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  • बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत

    बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत


    नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती और उपभोग में बढ़ोतरी का असर अब सरकार के राजस्व पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जुलाई 2026 में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संग्रह 15.4 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी के साथ 2.11 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया। यह पिछले 14 महीनों की सबसे तेज वृद्धि है और चालू वित्त वर्ष 2026-27 में दूसरी बार ऐसा हुआ है जब मासिक जीएसटी कलेक्शन दो लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार करने में सफल रहा है। यह आंकड़ा देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों मजबूत खपत और बेहतर टैक्स अनुपालन का संकेत माना जा रहा है।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई के दौरान घरेलू जीएसटी राजस्व 10.1 प्रतिशत बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपए हो गया जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.31 लाख करोड़ रुपए था। वहीं आयात पर मिलने वाले जीएसटी राजस्व में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई और इसमें 28.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आयात से प्राप्त जीएसटी संग्रह बढ़कर 66 हजार 511 करोड़ रुपए पहुंच गया। घरेलू और आयात दोनों स्रोतों से मजबूत राजस्व मिलने के कारण कुल सकल जीएसटी संग्रह 2.11 लाख करोड़ रुपए के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया।

    सरकार ने बताया कि जुलाई के दौरान जीएसटी रिफंड में भी वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में रिफंड 13.1 प्रतिशत बढ़कर 29 हजार 968 करोड़ रुपए रहा। रिफंड समायोजित करने के बाद सरकार का शुद्ध जीएसटी राजस्व 1.81 लाख करोड़ रुपए रहा जो पिछले वर्ष की तुलना में 15.8 प्रतिशत अधिक है। घरेलू शुद्ध राजस्व 10.5 प्रतिशत बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि सीमा शुल्क से प्राप्त शुद्ध जीएसटी राजस्व में 30.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई और यह 54 हजार 223 करोड़ रुपए हो गया।

    चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों अप्रैल से जुलाई के दौरान भी सरकार का कर संग्रह लगातार मजबूत बना हुआ है। इस अवधि में कुल सकल जीएसटी संग्रह 10.1 प्रतिशत बढ़कर 8.43 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 7.66 लाख करोड़ रुपए था। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार लगातार बनी हुई है और कर संग्रह में भी इसका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।

    इससे पहले जून 2026 में भी जीएसटी संग्रह 13.9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.94 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया था। उस समय भी आयात से मिलने वाले राजस्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लगातार दो महीनों से मजबूत कर संग्रह यह संकेत देता है कि देश में उत्पादन व्यापार और उपभोग की गतिविधियां गति पकड़ रही हैं।

    एसबीआई रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि जीएसटी संग्रह और बेसिक एक्साइज ड्यूटी में राज्यों की हिस्सेदारी को एक साथ देखा जाए तो वित्त वर्ष 2026-27 में राज्यों को पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.43 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि आने वाले महीनों में जीएसटी संग्रह और मजबूत हो सकता है तथा पूरे वित्त वर्ष के दौरान इसमें 8 से 9 प्रतिशत की वृद्धि बनी रहने की संभावना है।

    रिपोर्ट के मुताबिक हाल के महीनों में जीएसटी संग्रह की रफ्तार में जो हल्की नरमी देखने को मिली थी उसका प्रमुख कारण जीएसटी दरों का युक्तिकरण था जिसकी पहले से संभावना जताई जा रही थी। अब आर्थिक गतिविधियों में तेजी और कर संग्रह में लगातार सुधार से यह उम्मीद बढ़ गई है कि वित्त वर्ष के शेष महीनों में भी सरकार का राजस्व मजबूत रहेगा और इससे केंद्र तथा राज्यों दोनों की वित्तीय स्थिति को मजबूती मिलेगी।

  • राजकोषीय अनुशासन की राह पर केंद्र, वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में घाटा लक्ष्य के दायरे में; कर संग्रह और पूंजीगत व्यय में भी बढ़ोतरी

    राजकोषीय अनुशासन की राह पर केंद्र, वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में घाटा लक्ष्य के दायरे में; कर संग्रह और पूंजीगत व्यय में भी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों अप्रैल और मई के दौरान 1.624 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पूरे वित्त वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य का 9.6 प्रतिशत है। शुरुआती वित्तीय आंकड़े संकेत देते हैं कि सरकार राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए निर्धारित वित्तीय लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ रही है। कर संग्रह, गैर-कर राजस्व और पूंजीगत व्यय में दर्ज हुई प्रगति ने भी वित्तीय स्थिति को मजबूती प्रदान की है।

    सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए 16.96 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय किया है। शुरुआती दो महीनों के आंकड़ों को देखते हुए वित्तीय प्रबंधन संतुलित दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष की शुरुआत में नियंत्रित राजकोषीय स्थिति सरकार को आगे की आर्थिक प्राथमिकताओं पर प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर प्रदान करती है।

    मई महीने के दौरान केंद्र सरकार ने लगभग दो लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय अधिशेष दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में अधिक रहा। इससे पहले अप्रैल में सरकार के कुल व्यय की तुलना में प्राप्तियां कम रहने के कारण घाटा दर्ज हुआ था, लेकिन मई में राजस्व में सुधार से वित्तीय संतुलन मजबूत हुआ। यह संकेत देता है कि सरकारी आय के स्रोतों में निरंतर सुधार हो रहा है।

    गैर-कर राजस्व में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। मई के दौरान यह आय पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रही, जिसमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त राजस्व का योगदान रहा। इसी अवधि में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा केंद्र सरकार को अधिशेष राशि हस्तांतरित किए जाने से भी सरकारी वित्तीय स्थिति को अतिरिक्त मजबूती मिली। इससे सरकार के संसाधनों में वृद्धि हुई और वित्तीय प्रबंधन को संतुलित बनाए रखने में सहायता मिली।

    पूंजीगत व्यय के मोर्चे पर भी सरकार ने निवेश की गति बनाए रखी। अप्रैल और मई के दौरान पूंजीगत खर्च में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई। बुनियादी ढांचे, विकास परियोजनाओं और सार्वजनिक निवेश पर लगातार खर्च किए जाने से अर्थव्यवस्था में मांग को समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार लंबे समय से पूंजीगत निवेश को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार मानती रही है और शुरुआती महीनों के आंकड़े उसी दिशा में निरंतरता का संकेत देते हैं।

    कर संग्रह में भी सकारात्मक रुझान देखने को मिला। अप्रैल-मई के दौरान कुल कर राजस्व में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई। बेहतर कर संग्रह सरकार की आय बढ़ाने के साथ-साथ राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे विकास योजनाओं के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में सुविधा मिलती है।

    सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में निर्धारित राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल किया था और चालू वित्त वर्ष में इसे और कम करने का लक्ष्य रखा गया है। राजकोषीय घाटे में कमी से सरकार की उधारी पर दबाव घटता है, जिससे बैंकिंग प्रणाली में निजी क्षेत्र और उपभोक्ताओं के लिए ऋण उपलब्धता बेहतर होती है। साथ ही महंगाई को नियंत्रित रखने, निवेश बढ़ाने और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति देने में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शुरुआती वित्तीय आंकड़े संकेत देते हैं कि सरकार निर्धारित राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ रही है।