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  • ‘दिमागी नक्सल’ पर BJP का सोशल मीडिया वार, राज्यों के हैंडल्स ने मिलकर शुरू किया मीम कैंपेन

    ‘दिमागी नक्सल’ पर BJP का सोशल मीडिया वार, राज्यों के हैंडल्स ने मिलकर शुरू किया मीम कैंपेन


    नई दिल्ली। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के सक्रिय होने के साथ पार्टी का सोशल मीडिया तंत्र भी नए अंदाज में काम करता नजर आ रहा है। भाजपा सोशल मीडिया कन्वीनर दीपक म्हस्के की टीम ने पिछले तीन दिनों में अलग-अलग राज्यों के पार्टी हैंडल्स को आपस में जोड़कर एक साथ राजनीतिक संदेश देने की रणनीति शुरू की है। इसके तहत मीम्स, बॉलीवुड-हॉलीवुड फिल्मों के चर्चित सीन और क्रिएटिव वीडियो का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    इस अभियान में राज्यों के भाजपा हैंडल्स एक-दूसरे की पोस्ट को कोट और रिट्वीट करने के साथ टैग और कोलैबोरेशन कर रहे हैं। इसका मकसद कंटेंट की पहुंच बढ़ाने के साथ राजनीतिक व्यंग्य के जरिए विपक्ष पर निशाना साधना भी है।

    जम्मू-कश्मीर BJP के पोस्ट से शुरू हुआ सिलसिला

    इस नए सोशल मीडिया प्रयोग की शुरुआत जम्मू-कश्मीर भाजपा के X हैंडल से हुई। हैंडल ने सलमान खान, संजय दत्त और जैकी श्रॉफ का एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें तीनों अभिनेता एक साथ रियलिटी शो के मंच पर दिखाई दे रहे हैं।

    भाजपा ने इस वीडियो को राजनीतिक रंग देते हुए संजय दत्त को कर्नाटक भाजपा, सलमान खान को जम्मू-कश्मीर भाजपा और जैकी श्रॉफ को गोवा भाजपा के रूप में पेश किया। पोस्ट में लिखा गया—“तीन भाई, तीनों तबाही ?? The worst nightmare for the Dimagi Naxal ecosystem!”

    पोस्ट के ट्रेंड करने के बाद भाजपा IT सेल और सोशल मीडिया टीम ने इसे आगे बढ़ाया। इसके बाद दूसरे राज्यों के भाजपा हैंडल्स भी इस अभियान से जुड़ते चले गए।

    MP BJP ने जोड़े ‘तीन’ में ‘चार भाई’

    जम्मू-कश्मीर भाजपा की पोस्ट को मध्य प्रदेश भाजपा ने कोट करते हुए लिखा—“Hold up… Madhya Pradesh is entering the chat?? तीन भाई? Make it चार, अब तबाही होगी आर-पार!”

    इसके बाद यह सिलसिला और आगे बढ़ा। दिल्ली भाजपा ने अभिनेता पंकज त्रिपाठी के एक वीडियो के साथ पोस्ट किया—“भूल तो नहीं गए हमें?” इसके बाद अलग-अलग राज्यों के भाजपा हैंडल्स ने इसी अंदाज में मीम्स और वीडियो पोस्ट करना शुरू कर दिया।

    दो-तीन राज्यों तक पहुंचाने की रणनीति

    भाजपा IT सेल के एक अधिकारी के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर भाजपा के वीडियो के बाद यह रणनीति बनाई गई कि देशभर के भाजपा राज्यों के सोशल मीडिया हैंडल्स को एक साथ जोड़ा जाए। इसके तहत हैंडल्स एक-दूसरे की पोस्ट को कोट, टैग और जरूरत के अनुसार कोलैबोरेट करेंगे।

    अधिकारी का कहना है कि अलग-अलग राज्यों के पार्टी हैंडल्स के फॉलोअर्स काफी ज्यादा हैं। ऐसे में एक राज्य का हैंडल जब दूसरे राज्य के हैंडल को कोट या टैग करता है तो पोस्ट की पहुंच कई गुना बढ़ जाती है।

