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  • रूसी तेल खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों को ट्रंप ने टैरिफ से दी छूट, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फैसले की बताई वजह

    रूसी तेल खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों को ट्रंप ने टैरिफ से दी छूट, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फैसले की बताई वजह

    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने से जुड़े प्रावधानों को लागू नहीं किया है। इस फैसले के बाद अमेरिकी राजनीति में बहस शुरू हो गई है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने इस निर्णय पर सवाल उठाए हैं। वहीं, ट्रंप ने अपने कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह अमेरिका के हित में है और इससे दुनिया को भी फायदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि अभी कई लोगों को उनके फैसले का वास्तविक अर्थ समझ नहीं आया है।

    जिन पांच देशों को इस टैरिफ से छूट मिली है, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। ये देश रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले के तहत इन देशों पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ फिलहाल लागू नहीं होगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसकी ऊर्जा खरीद से जुड़े व्यापारिक संबंधों को लेकर अमेरिका में चर्चा जारी है।

    ट्रंप ने रविवार को मियामी में मीडिया से बातचीत के दौरान अपने निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों को अभी यह जानकारी नहीं है कि उनके फैसले का वास्तविक मतलब क्या है। उनके मुताबिक, समय के साथ इस निर्णय के पीछे का उद्देश्य समझ में आएगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनका कदम अमेरिका के हित में होगा और वैश्विक स्तर पर भी इसका लाभ देखने को मिल सकता है। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में इस फैसले से होने वाले संभावित लाभों का विस्तृत विवरण नहीं दिया।

    इससे पहले शुक्रवार को ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत रूस से संबंधित नए प्रतिबंध कानून के कुछ प्रावधानों को लागू करने से छूट दी गई। अमेरिकी कांग्रेस ने सितंबर में इस कानून को पारित किया था। इसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल था। भारत और चीन समेत पांच देशों को इस कार्रवाई से फिलहाल राहत मिलने के बाद कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    आदेश के अनुसार, यह छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री और वित्त मंत्री यह तय नहीं कर लेते कि आगे क्या कार्रवाई आवश्यक है। इस व्यवस्था के कारण संबंधित देशों पर टैरिफ लगाने का निर्णय तत्काल लागू नहीं हुआ है। हालांकि, इससे भविष्य में टैरिफ लगाने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। आगे की कार्रवाई अमेरिकी प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगी।

    ट्रंप के इस कदम की आलोचना उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के साथ-साथ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने भी की है। दोनों दलों के नेताओं ने पिछले महीने इस कानून को भारी बहुमत से पारित किया था। ऐसे में राष्ट्रपति के फैसले को लेकर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में मतभेद सामने आए हैं। आलोचकों का मानना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

    दक्षिण कैरोलिना की रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह रूस पर दबाव बनाने का विकल्प चुनतीं, ताकि युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया जा सके और गैस की कीमतें कम हों। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भरोसा नहीं होने की बात भी कही। इस कानून का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ रखा गया है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि रूस से ऊर्जा खरीद और उस पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी प्रशासन तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच मतभेद बने हुए हैं।

  • भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में गतिरोध, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं- आगे बढ़ना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल

    भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में गतिरोध, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं- आगे बढ़ना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल

    नई दिल्ली ।भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन दोनों देश फिलहाल ऐसे पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां आगे बढ़ना मुश्किल दिखाई दे रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि समझौते पर बेहद कठिन और गहन बातचीत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है, जबकि अमेरिका अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग 2026 में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वार्ता अभी खत्म नहीं हुई है। दोनों पक्ष यह देखने की कोशिश कर सकते हैं कि क्या आगे बातचीत की कोई गुंजाइश बाकी है। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा स्थिति में दोनों देशों के लिए कुछ और देना या लेना आसान नहीं होगा। प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत काफी कठिन और व्यापक स्तर पर हुई है।

