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  • जर्मनी-नीदरलैंड दौरा…. ट्रंप की टैरिफ नीति और ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच भारत का नया दांव

    जर्मनी-नीदरलैंड दौरा…. ट्रंप की टैरिफ नीति और ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच भारत का नया दांव


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) ने बीते डेढ़ साल में भारतीय माल (Indian goods) पर शुल्क (Tariff) की दर तीन बार बदली। अब अधिकतर भारतीय सामान पर सामान्य शुल्क के ऊपर 10 फीसदी लगता है। फरवरी 2026 में 18% की दर वाले जिस अंतरिम ढांचे का एलान हुआ था, उस पर आठ महीने बाद भी हस्ताक्षर नहीं हुए। इसी अनिश्चितता के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) 22 से 24 अक्तूबर तक जर्मनी (Germany) और 24 से 27 अक्तूबर तक नीदरलैंड (Netherlands) के दौरे पर रहेंगे। उनके साथ करीब 100 कंपनियों और नवउद्यमों का दल है।

    बीते चार साल में भारत ने एक के बाद एक समझौते किए हैं और यूरोपीय संघ उसका 22वां मुक्त व्यापार साझेदार बना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के व्यापार समझौते पर सकारात्मक बयान के बावजूद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीयर का कहना है कि घोषणा तुरंत होने वाली नहीं है। यानी तस्वीर अब भी साफ नहीं।


    यूरोप का दरवाजा खुला, पर ताला अब तक नहीं हटा

    यूरोपीय संघ के साथ हुआ समझौता भारत का अब तक का सबसे बड़ा सौदा है। यूरोपीय संघ अपने 99.3 प्रतिशत और भारत अपने 96.6 प्रतिशत कारोबार पर शुल्क हटाएगा या घटाएगा। भारत यूरोपीय कारों पर शुल्क 110 प्रतिशत तक के स्तर से घटाकर 40 प्रतिशत पर लाएगा। पर नौ महीने बाद भी यह लागू नहीं हुआ है। गोयल का यह दौरा इसलिए नीतिगत कम और व्यावहारिक ज्यादा है।


    बर्लिन और हेग में क्या होगा

    गोयल बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में हिस्सा लेंगे और जर्मनी के आर्थिक मामलों एवं ऊर्जा मंत्री तथा चांसलर कार्यालय के जी-7 और जी-20 शेरपा से द्विपक्षीय बातचीत करेंगे। भारतीय कारोबारी दल की अलग बैठकें वाहन और उन्नत विनिर्माण, सूचना तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि एवं उपभोक्ता सामान, दवा और स्वास्थ्य में होंगी।

    नीदरलैंड में बातचीत सरकार से सरकार के स्तर पर होगी। 25 अक्तूबर को भारतीय दल रॉटरडम बंदरगाह देखने जाएगा और 26 अक्तूबर को हेग में भारत-नीदरलैंड कारोबार मंच की बैठक होगी।


    अब तक की कोशिशों से क्या मिला

    वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल निर्यात 863.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। इसमें वस्तुओं का निर्यात 441.8 अरब डॉलर और सेवाओं का 421.3 अरब डॉलर रहा। यह उसी साल हुआ जिस साल अमेरिका ने शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया था।

    मुक्त व्यापार समझौते वाले बाजारों में आसियान देश सबसे ऊपर रहे, जहां 38.42 अरब डॉलर का माल गया। संयुक्त अरब अमीरात 37.36 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर रहा। ब्रिटेन के साथ समझौता 15 जुलाई 2026 को लागू हुआ और उसी वित्त वर्ष में वहां 13.44 अरब डॉलर का निर्यात दर्ज हुआ।

    ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौते से पहले वित्त वर्ष 2020-21 में वहां भेजे माल के लिए सिर्फ 1,482 मूल प्रमाणपत्र जारी हुए थे, समझौते के बाद यह औसतन 45 हजार से ऊपर पहुंच गया। ऑस्ट्रेलिया को निर्यात चार अरब डॉलर से बढ़कर 7.28 अरब डॉलर हो गया।

