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  • TMC नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से अंतिम फैसले की समयसीमा बताने को कहा

    TMC नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से अंतिम फैसले की समयसीमा बताने को कहा

    नई दिल्ली ।तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि वह दोनों गुटों के बीच चल रहे विवाद पर अंतिम फैसला लेने में कितना समय लेगा। अदालत ने विवाद का जल्द निपटारा किए जाने की जरूरत पर जोर दिया है।

    यह मामला ममता बनर्जी की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। उन्होंने चुनाव आयोग के उस अंतरिम फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और उसके पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न को फिलहाल फ्रीज कर दिया गया है।

    चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अंतरिम व्यवस्था के तहत अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं। ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न मिला है।

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने चुनाव आयोग से यह बताने को कहा है कि विवाद पर अंतिम निर्णय लेने के लिए उसे कितना समय चाहिए। अदालत में यह भी चर्चा हुई कि मामले की सुनवाई को तेज तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है, ताकि दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों पर जल्द निर्णय लिया जा सके।

    ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अदालत में पेश हुए। उन्होंने कहा कि उनकी ओर से पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनाव को रोकने की मांग नहीं की जा रही है। उनका कहना है कि पार्टी को उसके मूल नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने की अनुमति मिलनी चाहिए।

    सिब्बल ने इस विवाद को पार्टी की पहचान और अस्तित्व से जुड़ा विषय बताया। उनकी ओर से चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले पर भी सवाल उठाए गए और कहा गया कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान नाम और चिह्न फ्रीज किए जाने से संबंधित पक्ष के सामने प्रभावी कानूनी उपाय का सवाल पैदा होता है।

    विवाद की पृष्ठभूमि में तृणमूल कांग्रेस के भीतर दो गुटों के बीच पार्टी के नाम, संगठनात्मक नियंत्रण और चुनाव चिह्न को लेकर दावे शामिल हैं। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फिलहाल मूल नाम और चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए वैकल्पिक नाम और चिह्न दिए हैं।

    आगामी उपचुनावों को देखते हुए यह विवाद महत्वपूर्ण हो गया है। दोनों गुटों के उम्मीदवारों को फिलहाल अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के तहत चुनाव प्रक्रिया में आगे बढ़ना होगा। ऐसे में अंतिम फैसला कब आता है, इस पर दोनों पक्षों की नजर बनी हुई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से अंतिम निर्णय के लिए समयसीमा बताने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी। उस सुनवाई में आयोग की ओर से विवाद के निपटारे में लगने वाले संभावित समय के बारे में अदालत को जानकारी दी जाएगी।

    फिलहाल TMC का मूल नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न अंतरिम रूप से फ्रीज है। अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों के लिए आवंटित वैकल्पिक नाम और चिह्न ही चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जाएंगे।

  • ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन बड़े संकट, अब सुप्रीम कोर्ट से लगाई आस

    ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन बड़े संकट, अब सुप्रीम कोर्ट से लगाई आस


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद शुक्रवार को कई नए मोड़ से गुजरा। चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाले पारंपरिक चुनाव चिह्न को फिलहाल फ्रीज कर दोनों गुटों को नए नाम और प्रतीक आवंटित किए। इसके कुछ ही समय बाद नंदीग्राम उपचुनाव में ममता बनर्जी गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया। ममता ने इसके बाद कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया, लेकिन कुछ घंटे बाद ही पुलिस ने मिलन प्रधान को एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया।

    घटनाक्रम के बीच ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े मामले के अलावा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से निर्णय में देरी को लेकर भी अलग याचिका दायर की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक पहली याचिका में आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है, जबकि दूसरी में अयोग्यता की प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान पार्टी के नाम और प्रतीक को लेकर किए गए इंतजाम पर सवाल उठाया गया है। इन मामलों पर 21 सितंबर को सुनवाई संभावित बताई जा रही है।

    ममता गुट को मिला नया नाम और चुनाव चिह्न

    चुनाव आयोग के अंतरिम इंतजाम के तहत ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। वहीं प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाला प्रतीक फिलहाल दोनों गुटों के इस्तेमाल के लिए रोक दिया गया है। यह व्यवस्था अक्टूबर में होने वाले उपचुनावों के मद्देनजर अंतरिम तौर पर की गई है।

    ममता गुट ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने पार्टी के बहुसंख्यक कैडर और मूल संगठनात्मक ढांचे को पर्याप्त महत्व दिए बिना बागी गुट के दावों को प्राथमिकता दी। गुट का कहना है कि पार्टी के नाम और पारंपरिक चिह्न पर अंतिम फैसला करने से पहले विधायकों की सदस्यता से जुड़े विवाद का निपटारा होना चाहिए।

