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  • रुपए को मजबूती देने और विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए सरकार और आरबीआई के कदमों को एसोचैम का समर्थन

    रुपए को मजबूती देने और विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए सरकार और आरबीआई के कदमों को एसोचैम का समर्थन


    नई दिल्ली:  
    रुपए में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश के रुझानों के बीच सरकार तथा भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से उठाए गए कदमों को उद्योग संगठन एसोचैम ने समर्थन दिया है। संगठन का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच रुपए को सहारा देने, निवेशकों का भरोसा मजबूत करने और दीर्घकालिक विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए किए जा रहे प्रयास सही दिशा में हैं। एसोचैम के मुताबिक, भारत की आर्थिक बुनियाद को मजबूत बनाए रखते हुए स्थायी पूंजी प्रवाह बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

    एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता के मौजूदा दौर में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार और आरबीआई के समन्वित प्रयास सराहनीय हैं। उन्होंने रुपए की दीर्घकालिक मजबूती को देश की आर्थिक स्थिति और लगातार विदेशी पूंजी आकर्षित करने की क्षमता से जोड़कर देखा। संगठन ने इस बात पर जोर दिया कि केवल अस्थायी पूंजी प्रवाह के बजाय लंबे समय तक टिकने वाले निवेश को बढ़ावा देना जरूरी है।

    मिंडा ने पूर्व आरबीआई गवर्नर डी. सुब्बाराव के विचारों का भी समर्थन किया। सुब्बाराव ने कहा था कि रुपए की दीर्घकालिक मजबूती अंततः भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद और निरंतर पूंजी प्रवाह आकर्षित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। एसोचैम अध्यक्ष के अनुसार, संगठन इस विचार से सहमत है और सरकार तथा आरबीआई की ओर से पहले ही उठाए गए कदमों को महत्वपूर्ण मानता है।

    एसोचैम ने दावा किया कि हाल में किए गए उपायों से रुपया अपने हालिया निचले स्तरों से उबरने में सफल रहा है। संगठन ने 31 अगस्त को समाप्त हुई 133 अरब डॉलर की एफसीएनआर (बी) मोबिलाइजेशन विंडो का भी उल्लेख किया। इस पहल को विदेशी मुद्रा जुटाने से जुड़े प्रयासों के संदर्भ में अहम बताया गया।

    संगठन के मुख्य अर्थशास्त्री एस.पी. शर्मा ने कहा कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है। इसके प्रमुख आधारों में पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आरबीआई का 7.1 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान और महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए अपनाई गई संतुलित मौद्रिक नीति शामिल हैं। उनके मुताबिक, ये कारक देश की आर्थिक स्थिरता को समर्थन देते हैं।

    एसोचैम ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए वित्त मंत्रालय की ओर से हाल में घोषित कदमों का भी स्वागत किया। इनमें आयकर संशोधन अध्यादेश, 2026 शामिल है। इसके तहत 1 अप्रैल 2026 से सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई के निवेश पर मिलने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट का प्रावधान किया गया है। संगठन ने इसे विदेशी निवेश आकर्षित करने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम बताया।

    इसके अलावा, एसोचैम ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने वित्त वर्ष 2027-28 के बजट की तैयारी के दौरान दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर यानी एलटीसीजी और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी एसटीटी को लेकर निवेशकों की राय पर विचार करने की बात कही थी।

    हालांकि, संगठन ने कर व्यवस्था में और सुधार की जरूरत भी बताई। एसोचैम के अनुसार, कर ढांचे को अधिक तर्कसंगत बनाने, नियमों की व्याख्या सरल करने और दीर्घकालिक इक्विटी निवेश को प्रोत्साहित करने वाले उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। संगठन ने अल्पकालिक पूंजी प्रवाह की तुलना में लंबे समय तक बने रहने वाले निवेश को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

