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  • काशी के पिशाचमोचन में अकाल मौत का तर्पण, घोड़े का कान और गाय की पूंछ छूने की अनोखी परंपरा

    काशी के पिशाचमोचन में अकाल मौत का तर्पण, घोड़े का कान और गाय की पूंछ छूने की अनोखी परंपरा


    नई दिल्ली: पितृपक्ष के दौरान वाराणसी के पिशाचमोचन में हर दिन 20 हजार से ज्यादा लोग पूर्वजों और अकाल मौत से जुड़े श्राद्ध कर्म कराने पहुंच रहे हैं। आदि गंगा विमलोदत्त कुंड के किनारे इन दिनों 10 से 12 तरह के श्राद्ध कर्म कराए जा रहे हैं। नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और तर्पण के बाद यहां दो विशेष प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं। इनमें संजाब नस्ल के शक्ति घोड़े का कान छूना और अकाल मौत वाले व्यक्ति की फोटो पीपल के सूखे पेड़ पर लगाना शामिल है। मान्यता के अनुसार, इन्हें पितरों और आत्माओं की शांति की कामना से जुड़ी अंतिम प्रक्रिया माना जाता है। पिशाचमोचन पर पितृपक्ष शुरू होने से एक दिन पहले से संजाब नस्ल के दो घोड़े खड़े हैं। इनका इस्तेमाल साल में केवल श्राद्ध के 15 दिनों के दौरान होता है। बाकी समय इनकी बुकिंग विवाह समारोहों के लिए की जाती है।

    पिशाचमोचन क्षेत्र में 10 से 15 पीपल के पेड़ हैं, जिन पर करीब 500 फोटो फ्रेम लगे हुए हैं। वहां मौजूद पंडित अमित मिश्रा के अनुसार, इन पेड़ों पर उन आत्माओं की तस्वीरें लगाई जाती हैं, जिनकी अचानक मौत हुई और जिन्हें शांतिपूर्वक विदा नहीं माना गया। उन्होंने बताया कि लोग ऐसी आत्माओं की शांति के लिए यहां श्राद्ध कराने आते हैं। इसी तरह गाजीपुर के मुख्तार की पत्नी और बेटी भी करीब 30 साल पहले हुई उनकी मौत के बाद श्राद्ध कराने यहां पहुंची थीं। परिवार का कहना था कि उनके पति सपने में आते थे और इससे उन्हें डर लगता था। पिशाचमोचन में अकाल मौत से मुक्ति के लिए पीपल के पेड़ पर फोटो फ्रेम लगाने के साथ कील ठोकने की प्रक्रिया भी श्राद्ध पूजा के पैकेज में शामिल है।

    यहां घोड़े का कान, भैंस का सींग और गाय की पूंछ छूकर पितरों के नाम पर दान करने की भी परंपरा है। जिस संजाब नस्ल के घोड़े का कान लोग छूते हैं, उसका नाम शक्ति है। एक व्यक्ति को घोड़े का कान छूने के लिए कम से कम 10 रुपये देने होते हैं। बताया गया है कि यह घोड़ा रोजाना कम से कम 50 हजार रुपये तक कमा लेता है। पिशाचमोचन में श्राद्ध कर्म कराने वालों में गरीब और संपन्न परिवार दोनों शामिल होते हैं। यहां नेता, जज, फिल्म स्टार और अन्य सम्पन्न परिवार भी तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं। एक मृतक के तर्पण की सामान्य लागत 15 से 20 हजार रुपये बताई गई है, जबकि कई बार यह खर्च 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। भीड़ अधिक होने के कारण कुंड के किनारों के अलावा आसपास के पांच-छह भवनों में भी श्राद्ध कर्म कराए जाते हैं।

    अकाल मौत के लिए यहां सबसे महंगा श्राद्ध नारायण बलि बताया गया है। पांच ब्राह्मणों से नारायण बलि कराने की लागत 15 हजार रुपये है, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए आठ हजार रुपये और पार्वण श्राद्ध के लिए 2500 रुपये लिए जाते हैं। गयातीर्थ और गया श्राद्ध की कीमत निश्चित नहीं है और यह 1100 से 2500 रुपये या उससे अधिक हो सकती है। यदि एक ही परिवार में कई लोगों की अकाल मौत हुई हो तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग श्राद्ध कराया जाता है। पांच लोगों की अकाल मौत होने पर सभी के लिए अलग-अलग नारायण बलि करानी होती है और प्रत्येक के लिए कम से कम 15 हजार रुपये का खर्च बताया गया है।