    पार्टी के मुताबिक, दिल्ली भाजपा की एक पोस्ट के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि जिस तरह दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर किया, उसी तरह पंजाब में भी AAP को सबक मिल सकता है।

    भाजपा का दावा है कि इस रणनीति से राजनीतिक कंटेंट केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरे राज्यों में भी पहुंचता है। पार्टी अब ऐसे कंटेंट पर जोर दे रही है, जिसका असर एक साथ दो-तीन राज्यों की राजनीति पर पड़े।

    ‘दिमागी नक्सल’ के मुद्दे को बनाया सोशल मीडिया हथियार

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से “दिमागी नक्सल” शब्द इस्तेमाल किए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हुई है। अब भाजपा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसी कथित “दिमागी नक्सल” मानसिकता को निशाना बनाते हुए मीम्स और फनी वीडियो तैयार किए जा रहे हैं।

    इसके लिए बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों के लोकप्रिय दृश्यों को एडिट किया जा रहा है। इनके जरिए राजनीतिक संदेश के साथ विपक्ष पर व्यंग्य भी किया जा रहा है।

    भाजपा के एक नेता का कहना है कि अभी यह सिर्फ “करवट” है। उनके मुताबिक, तीन दिनों में सोशल मीडिया पर जिस तरह का नैरेटिव तैयार हुआ है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरी ताकत से अभियान चलने पर इसका असर कितना बड़ा हो सकता है।

    Twitter के बाद Instagram पर भी तैयारी

    भाजपा नेता का आरोप है कि कांग्रेस का नैरेटिव झूठ पर आधारित है और पार्टी को “झूठ की राजनीति” का जवाब देना जरूरी है। इसी रणनीति के तहत अब Twitter के बाद Instagram पर भी क्रिएटिव वीडियो और तस्वीरों के जरिए अभियान चलाने की तैयारी है।

    भाजपा सूत्रों के मुताबिक, Twitter पर राजनीतिक मुद्दों में रुचि रखने वाले लोगों की संख्या अधिक है, इसलिए वहां अभियान शुरू किया गया है। अब इसी रणनीति को Instagram पर भी लागू किया जाएगा।

    आने वाले दिनों में अलग-अलग राज्यों के भाजपा हैंडल्स से मीम्स, फनी वीडियो और क्रिएटिव पोस्ट लगातार सामने आने की संभावना है। पार्टी ने अपने Instagram और Twitter अकाउंट पर टीजर के तौर पर “Shall we begin” संदेश भी पोस्ट किया है और देशभर के अलग-अलग राज्यों के भाजपा हैंडल्स को टैग किया है।

    यानी भाजपा की नई सोशल मीडिया टीम ने साफ संकेत दे दिया है कि मौजूदा अभियान महज शुरुआत है। आने वाले दिनों में सोशल मीडिया पर पार्टी का राजनीतिक कैंपेन और ज्यादा आक्रामक और क्रिएटिव नजर आ सकता है।

  • ‘ब्रालेट तो छोटी-सी बात थी…’ कृति सेनन के राखी विज्ञापन पर बोलीं कंगना, राहुल गांधी पर भी साधा निशाना

    ‘ब्रालेट तो छोटी-सी बात थी…’ कृति सेनन के राखी विज्ञापन पर बोलीं कंगना, राहुल गांधी पर भी साधा निशाना


    नई दिल्ली। भाजपा सांसद और बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने रक्षाबंधन को लेकर कृति सेनन के विवादित ज्वैलरी विज्ञापन पर एक बार फिर प्रतिक्रिया दी है। कंगना ने कहा कि उनकी आपत्ति केवल कृति के कपड़ों को लेकर नहीं थी, बल्कि विज्ञापन में रक्षाबंधन जैसे त्योहार को जिस तरह पेश किया गया, उससे थी। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित ज्वैलरी ब्रांड ने विज्ञापन वापस ले लिया था।