    एसोचैम ने कहा कि भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से वह सरकार, आरबीआई और बाजार नियामक सेबी के साथ मिलकर काम जारी रखेगा। संगठन का मानना है कि स्थिर आर्थिक नीतियां, स्पष्ट कर व्यवस्था और भरोसेमंद निवेश माहौल दीर्घकालिक विदेशी पूंजी आकर्षित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • एलटीसीजी टैक्स में बदलाव पर निर्मला सीतारमण ने कहा- अभी कुछ कहना जल्दबाजी, वित्त वर्ष 2027-28 के बजट की तैयारी शुरू

    एलटीसीजी टैक्स में बदलाव पर निर्मला सीतारमण ने कहा- अभी कुछ कहना जल्दबाजी, वित्त वर्ष 2027-28 के बजट की तैयारी शुरू


    नई दिल्ली । 
    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार, 13 अक्टूबर को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (एलटीसीजी) टैक्स व्यवस्था में संभावित बदलाव को लेकर कहा कि फिलहाल इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने बताया कि अगले केंद्रीय बजट की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और अभी यह तय करने का समय नहीं है कि सरकार किन मुद्दों पर विचार करेगी। वित्त मंत्री की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब निवेशक पूंजीगत लाभ पर लगने वाले कर और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं में संभावित बदलाव को लेकर अपनी राय सामने रख रहे हैं।

    एक कार्यक्रम में बोलते हुए निर्मला सीतारमण ने स्वीकार किया कि भारत और विदेशों के निवेशक एलटीसीजी टैक्स को लेकर अपने विचार रख रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इन मुद्दों पर मिलने वाले सुझावों और विचारों को गंभीरता से सुनेगी। वित्त मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि इस चर्चा में सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) का विषय भी जुड़ा हुआ है। बाजार से जुड़े प्रतिभागियों ने यह सवाल उठाया है कि क्या अलग-अलग परिसंपत्ति वर्गों के साथ कर व्यवस्था में समान व्यवहार किया जाना चाहिए।

    सरकार वित्त वर्ष 2027-28 के केंद्रीय बजट की तैयारी कर रही है। इसे 1 फरवरी 2027 को पेश किया जाना है। एलटीसीजी टैक्स में संभावित बदलाव को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया गया है। वित्त मंत्री के बयान से स्पष्ट है कि बजट से पहले इस विषय पर निवेशकों और बाजार के अन्य प्रतिभागियों की राय सामने आ रही है, लेकिन सरकार की ओर से किसी प्रस्तावित बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है।

    मौजूदा नियमों के अनुसार, एक साल से अधिक समय तक रखे गए सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों और इक्विटी म्यूचुअल फंड से होने वाले दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पर 12.5 प्रतिशत कर लगता है। हालांकि, एक वित्त वर्ष में ऐसे लाभ के 1.25 लाख रुपये तक के हिस्से पर कर छूट उपलब्ध है। इस व्यवस्था में जुलाई 2024 के केंद्रीय बजट के दौरान बदलाव किया गया था। उस समय एलटीसीजी टैक्स की दर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दी गई थी। साथ ही, कर छूट की सीमा एक लाख रुपये से बढ़ाकर 1.25 लाख रुपये कर दी गई थी।

    बजट 2026 के दौरान बाजार के कुछ वर्गों को उम्मीद थी कि पूंजीगत लाभ कर की दर घटाई जा सकती है या कर छूट की सीमा बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, उस बजट में मौजूदा पूंजीगत लाभ कर व्यवस्था को बरकरार रखा गया था। दूसरी ओर, फ्यूचर्स और ऑप्शंस यानी एफएंडओ कारोबार पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स में बढ़ोतरी की गई थी। इस कारण पूंजीगत लाभ कर और प्रतिभूति लेनदेन कर से जुड़े मुद्दे बाजार की चर्चाओं में बने हुए हैं।

    उद्योग संगठनों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने कई बार यह दलील दी है कि भारत की पूंजीगत लाभ कर व्यवस्था घरेलू शेयर बाजारों की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर सकती है और निवेश के प्रवाह पर असर डाल सकती है। इसी बीच, इस वर्ष विदेशी निवेशक लंबे समय तक भारतीय इक्विटी बाजारों में शुद्ध बिकवाल बने रहे हैं। इन परिस्थितियों में कर व्यवस्था से जुड़े संभावित बदलावों पर निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है।

