीदारी मजबूत करना कंपनी की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल रहा। इन पहलों का सकारात्मक प्रभाव कंपनी की सामाजिक रेटिंग पर भी देखने को मिला।

    कॉरपोरेट गवर्नेंस के क्षेत्र में बोर्ड स्तर पर ईएसजी की नियमित निगरानी, व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम और सप्लाई चेन से जुड़े साझेदारों के साथ बेहतर समन्वय ने कंपनी की प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाया है। कंपनी का कहना है कि पारदर्शिता, जवाबदेही और सतत सुधार की नीति ही उसकी दीर्घकालिक सफलता का आधार है।

    कंपनी ने अपने बयान में कहा कि यह रेटिंग इस बात का प्रमाण है कि पोर्ट्स और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में अदाणी पोर्ट्स ईएसजी मानकों के मामले में अग्रणी कंपनियों में शामिल है। कंपनी पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सुशासन के सर्वोत्तम मानकों को अपनाने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है।

    इस उपलब्धि के साथ कंपनी को हाल ही में एक और बड़ी सफलता मिली थी, जब एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने उसकी लंबी अवधि की इश्यूअर क्रेडिट रेटिंग और सीनियर अनसिक्योर्ड नोट्स की रेटिंग को BBB- से बढ़ाकर BBB कर दिया। एजेंसी ने कंपनी का स्टेबल आउटलुक भी बरकरार रखा। यह अपग्रेड मजबूत नकदी प्रवाह, स्वस्थ वित्तीय स्थिति और बड़े विस्तार कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक पूरा करने की क्षमता को देखते हुए दिया गया।

    इन लगातार मिल रही सकारात्मक रेटिंग्स ने अदाणी पोर्ट्स की वैश्विक विश्वसनीयता को और मजबूत किया है। साथ ही यह संकेत भी दिया है कि कंपनी भविष्य में सतत विकास, निवेशकों के भरोसे और जिम्मेदार कारोबारी संचालन के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

  • नीति आयोग समर्थित राष्ट्रीय इनोवेशन चैलेंज में युवा स्टार्टअप्स का दमदार प्रदर्शन, सस्टेनेबिलिटी आधारित छह नवाचारों को मिली बड़ी पहचान और वित्तीय सहायता

    नीति आयोग समर्थित राष्ट्रीय इनोवेशन चैलेंज में युवा स्टार्टअप्स का दमदार प्रदर्शन, सस्टेनेबिलिटी आधारित छह नवाचारों को मिली बड़ी पहचान और वित्तीय सहायता

    नई दिल्ली । देश में नवाचार और उद्यमिता को नई दिशा देने के उद्देश्य से आयोजित राष्ट्रीय स्तर की एक प्रमुख प्रतियोगिता में युवाओं द्वारा संचालित छह स्टार्टअप्स को विजेता घोषित किया गया है। सस्टेनेबिलिटी, संसाधन संरक्षण और सामाजिक प्रभाव पर आधारित इन स्टार्टअप्स ने अपने अभिनव समाधानों के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। चयनित उद्यमों को वित्तीय सहायता के साथ-साथ प्रशिक्षण, मेंटरशिप और उद्योग जगत से जुड़ने के अवसर भी उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे उनके विचारों को बड़े स्तर पर विकसित करने में मदद मिलेगी।

    यह प्रतियोगिता देश में उभरते उद्यमियों को प्रोत्साहित करने और सतत विकास से जुड़े समाधान विकसित करने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी। इसमें सर्कुलर इकोनॉमी, टिकाऊ वस्त्र एवं फैशन, पर्यावरण-अनुकूल खाद्य प्रणालियां तथा जल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को केंद्र में रखा गया। इन विषयों पर आधारित नवाचारों ने न केवल तकनीकी क्षमता दिखाई बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान की दिशा में भी महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रस्तुत कीं।

    प्रतियोगिता को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रतिस्पर्धा मिली। देश के 28 राज्यों से 350 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 50 संभावनाशील स्टार्टअप्स का चयन एक विशेष क्षमता विकास कार्यक्रम के लिए किया गया। तीन महीने तक चलने वाले इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों को व्यवसाय विकास, बाजार रणनीति, प्रभाव मूल्यांकन और निवेशकों से संवाद जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और उद्योग जगत से जुड़े अनुभवी पेशेवरों ने मार्गदर्शन प्रदान किया।