    ‘किसने रोका है कुछ भी पहनने से?’
    कृति सेनन के आउटफिट पर सवाल उठाए जाने को लेकर कंगना ने कहा कि किसी को भी अपनी पसंद के कपड़े पहनने से रोकने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि मुद्दा यह नहीं है कि कृति ने क्या पहना था, बल्कि यह है कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार को विज्ञापन में किस रूप में दिखाया गया।

    कंगना से जब पूछा गया कि क्या कृति ईद के मौके पर भी इसी तरह के कपड़ों में पोस्ट कर सकती हैं, तो उन्होंने इस पर भी टिप्पणी की और हिंदू पारिवारिक रिश्तों में मर्यादा और सीमाओं का जिक्र किया।

    राहुल गांधी पर भी साधा निशाना
    ‘डिकोड’ को दिए इंटरव्यू में कंगना ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा कृति सेनन के समर्थन पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की पोस्ट में रक्षाबंधन का जिक्र नहीं था।

    कंगना ने कहा कि एक महिला रक्षाबंधन पर अपनी पसंद के कपड़े पहन सकती है, लेकिन रक्षाबंधन केवल कपड़ों या फैशन का मामला नहीं, बल्कि एक सभ्यता और धार्मिक परंपरा की अभिव्यक्ति है।

    उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह अपने नजरिए को लेकर भ्रमित हैं। कंगना ने सनातन धर्म को लेकर राहुल गांधी की सोच पर भी सवाल उठाए और कहा कि उनका नजरिया सनातन धर्म के प्रति अलग तरह का है।

    ‘ब्रालेट तो छोटी-सी चीज थी’
    कंगना ने साफ किया कि उनके मुताबिक विज्ञापन में ब्रालेट सबसे बड़ा मुद्दा नहीं था। उन्होंने कहा कि असली सवाल यह था कि विज्ञापन में रक्षाबंधन से जुड़े पारंपरिक तत्व लगभग नजर नहीं आए।

    उन्होंने माता-पिता, घर, हलवा-पूरी, भगवान, टीका, अक्षत, धूप और दीप जैसे पारंपरिक प्रतीकों का जिक्र करते हुए कहा कि रक्षाबंधन को केवल आधुनिक एस्थेटिक्स के जरिए पेश नहीं किया जा सकता।

    कंगना के मुताबिक, “एक त्योहार किसी संस्कृति और सभ्यता का एस्थेटिक एक्सप्रेशन होता है।” उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन में टीका और राखी जैसे पारंपरिक प्रतीकों का अपना महत्व है। अब कंगना की इन टिप्पणियों पर कृति सेनन और राहुल गांधी की ओर से किसी प्रतिक्रिया का इंतजार है।

  • US खुफिया एजेंसी का दावा….नाटो समिट के दौरान ईरानी मिसाइल के निशाने पर थे ट्रंप!

    US खुफिया एजेंसी का दावा….नाटो समिट के दौरान ईरानी मिसाइल के निशाने पर थे ट्रंप!


    वॉशिंगटन।
    नाटो शिखर सम्मेलन (NATO Summit) के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर खतरे का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को कई इनपुट मिले थे कि ईरान (Iran) को तुर्किये (Türkiye) की राजधानी अंकारा में ट्रंप के ठिकाने की सटीक जानकारी थी। बताया गया कि ईरानी एजेंटों को उस होटल की मंजिल तक की जानकारी थी, जहां ट्रंप ठहरे हुए थे। सुरक्षा अधिकारियों ने इसी दौरान ट्रंप को निशाना बनाने वाले संभावित सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल खतरे का भी पता लगाया।


    क्या ट्रंप को मिसाइल से निशाना बनाने की तैयारी थी?