    वित्त मंत्री की टिप्पणियों के बाद मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में तेजी दर्ज की गई। कारोबार के अंत में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त के साथ बंद हुए। हालांकि, एलटीसीजी टैक्स में बदलाव को लेकर सरकार की ओर से अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। आगामी बजट प्रक्रिया के दौरान इस विषय पर मिलने वाले सुझावों और सरकार के रुख पर नजर रहेगी।

  • जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक की तारीख बदली, अब 8 अक्टूबर को होगी बैठक; अनुपालन और टैक्स सुधारों पर चर्चा की उम्मीद

    जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक की तारीख बदली, अब 8 अक्टूबर को होगी बैठक; अनुपालन और टैक्स सुधारों पर चर्चा की उम्मीद

    नई दिल्ली ।जीएसटी परिषद की प्रस्तावित 57वीं बैठक की तारीख में बदलाव किया गया है। पहले यह बैठक 7 अक्टूबर को होने वाली थी, लेकिन अब इसे एक दिन आगे बढ़ाकर 8 अक्टूबर को आयोजित किया जाएगा। जीएसटी परिषद सचिवालय ने एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर बैठक की तारीख बदले जाने की जानकारी दी है। ज्ञापन के अनुसार, अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण बैठक को पुनर्निर्धारित किया गया है। बैठक की अध्यक्षता वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण करेंगी और इसमें केंद्र तथा राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

    बैठक में कारोबारियों और करदाताओं के लिए जीएसटी अनुपालन को आसान बनाने के उद्देश्य से कई प्रक्रिया संबंधी सुधारों पर चर्चा होने की उम्मीद है। परिषद पंजीकरण, रिटर्न और रिफंड की मौजूदा प्रक्रियाओं में बदलाव से जुड़े प्रस्तावों पर विचार कर सकती है। इसके साथ ही जीएसटी विवादों के समाधान को सरल बनाने और इनपुट टैक्स क्रेडिट के प्रवाह को बेहतर करने से संबंधित सुधारों पर भी चर्चा हो सकती है। इन प्रस्तावों का उद्देश्य कर अनुपालन में लगने वाले समय और लागत को कम करना है।

    इन सुधारों को जीएसटी परिषद की कानून समिति की व्यापक सिफारिशों से भी जोड़ा गया है। समिति ने जीएसटी कानूनों को सरल बनाने के विभिन्न उपायों की समीक्षा की है। इसके अलावा जानबूझकर कर चोरी करने और अनजाने में कर का भुगतान नहीं कर पाने वाले मामलों के बीच अंतर करने के तरीकों पर भी विचार किया गया है। परिषद की बैठक में इन सिफारिशों से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा होने की संभावना है।

    मौजूदा जीएसटी व्यवस्था के तहत केंद्रीय जीएसटी अधिनियम की धारा 69 में गिरफ्तारी से संबंधित प्रावधान हैं। इसके तहत आयुक्त किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का आदेश दे सकते हैं, यदि उन्हें यह विश्वास करने का कारण हो कि संबंधित व्यक्ति ने धारा 132 में निर्दिष्ट अपराध किए हैं। इन अपराधों में कर चोरी और फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े कुछ मामले भी शामिल हैं। जीएसटी व्यवस्था में प्रक्रिया संबंधी बदलावों के साथ इन प्रावधानों से जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा हो सकती है।

    परिषद कारोबारियों के लिए अनुपालन को आसान बनाने के उपायों पर भी विचार कर सकती है। इसमें ई-कॉमर्स के माध्यम से आपूर्ति करने वाले कारोबारी भी शामिल हैं। पंजीकरण, रिटर्न दाखिल करने, रिफंड प्राप्त करने और इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल बनाने का उद्देश्य कारोबारियों के लिए कर संबंधी औपचारिकताओं को आसान करना है।

    इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा था कि जीएसटी सुधारों का अगला चरण अनुपालन को आसान बनाने और रिफंड प्रक्रिया में सुधार करने पर केंद्रित होगा। उनके अनुसार, इन सुधारों से कारोबारियों का निवेश करने और अपने कारोबार का विस्तार करने का भरोसा बढ़ेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा है कि जीएसटी सुधारों के अगले चरण में पंजीकरण, रिटर्न, रिफंड, विवाद समाधान और इनपुट टैक्स क्रेडिट की प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर ध्यान दिया जाएगा।

    जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक मूल रूप से 12 सितंबर को आयोजित होनी थी। हालांकि, 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में भारत की मेजबानी में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के कारण बैठक को 7 अक्टूबर तक टाल दिया गया था। अब तारीख में दूसरी बार बदलाव किया गया है और बैठक 8 अक्टूबर को होगी। बैठक में प्रस्तावित कर सुधारों और अनुपालन से जुड़े उपायों पर आगे की दिशा तय किए जाने की उम्मीद है।

  • GST कानून में बड़ा बदलाव संभव, टैक्स अधिकारियों की गिरफ्तारी शक्ति हटाने पर 7 अक्टूबर को परिषद में चर्चा

    GST कानून में बड़ा बदलाव संभव, टैक्स अधिकारियों की गिरफ्तारी शक्ति हटाने पर 7 अक्टूबर को परिषद में चर्चा

    नई दिल्ली : GST कानून लागू होने के करीब नौ साल बाद सरकार टैक्स व्यवस्था में एक बड़े बदलाव पर विचार कर रही है। प्रस्ताव के तहत GST अधिकारियों को मिली सीधे गिरफ्तारी करने की शक्ति हटाई जा सकती है। इस मुद्दे पर 7 अक्टूबर को होने वाली GST काउंसिल की बैठक में चर्चा होने की संभावना है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो GST से जुड़े मामलों में टैक्स अधिकारी मौजूदा व्यवस्था के तहत सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकेंगे। इसके लिए GST कानून में संशोधन करना होगा और सरकार इसे आगामी शीतकालीन सत्र में संसद के सामने ला सकती है।

    GST कानून 2016 में संविधान के 101वें संशोधन के साथ अस्तित्व में आया था और 2017 में इसे लागू किया गया। मौजूदा कानून के तहत गंभीर टैक्स अपराधों में गिरफ्तारी का प्रावधान है। इनमें फर्जी बिल बनाना, गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल करना और जानबूझकर टैक्स चोरी जैसे मामले शामिल हैं। CGST Act की धारा 69 के तहत कमिश्नर को गिरफ्तारी की मंजूरी देने का अधिकार है। इसके लिए संबंधित अधिकारी के पास यह मानने का पर्याप्त आधार होना जरूरी है कि व्यक्ति ने गंभीर GST अपराध किया है।

    सरकार ने वर्ष 2022 में गिरफ्तारी और जमानत को लेकर अधिकारियों के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए थे। इनमें कहा गया था कि केवल कानून में गिरफ्तारी की अनुमति होने के आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। कार्रवाई से पहले मामले की गंभीरता, संबंधित व्यक्ति की भूमिका और अन्य पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अब प्रस्तावित बदलाव को लेकर चर्चा का एक प्रमुख कारण टैक्स अधिकारियों के अधिकारों के गलत इस्तेमाल से जुड़ी शिकायतें बताई जा रही हैं।

    पिछले करीब आठ से नौ महीनों से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा चलने की बात कही गई है। कारोबारियों और कंपनियों की ओर से GST जांच और गिरफ्तारी को लेकर चिंता जताई जाती रही है। विशेष रूप से कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ्तारी को लेकर उद्योग जगत में सवाल उठते रहे हैं। सरकार ऐसा बदलाव चाहती है जिससे गंभीर धोखाधड़ी के मामलों में कार्रवाई जारी रहे, लेकिन कारोबारियों के बीच अनावश्यक डर की स्थिति न बने।

