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  • टाटा ट्रस्ट में सत्ता की लड़ाई तेज, सात ट्रस्टों के 84 कैविएट से मचा हड़कंप, नोएल-नेविल टाटा पर क्यों बढ़ा दबाव

    टाटा ट्रस्ट में सत्ता की लड़ाई तेज, सात ट्रस्टों के 84 कैविएट से मचा हड़कंप, नोएल-नेविल टाटा पर क्यों बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली। टाटा समूह से जुड़े ट्रस्टों के भीतर चल रहा विवाद अब खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के सामने सात ट्रस्टों की ओर से कुल 84 कैविएट दाखिल किए जाने के बाद इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। इन कैविएट में नोएल टाटा और नेविल टाटा को कैविएटर बनाया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि ट्रस्ट से जुड़े किसी मामले में चैरिटी कमिश्नर की ओर से कोई आदेश जारी करने से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाए। बड़ी संख्या में कैविएट दाखिल होने को टाटा ट्रस्ट के भीतर बढ़ते मतभेदों का अहम संकेत माना जा रहा है।

    मामले का केंद्र सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट यानी एसडीटीटी में शासन व्यवस्था और निर्णय लेने के अधिकारों से जुड़ा विवाद बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार नोएल टाटा और नेविल टाटा के खिलाफ अलग-अलग मुद्दे उठाए गए हैं और इसी वजह से कानूनी स्तर पर पहले से अपनी स्थिति सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल टाटा ट्रस्ट की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

    विवाद की एक अहम कड़ी नोएल टाटा की नियुक्ति और उनके स्थायी ट्रस्टी के रूप में बने रहने से जुड़ी है। श्रीनिवासन की ओर से नोएल टाटा की नियुक्ति की जांच की मांग उठाई गई है। साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन बनाने का आधार क्या था और वह इस पद पर किस प्रक्रिया के तहत बने हुए हैं। इन सवालों ने ट्रस्ट की आंतरिक व्यवस्था और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर बहस तेज कर दी है।

    मामला सिर्फ नियुक्ति तक सीमित नहीं है। एसडीटीटी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में नोएल टाटा की भागीदारी और उनके मतदान अधिकारों पर भी रोक लगाने की मांग की गई है। इसमें टाटा संस के निदेशकों प्रतिनिधियों या प्रॉक्सी की नियुक्ति और उन्हें किसी तरह के निर्देश देने से जुड़े मामले भी शामिल हैं। ऐसे में विवाद का असर टाटा समूह की शीर्ष स्तर की निर्णय प्रक्रिया पर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

    इस बीच सर रतन टाटा ट्रस्ट को लेकर भी पहले से स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की ओर से ट्रस्ट के कामकाज पर कुछ प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। इन प्रतिबंधों के चलते ट्रस्ट फिलहाल बैठक नहीं कर पा रहा है। जब तक यह रोक नहीं हटती तब तक बैठक आयोजित करने में भी अड़चन बनी रहेगी।

    टाटा ट्रस्ट की संरचना और टाटा संस में ट्रस्टों की भूमिका को देखते हुए यह विवाद काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रस्टों के फैसलों का असर समूह की कंपनियों और उसके प्रशासनिक ढांचे पर भी पड़ सकता है। ऐसे में 84 कैविएट दाखिल होने के बाद अब निगाहें महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि इन आपत्तियों और आरोपों पर क्या रुख अपनाया जाता है और नोएल टाटा तथा अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका को लेकर विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • टाटा संस में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर विवाद… कानूनी खर्च का भुगतान नहीं करेगा ट्रस्ट

    टाटा संस में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर विवाद… कानूनी खर्च का भुगतान नहीं करेगा ट्रस्ट


    नई दिल्ली।
    टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (टीईडीटी) (Tata Education and Development Trust – TEDT) के ट्रस्टी मेहली मिस्त्री (Mehli Mistry) ने साफ कर दिया है कि ट्रस्ट टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड के बीच एन चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) की दोबारा नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद से जुड़े किसी भी कानूनी खर्च का भुगतान नहीं करेगा। टीईडीटी के कोष का अनुमान करीब 5,000 करोड़ रुपये बताया गया है। मेहली ने टाटा ट्रस्ट्स के सीईओ सिद्धार्थ शर्मा को ईमेल भेजकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। इसकी प्रति टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन टाटा और टीईडीटी के दूसरे ट्रस्टी जेएन मिस्त्री को भी भेजी गई है।

    मेहली ने कहा कि ट्रस्टी, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रहा मुकदमा पिछले 150 वर्षों में अभूतपूर्व है। उन्होंने विवाद में शामिल लोगों के अनुभव या रवैये पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए टीईडीटी के रुख को स्पष्ट किया। उनका कहना है कि टीईडीटी टाटा संस का शेयरधारक नहीं है और इसलिए इन विवादों से अलग है।


    क्या अभी टीईडीटी का पैसा इस विवाद में खर्च हो रहा है?