    खतरे का आकलन इतना गंभीर बताया गया कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने असाधारण सुरक्षा योजना तैयार की। रिपोर्ट के मुताबिक, नाटो सम्मेलन के आसपास एक व्यक्ति को कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल के साथ भी देखा गया था। साथ ही ऐसी जानकारी सामने आई कि ट्रंप को ले जाने वाले विमान को निशाना बनाया जा सकता है। इसके बाद ट्रंप की आवाजाही को सार्वजनिक रूप से सामान्य दिखाते हुए उन्हें गुप्त तरीके से दूसरे विमान में भेजने की योजना बनाई गई।


    ट्रंप को एयरपोर्ट से गुप्त तरीके से कैसे निकाला गया?

    सुरक्षा योजना के तहत ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से पुराने एयरफोर्स वन में सवार होने का दृश्य दिया। इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट के अंदर एक कैटरिंग कंटेनर के जरिए गुप्त रूप से बाहर निकाला गया और सैन्य विमान से तुर्किये से बाहर ले जाया गया। दूसरी ओर, मूल एयरफोर्स वन को अंकारा से ब्रिटेन के लिए रवाना किया गया। इसमें विदेश मंत्री मार्को रुबियो, वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ सहयोगी स्टीफन मिलर तथा स्टीवन च्यूंग समेत कई अधिकारी मौजूद थे।


    क्या एयरफोर्स वन में बैठे लोगों को खतरे की जानकारी थी?

    रिपोर्ट के मुताबिक, मूल एयरफोर्स वन में मौजूद सभी यात्रियों को खतरे की पूरी गंभीरता की जानकारी नहीं दी गई थी। 8 जुलाई को अंकारा से ब्रिटेन की उड़ान के दौरान यात्रियों को विमान की खिड़कियों के पर्दे बंद रखने का निर्देश दिया गया। बाद में ट्रंप गुप्त रूप से फिर एयरफोर्स वन में शामिल हो गए और कैमरों के सामने ऐसे दिखाई दिए, जैसे वह पूरे समय उसी विमान में रहे हों। इस पूरी कार्रवाई को लेकर पूर्व व्हाइट हाउस अधिकारियों के बीच भी सवाल उठे हैं।


    क्या ट्रंप की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम सही था?

    इस सुरक्षा अभियान को लेकर दो तरह की राय सामने आई है। कुछ पूर्व अधिकारियों का मानना है कि जिस विमान को डिकॉय बनाया गया, उसमें मौजूद लोगों को खतरे की जानकारी दी जानी चाहिए थी। वहीं, इस फैसले का बचाव करने वालों का तर्क है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए विश्वसनीय खतरे की स्थिति में असाधारण कदम उठाना जरूरी था। ट्रंप ने बाद में कहा कि उन्होंने सीक्रेट सर्विस के निर्देशों का पालन किया और इस दावे को खारिज किया कि विमान में मौजूद लोगों को जानबूझकर ज्यादा खतरे में डाला गया।

  • LS में ताकत बढ़ाने की तैयारी में NDA…. टारगेट- दो तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचना

    LS में ताकत बढ़ाने की तैयारी में NDA…. टारगेट- दो तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचना


    नई दिल्ली।
    केंद्र की सत्ता पर काबिज एनडीए (NDA) गठबंधन लोकसभा (Lok Sabha) में अपना कुनबा और ताकत बढ़ाने की तैयारी में है। टीएमसी (TMC) के बागी गुट द्वारा 19 सांसदों के समर्थन का दावा किए जाने के बाद, अब विपक्षी खेमे की एक और बड़ी पार्टी में फूट की खबरें सामने आ रही हैं। सूत्रों की मानें तो अगला नंबर उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना यूबीटी (Shiv Sena – UBT)) का हो सकता है। बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए लोकसभा (Lok Sabha) में दो-तिहाई बहुमत (Two-thirds majority) के आंकड़े के करीब पहुंचने के लिए विपक्ष के कई सांसदों को अपने पाले में लाने की जुगत में लगा हुआ है।


    शिवसेना (UBT) के 6 सांसद कर सकते हैं पाला-बदल

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनडीए की एकतरफा जीत के बाद से ही उद्धव गुट में बगावत की अटकलें चल रही थीं, लेकिन अब इन चर्चाओं ने काफी जोर पकड़ लिया है। लोकसभा में फिलहाल उद्धव ठाकरे की पार्टी के कुल 9 सांसद हैं। दल-बदल कानून के तहत सदस्यता जाने से बचने के लिए इनमें से कम से कम 6 सांसदों को एक साथ पार्टी छोड़नी होगी और किसी अन्य दल में विलय करना होगा। माना जा रहा है कि इन बागी सांसदों के लिए सबसे मुफीद विकल्प महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना ही होगी।


    मुंबई तक सिमट रहा उद्धव ठाकरे का प्रभाव?

