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  • टाटा ट्रस्ट्स की बोर्ड बैठक पर रोक, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर का निर्देश

    टाटा ट्रस्ट्स की बोर्ड बैठक पर रोक, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर का निर्देश

    नई दिल्ली। टाटा समूह से जुड़े सर रतन टाटा ट्रस्ट के प्रशासनिक मामलों में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने ट्रस्ट की प्रस्तावित अहम बोर्ड बैठक को स्थगित करने का निर्देश जारी किया है। यह फैसला ट्रस्ट की बोर्ड संरचना को लेकर मिली कथित नियम उल्लंघन संबंधी शिकायतों के बाद लिया गया है।

    इस निर्देश के बाद टाटा ट्रस्ट्स की ओर से बयान जारी कर कहा गया है कि आदेश एकतरफा (एक्स-पार्टी) तरीके से दिया गया है और केवल सर रतन टाटा ट्रस्ट पर लागू होता है। ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश की समीक्षा की जा रही है और कानूनी पहलुओं को समझा जा रहा है।

    महत्वपूर्ण बैठक पर लगी रोक
    यह बैठक इसलिए भी बेहद अहम मानी जा रही थी क्योंकि इसमें टाटा संस से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा प्रस्तावित थी। इनमें कंपनी की संभावित लिस्टिंग, चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और अन्य नॉमिनी डायरेक्टर्स से जुड़े मुद्दे शामिल थे। बैठक पहले 8 मई को होनी थी, जिसे बाद में 16 मई तक स्थगित किया गया था, लेकिन अब इसे फिर से टाल दिया गया है।

    जांच के घेरे में ट्रस्ट की संरचना
    महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर अमोघ एस. कालोटी के अनुसार, सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी बोर्ड की संरचना को लेकर प्राप्त शिकायतों की जांच जारी है। आदेश में कहा गया है कि जब तक इंस्पेक्टर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करता, तब तक किसी भी प्रकार की बोर्ड बैठक आयोजित नहीं की जा सकती। वकील कात्यायनी अग्रवाल द्वारा दायर शिकायत में भी इस मामले को उठाया गया है। उन्होंने 18 अप्रैल को चैरिटी कमिश्नर से हस्तक्षेप की मांग की थी और जांच पूरी होने तक सभी आगामी बैठकों पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।

    ट्रस्टी संरचना पर उठे सवाल
    जानकारी के अनुसार, सितंबर 2025 में लागू संशोधित नियमों के तहत किसी भी ट्रस्ट में स्थायी या आजीवन ट्रस्टियों की संख्या कुल बोर्ड के 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। शिकायत में कहा गया है कि वर्तमान में ट्रस्ट में छह ट्रस्टी हैं, जिनमें जिमी नवल टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और नोएल नवल टाटा जैसे आजीवन ट्रस्टी शामिल हैं, जिससे अनुपात नियमों के उल्लंघन का सवाल उठता है।

    सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में 23.6 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो 180 अरब डॉलर से अधिक मूल्य वाले टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है। ऐसे में यह मामला कॉरपोरेट और कानूनी दोनों स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • भारत की इन कंपनियों का नहीं है कोई भी मालिक, सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे करती हैं कारोबार

    भारत की इन कंपनियों का नहीं है कोई भी मालिक, सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे करती हैं कारोबार

    नई दिल्ली।भारत में ज्यादातर बड़े बिजनेस फैमिली कंट्रोल में होते हैं यानी कंपनी के मालिक और उसके बोर्ड के प्रमुख अक्सर एक ही परिवार से होते हैं. लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी कंपनियों में ऐसा होता है कि परिवार के किसी सदस्य के पास कंपनी का कंट्रोल नहीं होता हैं जब परिवार में कोई वारिस नहीं होता या बच्चों को व्यापार में कोई इंटरेस्ट नहीं होती, तो कंपनियों को संभालने के लिए पेशेवर मैनेजर्स या ट्रस्ट जिम्मेदार बन जाते हैं. इस तरह बिजनेस को चलाए रखने में मदद करती है, बल्कि निवेशकों और समाज के भरोसे को भी बनाए रखती है.

