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  • वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

    वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

    नई दिल्ली। वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने देश और दुनिया में तेजी से पैर पसार रहे मोटापे को लेकर अब तक की सबसे बड़ी और गंभीर चेतावनी जारी की है। हृदय रोग विशेषज्ञों के इस प्रतिष्ठित संगठन ने पहली बार एक विशेष गाइडलाइन जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मोटापा सिर्फ शरीर का वजन बढ़ने का सामान्य लक्षण या सुंदरता से जुड़ा मुद्दा नहीं है। यह असल में दिल, किडनी और मेटाबॉलिक तंत्र से जुड़ी कई जानलेवा और गंभीर बीमारियों की प्राथमिक जड़ है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इंसानी शरीर में विशेष रूप से पेट के आसपास जमा होने वाली अतिरिक्त चर्बी यानी बेली फैट सीधे तौर पर आंतरिक अंगों को नुकसान पहुँचाना शुरू कर देता है। डॉक्टरों ने अपनी जांच और शोध में पाया है कि यह स्थिति शरीर के भीतर क्रोनिक इन्फ्लेमेशन यानी लगातार बनी रहने वाली सूजन को जन्म देती है। इसके साथ ही यह इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती है और रक्त वाहिकाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करती है। इसी वजह से आगे चलकर मरीजों में डायबिटीज, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर और किडनी खराब होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

    मध्य प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच यह चेतावनी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत को वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ‘डायबिटीज कैपिटल’ के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नई गाइडलाइन के मुताबिक, वजन बढ़ने की यह प्रक्रिया अक्सर उन बीमारियों का आधार तैयार करती है जो बाद में हृदय, वृक्क (किडनी) और शरीर के पूरे मेटाबॉलिज्म को एक साथ अपनी चपेट में ले लेती हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में विशेषज्ञ अब इस घातक स्थिति को कार्डियोवैस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक यानी ‘सीकेएम सिंड्रोम’ कह रहे हैं।

    इस शोध और गाइडलाइन में सबसे चौंकाने वाला तथ्य पेट की चर्बी को लेकर सामने आया है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि किन्हीं दो व्यक्तियों का कुल वजन और बॉडी मास इंडेक्स बिल्कुल समान है, तब भी उनकी आंतरिक सेहत और जोखिम का स्तर पूरी तरह अलग हो सकता है। असली और सबसे बड़ा खतरा पेट के अंदरूनी अंगों के चारों ओर जमा होने वाले ‘विसरल फैट’ से होता है। यह छुपा हुआ विसरल फैट शरीर के भीतर लगातार ऐसे हानिकारक रसायनों का स्राव करता है, जो रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं और इंसुलिन के सकारात्मक प्रभाव को पूरी तरह खत्म कर देते हैं।

    हृदय रोग विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि खराब खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता और तनाव के कारण कम उम्र में ही भारतीयों का दिल बूढ़ा हो रहा है। कार्डियक अरेस्ट और किडनी फेल्योर के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए अब मोटापे को एक प्राथमिक बीमारी मानकर इसका इलाज करना अनिवार्य हो गया है। चिकित्सा तंत्र ने आम जनता से अपील की है कि वे पेट के घेरे और विसरल फैट को नियंत्रित रखने के लिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं ताकि सीकेएम सिंड्रोम जैसी जटिलताओं से समय रहते बचा जा सके।

  • दूषित पानी और GBS सिंड्रोम को मात देकर 67 वर्षीय महिला घर लौटी

    दूषित पानी और GBS सिंड्रोम को मात देकर 67 वर्षीय महिला घर लौटी


    इंदौर । इंदौर भागीरथपुरा की 67 वर्षीय पार्वती कोंडला ने एक ऐसा संघर्ष जीता जिसे देखकर डॉक्टर और परिजन दोनों हैरान हैं। दूषित पानी से फैलने वाले बैक्टीरिया के कारण उनके शरीर में गिलियन-बैरे सिंड्रोम  उत्पन्न हो गया जिसने उनकी नसों को प्रभावित कर लकवा पैदा कर दिया। इस दौरान 36 लोगों की मौत हुई लेकिन पार्वती ने 72 दिनों तक अस्पताल में जिंदगी के लिए जंग लड़ी और अंततः जीत हासिल की।

    28 दिसंबर को पार्वती के पति भेरूलाल कोंडला को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। शुरू में मामूली संक्रमण का अंदेशा था लेकिन जल्द ही दूषित पानी में मौजूद कैम्पीलोबैक्टर जेजुनी बैक्टीरिया ने उनके नर्वस सिस्टम पर हमला कर दिया। उसी दिन पार्वती को स्कीम 78 स्थित विवेक मेमोरियल अस्पताल में भर्ती किया गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें आईसीयू में रेफर किया गया और फिर 2 जनवरी को बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती किया गया।

    GBS सिंड्रोम में शरीर का इम्यून सिस्टम अपनी ही नसों को खत्म कर देता है। देखते ही देखते पार्वती का शरीर लकवाग्रस्त हो गया और किडनियों ने काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने शुरुआती तौर पर बचने की संभावना केवल 3-4 प्रतिशत बताई। इसके बाद उन्हें 16 दिन वेंटिलेटर और 22 दिन ICU में रखा गया। जब फेफड़ों ने साथ छोड़ दिया तो ट्रेकोस्टोमी कर गले में छेद बनाकर सांस लेने का रास्ता बनाया गया। 18 दिन तक पार्वती पूरी तरह बेहोश रहीं।

    भागीरथपुरा का यह मामला शासन की निगरानी में था। केंद्रीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय कई बार अस्पताल पहुंचे और परिवार को ढांढस बंधाया कि वे किसी की बात की चिंता न करें। 72 दिनों के इलाज का खर्च लगभग 19.50 लाख रुपए शासन द्वारा कवर किया गया।

    48 दिन बाद पार्वती को HDU में रेफर किया गया और धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार हुआ। 6 मार्च को उनका ट्रेकोस्टोमी सिस्टम बंद किया गया और धीरे-धीरे लिक्विड डाइट शुरू की गई। 9 मार्च को उन्हें डिस्चार्ज किया गया। अब CMHO डॉ. माधव हसानी की टीम उनकी मॉनिटरिंग कर रही है।

    घर लौटने के बाद भी पार्वती की लड़ाई खत्म नहीं हुई। बेटे प्रदीप के अनुसार फिजियोथेरेपिस्ट केयर टेकर और दवाओं का खर्च महीने का 60-70 हजार रुपए आ रहा है। उन्हें दिन में 9 बार लिक्विड डाइट दी जाती है जिसमें 6 बार दूध और प्रोटीन और 3 बार अन्य लिक्विड ट्यूब के जरिए दिए जाते हैं।

    हालांकि घर आने के बाद उन्होंने हाथ उठाना और परिजनों को पहचान कर जवाब देना शुरू कर दिया है पर उनकी रिकवरी अभी भी चल रही है। प्रदीप ने कहा कि डॉक्टरों की मेहनत परिवार की श्रद्धा और मां की इच्छाशक्ति ने उन्हें मौत से वापस लौटाया।

    पार्वती की यह कहानी न सिर्फ जिंदगी की जंग जीतने का उदाहरण है बल्कि लोगों के लिए प्रेरणा भी है कि संकट और मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों सही समय पर इलाज परिवार का सहयोग और मजबूत इच्छाशक्ति से हर चुनौती को पार किया जा सकता है।