    एकनाथ शिंदे अपनी मजबूत जमीनी पकड़ और आसानी से लोगों के बीच उपलब्ध रहने की छवि के कारण राज्य के बड़े हिस्से में अपने विरोधी गुट को कमजोर करने में सफल रहे हैं। शिंदे ने ठाकरे गुट के कई प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में कर लिया है, जिसके चलते माना जा रहा है कि उद्धव ठाकरे का प्रभाव अब मुख्य रूप से केवल मुंबई तक ही सीमित रह गया है।


    लोकसभा में 360 का आंकड़ा छूने पर NDA की नजर

    संसद में अपने गठबंधन का संख्याबल बढ़ाने की बीजेपी की इस सियासी कवायद के पीछे सबसे बड़ा लक्ष्य दो-तिहाई बहुमत हासिल करना है। फिलहाल लोकसभा में 540 सांसद मौजूद हैं और तीन सीटें खाली हैं। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की नजर किसी भी तरह सदन में दो-तिहाई यानी 360 सांसदों का जादुई आंकड़ा हासिल करने पर है।


    टीएमसी में भी हलचल

    इस मुहिम को तब बल मिला, जब हाल ही में टीएमसी के बागी गुट ने दावा किया कि उनके पास 19 लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जो एनडीए सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। सूत्रों का कहना है कि संसद में संख्याबल बढ़ाने की बीजेपी की यह पूरी मुहिम अंततः इस बात पर भी निर्भर करेगी कि मौजूदा लोकसभा में 360 के जादुई आंकड़े को पार करने का उनका यह मास्टरप्लान जमीनी स्तर पर कितना व्यावहारिक साबित होता है।

  • ईरान पर हुआ हमला तो मुस्लिम देशों के टारगेट पर होंगे US मिलिट्री बेस?

    ईरान पर हुआ हमला तो मुस्लिम देशों के टारगेट पर होंगे US मिलिट्री बेस?


    तेहरान। ईरान और अमेरिका में तनातनी चरम पर पहुंच गई है। आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका ईरान पर कभी भी सैन्य हमला कर सकता है। यही वजह है कि भारत समेत दुनिया भर के देशों ने अपने-अपने नागरिकों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस तनातनी को तब और बढ़ा दिया, जब उन्होंने ईरान में प्रदर्शनकारियों से अपना आंदोलन तेज करने का आह्वान किया और कहा कि मदद पहुंच रही है। इस बीच, ईरान ने धमकी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया वह चुप नहीं बैठेगा और मध्य-पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर जवाही हमला करेगा।
    शायद यही वजह है कि अमेरिका ने मध्य-पूर्व में स्थित अपने मिलिट्री बेस से सैनिकों और कर्मियों को वापस बुलाने का फैसला किया है। ईरान ने अमेरिकी हमलों की आशंकाओं के मद्देनजर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर और तुर्की समेत मिडिल ईस्ट के कई देशों को चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो वह उनके देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाएगा।
    दुनिया भर में अमेरिका के सैन्य अड्डे: कहां, क्यों और कितने अहम?
    दुनिया भर में अमेरिका के सैन्य ठिकाने दो तरह हैं। पहला एयर बेस, जहां लड़ाकू विमान रखे जाते हैं और वहां से संचालित किए जाते हैं, और दूसरा नेवल बेस होते हैं, जहां युद्धपोत और नौसैनिक जहाज़ तैनात रहते हैं। जुलाई 2024 तक, अमेरिका के पास दूसरे देशों में कम से कम 128 सैन्य अड्डे हैं। इनमें सबसे बड़ा विदेशी अड्डा दक्षिण कोरिया का कैंप हम्फ्रीज़ है, जो क्षेत्रफल के लिहाज़ से अमेरिका का सबसे बड़ा ओवरसीज़ बेस माना जाता है। ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2001 के बाद 19 से 30 लाख अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान और इराक युद्धों में सेवा दी इनमें से आधे से ज़्यादा सैनिक एक से अधिक बार इन युद्ध क्षेत्रों में भेजे गए।
    मिडिल-ईस्ट में कहां-कहां अमेरिकी सैन्य अड्डे?
    मध्य-पूर्व के करीब आधा दर्जन मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। इनमें सउदी अरब, कतर, UAE, बहरीन, तुर्की, इराक और जॉर्डन शामिल हैं। ये अमेरिकी सैन्य अड्डे मध्य-पूर्व और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखते हैं। आतंकवाद विरोधी अभियानों में अहम भूमिका निभाते हैं और ईरान, रूस और चीन जैसे देशों पर रणनीतिक दबाव बनाए रखते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कुल 19 मिलिट्री बेस हैं। इनमें से हरेक सैन्य अड्डों पर करीब 40 से 50 हजार सैनिक तैनात हैं।