    भारत में कुछ बड़ी कंपनियां ऐसी हैं जिनका कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं है और ये ट्रस्ट या फाउंडेशन के भरोसे चलती हैं. इसका मतलब है कि कंपनी का नियंत्रण किसी एक व्यक्ति के पास नहीं होता, बल्कि ट्रस्ट या बोर्ड तय करता है कि मुनाफा और संचालन कैसे होंगे, इन कंपनियों का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि समाज की भलाई और विकास के लिए काम करना होता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि भारत की किन कंपनियों का कोई भी मालिक नहीं है सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे कारोबार करती हैं.

    भारत की किन कंपनियों का कोई भी मालिक नहीं है

    -टाटा ग्रुप में रतन टाटा के कोई प्रत्यक्ष वारिस नहीं थे, इसलिए साइरस मिस्त्री जैसे पेशेवरों को नेतृत्व दिया गया. बाद में मिस्त्री के जाने के बाद एन. चंद्रशेखरन टाटा ग्रुप के प्रमुख बने. लेकिन टाटा ग्रुप की ज्यादा हिस्सेदारी अब भी परिवार या व्यक्तिगत मालिकों के बजाय टाटा ट्रस्ट्स के पास है. ये ट्रस्ट्स कंपनी के मुनाफे को शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक कार्यों में निवेश करते हैं. -. महिंद्रा ग्रुप में भी ऐसा ही मामला है. आनंद महिंद्रा की बेटियों ने व्यापार संभालने में कोई सक्रिय भूमिका नहीं ली, उनके दोस्तों या पेशेवरों ने ग्रुप को प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली, भारत में अब पारिवारिक मालिकाना होना जरूरी नहीं है, बल्कि पेशेवर प्रबंधन और ट्रस्ट आधारित नियंत्रण भी कंपनियों को मजबूत बनाए रखता है.

    – भारत की तीसरी बड़ी दवा कंपनी सिप्ला भी इसी स्थिति में है. इसके चेयरमैन युसूफ हमीद के वारिस कारोबार में दिलचस्पी नहीं रखते हैं. इसलिए वे अब अपनी कंपनी बेचने की तैयारी कर रहे हैं. इसी तरह बिसलेरी और बायोकॉन जैसे बड़े ब्रांडों में भी वारिस की अनुपस्थिति के कारण व्यवसाय को पेशेवर हाथों में सौंपा गया या ट्रस्ट आधारित प्रबंधन अपनाया गया.

    ये कंपनियां सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे करती हैं कारोबार

    -टाटा ट्रस्ट्स – टाटा ग्रुप की ज्यादातर कंपनियों की हिस्सेदारी इन ट्रस्टों के पास है. इसका फायदा शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक कार्यों में निवेश किया जाता है. -. इंफोसिस फाउंडेशन – इंफोसिस कंपनी के मुनाफे का यूज शिक्षा और ग्रामीण विकास में कियाजाता है. – अजीम प्रेमजी फाउंडेशन – यह शिक्षा सुधार पर केंद्रित है और विप्रो के मुनाफे का समाज में योगदान सुनिश्चित करता है. इन कंपनियों में कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं होता है. इसके बजाय बोर्ड और ट्रस्ट कंपनियों के संचालन और दिशा-निर्देश तय करते हैं.

    कैसे काम करता है ट्रस्ट मॉडल?

    ट्रस्ट आधारित कंपनियों में कोई भी एक व्यक्ति कंपनी का मालिक नहीं होता है. इसका फायदा भी व्यक्तिगत फायदे के बजाय सामाजिक कार्यों में लगाया जाता है. इसके अलावा पेशेवर मैनेजर्स और बोर्ड कंपनी का संचालन करते हैं. साथ ही लंबे समय तक सस्टेनेबिलिटी और ट्रांसपेरेंसी रहती है.