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  • TET अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का बड़ा आंदोलन: 18 जून को प्रदेशभर में सौंपेंगे ज्ञापन, 20 लाख शिक्षकों पर असर का दावा

    TET अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का बड़ा आंदोलन: 18 जून को प्रदेशभर में सौंपेंगे ज्ञापन, 20 लाख शिक्षकों पर असर का दावा


    मध्य प्रदेश। मध्यप्रदेश में टीईटी (टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट) अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद प्रदेश के शिक्षक संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर आंदोलन का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया है। मध्यप्रदेश शिक्षक संघ ने घोषणा की है कि 18 जून को प्रदेश के सभी जिलों में कलेक्टरों के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम ज्ञापन सौंपे जाएंगे।

    संघ का कहना है कि वर्ष 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय और कानूनी निश्चितता के सिद्धांतों के भी विपरीत है। संगठन के पदाधिकारियों का तर्क है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय की नियमावली और चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी, उन्हें बाद में बने मानकों के आधार पर प्रभावित करना उचित नहीं माना जा सकता।

    मध्यप्रदेश शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौर और प्रदेश महामंत्री राकेश गुप्ता के अनुसार, 29 मई 2026 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रदेश सहित देशभर के लाखों शिक्षकों में असमंजस और चिंता का माहौल है। फैसले में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण होना आवश्यक माना गया है। इसके बाद से शिक्षक संगठनों में भविष्य को लेकर आशंकाएं बढ़ गई हैं।

    संघ का कहना है कि 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने टीईटी को शिक्षक नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता घोषित किया था। इससे पहले विभिन्न राज्यों में नियुक्त हुए शिक्षकों ने उस समय लागू पात्रता और चयन प्रक्रिया के आधार पर नौकरी प्राप्त की थी। ऐसे शिक्षक पिछले डेढ़ से दो दशकों से शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं और विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास के साथ सामाजिक जागरूकता तथा राष्ट्र निर्माण में भी योगदान दे रहे हैं।

    शिक्षक संघ का मानना है कि यदि नए नियमों को पूर्व प्रभाव से लागू किया गया तो इससे हजारों नहीं, बल्कि लाखों शिक्षकों की सेवा सुरक्षा और भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो सकता है। इसी कारण संगठन केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहा है।

    संघ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वर्ष 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवाओं को वैध मानते हुए संसद के आगामी मानसून सत्र में आवश्यक विधायी संशोधन किया जाए। साथ ही एनसीटीई की 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना में भी आवश्यक बदलाव किए जाएं, ताकि पूर्व में नियुक्त शिक्षकों को राहत मिल सके। संगठन का कहना है कि न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हुए भी नीति निर्माण और कानून संशोधन का अधिकार विधायिका के पास है और व्यापक जनहित को देखते हुए सरकार को सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।

    मध्यप्रदेश शिक्षक संघ के अनुसार, इस मुद्दे से केवल प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं। संगठन का दावा है कि मध्यप्रदेश के लगभग डेढ़ लाख और देशभर के 20 लाख से अधिक शिक्षक इस निर्णय के प्रभाव क्षेत्र में आ सकते हैं। ऐसे में 18 जून को होने वाला ज्ञापन अभियान शिक्षकों की मांगों को सरकार तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

    अब सभी की नजर केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं की प्रतिक्रिया पर टिकी है, क्योंकि इस मुद्दे का सीधा संबंध लाखों शिक्षकों के रोजगार, सेवा सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

  • टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक..UGC के वो 4 नियम कौन से हैं जिनपर बवाल मचा हुआ है?

    टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक..UGC के वो 4 नियम कौन से हैं जिनपर बवाल मचा हुआ है?