    सीतारमण ने कहा कि व्यापार संतुलन इस समय भारत के पक्ष में है और अमेरिका की प्रमुख चिंता अपने व्यापार घाटे को कम करना है। उनके अनुसार, अमेरिका की यह चिंता कई वर्षों से भारत के साथ होने वाले व्यापार में उसके नुकसान से जुड़ी हुई है। दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते के लिए तय रूपरेखा के तहत हो रही है। भारत और अमेरिका ने उस समय व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखते हुए अंतरिम समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में काम करने की बात कही थी।

    वित्त मंत्री ने इस दौरान भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए व्यापार समझौते का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे व्यापार समझौतों को लेकर भारत के दृष्टिकोण के उदाहरण के रूप में पेश किया। सीतारमण के अनुसार, यह समझौता करीब दो अरब लोगों और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाली अर्थव्यवस्थाओं को कवर करेगा। उन्होंने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के इस्तेमाल किए गए वाक्यांश का उल्लेख करते हुए इसे “सभी समझौतों की मां” कहना उचित बताया।

    सीतारमण ने बताया कि भारत-यूरोपीय संघ समझौते के तहत भारत ने अपनी 92.5 प्रतिशत टैरिफ लाइनों और व्यापार मूल्य के करीब 97 प्रतिशत हिस्से को खोल दिया है। वहीं, यूरोपीय संघ ने व्यापार मूल्य के करीब 99 प्रतिशत और लगभग 97 प्रतिशत टैरिफ लाइनों को खोला है। उन्होंने कहा कि बाजार पहुंच से जुड़ी प्रतिबद्धताओं का चयन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की पूरकता को ध्यान में रखकर किया गया। साथ ही यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि इन प्रतिबद्धताओं का भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अमेरिका के साथ बातचीत में भी आगे की संभावनाओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच चर्चा जारी है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच घरेलू आंकड़े तय करेंगे अगले हफ्ते बाजार की दिशा

    ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच घरेलू आंकड़े तय करेंगे अगले हफ्ते बाजार की दिशा

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए 22 सितंबर से शुरू होने वाला अगला कारोबारी सप्ताह कई वैश्विक और घरेलू घटनाक्रमों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाला है। निवेशकों की नजर मध्यपूर्व में ईरान-अमेरिका तनाव, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी टैरिफ से जुड़े फैसलों, बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। इन संकेतकों में होने वाले बदलाव का असर बाजार के उतार-चढ़ाव पर दिखाई दे सकता है।

    मध्यपूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बाजार के लिए प्रमुख वैश्विक जोखिमों में बना हुआ है। इस क्षेत्र से जुड़ी किसी भी नई खबर का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है। खासकर कच्चे तेल की कीमतों में तेज बदलाव का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    अमेरिकी टैरिफ से जुड़े घटनाक्रम भी भारतीय बाजार के लिए अहम रहेंगे। अमेरिका में रूस पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित एक विधेयक को प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलने के बाद इस पर नजर बनी हुई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है।

    इस तरह के किसी कदम का प्रभाव भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातकों पर पड़ सकता है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े समीकरण प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहेगी। इसलिए निवेशक अमेरिकी व्यापार नीति और उससे जुड़े अगले कदमों को करीब से देखेंगे।

    कच्चे तेल की कीमतें भारतीय शेयर बाजार के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक रहेंगी। तेल की लागत में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है और इससे आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं भी पैदा हो सकती हैं। बीते सप्ताह बाजार की धारणा पर ऊर्जा लागत को लेकर ऐसी ही चिंताओं का असर दिखाई दिया।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। 18 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय नकद बाजार में शुद्ध खरीदार रहे और उन्होंने 599.54 करोड़ रुपये की खरीदारी की। इसी दिन घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भी 1,019.69 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की।

    रुपये और अमेरिकी डॉलर की चाल पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव का असर कंपनियों की लागत, आयात और विदेशी निवेश के प्रवाह पर पड़ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव भी वैश्विक निवेश प्रवाह को प्रभावित करने वाला प्रमुख संकेतक बना रहेगा।

    घरेलू मोर्चे पर पीएमआई और बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़े अगले सप्ताह जारी होने हैं। इन आंकड़ों से देश की आर्थिक गतिविधियों की स्थिति का संकेत मिलेगा। निवेशक इन आंकड़ों को आर्थिक वृद्धि की गति और कारोबारी माहौल के आकलन के लिए देख सकते हैं।