    पिशाचमोचन में श्राद्ध कर्म की व्यवस्था बड़े स्तर पर होती है। मुन्ना पंडा के परिवार के लोग यहां प्रमुख महंत होते हैं, जबकि पितृपक्ष के 15 दिनों के लिए करीब 400 पंडे श्राद्ध कराने में जुटते हैं। तर्पण के लिए बैठने की जगह का किराया 500 रुपये लिया जाता है। एक तर्पण में करीब डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। काम सूर्योदय के साथ शुरू होकर आधी रात तक चलता है। यहां व्यवस्था के लिए पंडे वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल करते हैं। पानी, गोबर, दूध और सफाई जैसी जरूरतों के लिए इसी माध्यम से कर्मचारियों को बुलाया जाता है। यहां आने वाले यजमानों को केवल दक्षिणा लेकर आने की जरूरत होती है, जबकि श्राद्ध और तर्पण में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री पैकेज के साथ यहीं उपलब्ध कराई जाती है।

  • द्वितीया तिथि का श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ समय और विधि

    द्वितीया तिथि का श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ समय और विधि

    नई दिल्ली। पितृपक्ष के दौरान सोमवार, 28 सितंबर को द्वितीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार जिन पितरों का निधन किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध इस दिन करने की परंपरा है। पितरों की आत्मा की शांति और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार चावल, दूध, शहद, घी और काले तिल से तैयार पिंड पितरों को अर्पित करने से उन्हें शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है।

    28 सितंबर को ही होगा द्वितीया श्राद्ध

    आश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि की शुरुआत 27 सितंबर की रात 8 बजकर 58 मिनट पर हुई और यह 28 सितंबर की शाम 7 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। उदिया तिथि के अनुसार द्वितीया तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर, सोमवार को किया जाएगा।

    श्राद्ध और तर्पण का श्रेष्ठ समय

    शास्त्रों में पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए कुतुप वेला को विशेष रूप से शुभ माना गया है। यह समय दोपहर के आसपास आता है। 28 सितंबर को कुतुप काल सुबह 11 बजकर 48 मिनट से दोपहर 12 बजकर 36 मिनट तक रहेगा।

    हालांकि, कुतुप वेला का समय अलग-अलग शहरों में थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार श्राद्ध का समय निर्धारित करना उचित माना जाता है।

    कैसे करें द्वितीया तिथि का श्राद्ध?

    द्वितीया तिथि के श्राद्ध में आटा, चावल या जौ से गोल पिंड तैयार कर पितरों को अर्पित करने की परंपरा है। पिंडदान के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों का तर्पण किया जाता है।

    तर्पण करते समय हाथ में कुश रखना भी धार्मिक विधि का हिस्सा माना जाता है। कुश एक प्रकार की पवित्र घास है, जिसकी अंगूठी बनाकर दाएं हाथ की अनामिका उंगली में धारण किया जाता है।

    श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद जरूरतमंद ब्राह्मणों को भोजन कराने और उन्हें दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। अंत में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

    पंचबलि का भी है विशेष महत्व

    श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन का एक हिस्सा अलग निकालकर रखने की परंपरा है। इसे पंचबलि कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से पितरों तक भोजन पहुंचता है और वे प्रसन्न होते हैं।

    मान्यता के अनुसार पंचबलि और विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों को शांति मिलती है तथा पितृ दोष से मुक्ति की कामना की जाती है।

  • पितृ पक्ष 2026 में इन 10 कामों से रहें दूर, 27 सितंबर से शुरू श्राद्ध पक्ष में रखें इन बातों का ध्यान

    पितृ पक्ष 2026 में इन 10 कामों से रहें दूर, 27 सितंबर से शुरू श्राद्ध पक्ष में रखें इन बातों का ध्यान


    नई दिल्ली । पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर से हो रही है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। यह अवधि हिंदू परंपरा में पूर्वजों के स्मरण, श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दौरान कई परिवार खानपान और दैनिक जीवन से जुड़े कुछ नियमों का पालन करते हैं। हालांकि, इन नियमों में परिवार और क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए किसी एक परंपरा को सभी के लिए अनिवार्य नहीं माना जाता।

