Tag: tax

  • अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन ने बनाया नया रिकॉर्ड, 23 प्रतिशत की छलांग के साथ सरकारी खजाने में आए 2.31 लाख करोड़

    अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन ने बनाया नया रिकॉर्ड, 23 प्रतिशत की छलांग के साथ सरकारी खजाने में आए 2.31 लाख करोड़

    नई दिल्ली ।देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह के मोर्चे पर अक्टूबर 2026 में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान सकल जीएसटी कलेक्शन सालाना आधार पर 22.9 प्रतिशत उछलकर 2.31 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। पिछले साल अक्टूबर 2025 में यह आंकड़ा 1.88 लाख करोड़ रुपये था। ताजा आंकड़े देश में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार और आयात से मिलने वाले कर राजस्व में बढ़ोतरी को दर्शाते हैं।

    रिफंड की राशि घटाने के बाद अक्टूबर में शुद्ध जीएसटी राजस्व 25.6 प्रतिशत बढ़कर 2.03 लाख करोड़ रुपये हो गया। एक साल पहले इसी महीने में यह 1.61 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। सकल और शुद्ध दोनों तरह के राजस्व में हुई वृद्धि से कर संग्रह में मजबूती का संकेत मिला है।

    अक्टूबर के दौरान घरेलू जीएसटी संग्रह में 15.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 1.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके मुकाबले आयात से प्राप्त जीएसटी राजस्व में कहीं अधिक तेजी देखने को मिली। आयात पर मिलने वाला कर 42.2 प्रतिशत बढ़कर 72,246 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल अक्टूबर में इस मद से 50,796 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था।

    घरेलू जीएसटी संग्रह में केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) का योगदान 42,935 करोड़ रुपये रहा। राज्य वस्तु एवं सेवा कर (एसजीएसटी) के रूप में 51,340 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जबकि एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) का घरेलू संग्रह 64,769 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। आयात से प्राप्त आईजीएसटी में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई, जिसने कुल कर संग्रह को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले सात महीनों यानी अप्रैल से अक्टूबर के दौरान भी जीएसटी संग्रह में सकारात्मक रुझान बना रहा। इस अवधि में सकल जीएसटी कलेक्शन 13.2 प्रतिशत बढ़कर 14.77 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 13.05 लाख करोड़ रुपये था। वहीं, शुद्ध जीएसटी राजस्व 12.6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12.69 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह 11.27 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था।

    अक्टूबर में जीएसटी रिफंड की राशि में भी बढ़ोतरी हुई। कुल रिफंड 6.5 प्रतिशत बढ़कर 27,934 करोड़ रुपये रहा, जबकि अक्टूबर 2025 में यह 26,225 करोड़ रुपये था। घरेलू कारोबार से संबंधित रिफंड 9.8 प्रतिशत बढ़कर 14,007 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, आईसीईजीएटीई के माध्यम से संसाधित निर्यात रिफंड 3.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 13,927 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

    रिफंड को समायोजित करने के बाद घरेलू शुद्ध जीएसटी संग्रह 16.4 प्रतिशत बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। दूसरी ओर, कस्टम्स से जुड़े शुद्ध जीएसटी राजस्व में 56.2 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई और यह 58,319 करोड़ रुपये रहा। इससे आयात पर मिलने वाले कर राजस्व की मजबूत स्थिति सामने आई।

    अप्रैल से अक्टूबर 2026 के बीच कुल जीएसटी रिफंड 16.9 प्रतिशत बढ़कर 2.08 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसमें घरेलू रिफंड 19.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.18 लाख करोड़ रुपये और आयात से जुड़े रिफंड 13.4 प्रतिशत बढ़कर 89,733 करोड़ रुपये रहे। इस तरह चालू वित्त वर्ष के शुरुआती सात महीनों में जीएसटी संग्रह और रिफंड दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

  • भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 13.21 प्रतिशत बढ़कर 13.38 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, कॉरपोरेट और व्यक्तिगत करों से राजस्व में वृद्धि

    भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 13.21 प्रतिशत बढ़कर 13.38 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, कॉरपोरेट और व्यक्तिगत करों से राजस्व में वृद्धि