    भारतीय शेयर बाजार ने पिछला सप्ताह कमजोर स्तर पर समाप्त किया। सेंसेक्स 0.65 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,294.46 अंक पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 0.22 प्रतिशत फिसलकर 23,346.40 अंक पर रहा। ऐसे में अगले सप्ताह वैश्विक तनाव, तेल की कीमत, टैरिफ और घरेलू आंकड़ों के बीच बाजार की गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।

  • ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े एचआर 5334 विधेयक पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया। इस कानून में रूस पर प्रतिबंधों, टैरिफ और अन्य पाबंदियों को लागू करने तथा उनका दायरा बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे जारी रखने की व्यवस्था भी की गई है।

    ट्रंप के इस फैसले पर भारत में कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि किसी धौंस जमाने वाले का मुकाबला करने का एक ही तरीका है और वह है मजबूती से उसका प्रतिरोध करना।

    नए कानून में रूस के ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इसमें रूस के ऊर्जा कारोबार और उससे जुड़े प्रमुख खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था है। रूस के साथ बड़े स्तर पर ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों में भारत और चीन भी शामिल हैं।

    कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। इससे रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध नीति का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि कानून पर हस्ताक्षर होने के साथ भारत पर तत्काल कोई नया टैरिफ लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है।

    विधेयक में रूस के नेतृत्व, ऊर्जा क्षेत्र और रक्षा कारोबार से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई के प्रावधान भी शामिल हैं। रूस के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग करने वाले देशों और संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य रूस के आर्थिक और रणनीतिक नेटवर्क पर प्रतिबंधों का प्रभाव मजबूत करना है।

    कानून में रूस के ऊर्जा निर्यात से जुड़े नेटवर्क पर भी ध्यान दिया गया है। इसके जरिए प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई का रास्ता तैयार किया गया है। रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों का इस्तेमाल किए जाने की व्यवस्था की गई है।

    ईरान को लेकर भी कानून में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। इसमें ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इस तरह रूस के साथ ईरान को लेकर भी अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था को कानूनी आधार मिला है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 16 सितंबर 2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद विधेयक को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। 18 सितंबर को ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया।

    भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के साथ उसका ऊर्जा कारोबार लंबे समय से जारी है। रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा भारत के आर्थिक और ऊर्जा हितों से जुड़ता है।

    जयराम रमेश की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा भारत की राजनीतिक बहस में भी सामने आया है। नए कानून के तहत भारत पर तत्काल कोई नया शुल्क लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि आगे अमेरिकी प्रशासन इस कानून के प्रावधानों का किस तरह इस्तेमाल करता है, इससे भारत समेत रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर संभावित प्रभाव स्पष्ट होगा।

  • कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ी रणनीतिक साझेदारी, एसोसिएट सदस्यता प्रस्ताव से अमेरिका के साथ तनाव गहराया

    कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ी रणनीतिक साझेदारी, एसोसिएट सदस्यता प्रस्ताव से अमेरिका के साथ तनाव गहराया

    नई दिल्ली । कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम सामने आया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कनाडा के साथ मौजूदा सहयोग को एक नई और अधिक व्यापक साझेदारी में बदलने का प्रस्ताव रखा है। इसी क्रम में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने यूरोपीय संसद में यूरोप के साथ गहरे संबंधों का समर्थन किया। दोनों पक्षों के बीच चर्चा अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, तकनीक, अंतरिक्ष और डिजिटल व्यापार जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच रही है।

    कनाडा को यूरोपीय संघ का पहला एसोसिएट सदस्य बनाने की संभावना ने इस पूरी पहल को खास बना दिया है। यह पूर्ण सदस्यता से अलग व्यवस्था होगी। इसके तहत कनाडा यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की तरह संगठन के सभी फैसलों में मतदान नहीं करेगा, लेकिन कई अहम क्षेत्रों में यूरोपीय देशों के साथ गहरा सहयोग कर सकेगा। मौजूदा समय में यूरोपीय संघ में 27 देश शामिल हैं। एसोसिएट सदस्यता की यह व्यवस्था अभी मौजूदा ढांचे में निर्धारित नहीं है, इसलिए इसे लागू करने के लिए आगे कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया की जरूरत होगी।