    10 बागी विधायकों की सदस्यता पर भी विवाद

    ममता गुट के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 बागी विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की है। इस मामले में विधानसभा सचिवालय की ओर से संबंधित विधायकों को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब मांगा गया है।

    सूची में ऋतब्रत बनर्जी के अलावा अरूप राय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज्जमान अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मिन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष शामिल हैं।

    विवाद केवल विधायकों की सदस्यता तक सीमित नहीं है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर भी दोनों खेमों के बीच कानूनी लड़ाई चल रही है। ममता गुट ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी। ममता गुट ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अगस्त में हाईकोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए ऋतब्रत को फिलहाल सीमित अवधि के लिए पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।

    एक दिन में बदली नंदीग्राम की तस्वीर

    6 अक्टूबर को प्रस्तावित नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में शुक्रवार को घटनाक्रम तेजी से बदला। ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया। इससे पहले वह अपने पति सत्यजीत के साथ राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंचीं और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की थी। नामांकन वापस लेने की वजह तत्काल स्पष्ट नहीं हो सकी। ममता बनर्जी ने बाद में कहा कि उनकी प्रत्याशी पर दबाव बनाया गया था।

    इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने कांग्रेस को ‘सिस्टर पार्टी’ बताते हुए इसे INDIA ब्लॉक को मजबूत करने की दिशा में कदम बताया। हालांकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उनकी पार्टी ने TMC से समर्थन नहीं मांगा था।

    समर्थन के कुछ घंटे बाद मिलन प्रधान गिरफ्तार

    ममता के समर्थन की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस के नंदीग्राम प्रत्याशी मिलन प्रधान को पश्चिम बंगाल पुलिस ने एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्टों के अनुसार मामला 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़ा है और उनके खिलाफ पहले से गिरफ्तारी वारंट लंबित था। उन्हें अदालत में पेश किए जाने की बात कही गई है।

    गिरफ्तारी के समय को लेकर कांग्रेस और ममता गुट ने सवाल उठाए। ममता बनर्जी ने कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ा, जबकि कांग्रेस नेताओं ने भी गिरफ्तारी की टाइमिंग पर आपत्ति जताई। दूसरी ओर, पुलिस और भाजपा की ओर से इसे कानून के तहत कार्रवाई बताया गया और राजनीतिक आरोपों को खारिज किया गया। इसलिए गिरफ्तारी के पीछे राजनीतिक मंशा होने का दावा फिलहाल संबंधित पक्षों के आरोप के रूप में ही सामने आया है।

    28 साल पुरानी पार्टी पहचान पर कानूनी लड़ाई

    ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। ‘फूल-घास’ वाला पारंपरिक चुनाव चिह्न लंबे समय से पार्टी की पहचान रहा है। मौजूदा विवाद में पहली बार दोनों गुट इस नाम और प्रतीक पर अपना दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने फिलहाल दोनों को अलग-अलग नाम और चिह्न देकर उपचुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अंतरिम इंतजाम किया है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव 6 अक्टूबर को और मतगणना 9 अक्टूबर को प्रस्तावित है। ऐसे में ममता गुट के लिए एक ओर मूल पार्टी नाम और प्रतीक को लेकर कानूनी लड़ाई अहम है, वहीं दूसरी ओर बागी विधायकों की अयोग्यता का मामला भी इससे जुड़ा हुआ है।

    राहुल गांधी का भाजपा पर आरोप, भाजपा ने पलटवार किया

    कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान की गिरफ्तारी पर राहुल गांधी ने भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि गिरफ्तारी राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है और भाजपा निष्पक्ष चुनाव में भरोसा नहीं करती। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा विपक्षी दलों और चुनावी मुकाबले को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

    भाजपा ने इन आरोपों को विपक्ष की प्रतिक्रिया बताते हुए पलटवार किया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद में आयोग अपने नियमों के तहत निर्णय लेता है। इस पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और नंदीग्राम उपचुनाव की आगे की प्रक्रिया पर हैं।

  • रात में दिखें सांप, साफ पानी या तेज रोशनी तो क्या होता है मतलब, स्वप्न शास्त्र में बताए गए संकेत समझिए

    रात में दिखें सांप, साफ पानी या तेज रोशनी तो क्या होता है मतलब, स्वप्न शास्त्र में बताए गए संकेत समझिए