    कार्यक्रम के तहत सभी चयनित स्टार्टअप्स को अपने विचार और व्यवसाय मॉडल विशेषज्ञों की जूरी के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर मिला। मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद शीर्ष 20 स्टार्टअप्स को एक विशेष इमर्शन बूटकैंप के लिए चुना गया, जहां उन्हें उद्यमिता से जुड़े व्यावहारिक अनुभवों और उद्योग की वास्तविक चुनौतियों को समझने का अवसर मिला। इस दौरान निवेशकों, नीति निर्माताओं, तकनीकी विशेषज्ञों और सफल उद्यमियों के साथ संवाद ने प्रतिभागियों को अपने मॉडल को और अधिक मजबूत बनाने में सहायता प्रदान की।

    अंतिम चरण में तीन स्टार्टअप्स को विजेता घोषित करते हुए उन्हें 3.5 लाख रुपये की सीड ग्रांट प्रदान की गई, जबकि तीन अन्य स्टार्टअप्स को उपविजेता के रूप में 2.2 लाख रुपये की वित्तीय सहायता दी गई। इसके अतिरिक्त सभी विजेता टीमों को क्षमता विकास कार्यक्रमों और राष्ट्रीय नवाचार नेटवर्क से जोड़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि वे अपने समाधानों को व्यापक स्तर पर लागू कर सकें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में प्रतिभा और नवाचार की कमी नहीं है, लेकिन संसाधनों और अवसरों का समान वितरण अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। बड़े शहरों में निवेश और मार्गदर्शन अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध है, जबकि छोटे शहरों, दूरस्थ क्षेत्रों और पूर्वोत्तर राज्यों के उद्यमियों तक ऐसे अवसर सीमित रूप से पहुंच पाते हैं। इसी अंतर को कम करने के लिए इस प्रकार की पहलें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

    कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि चयनित स्टार्टअप्स में महिला उद्यमियों की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। कुल चयनित उद्यमों में 40 प्रतिशत से अधिक महिलाओं द्वारा संचालित हैं, जो देश के नवाचार परिदृश्य में बढ़ती महिला भागीदारी और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, युवा नेतृत्व, तकनीकी नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व का यह संगम भारत को सतत विकास के लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

  • दराज में बंद पुराने स्मार्टफोन को मिलेगी नई पहचान, हजारों मोबाइल मिलकर बन सकते हैं भविष्य के मिनी डेटा सेंटर

    दराज में बंद पुराने स्मार्टफोन को मिलेगी नई पहचान, हजारों मोबाइल मिलकर बन सकते हैं भविष्य के मिनी डेटा सेंटर

    नई दिल्ली । तकनीक की दुनिया में तेजी से बदलते दौर के बीच अब पुराने स्मार्टफोन को लेकर एक नई सोच सामने आई है। आमतौर पर नया मोबाइल खरीदने के बाद पुराने फोन को लोग दराज में रख देते हैं या फिर उसे कबाड़ समझकर अलग कर देते हैं। लेकिन भविष्य में यही पुराने स्मार्टफोन आधुनिक कंप्यूटिंग सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। नई तकनीकी पहल के तहत पुराने मोबाइल उपकरणों को दोबारा उपयोग में लाकर उन्हें छोटे डेटा सेंटर और क्लाउड कंप्यूटिंग नेटवर्क में बदला जा सकता है।

    इस अवधारणा का मुख्य उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक कचरे को कम करना और मौजूदा तकनीकी संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है। दुनिया भर में हर वर्ष करोड़ों स्मार्टफोन उपयोग से बाहर हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश उपकरण तकनीकी रूप से पूरी तरह बेकार नहीं होते, लेकिन नए मॉडलों के आने के बाद उनका उपयोग घट जाता है। ऐसे में इन उपकरणों की कंप्यूटिंग क्षमता को नए रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।

    नई प्रणाली के तहत पुराने स्मार्टफोन के उन हिस्सों को हटाया जाता है जिनकी आवश्यकता नहीं रहती। इसमें स्क्रीन, कैमरा, बैटरी और बाहरी आवरण जैसे घटक शामिल हैं। इसके बाद केवल मदरबोर्ड को सुरक्षित रखा जाता है, जिसमें प्रोसेसर, रैम और स्टोरेज जैसी महत्वपूर्ण तकनीकी इकाइयां मौजूद होती हैं। यही हिस्से आगे चलकर कंप्यूटिंग नेटवर्क की आधारशिला बनते हैं।