    बहरीन: बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े (Fifth Fleet) का मुख्यालय है। यह बेड़ा खाड़ी क्षेत्रों खासकर लाल सागर, अरब सागर और हिंद महासागर के कुछ हिस्सों में नौसैनिक सुरक्षा और सैन्य अभियानों की निगरानी करता है। समुद्री रक्षा में यह बेड़ा काफी अहम माना जाता है।

    कतर: कतर की राजधानी दोहा के पास अल उदैद एयर बेस है, जो रेगिस्तान में 24 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह ईरान से करीब 190 KM की दूरी पर फारस की खाड़ी के किनारे स्थित है। यहां करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड का मुख्यालय है। यह कमांड मिस्र से कजाकिस्तान तक के बड़े क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों को संभालता है। पिछले साल जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु सुविधा ठिकानों पर हमले किए थे तब ईरान ने कतर में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। इस वजह से कतर पहले से ही सचेत है और अमेरिका पर हमले नहीं करने का दबाव बना रहा है।

    कुवैत: कुवैत में कई अमेरिकी सैन्य बेस हैं। कैंप आरिफजान यूएस आर्मी सेंट्रल कमांड का मुख्यालय है। वहां अली अल सलेम एयर बेस भी है, जो इराक सीमा से 40 किमी दूर, अलग-थलग और कठिन इलाके में स्थित है। कुवैत में ही कैंप ब्यूहरिंग सैन्य अड्डा भी है। 2003 के इराक युद्ध के दौरान ये अड्डा बना था। यह इराक और सीरिया भेजे जाने वाले सैनिकों का ट्रांज़िट बेस है।

    संयुक्त अरब अमीरात: UAE की राजधानी अबू धाबी के पास अल धफरा एयर बेस है, जो यूएई वायुसेना के साथ साझेदारी में है यहां से ISR और ड्रोन ऑपरेशंस किए जाते हैं। ISIS के खिलाफ अभियानों और क्षेत्रीय निगरानी में यह अड्डा अहम भूमिका निभाता रहा है। दुबई के जिबेल अली पोर्ट औपचारिक बेस नहीं है लेकिन पश्चिम एशिया में अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा पोर्ट ऑफ कॉल है। यहां अक्सर अमेरिकी विमानवाहक पोत और युद्धपोत आते हैं