    मार्क कार्नी ने यूरोप के साथ संबंधों को आने वाले समय के लिए महत्वपूर्ण बताया है। उनका जोर इस बात पर है कि दोनों पक्ष अपनी रणनीतिक क्षमता और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए साथ काम करें। कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच पहले से व्यापारिक संबंध मौजूद हैं, लेकिन अब दोनों पक्ष इन्हें रक्षा और आर्थिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों तक विस्तार देने पर विचार कर रहे हैं। महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा औद्योगिक क्षमता, AI और उन्नत तकनीक को इस साझेदारी के प्रमुख क्षेत्र माना जा रहा है।

    कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच मौजूदा व्यापारिक समझौता भी इस नई पहल की आधारभूमि है। दोनों पक्ष अब उस ढांचे से आगे बढ़कर अधिक व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संबंध विकसित करने की बात कर रहे हैं। कनाडा यूरोपीय रक्षा खरीद व्यवस्था में शामिल होने वाला पहला गैर-यूरोपीय देश भी बन चुका है। इससे रक्षा क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच सहयोग का दायरा बढ़ा है।

    इस घटनाक्रम का असर अमेरिका के साथ कनाडा के संबंधों पर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के संभावित एसोसिएट सदस्य बनने के प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि यूरोपीय संघ के साथ यह व्यवस्था अमेरिका के लिए प्रतिकूल मानी गई, तो यूरोप पर भारी टैरिफ लगाए जा सकते हैं। उन्होंने इस प्रस्ताव को लेकर आपत्ति जताई है और इसे अमेरिका के लिए संभावित रूप से शत्रुतापूर्ण कदम बताया है।

    दूसरी ओर, कनाडा यूरोप के साथ अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के रूप में आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है। कनाडा का फोकस भरोसेमंद साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को विविध बनाने तथा महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी रणनीतिक क्षमता मजबूत करने पर है। ऊर्जा, खनिज, रक्षा, तकनीक और वित्तीय सेवाओं से जुड़े सहयोग पर भी बातचीत आगे बढ़ रही है।

    कनाडा और अमेरिका के बीच टैरिफ तथा व्यापार को लेकर जारी मतभेदों के बीच यूरोप के साथ बढ़ती नजदीकी महत्वपूर्ण है। हालांकि, कनाडा और अमेरिका के पुराने संबंध भी बने हुए हैं। वहीं यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित नई व्यवस्था का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है। एसोसिएट सदस्यता की प्रकृति, अधिकार और जिम्मेदारियां आगे होने वाली बातचीत में निर्धारित होंगी। फिलहाल यह पहल कनाडा और यूरोप के बीच संबंधों को व्यापार से आगे रणनीतिक साझेदारी तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आई है।

  • HSBC ने वोडाफोन आइडिया पर रिड्यूस रेटिंग बरकरार रखी, 8.25 रुपये के लक्ष्य से शेयर में 47 प्रतिशत गिरावट का अनुमान

    HSBC ने वोडाफोन आइडिया पर रिड्यूस रेटिंग बरकरार रखी, 8.25 रुपये के लक्ष्य से शेयर में 47 प्रतिशत गिरावट का अनुमान

    नई दिल्ली । वोडाफोन आइडिया के शेयरों को लेकर ब्रोकरेज फर्म HSBC ने चिंता जताई है। HSBC ने कंपनी के शेयर पर रिड्यूस रेटिंग बरकरार रखते हुए 8.25 रुपये प्रति शेयर का लक्ष्य मूल्य दिया है। यह पिछले कारोबारी सत्र के बंद भाव की तुलना में करीब 47 प्रतिशत की संभावित गिरावट को दर्शाता है। मंगलवार को वोडाफोन आइडिया के शेयरों में गिरावट देखने को मिली।