    मेहली मिस्त्री के ईमेल में यह नहीं कहा गया है कि टीईडीटी का पैसा फिलहाल इस विवाद से जुड़े कानूनी खर्च में इस्तेमाल किया जा रहा है। ईमेल में ऐसा भी नहीं कहा गया है कि इस तरह के खर्च का कोई प्रस्ताव सामने आया है। उनकी आपत्ति इस आशंका पर आधारित है कि टीईडीटी से भविष्य में ऐसे कानूनी खर्च उठाने को कहा जा सकता है। मेहली ने मांग की है कि उनका ईमेल 20 नवंबर 2026 को होने वाली टीईडीटी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की अगली बैठक में रखा जाए और रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।


    चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?

    चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को टाटा संस बोर्ड को बताया था कि वह मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होने के बाद दोबारा नियुक्ति के लिए अपना नाम पेश नहीं करेंगे। इसके बाद सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) ने उनके फैसले का सम्मान करते हुए नए चेयरमैन के चयन के लिए चयन समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया। लेकिन 17 सितंबर को टाटा संस बोर्ड ने 4:1 के मतदान से चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए फिर नियुक्त करने को मंजूरी दे दी। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया।


    टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी इस विवाद में क्यों अहम?

    विवाद में टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी भी अहम है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी इक्विटी शेयर पूंजी है। दो प्रमुख ट्रस्टों में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के पास 27.98 फीसदी और सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास 23.56 फीसदी हिस्सेदारी है। दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी 51.54 फीसदी है। बाकी हिस्सेदारी अन्य संबद्ध टाटा ट्रस्ट्स के पास है। टीईडीटी, सर रतन टाटा ट्रस्ट से जुड़ा एक संबद्ध ट्रस्ट है, लेकिन मेहली ने स्पष्ट किया है कि टीईडीटी खुद टाटा संस का शेयरधारक नहीं है।


    क्या टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर भी अलग विवाद है?

    चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के मुद्दे के साथ टाटा संस के भविष्य के स्वामित्व को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। टाटा ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर को कहा था कि उसने टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने पर सहमति नहीं दी है। ट्रस्ट्स ने कहा कि लिस्टिंग के अलावा दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए और फैसला लेने से पहले सभी उपलब्ध विकल्पों की जांच और समीक्षा होनी चाहिए। ट्रस्ट्स ने टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध कंपनी बनाए रखने की अपनी स्थिति दोहराई और उसकी धर्मार्थ बहुमत हिस्सेदारी की भूमिका का भी उल्लेख किया।

  • एन. चंद्रशेखरन 2032 तक संभालेंगे टाटा संस की कमान, बोर्ड ने पांच साल बढ़ाया कार्यकाल

    एन. चंद्रशेखरन 2032 तक संभालेंगे टाटा संस की कमान, बोर्ड ने पांच साल बढ़ाया कार्यकाल


    नई दिल्ली।
    टाटा समूह के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को टाटा संस की कमान संभालते हुए अभी और पांच साल हो गए हैं। टाटा संस लिमिटेड के बोर्ड ने गुरुवार को उनके कार्यकाल को पांच साल के लिए बढ़ाने की मंजूरी दे दी। इसके साथ ही चंद्रशेखरन फरवरी 2032 तक समूह के चेयरमैन बने रहेंगे। उनका मौजूदा दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था।

    चंद्रशेखरन के कार्यकाल में विस्तार का फैसला ऐसे समय में आया है, जब टाटा समूह ने पारंपरिक कारोबारों के साथ-साथ विमानन, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे नए क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। बोर्ड के फैसले के बाद अब अगले पांच वर्षों के लिए समूह के नेतृत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है।

    65 साल की उम्र में रिटायरमेंट की नीति, 70 तक जारी रह सकता है कार्यकाल

    टाटा समूह की आंतरिक नीति के अनुसार, कार्यकारी पदों पर नियुक्त अधिकारियों के लिए आमतौर पर 65 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति का प्रावधान है। हालांकि, गैर-कार्यकारी भूमिका में अधिकारी 70 वर्ष की उम्र तक पद पर बने रह सकते हैं।