    GST कानून के तहत गिरफ्तारी के इस्तेमाल के आंकड़े भी सामने आए हैं। वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच GST अपराधों के 72,393 मामले दर्ज हुए और केंद्रीय GST अधिकारियों ने 887 लोगों को गिरफ्तार किया। यह आंकड़ा केवल केंद्रीय GST फॉर्मेशन से संबंधित है। इसमें राज्य GST अधिकारियों की ओर से की गई गिरफ्तारियां शामिल नहीं हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में गंभीर धोखाधड़ी और जानबूझकर किए गए अपराधों पर कार्रवाई जारी रखने की बात है, लेकिन GST अधिकारी स्वयं गिरफ्तारी की शक्ति का इस्तेमाल नहीं करेंगे। ऐसे मामलों में आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई का रास्ता अपनाया जा सकता है। गंभीर और जानबूझकर किए गए फ्रॉड के मामलों में भारतीय न्याय संहिता के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

    अब 7 अक्टूबर की GST काउंसिल बैठक पर नजर है। बैठक में गिरफ्तारी की शक्ति हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो GST कानून में संशोधन की आवश्यकता होगी और सरकार इसे संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पेश कर सकती है। फिलहाल GST अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्ति समाप्त नहीं हुई है। यह अभी प्रस्ताव के स्तर पर है और अंतिम स्थिति GST काउंसिल की चर्चा, सरकार के फैसले तथा आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होगी।

  • Shiprocket IPO से पहले सामने आए कानूनी विवाद, कंपनी पर चार आपराधिक मामले और 5.39 करोड़ रुपये की दावा राशि लंबित

    Shiprocket IPO से पहले सामने आए कानूनी विवाद, कंपनी पर चार आपराधिक मामले और 5.39 करोड़ रुपये की दावा राशि लंबित


    नई दिल्ली । ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स और शिपिंग प्लेटफॉर्म शिपरॉकेट शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रही है। कंपनी के प्रस्तावित आईपीओ से पहले सामने आए मसौदा दस्तावेज में कई कानूनी, कर और परिचालन जोखिमों का उल्लेख किया गया है। इनमें कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों से जुड़े लंबित मामले भी शामिल हैं, जिनका संभावित असर कारोबार और वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है।

    दस्तावेज के अनुसार, शिपरॉकेट के खिलाफ चार आपराधिक मामले लंबित हैं। इन मामलों में कुल दावा राशि 5.39 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके अलावा कंपनी के खिलाफ दो अन्य आपराधिक कार्यवाहियां और सात कर विवाद भी चल रहे हैं। सहयोगी कंपनियों के स्तर पर भी एक आपराधिक मामला और तीन कर संबंधी मामले लंबित हैं, जिनमें कुल दावा राशि 2.34 करोड़ रुपये बताई गई है।

    कंपनी के सामने मौजूद मामलों में वर्ष 2022 का एक प्रमुख मामला भी शामिल है। इसमें शिपरॉकेट के सह-संस्थापक साहिल गोयल और गौतम कपूर, निदेशक अर्जुन सेठी तथा मुख्य वित्तीय अधिकारी कुमार तनमय को नामजद किया गया है। मामले में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं। यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

    वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो शिपरॉकेट अभी लाभ में नहीं आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का शुद्ध घाटा 79.2 करोड़ रुपये रहा। इससे पिछले वित्त वर्ष में घाटा 74.4 करोड़ रुपये था। हालांकि वित्त वर्ष 2023-24 में दर्ज 595.1 करोड़ रुपये के घाटे की तुलना में कंपनी की वित्तीय स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

    राजस्व के मोर्चे पर कंपनी ने लगातार वृद्धि दर्ज की है। वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन से प्राप्त आय 24 प्रतिशत बढ़कर 2024.1 करोड़ रुपये हो गई। राजस्व में यह वृद्धि कंपनी के कारोबार के विस्तार का संकेत देती है, लेकिन बढ़ती आय के बावजूद लाभप्रदता हासिल करना अभी भी प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

    कंपनी के अनुसार, व्यापारियों का आधार बढ़ाने, नए उत्पाद विकसित करने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमताओं में निवेश करने और नए कारोबारी क्षेत्रों का विस्तार करने पर खर्च निकट भविष्य में मुनाफे पर दबाव बनाए रख सकता है। ऐसे निवेश कंपनी की दीर्घकालिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके कारण तत्काल लाभ में सुधार सीमित रह सकता है।