    पितृ पक्ष के दौरान आम तौर पर सादगी, सात्विक भोजन, संयम और शांत वातावरण को महत्व दिया जाता है। कई परिवार इस अवधि में मांसाहार, शराब और अन्य नशीले पदार्थों से दूरी रखते हैं। भोजन बनाते समय स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखने की परंपरा भी है।

    कई परिवारों में पितृ पक्ष के दौरान बाल और नाखून काटने से बचने की मान्यता है। कुछ लोग पूरे श्राद्ध पक्ष में इसका पालन करते हैं, जबकि अन्य परिवारों में ऐसा नियम नहीं होता। इसलिए इस मामले में अपनी पारिवारिक परंपरा को प्राथमिकता दी जा सकती है।

    इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य बड़े मांगलिक कार्यक्रमों को टालने की परंपरा भी कई परिवारों में है। पितृ पक्ष को मुख्य रूप से पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध कर्म के लिए समर्पित समय माना जाता है, इसलिए बड़े शुभ कार्यों की शुरुआत इसके बाद करने की मान्यता है।

    श्राद्ध पक्ष में घर का माहौल शांत रखने पर भी जोर दिया जाता है। अनावश्यक विवाद, गुस्सा और कलह से बचने की सलाह दी जाती है। साथ ही बुजुर्गों, जरूरतमंदों और अन्य लोगों का अपमान न करने की परंपरा बताई जाती है। अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, वस्त्र या जरूरी सामान का दान और सेवा करना भी इस अवधि से जोड़ा जाता है।

    पितृ पक्ष में झूठ, छल-कपट और गलत तरीके से धन कमाने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस दौरान व्यक्ति को अपने व्यवहार में संयम रखना चाहिए और अच्छे कार्यों पर ध्यान देना चाहिए।

    श्राद्ध के लिए तैयार किए गए भोजन की बर्बादी से भी बचना चाहिए। जरूरत के अनुसार भोजन तैयार करने और जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा कई जगहों पर है। अन्न का सम्मान करने और उसे व्यर्थ न गंवाने पर जोर दिया जाता है।

    श्राद्ध की तिथि तय करते समय संबंधित हिंदू तिथि को महत्व दिया जाता है। सामान्य अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के बजाय जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ था, उसके अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। तिथि को लेकर भ्रम होने पर स्थानीय पंचांग की सहायता ली जा सकती है।

    पितृ पक्ष 2026 में 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन होगा। तिथि क्षय के कारण दोनों श्राद्ध एक साथ पड़ रहे हैं। वहीं 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी। जिन पितरों की निर्धारित श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारण से उस दिन श्राद्ध नहीं हो पाया, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है।

    पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियों में 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 सितंबर को प्रतिपदा, 28 को द्वितीया, 29 को तृतीया, 30 को चतुर्थी-पंचमी, 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 को सप्तमी, 3 को अष्टमी, 4 को नवमी, 5 को दशमी, 6 को एकादशी, 7 को द्वादशी, 8 को त्रयोदशी, 9 को चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या शामिल है।

  • पितृ पक्ष में आज प्रतिपदा श्राद्ध, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ मुहूर्त और विधि

    पितृ पक्ष में आज प्रतिपदा श्राद्ध, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ मुहूर्त और विधि

    नई दिल्ली । पितृपक्ष में तिथिनुसार पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार पितृपक्ष में उसका श्राद्ध किया जाता है। वर्ष 2026 में 27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। प्रतिपदा श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है, जिनका निधन हिंदू पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि को हुआ हो।

    हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात 10 बजकर 18 मिनट से शुरू होकर 27 सितंबर की रात 8 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। इसी वजह से प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 27 सितंबर, रविवार को किया जाएगा। इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है।

    पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए कुतुप मुहूर्त को विशेष महत्व दिया जाता है। सामान्य तौर पर 27 सितंबर को कुतुप मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक बताया गया है। हालांकि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय समय के अंतर के कारण मुहूर्त में कुछ बदलाव हो सकता है। इसलिए श्राद्ध कर्म करने वाले लोगों को अपने स्थान के अनुसार पंचांग से समय की पुष्टि करनी चाहिए।