    नई दिल्ली ।भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष 2026-27 में 14 अक्टूबर तक पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 13.21 प्रतिशत बढ़कर 13.38 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है। इस दौरान कॉरपोरेट टैक्स, गैर-कॉरपोरेट टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) से होने वाली प्राप्तियों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। जारी आंकड़ों के अनुसार, कर रिफंड को घटाने के बाद प्राप्त शुद्ध राजस्व में यह वृद्धि सामने आई है।

    रिफंड से पहले सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह में भी बढ़ोतरी हुई। चालू वित्त वर्ष में 14 अक्टूबर तक यह 14.89 प्रतिशत बढ़कर 16.03 लाख करोड़ रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह 13.95 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। इस तरह सकल संग्रह में सालाना आधार पर उल्लेखनीय इजाफा हुआ है।

    इस अवधि में करदाताओं को जारी किए गए रिफंड की राशि भी बढ़ी। पिछले वर्ष की समान अवधि में 2.13 लाख करोड़ रुपये के रिफंड जारी किए गए थे, जबकि चालू वित्त वर्ष में यह रकम बढ़कर 2.65 लाख करोड़ रुपये हो गई। इसमें सालाना आधार पर 24.22 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। रिफंड को समायोजित करने के बाद ही शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह का आंकड़ा निकाला जाता है।

    कॉरपोरेट टैक्स के शुद्ध संग्रह में भी बढ़ोतरी देखने को मिली। चालू वित्त वर्ष में 14 अक्टूबर तक यह राशि बढ़कर 5.99 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 4.97 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध कॉरपोरेट कर संग्रह हुआ था। इस आंकड़े से दोनों अवधियों के बीच कॉरपोरेट कर राजस्व में वृद्धि का संकेत मिलता है।

    गैर-कॉरपोरेट करों के शुद्ध संग्रह में भी इजाफा हुआ। इस श्रेणी में व्यक्तियों और अन्य गैर-कॉरपोरेट इकाइयों की ओर से चुकाए गए कर शामिल हैं। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह संग्रह 6.54 लाख करोड़ रुपये था, जो चालू वित्त वर्ष में बढ़कर 6.92 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

    सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स से प्राप्त शुद्ध राजस्व में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि दर्ज की गई। एसटीटी का शुद्ध संग्रह पिछले वर्ष के 30,901.81 करोड़ रुपये से बढ़कर 46,840.43 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, अन्य करों की श्रेणी में शुद्ध संग्रह नकारात्मक रहा। यह एक वर्ष पहले के 282.39 करोड़ रुपये से घटकर माइनस 1.64 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

    सकल संग्रह के आंकड़ों पर नजर डालें तो कॉरपोरेट कर प्राप्तियां पिछले वर्ष की समान अवधि के 6.44 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 7.53 लाख करोड़ रुपये हो गईं। इसी तरह सकल गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह 7.20 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 8.03 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। सकल एसटीटी संग्रह भी 30,901.81 करोड़ रुपये से बढ़कर 46,840.43 करोड़ रुपये रहा। दूसरी ओर, अन्य करों का सकल संग्रह 301.22 करोड़ रुपये से घटकर 18.87 करोड़ रुपये रह गया।

    प्रत्यक्ष कर संग्रह में कंपनियों के अलावा व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवारों (एचयूएफ), फर्मों, एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स (एओपी), बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स (बीओआई), स्थानीय निकायों और कृत्रिम न्यायिक व्यक्तियों द्वारा चुकाए गए कर भी शामिल हैं। चालू वित्त वर्ष के आंकड़े 14 अक्टूबर तक की अवधि के हैं और इनकी तुलना पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि से की गई है।
  • एक लाख रुपये के निवेश में FD और RD का फर्क, जानिए ब्याज, परिपक्वता राशि और टैक्स से जुड़ी जरूरी बातें

    एक लाख रुपये के निवेश में FD और RD का फर्क, जानिए ब्याज, परिपक्वता राशि और टैक्स से जुड़ी जरूरी बातें

    नई दिल्ली ।बैंक में सुरक्षित निवेश की बात आती है तो फिक्स्ड डिपॉजिट और रिकरिंग डिपॉजिट आम निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय विकल्प हैं। दोनों योजनाओं में पैसा बैंक में जमा किया जाता है और उस पर तय दर के अनुसार ब्याज मिलता है, लेकिन दोनों में निवेश करने का तरीका अलग होता है। इसी अंतर की वजह से समान ब्याज दर होने के बावजूद मिलने वाला अंतिम रिटर्न अलग हो सकता है।