    शिपरॉकेट की एक अन्य महत्वपूर्ण निर्भरता तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाताओं पर है। वित्त वर्ष 2025-26 में मर्चेंट सॉल्यूशन लागत कंपनी के कुल खर्च का लगभग 69.4 प्रतिशत रही। इस खर्च में शीर्ष 10 विक्रेताओं की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक थी। इससे कुछ प्रमुख सेवा प्रदाताओं पर कंपनी की निर्भरता का जोखिम सामने आता है।

    कंपनी ने यह भी बताया है कि उसके अधिकांश लॉजिस्टिक्स साझेदारों के साथ विशेष समझौते नहीं हैं। ऐसी स्थिति में किसी साझेदार के साथ कारोबारी संबंध प्रभावित होने पर सेवा व्यवस्था, लागत और परिचालन क्षमता पर असर पड़ सकता है। बढ़ती परिचालन लागत और प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्मों द्वारा बेहतर शर्तें दिए जाने की स्थिति भी कंपनी के लिए चुनौती बन सकती है।

    ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में शिपरॉकेट को मार्केटप्लेस, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और तकनीकी एग्रीगेटर्स से प्रतिस्पर्धा मिलती है। कंपनी घरेलू बाजार के साथ क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स कारोबार का विस्तार करना चाहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर अधिक हैं, लेकिन वहां नियामकीय आवश्यकताओं, लागत, संचालन और प्रतिस्पर्धा से जुड़े अतिरिक्त जोखिम भी मौजूद हैं।

    ऐसे में प्रस्तावित आईपीओ से पहले निवेशकों के लिए कंपनी की बढ़ती आय के साथ उसके घाटे, लंबित कानूनी मामलों, सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता और विस्तार संबंधी खर्चों को समझना महत्वपूर्ण होगा। कंपनी की आगे की रणनीति का मुख्य लक्ष्य कारोबार बढ़ाने के साथ लाभप्रदता और परिचालन स्थिरता हासिल करना रहेगा।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात 9.17 अरब डॉलर पहुंचा, अमेरिका सहित प्रमुख बाजारों से मिला सहारा

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात 9.17 अरब डॉलर पहुंचा, अमेरिका सहित प्रमुख बाजारों से मिला सहारा

    नई दिल्ली ।वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद भारत के रत्न एवं आभूषण उद्योग ने चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में बेहतर प्रदर्शन किया है। अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान देश का कुल रत्न एवं आभूषण निर्यात 2.44 प्रतिशत बढ़कर 9.17 अरब डॉलर पर पहुंच गया। भारतीय मुद्रा में यह निर्यात 13.58 प्रतिशत बढ़कर 87,078.01 करोड़ रुपये रहा।

    निर्यात क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय वृद्धि वैल्यू-एडेड आभूषणों की श्रेणी में दर्ज की गई। जड़े हुए सोने के आभूषणों का निर्यात अप्रैल-जुलाई अवधि में 21.09 प्रतिशत बढ़कर 2.24 अरब डॉलर हो गया। वहीं चांदी के आभूषणों ने और मजबूत प्रदर्शन करते हुए 72.19 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और इनका निर्यात 508.18 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

    प्लैटिनम आभूषणों के निर्यात में भी सकारात्मक वृद्धि देखने को मिली। इस श्रेणी का निर्यात 17.20 प्रतिशत बढ़कर 77.82 मिलियन डॉलर रहा। इसी अवधि में पॉलिश्ड लैब-ग्रोन डायमंड्स का निर्यात 7.47 प्रतिशत बढ़कर 408.50 मिलियन डॉलर हो गया। साधारण और जड़े हुए आभूषणों को मिलाकर कुल सोने के आभूषणों का निर्यात 5.87 प्रतिशत बढ़कर 4.03 अरब डॉलर रहा।