    ओमान के साथ समझौता एक जून 2026 को लागू हुआ और जून में ही वहां निर्यात पिछले महीने से 54.7 प्रतिशत और पिछले साल के मुकाबले 189.6 प्रतिशत बढ़ गया। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ समझौता अक्तूबर 2025 से लागू है और अब तक 7,885 मूल प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं।

  • ट्रंप की टैरिफ नीति के उल्टे परिणाम, दावा विदेशी कंपनियों पर बोझ डालने का था….भुगत रहे US के लोग

    ट्रंप की टैरिफ नीति के उल्टे परिणाम, दावा विदेशी कंपनियों पर बोझ डालने का था….भुगत रहे US के लोग


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की बहुचर्चित टैरिफ नीति (Tariff policy) पर एक नई रिपोर्ट ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। दावा किया गया था कि आयात शुल्क (Import Duty) का बोझ विदेशी कंपनियों और सरकारों पर पड़ेगा, लेकिन ताजा अध्ययन में सामने आया है कि इन शुल्कों का करीब 90 प्रतिशत खर्च अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों ने ही उठाया। यह निष्कर्ष फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयार्क (Federal Reserve Bank of New York) से जुड़े अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण में सामने आया है।

    यूएसए टुडे ने बताया कि छह फरवरी को जारी एक नामी टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक अनुमान है कि 2025 में हर अमेरिकी परिवार पर 1000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा, वहीं 2026 में यह बोझ बढ़कर 1300 डॉलर होने का अनुमान है।

    रिपोर्ट के मुताबिक आयातित वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क का अधिकांश हिस्सा कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में अमेरिकी बाजार में ही खपा दिया गया। विदेशी निर्यातकों ने अपने दामों में सीमित कटौती की, जिससे लागत का बोझ घरेलू कंपनियों और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच गया। ऐसे में यह अध्ययन न केवल ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि संरक्षणवादी कदमों का वास्तविक असर अक्सर घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता है।


    अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ा सीधा असर

    रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान चीन सहित कई देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए। ट्रंप ने दावा किया था कि इन शुल्कों का भुगतान विदेशी कंपनियां और सरकारें करेंगी। हालांकि अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वास्तविकता इससे अलग रही। विश्लेषण के अनुसार, आयातित वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी आयातकों ने चुकाया, जिसने आगे चलकर कीमतों में वृद्धि के रूप में उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर बोझ डाला। यानी टैरिफ एक तरह से घरेलू कर (टैक्स) की तरह काम करता रहा, जिसका प्रभाव रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ा।


    विदेशी निर्यातकों ने नहीं घटाए दाम

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विदेशी निर्यातकों ने अपने उत्पादों के दाम में बहुत कम कटौती की। इसका अर्थ यह है कि वे टैरिफ का बोझ खुद वहन करने के बजाय अमेरिकी खरीदारों पर डालने में सफल रहे। परिणामस्वरूप, आयातित सामान महंगे हुए और अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ी।


    महंगाई पर प्रभाव

    अध्ययन में यह संकेत भी दिया गया है कि टैरिफ का प्रभाव महंगाई दर पर पड़ा। जब कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी करती हैं। इससे व्यापक स्तर पर मूल्य वृद्धि देखने को मिलती है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि टैरिफ को अक्सर व्यापार घाटा कम करने या घरेलू उद्योगों की रक्षा के उपाय के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन यदि उसका भार मुख्य रूप से घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही पड़े तो नीति के लाभ सीमित हो सकते हैं।


    आगे की राह

    विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार नीति बनाते समय उसके व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन जरूरी है। यदि टैरिफ का अधिकांश भार घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता है, तो इससे उपभोक्ता खर्च, निवेश और प्रतिस्पर्धा पर नकारात्मक असर हो सकता है। रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक व्यापार की जटिलताओं के बीच किसी भी देश द्वारा उठाया गया संरक्षणवादी कदम अंततः उसके अपने बाजार को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भविष्य की व्यापार नीतियों को संतुलित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ तैयार करने की जरूरत है।