    श्राद्ध कर्म की परंपरा में सबसे पहले दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठने का विधान बताया गया है। इसके बाद पितरों को चावल, जौ, काले तिल, घी और शहद से तैयार किया गया पिंड अर्पित किया जाता है। पिंड अर्पित करने की इस प्रक्रिया को पिंडदान कहा जाता है। इसके बाद कुशा से बनी अंगूठी अनामिका उंगली में धारण कर पितरों को जल अर्पित किया जाता है। इस प्रक्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण के बाद पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

    श्राद्ध कर्म में भोजन और दान की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। इसके अलावा गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों जैसे जीवों को भी भोजन अर्पित किया जाता है। इसे पंचबली या पंचग्रास कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस परंपरा को पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान से जोड़कर देखा जाता है।

    पितरों का श्राद्ध कौन कर सकता है, इसे लेकर भी अलग-अलग पारिवारिक और धार्मिक परंपराएं हैं। सामान्य मान्यता के अनुसार पुत्र, पौत्र या परिवार का कोई पुरुष सदस्य श्राद्ध और तर्पण कर सकता है। हालांकि वर्तमान समय में कई परिवारों में महिलाएं भी पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करती हैं। श्राद्ध की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

  • पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू, जानिए पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी श्राद्ध तिथियां और धार्मिक मान्यताएं

    पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू, जानिए पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी श्राद्ध तिथियां और धार्मिक मान्यताएं

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने की विशेष अवधि माना जाता है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में पूर्वज अपने वंशजों के समीप आते हैं और उनके द्वारा किए गए अन्न तथा जल के अर्पण से तृप्त होते हैं। इसी कारण इन 16 दिनों को धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है। इसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर, शनिवार से शुरू होगा और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।

    26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा। इसके बाद 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध और 30 सितंबर को चतुर्थी तथा पंचमी श्राद्ध किया जाएगा। अक्टूबर में 1 तारीख को षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध, 3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध और 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध रहेगा।

    इसके बाद 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध, 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या रहेगी, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होगा।

    सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तब भी सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने का धार्मिक महत्व बताया गया है।

    धार्मिक परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु जिस हिंदू तिथि को हुई हो, पितृपक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। इसलिए श्राद्ध की तिथि केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के आधार पर तय नहीं की जाती। इसके लिए हिंदू पंचांग में मृत्यु की तिथि को देखा जाता है। यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार श्राद्ध का समय निर्धारित किया जाता है।

    पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म में संकल्प, तर्पण, पिंडदान, सात्विक भोजन का अर्पण और दान जैसी परंपराएं शामिल मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन का एक हिस्सा गाय, कौवे और कुत्ते के लिए भी अलग रखा जाता है।

    तर्पण के दौरान जल में काले तिल, जौ और कुशा मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित करने की परंपरा है। इसके अलावा संबंधित पूर्वज की मृत्यु तिथि पर पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए प्रार्थना पूरी होती है।

  • पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध के लिए विशेष अवधि माना जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। इसे सोलह श्राद्ध या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के 16 दिनों में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान करने से पितृ दोष तथा पूर्वजों के ऋण से मुक्ति मिलती है और परिवार को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    पितृपक्ष के दौरान नई शुरुआत और मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ संस्कार जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसका कारण यह माना जाता है कि पितृपक्ष का पूरा समय पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए किए जाने वाले कर्मकांड को समर्पित रहना चाहिए।

    धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि पूर्वजों की पूजा में विधि और अनुष्ठान का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस अवधि में परिवार का ध्यान श्राद्ध कर्म और तर्पण पर केंद्रित रखने की परंपरा है। इसी वजह से उत्सव और मांगलिक आयोजनों को टालने की मान्यता प्रचलित है।

    पितृपक्ष में नई चीजें खरीदने को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं। इस दौरान रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी वस्तुएं खरीदने पर सामान्यतः रोक नहीं मानी जाती, लेकिन बड़ी खरीदारी से परहेज करने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नए कपड़े, गहने, वाहन, मकान-जमीन और लोहे से जुड़ी बड़ी वस्तुओं की खरीदारी को इस अवधि में शुभ नहीं माना जाता।

