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  • अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव

    अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव

    नई दिल्ली । अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू कर दिया है। यह निर्णय अमेरिकी ट्रेड एक्ट-1974 की धारा 301 के तहत लिया गया है, जिसके माध्यम से उन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई की जाती है जिनकी सप्लाई चेन में जबरन मजदूरी या श्रम मानकों से जुड़े गंभीर सवाल उठते हैं। यह नया टैरिफ ऐसे समय लागू हुआ है जब पहले से लागू 15 प्रतिशत अस्थायी वैश्विक टैरिफ की अवधि समाप्त हो गई। इसके साथ ही भारत के लिए नई शुल्क व्यवस्था प्रभावी हो गई है, जिससे कई निर्यात क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।

    अमेरिका ने इस नई व्यवस्था के तहत कुल 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। इनमें भारत सहित कुछ देशों को 10 प्रतिशत वाले समूह में रखा गया है, जबकि अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लागू किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जिन देशों ने फोर्स्ड लेबर से जुड़े उत्पादों पर रोक लगाने या श्रम मानकों में सुधार के लिए कदम उठाए हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम टैरिफ श्रेणी में रखा गया है।

    भारत के लिए राहत की बात यह रही कि प्रारंभिक प्रस्ताव में 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की बात कही गई थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि भारत ने श्रम मानकों, सप्लाई चेन की निगरानी और विदेशी व्यापार नीति में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। इन कदमों के आधार पर प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क में 2.5 प्रतिशत की कमी की गई। हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका भविष्य में भी इन सुधारों की निगरानी जारी रखेगा।

    अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार माना जाता है। ऐसे में नया टैरिफ उन उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है जिनकी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अधिक है। टेक्सटाइल और गारमेंट्स, रत्न एवं आभूषण, चमड़ा उद्योग, कृषि एवं खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और विभिन्न विनिर्माण उत्पादों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अतिरिक्त शुल्क लागू होने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ने और निर्यातकों पर कीमत कम करने का दबाव बनने की संभावना है।

    फोर्स्ड लेबर का अर्थ ऐसी मजदूरी से है जिसमें किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध काम कराया जाता है। इसमें धमकी देना, वेतन रोकना, कर्ज के बदले काम कराने की मजबूरी, पहचान संबंधी दस्तावेज जब्त करना या नौकरी छोड़ने की स्वतंत्रता न देना जैसी स्थितियां शामिल होती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है और कई देश इस प्रकार के उत्पादों के आयात पर कड़ी निगरानी रखते हैं।

    अमेरिकी कानून के सेक्शन 301 के तहत सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि किसी देश की व्यापारिक नीतियां या उत्पादन प्रणाली अमेरिकी उद्योगों के लिए अनुचित या नुकसानदायक मानी जाती हैं, तो उसके खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ, आयात प्रतिबंध या अन्य व्यापारिक कदम उठाए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया में जांच के बाद संबंधित देश से बातचीत भी की जाती है और उसके बाद अंतिम निर्णय लागू होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। यदि भारतीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों, पारदर्शी सप्लाई चेन और गुणवत्ता मानकों को और मजबूत करते हैं, तो भविष्य में शुल्क संबंधी दबाव कम करने के साथ वैश्विक बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बेहतर बना सकते हैं।

  • भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश

    भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों (Senators) ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला बहुप्रतीक्षित विधेयक (Bill) पेश किया है। इसमें भारत समेत पांच देशों का नाम शामिल है, जिन पर रूस से तेल की खरीद जारी रखने पर शुल्क लगाया जा सकता है। कुछ सांसद इस प्रस्ताव को “लिंडसे ग्राहम रूस अकाउंटेबिलिटी बिल” (Lindsey Graham Russia Accountability Bill) कह रहे हैं। इसे मंगलवार को कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और जीन शाहीन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर रोजर विकर, केटी ब्रिट और दोनों दलों के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने पेश किया।

    यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है। ग्राहम ने करीब दो वर्षों तक इस विधेयक पर काम किया था और उनके सहयोगियों ने उन्हें इसका प्रमुख सूत्रधार बताया। इस विधेयक में ग्राहम ने रूसी तेल खरीद करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की सिफारिश की थी।


    अमेरिकी सांसदों ने क्यों पेश किया 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल?