    इराक: पश्चिमी इराक के अनबार प्रांत में ऐन अल असद एयर बेस है। यह इराकी सुरक्षा बलों और नाटो मिशन को समर्थन देता है। 2020 में जनरल कासेम सुलेमानी की मौत का बदला लेने के लिए ईरान ने इस पर मिसाइल हमला किया था। इसके अलावा उत्तरी इराक के कुर्द क्षेत्र में एरबिल एयर बेस इराक में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। यह अमेरिकी और सहयोगी देशों के प्रशिक्षण का केंद्र है। यह खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स और सैन्य योजना का अहम ठिकाना है।
    सऊदी अरब: सऊदी अरब के रियाद के दक्षिण में 60 किलोमीटर की दूरी पर प्रिंस सुल्तान एयर बेस है। यह क्षेत्र में हवाई और मिसाइल रक्षा अभियानों का समर्थन करता है। यहां पैट्रियट और THAAD जैसे उन्नत रक्षा सिस्टम तैनात हैं। सऊदी अरब में 2024 तक 2,321 अमेरिकी सैनिक मौजूद थे। क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए सऊदी सेना के साथ अमेरिकी सेना समन्वय कर ऑपरेशन करती है।

    जॉर्डन: जॉर्डन की राजधानी अम्मान से लगभग 100 किमी दूर अज़्राक में मुवाफ़क़ अल सल्टी एयर बेस है। यहां अमेरिकी वायुसेना की 332वीं एयर एक्सपेडिशनरी विंग तैनात है। यह सीरिया, लेबनान, इज़राइल, जॉर्डन और इराक क्षेत्र में निगरानी, हवाई अभियान और सैन्य समन्वय करती है।

    तुर्की: तुर्की और अमेरिका मिलकर दक्षिणी अदाना प्रांत में इंसिरलिक एयर बेस चलाते हैं। यहां अमेरिकी परमाणु हथियार रखे हैं। यहां से ISIS के खिलाफ गठबंधन को सहयोग दिया जाता है। तुर्की में 1465 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इनके अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, किरगिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान में भी अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। कुल मिलाकर देखें तो ईरान को चारों तरफ से अमेरिकी सैन्य अड्डों ने घेर रखा है।

  • डोनाल्ड ट्रंप की धमकी पर ईरान बोला-'अमेरिकी सैन्य अड्डे हमारे टारगेट होंगे'

    डोनाल्ड ट्रंप की धमकी पर ईरान बोला-'अमेरिकी सैन्य अड्डे हमारे टारगेट होंगे'

    शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर घातक बल का प्रयोग किया तो अमेरिका हस्तक्षेप करेगा। इस बयान पर ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनी के वरिष्ठ सलाहकार भी चेतावनी दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हस्तक्षेप से पूरे क्षेत्र में अराजकता फैल सकती है।
    राजधानी तेहरान सहित पूरे ईरान में रविवार से जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, जो मूल रूप से आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित हैं। दुकानदारों ने मुद्रा रियाल की गिरावट, मुद्रास्फीति और बढ़ती महंगाई के खिलाफ हड़ताल की, जो जल्द ही देशव्यापी हो गई। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है। प्रदर्शन अब केवल आर्थिक शिकायतों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि कई जगहों पर सरकार-विरोधी और सत्ताधारी व्यवस्था के खिलाफ नारे भी लगाए जा रहे हैं। प्रदर्शन कुम, इस्फहान, मशहद, हमदान जैसे शहरों तक फैल चुके हैं। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने लोगों की आजीविका के मुद्दों को गंभीरता से लेने की बात कही, लेकिन स्वीकार किया कि उनकी सरकार के पास सीमित विकल्प हैं।
    ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध

    यह प्रदर्शन 2022 के बाद ईरान में सबसे बड़े पैमाने के विरोध हैं, जो महसा अमीनी मामले के बाद हुए थे। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप का बयान इस बात का संकेत देता है कि अमेरिका ईरान में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर सतर्क है, जबकि ईरान इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मान रहा है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन वैध हैं, लेकिन अशांति फैलाने वालों को कड़ा जवाब दिया जाएगा। दोनों पक्षों की ओर से जारी ये पारस्परिक धमकियां मध्य पूर्व में तनाव को और बढ़ा सकती हैं, खासकर तब जब हाल ही में इजरायल-ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति रही हो।