    इन मदरबोर्ड्स को एक साथ जोड़कर विशेष सॉफ्टवेयर आधारित प्लेटफॉर्म पर संचालित किया जाता है। इसके लिए ऐसे सिस्टम का उपयोग किया जाता है जो एक साथ कई डिवाइसों को नियंत्रित और प्रबंधित कर सके। इस तरह अलग-अलग पुराने स्मार्टफोन मिलकर एक बड़े कंप्यूटिंग क्लस्टर का निर्माण करते हैं, जो जटिल डिजिटल कार्यों को संभालने में सक्षम हो सकता है।

    तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 25 से 50 पुराने स्मार्टफोन को एक साथ जोड़ा जाए तो वे कुछ विशेष कार्यों में एक उन्नत सर्वर के बराबर प्रदर्शन कर सकते हैं। यही नहीं, यदि ऐसे हजारों उपकरणों को एक नेटवर्क में जोड़ा जाए तो वे क्लाउड सेवाओं, अनुसंधान परियोजनाओं, शैक्षणिक प्रयोगों और डेटा प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भविष्य में हजारों स्मार्टफोन को जोड़कर बड़े स्तर के कंप्यूटिंग क्लस्टर विकसित करने की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है।

    शिक्षा और अनुसंधान क्षेत्र के लिए यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी मानी जा रही है। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों को बड़े कंप्यूटिंग नेटवर्क पर काम करने के लिए महंगे सर्वर और अत्याधुनिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। यदि पुराने स्मार्टफोन आधारित क्लस्टर सफल होते हैं तो कम लागत में विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को उन्नत तकनीकी प्रयोगों का अवसर मिल सकेगा। इससे तकनीकी शिक्षा को अधिक सुलभ और व्यावहारिक बनाने में मदद मिलेगी।

    पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक कचरा वर्तमान समय की बड़ी वैश्विक चुनौतियों में शामिल है। पुराने उपकरणों का पुनः उपयोग नए हार्डवेयर निर्माण की आवश्यकता को कम कर सकता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटेगा और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आ सकती है। यही कारण है कि इस तकनीक को टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल डिजिटल भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पुराना स्मार्टफोन केवल एक निष्क्रिय उपकरण नहीं रहेगा, बल्कि वह डेटा प्रोसेसिंग, क्लाउड सेवाओं और डिजिटल अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में उपयोगी संसाधन के रूप में नई भूमिका निभा सकता है। यह पहल तकनीक और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकती है।

  • जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और कृषि क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत ने ब्रिक्स देशों से छोटे और सीमांत किसानों को सशक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास तेज करने का आह्वान किया है। भारत का मानना है कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और टिकाऊ कृषि विकास सुनिश्चित करने के लिए किसानों को आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत रूप से सक्षम बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

    इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सदस्य देशों के बीच गहरा सहयोग वैश्विक कृषि व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि यदि ब्रिक्स देश अपनी सामूहिक क्षमता, अनुभव और संसाधनों का प्रभावी उपयोग करें तो कृषि क्षेत्र में सकारात्मक और दूरगामी बदलाव संभव हैं।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है और वैश्विक कृषि बाजारों में अस्थिरता किसानों के लिए नई कठिनाइयां पैदा कर रही है। इन परिस्थितियों में छोटे किसानों की सुरक्षा और समृद्धि को प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है।

    कृषि मंत्री ने कहा कि दुनिया के अधिकांश देशों में छोटे और सीमांत किसान खाद्य उत्पादन की रीढ़ हैं। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता, बेहतर बाजार और नवाचार आधारित कृषि प्रणालियों तक पहुंच मिलती है तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला भी अधिक मजबूत और स्थिर बनेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों का सशक्तिकरण ही खाद्य सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव है।

    भारत की कृषि उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए चौहान ने कहा कि पिछले एक दशक में देश के कृषि क्षेत्र ने लगातार उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। उन्होंने बताया कि कृषि क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 4.5 प्रतिशत रही है, जो इस क्षेत्र की मजबूती और क्षमता को दर्शाती है। खाद्यान्न उत्पादन में निरंतर वृद्धि ने देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है।