    मुख्य डेमोक्रेटिक प्रायोजक ब्लूमेंथल ने कहा कि यह विधेयक केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों तथा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। विधेयक में प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों पर शून्य से अधिक दर पर शुल्क लगा सके। हालांकि, शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है।

    विधेयक के अनुसार, अब शुल्क केवल रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर लागू होगा। विधेयक के प्रायोजकों ने कहा कि इस सूची में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। संशोधित मसौदे में पहले प्रस्तावित 500 फीसदी शुल्क को घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है।


    टैरिफ वाले देशों की सूची में भारत का भी नाम

    ब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों को भी दायरे में लाने का प्रावधान है। हालांकि, जो देश अपनी कुल गैस का 15 फीसदी से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें इससे छूट मिलेगी। इस प्रावधान से अधिकांश यूरोपीय सहयोगी देशों को राहत मिलेगी।

    सीनेटरों ने स्पष्ट किया कि शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है। इसे विधेयक में निर्धारित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) तय करेंगे। ब्लूमेंथल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शुल्क की दर इतनी होगी कि “चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।” हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया।


    ट्रंप के पास छूट देने का विशेषाधिकार

    विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। अगर बाद में शुल्क कम किया जाता है तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना भी अनिवार्य होगा। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर जेम्स रिश ने कहा कि उन्होंने एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया, जिसके तहत रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।

    सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों तक पर शुल्क लगाने का प्रावधान था। ब्लूमेंथल ने कहा कि मौजूदा मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। इनमें कुछ देशों के नाम दोनों सूचियों में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है और प्रशासन ने लिखित रूप से इस विधेयक का समर्थन भी किया है।


    लिंडसे ग्राहम को लेकर क्या बोले अमेरिकी सांसद?

    सांसदों ने उम्मीद जताई कि संशोधित मसौदे को प्रतिनिधि सभा में भी व्यापक समर्थन मिलेगा, क्योंकि पहले के व्यापक प्रस्ताव पर कई सांसदों ने आपत्ति जताई थी। विधेयक की घोषणा के दौरान कई सीनेटरों ने लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि दी। सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि ग्राहम के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां देखीं, लेकिन “यह उनका सबसे बड़ा योगदान है।”

    सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि ग्राहम ने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को जल्द पारित करना जरूरी है। उन्होंने यूक्रेन की युद्धक्षेत्र में बढ़त और रूस की ओर से नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया।

    कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि पर्याप्त समर्थन मिलते ही इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया।


    भारत पर क्यों गहराया संकट?

    भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से रूस से भारत का तेल आयात काफी बढ़ा है और अब यह भारत के कुल तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली पहले भी कह चुका है कि यह व्यापार देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित में है। भारत का यह भी कहना रहा है कि इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलती है।

    यह विधेयक अभी सीनेट की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा से भी पारित होना बाकी है। इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इससे पहले व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एएनआई से कहा कि ट्रंप प्रशासन इस रूस प्रतिबंध विधेयक का समर्थन करता है। व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों से आने वाले आयात पर 500 फीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ कारोबार जारी रखते हैं।

  • US: ट्रंप ने फिर फोड़ा टैरिफ बम…. UN से आने वाले वाहनों पर लगाया 25% टैक्स

    US: ट्रंप ने फिर फोड़ा टैरिफ बम…. UN से आने वाले वाहनों पर लगाया 25% टैक्स


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने एक बार फिर से टैरिफ बम (Tariff Bomb) फोड़ा है। इस बार उन्होंने कहा कि वह अगले हफ्ते से यूरोपीय यूनियन (European Union) से आने वाली कारों और ट्रकों पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ा देंगे। वह इसे बढ़ाकर 25 फीसदी कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह गुट पहले हुए एक व्यापार समझौते का पालन नहीं कर रहा है।

    उन्होंने अपने ‘ट्रुथ सोशल’ प्लेटफॉर्म पर लिखा, “इस तथ्य के आधार पर कि यूरोपीय यूनियन हमारे पूरी तरह से सहमत व्यापार समझौते का पालन नहीं कर रहा है, अगले सप्ताह मैं अमेरिका में आने वाली कारों और ट्रकों पर यूरोपीय यूनियन से लिए जाने वाले टैरिफ को बढ़ा दूंगा। टैरिफ को बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा।”

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे कहा, ”हालांकि, यदि वे अमेरिका के प्लांट्स में कारों और ट्रकों का प्रोडक्शन करते हैं, तो कोई टैरिफ नहीं लगेगा। कई ऑटोमोबाइल और ट्रक प्लांट्स वर्तमान में निर्माणाधीन हैं, जिनमें 100 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया जा रहा है। जो कार और ट्रक निर्माण के इतिहास में एक रिकॉर्ड है। ये प्लांट्स, जिनमें अमेरिकी कर्मचारी काम करेंगे, जल्द ही खुलने वाले हैं। आज अमेरिका में जो हो रहा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ! इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।

    ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति को और आक्रामक रूप से लागू करते हुए भारत समेत कई देशों पर टैरिफ लगाया है। इन टैरिफ का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को सस्ती विदेशी आयात से बचाना और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती देना बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा और कई देशों के बीच व्यापारिक तनाव भी तेज हो सकता है। भारत पर ट्रंप ने पहले 25 फीसदी का टैरिफ लगाया था, लेकिन फिर रूस से तेल खरीदने को लेकर इसे बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया था। हालांकि, बाद में ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूस से तेल आयात नहीं करेगा, जिसकी वजह से 25 फीसदी टैरिफ हटा दिया गया।

  • टैरिफ विवाद पर ट्रंप का बड़ा झटका…. कोर्ट ने दिए रिफंड के आदेश, कहा- कंपनियों को लौटाएं पैसे

    टैरिफ विवाद पर ट्रंप का बड़ा झटका…. कोर्ट ने दिए रिफंड के आदेश, कहा- कंपनियों को लौटाएं पैसे


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) में टैरिफ विवाद (Tariff Dispute) में बड़ा मोड़ आ गया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट (American Supreme Court) के फैसले के बाद अब न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने भी ट्रंप प्रशासन को झटका दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जिन कंपनियों ने ट्रंप सरकार की तरफ से लगाए गए आयात टैरिफ का भुगतान किया था, उन्हें अब पैसा वापस किया जाएगा। यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के जज रिचर्ड ईटन ने कहा कि सभी आयातक कंपनियां यूएस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का लाभ पाने की हकदार हैं, जिसमें पिछले महीने ट्रंप के कई टैरिफ को असंवैधानिक बताया गया था।

    फैसला सुनाते हुए यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में न्यायाधीश रिचर्ड ईटन ने कहा कि सभी आयातक रिकॉर्ड के मालिक इस फैसले का लाभ पाने के हकदार हैं। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के बाद आया, जिसमें अमेरिकी टैरिफ को अवैध बताते हुए कहा गया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 1977 की अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए टैरिफ संविधान के खिलाफ हैं।


    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक नजर

    इतना ही नहीं अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा था कि राष्ट्रपति अकेले टैरिफ तय और बदल नहीं सकते, क्योंकि कर लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस का है। इस फैसले में पारस्परिक टैरिफ, जो लगभग सभी देशों पर लगाए गए थे, को भी अवैध घोषित किया गया।


    कंपनियों के रिफंड पर कोर्ट सख्त

    न्यायाधीश ईटन ने अपने फैसले में कहा कि वह अकेले आईईईपीए टैरिफ की वापसी के मामलों को सुनेंगे। इससे यह साफ हुआ कि कंपनियों को टैरिफ लौटाने की प्रक्रिया कैसे होगी, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसका जिक्र नहीं किया। इसपर वकील रयान मेजरस ने कहा कि सरकार शायद इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी या वापसी की प्रक्रिया को रोकने के लिए समय मांगेगी।


    ट्रंप ने 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर इकट्ठा किए थे

    बता दें कि अमेरिका सरकार ने अब तक इन टैरिफ से 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर इकट्ठा किए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार को कुल 175 बिलियन डॉलर तक की वापसी करनी पड़ सकती है। ऐसे में यह फैसला विशेष रूप से एटमस निस्पंदन, नाशविल, टेनेसी की कंपनी के मामले पर आया है, जिसने टैरिफ की वापसी का दावा किया था। यह कंपनी फिल्टर्स और अन्य फिल्ट्रेशन प्रोडक्ट बनाती है।

    इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जब कोई सामान अमेरिका में आता है, तो यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन उसका अंतिम हिसाब करती है, जिसे लिक्विडेशन कहते हैं। लिक्विडेशन के बाद आयातकों को 180 दिन का समय मिलता है, जिसके अंदर वे टैरिफ पर आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। इसके बाद यह हिसाब कानूनी रूप से अंतिम माना जाता है।