    नए कपड़ों को लेकर भी पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं कही जाती, लेकिन पितृपक्ष में सादे और सात्विक वस्त्र पहनने को उचित माना गया है। श्राद्ध और तर्पण के समय सफेद, हल्के पीले या अन्य हल्के रंग के कपड़े पहनने की परंपरा बताई गई है। इसका उद्देश्य इस अवधि की सादगी और धार्मिक एकाग्रता बनाए रखना माना जाता है।

    पितृपक्ष के दौरान भगवान विष्णु के चातुर्मास से जुड़ी मान्यता भी बताई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण चातुर्मास में भी कई प्रकार के मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा है।

    इसके अलावा पितृपक्ष के दौरान खान-पान और दैनिक व्यवहार को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। इस अवधि में सात्विक भोजन करने, मांस, मछली, अंडा, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई धार्मिक परंपराओं में लहसुन और प्याज से भी परहेज करने की बात कही गई है। बाल और दाढ़ी न कटाने की मान्यता भी कुछ परंपराओं में प्रचलित है।

    पितृपक्ष में घर का वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण रखने पर जोर दिया जाता है। झगड़े, अपशब्द और गलत व्यवहार से बचने की सलाह दी जाती है। पशु-पक्षियों और जरूरतमंद लोगों के प्रति भी संवेदनशील व्यवहार करने की मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस अवधि में विनम्रता, संयम और श्रद्धा के साथ पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए।

  • पितृ पक्ष 2026 कब से शुरू होगा? 26 सितंबर से श्राद्ध पक्ष, जानें पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी महत्वपूर्ण तिथियां

    पितृ पक्ष 2026 कब से शुरू होगा? 26 सितंबर से श्राद्ध पक्ष, जानें पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी महत्वपूर्ण तिथियां

    नई दिल्ली ।पितृ पक्ष हिंदू धार्मिक परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस अवधि में परिवार अपने पितरों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन दिनों पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल तर्पण, अन्न अर्पण और दान-पुण्य किया जाता है। पारिवारिक परंपराओं के अनुसार श्राद्ध कर्म दोपहर के समय करने का विधान बताया गया है।

    साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध से होगी। इसके बाद अलग-अलग तिथियों के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध किया जाएगा। पितृ पक्ष की अवधि में प्रतिपदा से लेकर चतुर्दशी तक विभिन्न तिथियों पर श्राद्ध कर्म होंगे। वहीं, 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।

    पितृ पक्ष की शुरुआत पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध से होगी। 26 सितंबर को पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। इसके अगले दिन 27 सितंबर, रविवार को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध होगा। 28 सितंबर, सोमवार को द्वितीया और 29 सितंबर, मंगलवार को तृतीया तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाएगा।

    30 सितंबर, बुधवार को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध होगा। इसके बाद 1 अक्टूबर, गुरुवार को षष्ठी और 2 अक्टूबर, शुक्रवार को सप्तमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। 3 अक्टूबर, शनिवार को अष्टमी और 4 अक्टूबर, रविवार को नवमी तिथि के लिए श्राद्ध कर्म होगा।

    5 अक्टूबर, सोमवार को दशमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। 6 अक्टूबर, मंगलवार को एकादशी तिथि के श्राद्ध का दिन रहेगा। 7 अक्टूबर, बुधवार को द्वादशी तिथि के साथ मघा तिथि का श्राद्ध भी बताया गया है। इसके बाद 8 अक्टूबर, गुरुवार को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर, शुक्रवार को चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध होगा।

    पितृ पक्ष का अंतिम दिन 10 अक्टूबर, शनिवार को होगा। इस दिन अमावस्या तिथि पर सर्वपितृ अमावस्या का तर्पण और श्राद्ध किया जाएगा। धार्मिक परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी उपलब्ध नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।

    पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया परिवार की परंपरा और मान्यताओं के अनुसार की जाती है। सामान्य रूप से पितरों का मन में स्मरण करने के बाद जल तर्पण और अन्न का अर्पण किया जाता है। इसके बाद दान-पुण्य करने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में किए गए इन कर्मों का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करना है।

    इस तरह 2026 में पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। पूर्णिमा से आरंभ होने वाली यह अवधि सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगी। परिवार अपने पितरों की संबंधित तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण की परंपरा का पालन कर सकते हैं।