    उन्होंने जानकारी दी कि भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 376 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। वहीं गेहूं उत्पादन करीब 118 मिलियन टन के स्तर पर पहुंच गया है। बागवानी क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है और इसका उत्पादन 378 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। इसके अलावा मत्स्य उत्पादन 19 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया है, जो कृषि से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक विकास का संकेत है।

    सम्मेलन के दौरान मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कृषि नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता है और कृषि क्षेत्र में साझा प्रगति का समर्थन करता है।

    चौहान ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसके माध्यम से करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि देश की लगभग 43 प्रतिशत कार्यशक्ति कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है, जिससे यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

    उन्होंने विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर दिया कि भारत के लगभग 87 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। ऐसे में उनकी आय, उत्पादकता और संसाधनों तक पहुंच बढ़ाना केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का मानना है कि ब्रिक्स देशों का साझा सहयोग कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बना सकता है।

  • भारत की पहली 100% एथेनॉल कार लॉन्च: मारुति सुजुकी की वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल से स्वच्छ परिवहन को नई रफ्तार

    भारत की पहली 100% एथेनॉल कार लॉन्च: मारुति सुजुकी की वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल से स्वच्छ परिवहन को नई रफ्तार

    नई दिल्ली । भारत के ऑटोमोबाइल क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधन आधारित परिवहन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए मारुति सुजुकी ने देश की पहली फ्लेक्स-फ्यूल यात्री कार वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल लॉन्च कर दी है। यह वाहन E20 से लेकर E100 तक के एथेनॉल-पेट्रोल मिश्रण पर संचालित हो सकता है और 100 प्रतिशत एथेनॉल पर चलने के लिए तैयार भारत का पहला यात्री वाहन माना जा रहा है।

    कंपनी की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के बीच वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। एथेनॉल आधारित ईंधन न केवल आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करने में मदद करता है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    नई वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल को विशेष रूप से इस प्रकार विकसित किया गया है कि यह विभिन्न स्तरों के एथेनॉल मिश्रण के अनुरूप बेहतर प्रदर्शन कर सके। विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक भविष्य में भारत के हरित परिवहन मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इससे देश में जैव ईंधन उद्योग को भी नई गति मिलने की संभावना है।

    लॉन्च कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि सरकार लगातार ऐसे विकल्पों को बढ़ावा दे रही है जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करें। उन्होंने बताया कि सरकार की वैकल्पिक ईंधन रणनीति के तहत डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिश्रण को भी बढ़ावा देने की योजना है, जिससे पारंपरिक ईंधनों के उपयोग को धीरे-धीरे कम किया जा सके।

    गडकरी ने ऑटोमोबाइल उद्योग से आग्रह किया कि वे पुराने वाहनों को फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक के अनुरूप परिवर्तित करने की संभावनाओं पर काम करें। उनका मानना है कि इससे प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को मजबूती मिलेगी और देश में चल रहे वाहन स्क्रैपेज कार्यक्रम को भी समर्थन प्राप्त होगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्वच्छ ईंधन आधारित तकनीकों को अपनाने से वायु गुणवत्ता में सुधार और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

    कार्यक्रम के दौरान मारुति सुजुकी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हिसाशी ताकेउची ने बताया कि कंपनी केवल फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि कंप्रेस्ड बायोगैस और हाइड्रोजन जैसे भविष्य के स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों पर भी सक्रिय रूप से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि कंपनी का उद्देश्य भारतीय बाजार के लिए टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन समाधान विकसित करना है।

    कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, भारत में ग्रीन मोबिलिटी को लेकर उपभोक्ताओं की रुचि लगातार बढ़ रही है। पिछले वित्तीय वर्ष में बिकने वाले हरित वाहनों में मारुति सुजुकी की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही, जो इस क्षेत्र में कंपनी की मजबूत उपस्थिति को दर्शाती है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की बढ़ती उपलब्धता किसानों, एथेनॉल उत्पादकों और ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है।

    वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल का लॉन्च भारत के ऊर्जा परिवर्तन अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। यह पहल न केवल स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत देती है, बल्कि देश को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और टिकाऊ विकास के लक्ष्य के करीब ले जाने में भी सहायक साबित हो सकती है।