    फिक्स्ड डिपॉजिट यानी FD में निवेशक एकमुश्त रकम बैंक में निश्चित अवधि के लिए जमा करता है। जमा की गई पूरी राशि पर निवेश शुरू होने के बाद से ही निर्धारित नियमों के अनुसार ब्याज मिलता है। FD की अवधि बैंक और योजना के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। वहीं रिकरिंग डिपॉजिट यानी RD में निवेशक हर महीने एक निश्चित रकम जमा करता है। इस वजह से पूरी निवेश राशि शुरुआत में बैंक के पास नहीं रहती और ब्याज की गणना भी उसी हिसाब से होती है।

    रिटर्न के अंतर को एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी निवेश पर सालाना ब्याज दर 6.5 प्रतिशत है और निवेश की अवधि पांच साल है। अगर कोई व्यक्ति एक लाख रुपये की FD करता है तो पांच साल की अवधि पूरी होने पर उसे लगभग 1,38,042 रुपये मिल सकते हैं। इसमें मूलधन के साथ ब्याज भी शामिल होगा।

    दूसरी तरफ, यदि वही व्यक्ति पांच साल तक हर महीने लगभग 1,666 रुपये की RD करता है तो कुल जमा रकम करीब एक लाख रुपये होगी। इसी उदाहरण में परिपक्वता राशि लगभग 1,18,270 रुपये के आसपास बताई गई है। इस तरह दोनों में जमा की गई कुल मूल रकम लगभग समान होने के बावजूद FD से मिलने वाली राशि करीब 19,772 रुपये अधिक हो सकती है।

    इस अंतर की मुख्य वजह निवेश की अवधि और रकम के बैंक में उपलब्ध रहने का समय है। FD में पूरी राशि पहले दिन से जमा होती है, इसलिए पूरी रकम पर निर्धारित अवधि के दौरान ब्याज मिलता रहता है। RD में पैसा धीरे-धीरे हर महीने जमा होता है, इसलिए बाद में जमा होने वाली रकम को पूरी अवधि का ब्याज नहीं मिल पाता।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर निवेशक के लिए FD ही बेहतर विकल्प है। यदि किसी व्यक्ति के पास एकमुश्त रकम उपलब्ध है और निकट भविष्य में उसकी जरूरत नहीं है, तो वह FD पर विचार कर सकता है। इसके विपरीत जिन लोगों के पास एक साथ बड़ी रकम नहीं है, लेकिन वे नियमित रूप से बचत करना चाहते हैं, उनके लिए RD उपयोगी हो सकती है।

    RD के जरिए हर महीने एक निश्चित राशि बचाने की आदत भी विकसित की जा सकती है। नौकरीपेशा लोगों या नियमित आय वाले निवेशकों के लिए यह तरीका भविष्य में किसी बड़े खर्च के लिए रकम तैयार करने में मददगार हो सकता है। दूसरी ओर, FD उन लोगों के लिए सुविधाजनक हो सकती है जिनके पास पहले से पर्याप्त एकमुश्त बचत मौजूद है।

    टैक्स के लिहाज से भी निवेश से मिलने वाले ब्याज को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। FD और RD से प्राप्त ब्याज कर नियमों के तहत आय का हिस्सा हो सकता है। निर्धारित सीमा और लागू नियमों के अनुसार बैंक ब्याज पर TDS भी काट सकता है। इसलिए निवेश करने से पहले ब्याज दर के साथ टैक्स प्रभाव, अवधि, समय से पहले निकासी के नियम और अपनी वित्तीय जरूरतों को भी देखना जरूरी है।

    अंततः FD और RD में चुनाव केवल ज्यादा रिटर्न के आधार पर नहीं होना चाहिए। एकमुश्त रकम और निवेश की अवधि उपलब्ध हो तो FD का विकल्प उपयोगी हो सकता है, जबकि नियमित छोटी बचत के जरिए भविष्य के लिए रकम तैयार करने वालों के लिए RD अधिक सुविधाजनक हो सकती है।