    नई दिल्ली ।
    रात में देखे गए कुछ सपने सुबह उठने के बाद भी लंबे समय तक याद रहते हैं। कभी मंदिर या भगवान के दर्शन होते हैं, कभी साफ पानी, सांप, आसमान में उड़ना, दिवंगत व्यक्ति या तेज रोशनी दिखाई देती है। भारतीय परंपरा में ऐसे सपनों के अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं और स्वप्न शास्त्र में इन्हें कई तरह के संकेतों से जोड़ा जाता है।

    स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपनों को समझने के लिए केवल उसमें दिखाई देने वाली चीज को देखना पर्याप्त नहीं माना जाता। सपने के दौरान व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा था, दृश्य शांत था या डरावना और वर्तमान जीवन में उसकी परिस्थितियां कैसी हैं, इन बातों का भी महत्व बताया जाता है।

    सपने में मंदिर या भगवान के दर्शन को सामान्य तौर पर सकारात्मक संकेत माना जाता है। अगर मंदिर साफ दिखाई दे, दीपक जल रहा हो या वातावरण शांत हो तो इसे मन की शांति, आध्यात्मिक जुड़ाव और सकारात्मक भावनाओं से जोड़कर देखा जाता है। भगवान शिव, विष्णु, श्रीकृष्ण या माता के दर्शन को भी अलग-अलग आध्यात्मिक भावनाओं का प्रतीक माना जाता है।

    सपने में साफ और शांत पानी दिखाई देना भी शुभ संकेतों में शामिल किया जाता है। निर्मल नदी, स्वच्छ तालाब या शांत जल मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और नई शुरुआत की इच्छा को दर्शा सकता है। इसके विपरीत गंदा या अत्यधिक अशांत पानी तनाव, बेचैनी या किसी परेशानी की ओर संकेत कर सकता है।

    सांप का सपना अक्सर लोगों को डराता है, लेकिन इसे हर स्थिति में अशुभ नहीं माना जाता। स्वप्न परंपरा में सांप को शक्ति, परिवर्तन, रहस्य और आंतरिक ऊर्जा से जोड़ा गया है। अगर सांप नुकसान नहीं पहुंचाता तो इसे बदलाव या आंतरिक शक्ति का प्रतीक माना जा सकता है। वहीं सपने में अत्यधिक डर महसूस होना किसी चिंता या तनाव को दर्शा सकता है।

    खुद को आसमान में उड़ते हुए देखना आजादी और अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने की इच्छा से जुड़ा हो सकता है। उड़ते समय खुशी और उत्साह महसूस होना सकारात्मक सोच तथा आगे बढ़ने की आकांक्षा का संकेत माना जाता है। दूसरी ओर ऊंचाई से गिरने का डर असुरक्षा या किसी परिस्थिति को लेकर चिंता को दिखा सकता है।

    किसी दिवंगत व्यक्ति का सपने में दिखाई देना भी जरूरी नहीं कि अशुभ हो। प्रिय व्यक्ति की यादें और उनसे जुड़ी भावनाएं लंबे समय तक मन में रहती हैं। इसलिए ऐसे सपने भावनात्मक जुड़ाव, स्मृति या अधूरी भावनाओं का प्रतिबिंब हो सकते हैं। सपना शांत हो तो मन में सुकून की भावना और परेशान करने वाला हो तो भीतर के दुख से इसका संबंध हो सकता है।

    सपने में सोना, पैसा या दूसरी कीमती चीजें दिखाई देना समृद्धि, अवसर और महत्वाकांक्षा से जोड़ा जाता है। हालांकि इसका सीधा अर्थ भविष्य में धन मिलने की गारंटी नहीं है। कीमती वस्तु खोने का सपना आर्थिक चिंता या किसी महत्वपूर्ण चीज को खोने के डर से भी जुड़ा हो सकता है।

    सातवां प्रमुख सपना तेज रोशनी, दीपक या सूर्योदय का है। अंधेरे के बाद प्रकाश दिखाई देना आशा, ज्ञान, स्पष्टता और सकारात्मक बदलाव का प्रतीक माना जाता है। कठिन दौर से गुजर रहे व्यक्ति के लिए ऐसा सपना मानसिक रूप से बेहतर स्थिति की इच्छा को भी दर्शा सकता है।

    हालांकि हर सपना भविष्य की घटना का संकेत नहीं होता। दिनभर के विचार, तनाव, डर, इच्छाएं और पुरानी यादें भी सपनों का रूप ले सकती हैं। इसलिए किसी सपने के आधार पर आर्थिक, वैवाहिक या जीवन से जुड़ा बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए। सपनों को अपनी भावनाओं और मानसिक स्थिति को समझने का एक माध्यम मानना अधिक उचित है।

  • ममता बनर्जी को एक और झटका…..असली TMC के नाम और सिंबल पर दावा ठोकेंगे बागी सांसद!