    एन. चंद्रशेखरन की उम्र फिलहाल 63 वर्ष बताई गई है। उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में पूरा होना था, जब वे 65 वर्ष के हो जाएंगे। अब पांच साल का नया कार्यकाल मिलने के बाद वे फरवरी 2032 तक टाटा संस के चेयरमैन बने रह सकते हैं। उस समय उनकी उम्र 70 वर्ष होगी।

    चंद्रशेखरन के कार्यकाल को बढ़ाने का फैसला टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, नए कार्यकाल के दौरान समूह की रणनीति और कारोबार के विस्तार को लेकर आगे के फैसले बोर्ड और प्रबंधन की योजनाओं के अनुसार होंगे।

    अक्टूबर 2016 में टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे

    एन. चंद्रशेखरन का टाटा समूह से जुड़ाव काफी पुराना है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1987 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में इंटर्न के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने कंपनी में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं और आगे चलकर समूह के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे।

    अक्टूबर 2016 में वे पहली बार टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे। इसके करीब चार महीने बाद जनवरी 2017 में उन्हें टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया गया। तब से वे समूह के रणनीतिक फैसलों और कारोबार के विस्तार में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

    चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने पारंपरिक उद्योगों के साथ नए कारोबारी क्षेत्रों में निवेश और विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाए। विमानन, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और डिजिटल कारोबार को समूह की आगे की विकास रणनीति का हिस्सा बनाया गया।

    नौ साल में समूह का कारोबार और मुनाफा बढ़ा

    एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह के वित्तीय प्रदर्शन में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2020 से वित्त वर्ष 2026 के बीच समूह के राजस्व और मुनाफे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

    राजस्व में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी

    वित्त वर्ष 2020 में टाटा समूह का राजस्व 7.89 लाख करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2026 में यह बढ़कर 16.24 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस तरह छह वित्त वर्षों के दौरान समूह के राजस्व में काफी विस्तार हुआ।

    मुनाफा 32 हजार करोड़ से बढ़कर 1.71 लाख करोड़

    समूह के मुनाफे में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2020 में टाटा समूह का मुनाफा करीब 32 हजार करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 1.71 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि समूह के विभिन्न कारोबारों के प्रदर्शन और विस्तार से जुड़ी हुई है।


    सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण बढ़ा

    टाटा समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में भी वृद्धि हुई। वर्ष 2020 में इन कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 9.31 लाख करोड़ रुपये था। वर्ष 2026 में यह बढ़कर 24.39 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

    इन आंकड़ों के अनुसार, चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह के कारोबार का आकार, मुनाफा और सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार मूल्य बढ़ा है। हालांकि, अलग-अलग कंपनियों के प्रदर्शन और बाजार परिस्थितियों का प्रभाव इन आंकड़ों पर पड़ता है।

    टाटा समूह ने नए क्षेत्रों में बढ़ाया दायरा

    एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने अपने कारोबार को पारंपरिक उद्योगों से आगे बढ़ाने पर जोर दिया। विमानन क्षेत्र में समूह की गतिविधियों का विस्तार हुआ। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे क्षेत्रों में भी समूह ने कदम बढ़ाए।

    टाटा समूह के लिए इन नए क्षेत्रों में प्रवेश का उद्देश्य भविष्य की औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप कारोबार का विस्तार करना है। इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता विकसित करने पर भी ध्यान दिया गया है।

    समूह की प्रमुख कंपनियों में टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर और एयर इंडिया शामिल हैं। इन कंपनियों के अलग-अलग कारोबार हैं, लेकिन टाटा संस समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    टाटा समूह, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में क्या अंतर है?

    टाटा समूह से जुड़े तीन नाम अक्सर चर्चा में रहते हैं—टाटा समूह, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स। इन तीनों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं।


    टाटा समूह

    टाटा समूह उन अलग-अलग कंपनियों और कारोबारों का समूह है, जो टाटा नाम के तहत संचालित होते हैं। इसमें टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर और एयर इंडिया जैसी कंपनियां शामिल हैं। समूह के कारोबार आईटी, वाहन, इस्पात, ऊर्जा, विमानन और अन्य क्षेत्रों में फैले हुए हैं।

    टाटा संस

    टाटा संस टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। यह समूह की प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी रखती है और समूह के बड़े कारोबारी फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन समूह के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा हैं।

    टाटा ट्रस्ट्स

    टाटा ट्रस्ट्स सामाजिक और परोपकारी कार्यों से जुड़े ट्रस्टों का समूह है। ये शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण और अन्य जनहितकारी गतिविधियों में योगदान करते हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई जाती है।