  • आय सीमा नहीं तय करती ITR की जरूरत, इन वित्तीय गतिविधियों में टैक्स रिटर्न भरना बन जाता है अनिवार्य

    आय सीमा नहीं तय करती ITR की जरूरत, इन वित्तीय गतिविधियों में टैक्स रिटर्न भरना बन जाता है अनिवार्य

    नई दिल्ली । इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि अगर उनकी सालाना आय टैक्स छूट की सीमा से कम है तो उन्हें रिटर्न दाखिल करने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि आयकर नियमों के अनुसार कुछ ऐसी परिस्थितियां भी हैं, जहां व्यक्ति की आय पर टैक्स देनदारी न होने के बावजूद ITR भरना कानूनी रूप से जरूरी हो जाता है।

    आयकर विभाग ने ऐसी कई स्थितियां तय की हैं, जिनमें केवल आय की सीमा ही नहीं बल्कि व्यक्ति के वित्तीय लेन-देन और आर्थिक गतिविधियों के आधार पर भी ITR दाखिल करने की बाध्यता बन सकती है। ऐसे में टैक्स फ्री इनकम वाले लोगों को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड और लेन-देन की स्थिति के आधार पर रिटर्न भरने की जरूरत पड़ सकती है।

    अगर किसी व्यक्ति ने एक वित्तीय वर्ष में बिजली बिल के रूप में 1 लाख रुपये या उससे अधिक का भुगतान किया है, तो उसके लिए ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। यह नियम उन लोगों पर लागू होता है जिनके बड़े खर्च उनकी आर्थिक स्थिति को दर्शाते हैं।

    इसी तरह अगर किसी व्यक्ति ने खुद या अपने परिवार के किसी सदस्य के विदेश दौरे पर 2 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च किए हैं, तो उसे भी आयकर रिटर्न दाखिल करना आवश्यक हो सकता है। विदेश यात्रा पर होने वाले बड़े खर्च को आयकर नियमों के तहत रिपोर्टिंग की श्रेणी में रखा गया है।

    यदि किसी व्यक्ति के एक या एक से अधिक सेविंग बैंक खातों में एक वित्तीय वर्ष के दौरान कुल जमा राशि 50 लाख रुपये या उससे अधिक पहुंच जाती है, तो भी ITR दाखिल करना अनिवार्य हो सकता है। इसी तरह करंट अकाउंट में 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक जमा करने वाले व्यक्तियों को भी रिटर्न दाखिल करना पड़ता है।

    टैक्स कटौती से जुड़ा नियम भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी व्यक्ति की आय से निर्धारित सीमा से अधिक TDS या TCS काटा गया है, तो उसे ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। हालांकि वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह सीमा अलग निर्धारित की गई है।

    इसके अलावा जिन लोगों की कुल आय लागू बेसिक छूट सीमा से अधिक है, उनके लिए भी ITR दाखिल करना अनिवार्य है। अलग-अलग टैक्स व्यवस्था के अनुसार छूट सीमा अलग हो सकती है, इसलिए करदाताओं को अपनी आय और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

    अगर किसी व्यक्ति को शेयर बाजार, क्रिप्टो निवेश या संपत्ति बिक्री से नुकसान हुआ है और वह उस नुकसान को भविष्य के वर्षों में होने वाले लाभ के साथ समायोजित करना चाहता है, तो उसे नुकसान को आगे ले जाने के लिए ITR दाखिल करना जरूरी होता है।

    विदेश में संपत्ति रखने वाले भारतीय निवासियों के लिए भी टैक्स रिटर्न दाखिल करना आवश्यक हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति के नाम विदेश में बैंक खाता, शेयर या कोई संपत्ति है, तो उसे इसकी जानकारी आयकर रिटर्न में देनी होती है।

    फ्रीलांसर, डॉक्टर, वकील, आईटी प्रोफेशनल या अन्य सलाहकारों जैसे पेशेवरों के लिए भी कुछ परिस्थितियों में ITR जरूरी हो जाता है। अगर उनकी पेशेवर आय निर्धारित सीमा से अधिक है, तो उन्हें रिटर्न दाखिल करना पड़ता है।