    वोडाफोन आइडिया के शेयर 15.40 रुपये के आसपास कारोबार कर रहे थे। इससे पहले लगातार दो कारोबारी सत्रों में शेयर में करीब 8 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई थी। वहीं, 2026 में अब तक कंपनी के शेयर में 32 प्रतिशत से अधिक की बढ़त देखी गई है। कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब 1.68 लाख करोड़ रुपये बताया गया है।

    HSBC की मुख्य चिंता वोडाफोन आइडिया की स्पेक्ट्रम से जुड़ी देनदारियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नकदी जुटाने की क्षमता को लेकर है। ब्रोकरेज का अनुमान है कि मोबाइल टैरिफ में संभावित बढ़ोतरी से कंपनी की कमाई में सुधार हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद ऑपरेटिंग कैश फ्लो स्पेक्ट्रम भुगतान की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

    HSBC के अनुसार, कैलेंडर वर्ष 2027 की पहली तिमाही में मोबाइल टैरिफ बढ़ने की संभावना है। इसके बावजूद वित्त वर्ष 2029 में कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो स्पेक्ट्रम भुगतान की आवश्यकताओं से कम रहने का अनुमान है। ब्रोकरेज का कहना है कि इन जरूरतों को पूरा करने के लिए वोडाफोन आइडिया को अगले तीन वर्षों में अपने ऑपरेटिंग कैश फ्लो को करीब तीन गुना करना होगा।

    कंपनी के नेटवर्क में होने वाला निवेश उसके बाजार हिस्सेदारी को स्थिर रखने में मदद कर सकता है। हालांकि, HSBC को उम्मीद नहीं है कि नेटवर्क पर निवेश से कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में कोई बड़ी बढ़ोतरी होगी। ब्रोकरेज के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 से वित्त वर्ष 2029 के बीच कंपनी के EBITDA में सालाना आधार पर करीब 15 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि हो सकती है।

    इस अनुमान के पीछे मुख्य वजह मोबाइल टैरिफ में बढ़ोतरी की संभावना बताई गई है। यानी टैरिफ बढ़ने से कंपनी की कमाई और EBITDA में सुधार की उम्मीद है, लेकिन इससे पैदा होने वाला अतिरिक्त कैश स्पेक्ट्रम भुगतान की जरूरतों को पूरी तरह संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

    वोडाफोन आइडिया के लिए चुनौती केवल वित्त वर्ष 2029 के स्पेक्ट्रम भुगतान तक सीमित नहीं रहने की आशंका है। HSBC ने कहा है कि वर्ष 2030 से शुरू होने वाले स्पेक्ट्रम रिन्यूअल के लिए भी कंपनी को अतिरिक्त पूंजी की जरूरत होगी। इससे आने वाले वर्षों में कंपनी के सामने फंडिंग की जरूरत बनी रह सकती है।

    स्पेक्ट्रम भुगतान और भविष्य के रिन्यूअल के लिए पूंजी जुटाने की क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी को एक साथ नेटवर्क निवेश और अन्य परिचालन जरूरतों को भी पूरा करना है। HSBC की रिपोर्ट में इन्हीं वित्तीय जरूरतों को शेयर के लिए प्रमुख चुनौती के तौर पर देखा गया है।

    वोडाफोन आइडिया के शेयर ने 2026 में अब तक मजबूत प्रदर्शन किया है, लेकिन HSBC का आकलन कंपनी के भविष्य के कैश फ्लो और स्पेक्ट्रम देनदारियों पर केंद्रित है। ब्रोकरेज के मुताबिक, टैरिफ बढ़ोतरी से परिचालन प्रदर्शन में सुधार संभव है, लेकिन स्पेक्ट्रम से जुड़ी मौजूदा और भविष्य की भुगतान जरूरतों के लिए कंपनी को अपनी नकदी क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करनी होगी।

  • भारत दौरे पर बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने संरक्षणवाद पर जताई चिंता, अमेरिका और चीन की व्यापार रणनीतियों पर साधा निशाना