    उद्योग के प्रदर्शन को अमेरिका, सिंगापुर, हांगकांग और ब्रिटेन जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाली मांग का भी समर्थन मिला। इन बाजारों में भारतीय आभूषणों और खासकर वैल्यू-एडेड उत्पादों की मांग बढ़ने से निर्यातकों को लाभ हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां बदलते वैश्विक बाजार में उत्पादों के मूल्यवर्धन के जरिए अपनी स्थिति मजबूत कर रही हैं।

    हालांकि, सभी उत्पाद श्रेणियों में वृद्धि नहीं रही। कट एंड पॉलिश्ड डायमंड्स का निर्यात 8 प्रतिशत घटकर 3.60 अरब डॉलर रह गया। साधारण सोने के आभूषणों के निर्यात में भी 8.46 प्रतिशत की कमी आई और यह 1.80 अरब डॉलर रहा। वैश्विक उपभोक्ता मांग में बदलाव और कुछ प्रमुख बाजारों में आर्थिक दबाव को इस गिरावट से जोड़कर देखा जा रहा है।

    रत्न एवं आभूषण क्षेत्र के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में वैल्यू-एडेड उत्पाद उद्योग के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनकर उभरे हैं। क्षेत्र के नेतृत्व का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में हालिया नरमी प्रमुख उपभोक्ता बाजारों में मांग को बढ़ावा दे सकती है।

    उद्योग के लिए आईआईजेएस भारत प्रीमियर 2026 प्रदर्शनी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें 61,000 से अधिक आगंतुक पहुंचे, जबकि 80 देशों से 5,000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय खरीदार और प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रदर्शनी के दौरान हुए कारोबारी समझौतों के आगामी महीनों में वास्तविक निर्यात ऑर्डर में बदलने की उम्मीद है।

    इस बीच टैक्सेशन एंड अदर लॉज (संशोधन) विधेयक, 2026 को भी उद्योग के लिए अहम कदम माना जा रहा है। विशेष अधिसूचित क्षेत्रों के माध्यम से रफ डायमंड कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों को 15 वर्ष की आयकर छूट मिलने का प्रावधान भारत को वैश्विक हीरा व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने में मदद कर सकता है। इससे देश की भूमिका केवल हीरा प्रसंस्करण तक सीमित न रहकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में मजबूत होने की संभावना है।

    कुल मिलाकर, शुरुआती चार महीनों के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक दबाव के बीच भारतीय रत्न एवं आभूषण उद्योग ने निर्यात में सकारात्मक वृद्धि बनाए रखी है। हालांकि डायमंड और साधारण सोने के आभूषणों में गिरावट के कारण चुनौतियां कायम हैं, लेकिन वैल्यू-एडेड उत्पादों और प्रमुख विदेशी बाजारों से मिली मांग ने कुल निर्यात को बढ़त में बनाए रखा है।

  • संसद के मानसून सत्र में कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी, निवेश, न्याय व्यवस्था और एमएसएमई सुधार पर सरकार का विशेष फोकस

    संसद के मानसून सत्र में कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी, निवेश, न्याय व्यवस्था और एमएसएमई सुधार पर सरकार का विशेष फोकस

    नई दिल्ली । संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होने जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार व्यापक विधायी एजेंडे के साथ सदन में प्रवेश करेगी। इस सत्र के दौरान सरकार पांच नए विधेयक पेश करने की तैयारी में है। इन प्रस्तावित विधेयकों का उद्देश्य कर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना, न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करना, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाना तथा राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानूनों को और सख्त करना है। सरकार का मानना है कि इन विधेयकों से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक सुधारों को गति मिलेगी।

    सरकार आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 को सदन में प्रस्तुत करेगी, जिसके माध्यम से पहले जारी अध्यादेश का स्थान लेने वाला स्थायी कानून बनाया जाएगा। इस प्रस्ताव का उद्देश्य विदेशी निवेश को आकर्षित करना, सरकारी ऋण बाजार को अधिक मजबूत बनाना तथा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय बाजार में स्थिरता और तरलता बनाए रखना है। सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने और भारतीय अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध कराने में सहायक होगी।