    इसी तरह कारोबार करने वाले लोगों के लिए भी टर्नओवर के आधार पर ITR दाखिल करने की आवश्यकता हो सकती है। यदि किसी व्यवसाय का सालाना कारोबार तय सीमा से अधिक है, तो मुनाफा कम होने या न होने की स्थिति में भी रिटर्न दाखिल करना जरूरी हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ITR केवल टैक्स भुगतान का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की वित्तीय पहचान और रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी होता है। लोन लेने, वीजा प्रक्रिया, निवेश और कई अन्य वित्तीय कार्यों में भी ITR की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए करदाताओं को केवल आय सीमा देखकर निर्णय लेने के बजाय अपनी पूरी वित्तीय स्थिति और नियमों को ध्यान में रखकर रिटर्न दाखिल करना चाहिए।

  • Budget पर मिले सुझावों में क्रिप्टो पर 20% टैक्स लगाने की मांग…कर मुक्त हो PF योगदान

    Budget पर मिले सुझावों में क्रिप्टो पर 20% टैक्स लगाने की मांग…कर मुक्त हो PF योगदान


    नई दिल्ली।
    वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) अब तक राज्यों और अलग-अलग क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर उनसे आगामी बजट (Budget 2026) को लेकर सुझाव ले चुका है। बड़ी संख्या में लोग ऑनलाइन सुझाव (Online Suggestions) भेज रहे हैं। अभी तक क्रिप्टो करेंसी (Cryptocurrency) पर लगने वाले टैक्स को कम करने और उसकी निगरानी के लिए समूचित प्रावधान को लेकर सबसे ज्यादा सुझाव मिले हैं।

    कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि क्रिप्टो पर सीधे 20 फीसदी कर लगाया जाना चाहिए। लोगों का सुझाव है कि क्रिप्टो और ब्लॉकचेन सेक्टर के लिए स्पष्ट, संतुलित और व्यावहारिक नीति बनाई जाए।


    अभी कितना लगता है टैक्स

    वर्तमान में 30 फीसदी टैक्स और एक फीसदी टीडीएस लगता है जो छोटे निवेशकों व स्टार्टअप्स के लिए बाधा है, जिसे तर्कसंगत किया जाना चाहिए। क्रिप्टो को डिजिटल एसेट की स्पष्ट परिभाषा मिले और नुकसान को लाभ से समायोजित करने की अनुमति दी जाए। इससे नवाचार बढ़ेगा, रोजगार सृजित होंगे और भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था में अग्रणी बनेगा।

    क्रिप्टोकरेंसी को नियंत्रित ढंग से लागू करने के लिए भी सुझाव दिए जा रहे हैं। कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि इसके लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा एवं व्यापक कानून बनाया जाए, जिसमें इसकी कानूनी स्थिति, उपयोग और सीमाएं स्पष्ट हों। इसकी निगरानी के लिए एक नियामक प्राधिकरण का गठन किया जाए। केवाईसी एवं एंटी मनी लॉड्रिंग (एएमएल) नियमों का पालन सभी क्रिप्टो प्लेटफॉर्म पर नियमों को अनिवार्य किया जाए, जिससे अवैध गतिविधियों पर रोक लगाई जाए।


    पीएफ योगदान पर न लगाया जाए टैक्स

    मौजूदा नियमों के तहत किसी कर्मचारी के पीएफ खाते में सालाना 2.5 लाख रुपये के योगदान पर अर्जित ब्याज कर मुक्त होती है लेकिन 2.5 लाख रुपये से अधिक के योगदान पर अर्जित ब्याज पर कर्मचारी को कर देना होता है। लोगों ने सुझाव रखा है कि ईपीएफओ में होने वाले योगदान में कर से जुड़े प्रावधान को हटाया जाए क्योंकि इस प्रावधान से अनिवार्य पीएफ योगदान करने वाले कर्मचारी प्रभावित होते हैं।

    इसके बाद कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन बढ़ाए जाने को लेकर सुझाव आए हैं। काफी लोगों ने www.mygov.in वेबसाइट पर जाकर सुझाव दिया है कि कर्मचारियों की न्यूनतम वेतनमान सीमा को बढ़ाया जाएगा। करीब 11 वर्षों से न्यूनतम वेतन न बढ़ाए जाने के चलते लोगों का ईपीएफओ में जमा होने वाला अंशदान सीमित है। ऐसी स्थिति में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को लंबी नौकरी करने के बाद भी पेंशन बहुत कम मिलती है।