    भारत दौरे पर बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने संरक्षणवाद पर जताई चिंता, अमेरिका और चीन की व्यापार रणनीतियों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । 
    भारत दौरे पर आए बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति और चीन की आर्थिक रणनीतियों को लेकर परोक्ष रूप से तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने बिना किसी देश या नेता का नाम लिए कहा कि व्यापार में मनमाने प्रतिबंध, अचानक लगाए जाने वाले टैरिफ और बाजारों को व्यवस्थित तरीके से प्रभावित करने की कोशिशें वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।

    डी वेवर भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से जुड़ी उच्चस्तरीय चर्चा के दौरान बोल रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने संरक्षणवाद और अप्रत्याशित व्यापारिक फैसलों की आलोचना करते हुए कहा कि दुनिया में ऐसे फैसलों का चलन बढ़ रहा है, जिनमें किसी देश की व्यापार नीति अचानक बदल जाती है। उन्होंने इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अस्थिरता पैदा करने वाला बताया।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि कुछ लोग एक दिन व्यापार संबंधी फैसला लेते हैं और कुछ समय बाद उसी फैसले को वापस ले लेते हैं, फिर उसे दोबारा लागू कर देते हैं। उनकी इस टिप्पणी पर कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच हंसी और तालियां भी सुनाई दीं। इसके बाद डी वेवर ने संकेत दिया कि उपस्थित लोग समझ रहे हैं कि उनका इशारा किस दिशा में है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी का नाम नहीं ले रहे हैं। हालांकि, उनके बयान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति पर परोक्ष टिप्पणी के रूप में देखा गया। ट्रंप प्रशासन की ओर से अलग-अलग देशों और व्यापारिक साझेदारों पर शुल्क लगाने तथा व्यापारिक नीतियों में बदलाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा होती रही है।

    डी वेवर ने केवल अमेरिकी व्यापार नीति तक अपनी टिप्पणी सीमित नहीं रखी। उन्होंने चीन की आर्थिक गतिविधियों और बाजारों को प्रभावित करने वाली रणनीतियों की ओर भी संकेत किया। उनका कहना था कि कुछ देश जानबूझकर और व्यवस्थित तरीके से बाजारों में ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिससे उनके व्यापारिक साझेदारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री के अनुसार, इस तरह की रणनीतियों का उद्देश्य दूसरे देशों को आर्थिक रूप से कमजोर करना और उनकी निर्भरता बढ़ाना हो सकता है। उन्होंने संरक्षणवाद और अनुचित प्रतिस्पर्धा को ऐसी दो प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और देशों के बीच राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।

    उनकी टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने और मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत यूरोपीय बाजारों के साथ व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि यूरोपीय संघ भी भारत के साथ आर्थिक संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है।

    ऐसे माहौल में बेल्जियम के प्रधानमंत्री का संरक्षणवाद के खिलाफ बयान भारत-यूरोपीय संघ व्यापार वार्ता के व्यापक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को लेकर विभिन्न देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में स्थिर और पूर्वानुमान योग्य व्यापार नीति की जरूरत लगातार रेखांकित की जा रही है।

    डी वेवर ने अपने संबोधन में यह संदेश देने की कोशिश की कि व्यापारिक साझेदारों के बीच भरोसा तभी मजबूत हो सकता है, जब नीतियों में स्थिरता और आर्थिक तर्क को प्राथमिकता मिले। उनके बयान में अमेरिका और चीन दोनों की ओर संकेत था, लेकिन उन्होंने किसी देश का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया।

    भारत यात्रा के दौरान बेल्जियम के प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी वैश्विक व्यापार व्यवस्था में चल रहे बदलावों और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच सामने आई है। उनका जोर इस बात पर रहा कि मनमाने व्यापारिक फैसलों और अनुचित प्रतिस्पर्धा से केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि इसका असर देशों के बीच संबंधों और व्यापक भू-राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

  • टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री एस. जयशंकर 23 अगस्त से दो दिन के रूस दौरे पर जा रहे हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और रूस के संबंधों के साथ-साथ भारत के ऊर्जा हित भी अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच चर्चा में हैं। यात्रा के दौरान जयशंकर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करेंगे।