    मानसून सत्र में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 भी पेश किया जाएगा। इस विधेयक के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का तर्क है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों के निस्तारण की गति तेज होगी और न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते कार्यभार को कम करने में मदद मिलेगी।

    सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से एमएसएमई क्षेत्र में कारोबार को और सरल बनाने का प्रयास किया जाएगा। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य भरोसे पर आधारित नियामकीय व्यवस्था विकसित करना, भुगतान में देरी से जुड़े विवादों के समाधान की प्रक्रिया को मजबूत करना तथा राज्यों को अधिक प्रशासनिक अधिकार प्रदान करना है। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और निवेश के लिए बेहतर वातावरण तैयार होगा।

    जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए विलंबित पंजीकरण से जुड़े नियमों को अधिक प्रभावी और व्यवस्थित बनाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध होने वाले कृत्यों पर अधिक कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किए जाने की योजना है। सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य कानूनों को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक प्रभावी बनाना है।

    इन नए विधेयकों के अलावा सरकार संसद में पहले से लंबित कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी चर्चा आगे बढ़ाने का प्रयास करेगी। साथ ही अनुपूरक अनुदानों की मांग पर भी दोनों सदनों में विचार और मतदान कराया जाएगा। 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक बहस होने की संभावना है। सत्र शुरू होने से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक और विपक्षी दलों की रणनीतिक बैठकों के बाद संसद की कार्यवाही राजनीतिक और विधायी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है।

  • मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    नई दिल्ली । मई माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है, जो अर्थव्यवस्था में मांग और कर अनुपालन की मजबूती को दर्शाती है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के बावजूद भारत का सकल जीएसटी संग्रह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के स्तर के करीब पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब कई वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।
    आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 1,94,184 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 1,88,172 करोड़ रुपये की तुलना में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वहीं शुद्ध जीएसटी राजस्व 1,66,904 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जिसमें 3.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हुई है। रिफंड को समायोजित करने के बाद राजस्व वृद्धि लगभग 9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो कर संग्रह प्रणाली की मजबूती का संकेत है।

    महीने के दौरान रिफंड की राशि भी बढ़कर 27,281 करोड़ रुपये रही, हालांकि इसके बावजूद कुल राजस्व में सकारात्मक रुझान देखने को मिला। घरेलू कर संग्रह में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन आयात से प्राप्त कर राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि ने कुल आंकड़ों को संतुलित बनाए रखा। आयात आधारित जीएसटी संग्रह 19.1 प्रतिशत बढ़कर 59,654 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो वैश्विक व्यापार गतिविधियों में मजबूती और आयात मांग में सुधार का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति घरेलू खपत और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतरता को दर्शाती है।

    वहीं दूसरी ओर घरेलू जीएसटी संग्रह 1,34,530 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 2.6 प्रतिशत की कमी देखी गई, लेकिन सेवा क्षेत्र और वस्तु श्रेणियों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सेवा क्षेत्र में 22.2 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि और वस्तु श्रेणियों में सकारात्मक रुझान यह दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत आधारित विकास मॉडल मजबूत स्थिति में है। सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों की व्यापकता को दर्शाता है।

    राज्यों के स्तर पर भी जीएसटी संग्रह में विविध प्रदर्शन देखने को मिला। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, तेलंगाना और हरियाणा जैसे राज्यों में कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से केरल और हरियाणा जैसे राज्यों ने दोहरे अंकों में वृद्धि के साथ बेहतर प्रदर्शन किया है। यह संकेत देता है कि राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं में भी गतिविधियां तेज हो रही हैं और कर आधार का विस्तार हो रहा है।

    वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में कुल सकल जीएसटी संग्रह 4.37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक है। इसी अवधि में शुद्ध राजस्व में भी 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल माह में भी रिकॉर्ड संग्रह देखने को मिला था, जो यह दर्शाता है कि लगातार दो महीनों से राजस्व वृद्धि का रुझान मजबूत बना हुआ है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रदर्शन वित्त वर्ष के निर्धारित कर लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित होगा और देश की आर्थिक स्थिरता को और मजबूत करेगा।