    नई दिल्ली । देशभर में UGC के नए नियम को लेकर भारी विरोध देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर यूजीसी आरोलबैक तेजी से ट्रेंड करने लगा, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और इसे भेदभाव बढ़ाने वाला बताया गया। इसी बीच, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस बदलाव का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया। इस पूरे विवाद के बीच सवाल उठता है कि UGC ने कौन से नियम बनाए हैं और आखिर क्यों टीचर्स, स्टूडेंट्स और आम लोग इसमें नाराज हैं।

    UGC का नया नियम क्या है

    UGC ने 13 जनवरी 2026 को नया नियम लागू किया, जिसका नाम है उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के विनियम 2026 । इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव और असमानता को रोकना बताया गया है। नए नियम के तहत सभी विश्वविद्यालय और कॉलेजों को इक्विटी सेंटर, इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी कमेटी बनाने होंगे, साथ ही 24×7 हेल्पलाइन का प्रावधान भी होगा। अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC उनकी मान्यता रद्द कर सकता है या फंड रोक सकता है। UGC का कहना है कि पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ शिकायतों में 2020 से 2025 के बीच 100% से अधिक वृद्धि देखी गई है। इसके अलावा, रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यह नियम बनाया गया है, ताकि उच्च शिक्षा में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    क्यों मचा बवाल

    UGC के नए नियम के कुछ सेक्शन विशेष रूप से विवादित बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका PIL में कहा गया है कि Section 3C अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समाज के छात्र और शिक्षक भी नाराज हैं। बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इसे सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बनाने जैसा बताया। छात्र और शिक्षक दोनों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कार्रवाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, और सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि देशभर में इस नियम को लेकर तीव्र विरोध और बहस चल रही है।

    UGC के 4 विवादित नियम / बदलाव ,इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड का गठन

    नए नियम के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड बनाना अनिवार्य है। हालांकि, छात्रों का कहना है कि इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं है, जिससे निर्णयों में पक्षपात होने का डर है। साथ ही इक्विटी स्क्वाडको बहुत अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ‘भेदभाव’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी कार्यवाही और सीमाओं को लेकर शंका बनी हुई है।

    अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों पर ध्यान
    नए नियम का मुख्य उद्देश्य एससी, एसटी और पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव को रोकना है। हालांकि, सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक इसे एकतरफा मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस नियम के तहत सवर्ण छात्रों को ‘संभावित अपराधी’ मानकर देखा जा सकता है, जिससे वास्तव में भेदभाव बढ़ने और माहौल में तनाव पैदा होने की संभावना है।

    सख्त कार्रवाई का अधिकार
    नए नियम के तहत, अगर कोई संस्थान के नियमों का पालन नहीं करता, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है या फंड रोक दिया जा सकता है। छात्र और शिक्षक मानते हैं कि यह कदम संस्थानों पर अत्यधिक दबाव डालता है और बिना पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन के इसे लागू करना मुश्किल और जटिल होगा।
    छात्रों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया
    कई छात्र संगठन और शिक्षक संघ के नए नियम का विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जबकि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर अपना विरोध जताया। छात्रों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कोई रोक नहीं है, और सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

    UGC का पक्ष
    UGC का कहना है कि यह नियम उच्च शिक्षा में समान अवसर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। आयोग के अनुसार, बिना निगरानी और संरचना के पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव रोकना मुश्किल है। यह भी बताता है कि नियम धीरे-धीरे लागू किए जाएंगे और उद्देश्य केवल समान अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। जबकि यह कदम शिक्षा प्रणाली में समानता और सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास है, नियम के कुछ सेक्शन विवादास्पद माने जा रहे हैं।

    सवर्ण छात्रों और शिक्षकों की चिंता और भविष्य की राह

    टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक सभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नया नियम सवर्ण छात्रों और शिक्षकों के अधिकारों के खिलाफ तो नहीं जा रहा। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर हैं, जिससे तय होगा कि नियम में कोई संशोधन या बदलाव करता है या नहीं। फिलहाल, यह मामला शिक्षा जगत में सबसे बड़ा और गर्म चर्चा का विषय बन गया है, और भविष्य में इसके प्रभाव को लेकर बहस जारी रहने की संभावना है।