    जयशंकर व्यापार, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति से जुड़े भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता भी करेंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और कारोबारी सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न क्षेत्रों में चल रही साझेदारी की समीक्षा किए जाने की उम्मीद है।

    जयशंकर का रूस दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूस से तेल, गैस और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी के बीच हो रहा है। ऐसे में भारत-रूस ऊर्जा कारोबार इस यात्रा के महत्वपूर्ण संदर्भों में शामिल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और रूस पिछले कुछ समय में उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है।

    यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलाव के बीच भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी थी। हालांकि अमेरिकी दबाव और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच रूसी तेल आयात में बदलाव की स्थिति बनी रही। इसके बाद पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और भारत के लिए रूसी तेल का महत्व फिर बढ़ गया।

    जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक पहुंचने की बात सामने आई। यह आंकड़ा बताता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा में रूसी आपूर्ति कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग और व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत को विशेष महत्व मिल सकता है।

    दौरे का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रक्षा और सैन्य तकनीकी सहयोग है। भारत और रूस लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में साझेदार रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों के अंतर-सरकारी आयोग के सैन्य और सैन्य-तकनीकी सहयोग से जुड़े कार्य समूह की बैठक भी हुई थी। इसमें दोनों पक्षों ने सशस्त्र बलों के बीच सहयोग बढ़ाने और आगामी गतिविधियों की योजना पर चर्चा की थी।

    इस पृष्ठभूमि में जयशंकर की रूस यात्रा दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रक्षा उपकरणों की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और सैन्य साझेदारी से जुड़े विषय भी द्विपक्षीय बातचीत के एजेंडे में रह सकते हैं, हालांकि किसी विशेष नई रक्षा डील की पुष्टि अभी नहीं हुई है।

    भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा और ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश व्यापार, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अंतर-सरकारी आयोग की बैठक इसी व्यापक सहयोग को संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है।

    रूसी नेतृत्व भी हाल के समय में भारत के आर्थिक और तकनीकी विकास की सराहना करता रहा है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा को दोनों देशों के बीच पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। अमेरिकी टैरिफ दबाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत के लिए रूस के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

  • अमेरिका ने चीन के जरिए टैरिफ बचाने के आरोपों में भारत समेत 40 से अधिक व्यापारिक साझेदारों को जोखिम वाले देशों में रखा

    अमेरिका ने चीन के जरिए टैरिफ बचाने के आरोपों में भारत समेत 40 से अधिक व्यापारिक साझेदारों को जोखिम वाले देशों में रखा

    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत 40 से अधिक देशों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि चीन अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए कुछ तीसरे देशों के रास्ते अपने सामान को अमेरिकी बाजार तक पहुंचा सकता है। इस प्रक्रिया को ट्रांसशिपमेंट के तौर पर चिन्हित किया गया है।

    अमेरिकी रिपोर्ट में भारत, कनाडा और यूरोपीय संघ के अलावा ताइवान, मैक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम सहित कई व्यापारिक साझेदारों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों में कुछ ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जहां चीन से आने वाले सामान की मामूली प्रोसेसिंग, पैकेजिंग या लेबल बदलकर उसके मूल स्रोत को अलग तरीके से प्रदर्शित किया जा सकता है।

    ट्रंप प्रशासन के मुख्य व्यापार सलाहकार पीटर नवारो की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रांसशिपमेंट की गतिविधियों में 2018 के बाद बढ़ोतरी देखने को मिली। इसी अवधि में अमेरिका ने चीन के कथित अनुचित व्यापारिक तौर-तरीकों के खिलाफ सेक्शन 301 के तहत अतिरिक्त टैरिफ लागू किए थे। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इन शुल्कों के प्रभाव से बचने के लिए चीनी सामान को तीसरे देशों के जरिए भेजने की कोशिशें बढ़ी हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामलों में चीन से तैयार या निर्मित वस्तुओं को किसी तीसरे देश में भेजकर उनका री-लेबलिंग, री-पैकेजिंग, री-इनवॉइसिंग या मामूली स्तर का प्रसंस्करण किया जा सकता है। इसके बाद सामान को उस देश का उत्पाद दिखाकर अमेरिका में भेजने की कोशिश की जा सकती है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इस तरह सामान पर लागू होने वाले टैरिफ में अंतर का लाभ उठाया जा सकता है।