    न्यायाधीश ने कस्टम्स को दिए ये निर्देश

    न्यायाधीश ने आगे आदेश दिया कि कस्टम्स उन टैरिफ को इकट्ठा करना बंद करें, जो सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित किए। और यदि कोई सामान पहले ही लिक्विडेशन प्रक्रिया से गुजर चुका है, तो उसका हिसाब बिना टैरिफ के फिर से किया जाएगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद न्यूयॉर्क लॉ स्कूल के प्रोफेसर बैरी एप्पलटन ने कहा कि यह आयातकों और उपभोक्ताओं के लिए बहुत अच्छा फैसला है। इससे कस्टम्स ब्रोकरों की भी बहुत व्यस्तता बढ़ेगी और कोर्ट के लिए प्रक्रिया आसान होगी।


    पिछले सोमवार को भी संघीय अदालत ने दिया था फैसला

    गौरतलब है कि पिछले सोमवार को एक अन्य संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन की वापसी रोकने की कोशिश को खारिज कर दिया। इसके बाद अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने इसे न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट में भेजा, ताकि वहां वापसी की अगली प्रक्रिया शुरू हो सके। अब यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन को यह तय करना होगा कि बड़ी मात्रा में टैरिफ की वापसी कैसे की जाए। वकील एलेक्सिस अर्ली के मुताबिक, “कस्टम्स आमतौर पर गलती होने पर टैरिफ लौटाते हैं, लेकिन उनका सिस्टम बड़े पैमाने पर वापसी के लिए नहीं बना है। यहां सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक प्रक्रिया की होगी।

  • अमेरिकी राष्ट्रपति ने धारा 122 के तहत टैरिफ लगाया, 150 दिनों के लिए आयात शुल्क लागू

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने धारा 122 के तहत टैरिफ लगाया, 150 दिनों के लिए आयात शुल्क लागू


    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आयातित वस्तुओं के लिए 10 प्रतिशत का अस्थायी टैरिफ लगाने का आदेश दिया है यह आदेश 24 फरवरी से प्रभावी होगा और 150 दिनों तक लागू रहेगा इस टैरिफ का उद्देश्य अमेरिकी व्यापार घाटे और अंतरराष्ट्रीय भुगतान समस्याओं को संबोधित करना है

    धारा 122 क्या है और इसे क्यों लागू किया गया
    ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 राष्ट्रपति को अधिकार देती है कि वे सरचार्ज और विशेष आयात प्रतिबंधों के माध्यम से अमेरिका की आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अंतरराष्ट्रीय भुगतान संकटों का समाधान कर सकें इस प्रावधान के तहत राष्ट्रपति औपचारिक जांच की आवश्यकता के बिना त्वरित कार्रवाई कर सकते हैं

    कौन-कौन सी वस्तुएं टैरिफ से मुक्त रहेंगी
    व्हाइट हाउस की फैक्टशीट के अनुसार, कुछ महत्वपूर्ण वस्तुएं टैरिफ से मुक्त रहेंगी इनमें खनिज, मुद्रा और बुलियन धातुएं, ऊर्जा और ऊर्जा उत्पाद, प्राकृतिक संसाधन और उर्वरक, कुछ कृषि उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स और उनका कच्चा माल, इलेक्ट्रॉनिक्स, यात्री वाहन और अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल हैं

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को दिए गए निर्देश
    राष्ट्रपति ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय को धारा 301 के तहत निर्देश दिया है कि वे उन देशों की जांच करें जिनकी नीतियां और कानून अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचा रही हैं या भेदभाव कर रहे हैं इस कदम का मकसद अनुचित व्यापार प्रथाओं का विरोध करना और अमेरिकी कंपनियों को सुरक्षित रखना है

    अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और आगे की संभावनाएँ
    राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार अमेरिका को व्यापार घाटे और घरेलू उत्पादन में कमी के कारण अपनी अधिकांश वस्तुएं आयात करनी पड़ती हैं जिससे अमेरिकी डॉलर विदेशों में चले जाते हैं टैरिफ 150 दिनों के बाद अपने आप समाप्त हो जाएगा लेकिन यदि आवश्यक हुआ तो राष्ट्रपति नई भुगतान संतुलन आपातकाल की घोषणा कर इसे फिर से लागू कर सकते हैं

    विशेषज्ञों की राय
    व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि धारा 122 के तहत टैरिफ लगाना अन्य व्यापार कानूनों की तुलना में तेज और अधिक प्रभावी है क्योंकि इसके लिए लंबी औपचारिक जांच की आवश्यकता नहीं होती यह अमेरिकी व्यापार हितों की रक्षा के लिए तात्कालिक कदम उठाने की अनुमति देता है
    ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति को मजबूत करने और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने की दिशा में एक रणनीतिक पहल है हालांकि इसके प्रभाव और प्रतिक्रिया दुनिया भर में निगरानी के दायरे में रहेंगे