    इस तरह टाटा समूह कारोबारों का व्यापक नेटवर्क है, टाटा संस उसकी प्रमुख होल्डिंग कंपनी है और टाटा ट्रस्ट्स सामाजिक एवं परोपकारी गतिविधियों से जुड़े ट्रस्टों का समूह है।

    आगे भी समूह की रणनीति पर रहेगी नजर

    टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल पांच साल बढ़ाए जाने के बाद अब वे फरवरी 2032 तक चेयरमैन बने रहेंगे। उनके नेतृत्व में समूह ने पिछले वर्षों में कारोबार के विस्तार और नए क्षेत्रों में प्रवेश पर जोर दिया है।

    आने वाले वर्षों में टाटा समूह की रणनीति में विमानन, तकनीक, विनिर्माण, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे क्षेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। बोर्ड के फैसले से समूह के शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता बनी रहेगी और आगे की कारोबारी योजनाओं को उसी दिशा में आगे बढ़ाया जा सकेगा।

  • टाटा संस का IPO होगा लॉन्च…. RBI ने खारिज किया एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन

    टाटा संस का IPO होगा लॉन्च…. RBI ने खारिज किया एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन


    नई दिल्ली।
    अगर सबकुछ ठीक रहा तो जल्द ही टाटा ग्रुप (Tata Group) की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons ) का आईपीओ (IPO) लॉन्च होगा। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) (Reserve Bank of India – RBI) ने टाटा संस को प्रमुख निवेश कंपनी के रूप में एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन को खारिज कर दिया है। इससे टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी हो गया है। कानूनी विशेषज्ञ एचपी रानीना और कॉरपोरेट गवर्नेंस विश्लेषक श्रीराम सुब्रमणियन ने कहा कि रिजर्व बैंक के फैसले के बाद टाटा संस के सामने लागू लिस्टिंग नियमों का पालन करने का विकल्प बचता है।


    रिटेल निवेशकों को क्या फायदा?

    टाटा संस के आईपीओ आने से इसमें रिटेल निवेशक हिस्सेदारी खरीद सकेंगे। अभी आम निवेशक टाटा ग्रुप की कंपनी टाटा मोटर्स, TCS, टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स जैसी अलग-अलग लिस्टेड टाटा कंपनियों के शेयर खरीद सकते हैं लेकिन टाटा संस में सीधे निवेश नहीं कर सकते क्योंकि यह अनलिस्टेड है। अब अगर लिस्टिंग होती है तो शेयरों की खरीद-बिक्री की जा सकेगी।


    टाटा संस की कैसे बढ़ीं मुश्किलें

    दरअसल, आरबीआई ने सितंबर 2022 में टाटा संस को ‘अपर-लेयर’ की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के रूप में वर्गीकृत किया था और ऐसी संस्थाओं के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना अनिवार्य किया गया था। टाटा संस के लिए मूल समयसीमा 30 सितंबर 2025 रखी गई थी। टाटा संस ने इस दायित्व से बचने के लिए 2024 में 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुकाया और एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने का आवेदन किया था। आरबीआई ने आवेदन पर फैसला लंबित रखा और बाद में भी टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी की सूचियों में शामिल करता रहा।


    जून 2026 में आरबीआई ने बदले नियम

    जून 2026 से आरबीआई ने कुछ नियमों में बदलाव किए। इसके तहत 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की एसेट्स वाली कोई भी एनबीएफसी अपने-आप अपर-लेयर श्रेणी में आ जाती है। मार्च, 2026 तक टाटा संस की परिसंपत्तियां दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई गई हैं। अगस्त में जारी अपर-लेयर सूची में टाटा संस 17 संस्थाओं में एकमात्र गैर-सूचीबद्ध निजी इकाई थी। इस सूची में आरईसी, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और भारतीय रेलवे वित्त निगम जैसी सरकारी एनबीएफसी भी शामिल हैं, जिन्हें सूचीबद्धता की अनिवार्यता से छूट हासिल है।

    शेयरधारकों में मतभेद
    हालांकि, टाटा संस के आईपीओ की राह में कई दिक्कतें भी हैं। सूत्रों की मानें तो सूचीबद्धता को लेकर टाटा संस के शेयरधारकों के बीच भी मतभेद हैं। नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है और वह सूचीबद्धता का विरोध करता रहा है। दूसरी ओर, करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह सूचीबद्धता के पक्ष में रहा है और इससे अपनी हिस्सेदारी का मूल्य हासिल करने की बात करता रहा है।


    चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति नहीं होने का भी कारण

    यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब टाटा संस में नेतृत्व और निदेशक मंडल को लेकर मतभेद की खबरें हैं। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अगले साल फरवरी में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुनर्नियुक्ति नहीं लेने का फैसला किया है। ऐसी खबरें हैं कि टाटा संस की सूचीबद्धता का मुद्दा उन कारणों में भी शामिल था जिनकी वजह से नोएल टाटा ने चेयरमैन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया था। रतन टाटा के सौतेले भाई और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा टाटा संस के निदेशक मंडल के सदस्य भी हैं।

    चर्चा है कि वह चंद्रशेखरन से यह आश्वासन चाहते थे कि टाटा संस को सूचीबद्ध होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। वहीं, चंद्रशेखरन ने कथित तौर पर कहा था कि किसी नियामकीय या कानूनी मामले के नतीजे को पहले से तय नहीं माना जा सकता। नोएल टाटा ने समूह के कुछ अन्य कारोबार में हो रहे घाटे का मुद्दा भी उठाया था। इनमें टाटा डिजिटल और एयर इंडिया शामिल हैं, जिन्हें चंद्रशेखरन के करीब एक दशक के कार्यकाल में शुरू या अधिग्रहीत किया गया था।

  • टाटा संस के रेवन्यू में 9.1% का उछाल…. एक शेयर पर 1,10,717 रुपये डिविडेंड देने की सिफारिश

    टाटा संस के रेवन्यू में 9.1% का उछाल…. एक शेयर पर 1,10,717 रुपये डिविडेंड देने की सिफारिश


    नई दिल्ली।
    टाटा संस (Tata Sons) के चेयरमैन एन चंद्रशेखर (Chairman N. Chandrasekaran) ने बताया कि टाटा संस का रेवन्यू (Tata Sons Revenue) बीते वित्त वर्ष 9.1 प्रतिशत बढ़कर 42,367 करोड़ रुपये रहा है। वित्त वर्ष 2025 में टाटा संस का रेवन्यू (Tata Sons Revenue) 38835 करोड़ रुपये रहा था। वहीं, टैक्स भुगतान के बाद प्रॉफिट 21.8 प्रतिशत बढ़कर 31,961 करोड़ रुपये हो गया। इससे पहले के फाइनेंशियल ईयर में कंपनी का प्रॉफिट 26232 करोड़ रुपये था। कंपनी के निदेशक मंडल ने 1,10,717 रुपये प्रति शेयर के डिविडेंड की सिफारिश की है। यह शेयरधारकों की मंजूरी पर निर्भर है। बता दें, टाटा संस की शेयर बाजारों में लिस्टिंग नहीं हुई है।

    एन. चंद्रशेखरन ने कहा है कि टाटा ग्रुप का वित्तीय प्रदर्शन बीते वित्त वर्ष 2025-26 में मजबूत रहा है। समूह का कुल रेवन्यू 7.8 प्रतिशत बढ़कर 16,24,030 करोड़ रुपये और नेट प्रॉफिट 51.9 प्रतिशत बढ़कर 1,70,525 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। चंद्रशेखरन ने कंपनी की सालाना रिपोर्ट 2025-26 में शेयरधारकों को संबोधित करते कहा कि वर्ष 2025-26 वैश्विक संघर्षों और ग्लोबल स्टेज पर एआई में अभूतपूर्व निवेश का साल रहा। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद टाटा समूह ने वित्तीय मोर्चे पर मजबूत प्रदर्शन किया।

    उन्होंने कहा, ”एकीकृत स्तर पर वित्त वर्ष 2025-26 में टाटा समूह का रेवन्यू 7.8 प्रतिशत बढ़कर 16,24,030 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि शुद्ध लाभ 51.9 प्रतिशत बढ़कर 1,70,525 करोड़ रुपये हो गया।” वित्त वर्ष 2025-26 में टाटा समूह का राजस्व वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में 2.1 गुना और लाभ 5.4 गुना हो गया है। यह समूह की विभिन्न कंपनियों में किए गए सुधारों का परिणाम है।

    टाटा के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता एयर इंडिया है। कंपनी का घाटा वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 22,238 करोड़ रुपये हो गया है। एक साल पहले इसी वित्त वर्ष के दौरान कंपनी का घाटा 10,859 करोड़ रुपये रहा था। चंद्रशेखरन ने कहा कि एयर इंडिया के लिए यह साल काफी संघर्षपूर्ण रहा। वो कहते हैं कि तेल की कीमतों में उछाल, कई रूट्स का बंद होना, AI171 का क्रैश होना, पश्चिम एशिया में तनाव का बुरा असर पड़ा है। जिसकी वजह से एयर इंडिया को काफी नुकसान हुआ है। वो कहते हैं इतिहास की हर बड़ी एयरलाइन को खड़ा होने में दशकों का समय लगा है….। एयर इंडिया के परिवर्तन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।