    अमेरिका ने इस पूरी व्यवस्था को अवैध ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क से जोड़ते हुए कहा है कि इससे व्यापार नियमों और सीमा शुल्क व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि चीनी कंपनियां ऐसे देशों और क्षेत्रों का इस्तेमाल कर सकती हैं जहां श्रम लागत अपेक्षाकृत कम हो, सीमा शुल्क निगरानी सीमित हो या मुक्त व्यापार क्षेत्रों में प्रक्रियात्मक लचीलापन उपलब्ध हो।

    इस मामले में अमेरिकी सरकार अब तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस और यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन मिलकर सीमा पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करना और यह पता लगाना है कि कहीं किसी वस्तु को तीसरे देश के माध्यम से भेजकर उसके वास्तविक मूल को छिपाने का प्रयास तो नहीं किया गया।

    भारत का नाम इस सूची में आने से अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर भी चर्चा बढ़ सकती है। हालांकि किसी देश का रिपोर्ट में उल्लेख होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां से होने वाला प्रत्येक व्यापार या शिपमेंट गैरकानूनी है। अमेरिकी प्रशासन ने मुख्य रूप से संभावित जोखिम और निगरानी की जरूरत पर जोर दिया है।

    ट्रंप प्रशासन का यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था में टैरिफ, सप्लाई चेन और चीन से जुड़े आयात को लेकर अमेरिकी नीतियां लगातार सख्त हो रही हैं। आने वाले समय में अमेरिकी सीमा शुल्क जांच और एआई आधारित निगरानी बढ़ने से उन देशों के निर्यातकों पर भी अतिरिक्त जांच का दबाव पड़ सकता है, जिनका नाम जोखिम वाले व्यापारिक साझेदारों में शामिल किया गया है।

  • फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    नई दिल्ली । अमेरिका ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात को लेकर अपनी नई व्यापारिक कार्रवाई के तहत भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि यह दर उन कई देशों की तुलना में कम है, जिन पर 12.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत ने जांच प्रक्रिया के दौरान फोर्स लेबर से निर्मित उत्पादों के आयात पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए, जिसके कारण उसे अपेक्षाकृत कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया।

    यह निर्णय अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा सेक्शन 301 के तहत की गई व्यापक जांच के बाद लिया गया है। जांच में 60 प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। अमेरिकी प्रशासन का आरोप था कि इन देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने या उसके पालन को सुनिश्चित करने में पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इसी आधार पर विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय की गई हैं।

    यूएसटीआर के अनुसार, भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें 10 प्रतिशत टैरिफ की श्रेणी में रखा गया है। इस समूह में बांग्लादेश, कनाडा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू किया जाएगा। यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान के लिए अलग व्यवस्था अपनाई गई है।

    अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जून में प्रस्तावित कार्रवाई सार्वजनिक किए जाने के बाद भारत ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लागू करने की दिशा में कदम उठाए। इसी पहल को ध्यान में रखते हुए भारत को अधिक अनुकूल श्रेणी में रखा गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जबरन श्रम को समाप्त करने और व्यापारिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    इस जांच प्रक्रिया के दौरान दो चरणों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की गई, 45 से अधिक सरकारों से परामर्श किया गया और दो हजार से अधिक सार्वजनिक टिप्पणियां प्राप्त हुईं। इसके आधार पर यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि समीक्षा के दायरे में शामिल सभी अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों में सुधार की आवश्यकता है। इसी कारण 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत कार्रवाई का निर्णय लिया गया।

    हालांकि अमेरिका ने कुछ आवश्यक उत्पादों को इस कार्रवाई से बाहर भी रखा है। इनमें दवाएं, सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, चुनिंदा कच्चा माल और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण वस्तुएं शामिल हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा जाना द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, हालांकि आगे इसका प्रभाव दोनों देशों के व्यापार और निर्यात पर नजर रखने के बाद ही स्पष्ट होगा।