    ममता बनर्जी को एक और झटका…..असली TMC के नाम और सिंबल पर दावा ठोकेंगे बागी सांसद!


    कोलकाता
    । पश्चिम बंगाल (West Bengal) में सत्ता छिनते ही ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को एक के बाद झटके मिले रहे हैं। रविवार को ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को गहरा जख्म देकर तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के बागी सांसदों ने अब त्रिपुरा की एक पार्टी संग विलय का फैसला कर लिया है। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Lok Sabha Speaker Om Birla) से मिलकर लोकसभा में अलग सीट की व्यवस्था करने की मांग भी की है। इधर पार्टी से नए-नए बागी हुए सुदीप बंदोपाध्याय ने रविवार को संकेत दे दिए हैं कि बागी खेमा अगले महीने टीएमसी के नाम और सिंबल पर अपना दावा ठोकेगा। ऐसे में यह चर्चाएं भी तेज हो गई हैं कि NDA को लोकसभा में अपना सबसे बड़ा सहयोगी मिलने जा रहा है।

    इससे पहले लोकसभा में दो-तिहाई सांसदों की बगावत के बाद, बागी खेमे को जिस ‘हेवीवेट’ की तलाश थी, वह भी अब पूरी हो गई है। कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद और लोकसभा में टीएमसी के संसदीय दल के नेता रहे सुदीप बंदोपाध्याय भी अब आधिकारिक तौर पर बागी गुट में शामिल हो गए हैं। बागी गुट में शामिल होते ही सुदीप बंदोपाध्याय ने ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा है बागियों का त्रिपुरा नेशनल सिटीजंस पार्टी (NCP) में विलय केवल एक अस्थायी व्यवस्था है।


    क्या है प्लान?

    लोकसभा में टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों का समर्थन होने की बात दोहराते हुए सुदीप बंदोपाध्याय ने बागियों की लॉन्ग टर्म रणनीति का खुलासा किया। उन्होंने पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा, “जब आप 2-तिहाई बहुमत के साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो यही सिस्टम है। आप पहले ही दिन जा के नहीं बोल सकते कि हमें पार्टी का सिंबल दे दो।” उन्होंने आगे कहा कि बागी खेमा जुलाई में चुनाव आयोग और कोर्ट के सामने आधिकारिक मांग रखेगा कि उन्हें ही असली तृणमूल माना जाए, क्योंकि हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है। इसके बाद कोर्ट इस पर फैसला करेगा।

    गौरतलब है कि रविवार को तृणमूल कांग्रेस में संकट उस वक्त और गहरा गया जब बागी सांसदों ने त्रिपुरा की एक बेहद कम चर्चित ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी। यह पार्टी अब लोकसभा में भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकार को समर्थन देगी। लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी सांसदों की अगुवाई करने वालीं काकोली घोष दस्तीदार ने एक बयान में कहा कि तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने बिरला को सौंपे गए आवेदन पर साइन किए हैं। उन्होंने कहा, ”तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई लोकसभा सदस्यों ने एक अलग समूह के रूप में मान्यता देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। हम नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपना विलय करेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करेंगे।”


    त्रिपुरा की पार्टी है NCPI

    ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ त्रिपुरा की एक रजिस्टर्ड पार्टी है। हालांकि इसकी कोई खास राजनीतिक मौजूदगी नहीं है। पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन इसके उम्मीदवार या तो नोटा से पीछे रहे या उन्हें उससे बस कुछ ही ज्यादा वोट मिले। इस बीच भाजपा ने कहा है कि अगर टीएमसी के सांसद NDA का समर्थन करना चाहते हैं तो यह देश के लिए अच्छा होगा।


    बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी बनेगी TMC

    लोकसभा में अगर टीएमसी के इस खेमे ने NDA को समर्थन दिया तो पार्टी बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी भी बन सकती है। बता दें कि बीजेपी के पास केंद्र में फिलहाल NDA के दो बड़े सहयोगी का समर्थन है। इसमें आंध्र प्रदेश की टीडीपी में 16 सांसद और ​जनता दल (यूनाइटेड) के 12 सांसद शामिल हैं। अब 20 से ज्यादा बागी टीएमसी सांसदों के समर्थन ने सदन में NDA की संख्या 313 तक बढ़ सकती है।