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  • तीस्ता जल विवाद में बड़ा भू-राजनीतिक ट्विस्ट: चीन की एंट्री से बदला पूरा समीकरण, भारत की टेंशन बढ़ी

    तीस्ता जल विवाद में बड़ा भू-राजनीतिक ट्विस्ट: चीन की एंट्री से बदला पूरा समीकरण, भारत की टेंशन बढ़ी


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में तीस्ता नदी परियोजना को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। ढाका में विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद यह चर्चा और बढ़ गई है कि भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल-बंटवारा विवाद अब नए राजनीतिक हालात में आगे बढ़ सकता है।

    बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने उम्मीद जताई है कि भारत के साथ तीस्ता समझौते पर जल्द प्रगति हो सकती है। उन्होंने कहा कि पहले यह मुद्दा भारत के अंदर राज्यों की राजनीतिक स्थिति के कारण अटका हुआ था, लेकिन अब हालात बदलने से बातचीत आगे बढ़ने की संभावना है। उनके बयान के बाद इस मुद्दे ने एक बार फिर सुर्खियां पकड़ ली हैं।

    तीस्ता नदी, जो सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है, दोनों देशों के लिए कृषि और सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। वर्षों से इसके पानी के बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है, जिससे यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है।

    इसी बीच चीन की भूमिका भी लगातार चर्चा में है। बांग्लादेश ने तीस्ता नदी पर एक बड़े जलाशय और बांध परियोजना की योजना बनाई है, जिसके लिए चीन ने वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की पेशकश की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन की एक्सिम बैंक इस परियोजना को फंड कर सकती है। इससे इस परियोजना का भू-राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।

    भारत के लिए यह मामला सिर्फ जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा के नजरिए से भी अहम है। जिस क्षेत्र में यह परियोजना प्रस्तावित है, वह भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है, जिसे “चिकन नेक” कहा जाता है। यह संकरा गलियारा भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति, खासकर चीन की भागीदारी बढ़ती है, तो यह भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा सकता है। इसी वजह से भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि तीस्ता विवाद पर भारत और बांग्लादेश के बीच बातचीत की संभावना बनी हुई है, लेकिन चीन की बढ़ती रुचि ने इस मुद्दे को केवल जल बंटवारे से आगे बढ़ाकर एक बड़े भू-राजनीतिक सवाल में बदल दिया है।

  • तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री से बढ़ी हलचल, बांग्लादेश-चीन की नजदीकी पर भारत की पैनी नजर

    तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री से बढ़ी हलचल, बांग्लादेश-चीन की नजदीकी पर भारत की पैनी नजर



    नई दिल्ली। बांग्लादेश की नई सरकार ने तीस्ता नदी प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना के लिए चीन से औपचारिक सहयोग मांगा है, जिससे दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। यह कदम भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय संतुलन पर असर डाल सकता है।

    बीजिंग में हुई अहम बैठक
    बुधवार को बीजिंग में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खालिलुर रहमान और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई बैठक में तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट (TRCMRP) पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग, इंफ्रास्ट्रक्चर और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई।

    चीन ने जताई निवेश में रुचि
    चीन ने कहा कि वह बांग्लादेश की विकास योजनाओं को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के साथ जोड़ने को तैयार है। साथ ही चीनी कंपनियों को बांग्लादेश में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने की बात भी कही गई।चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि उसका सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और न ही इसे किसी अन्य देश से प्रभावित होना चाहिए।

    तीस्ता नदी क्यों है अहम?
    तीस्ता नदी सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहां लाखों लोगों की सिंचाई और जीवन का मुख्य आधार है। इसी कारण यह परियोजना भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है, खासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए।

    भारत की रणनीतिक चिंता
    भारत ने हाल के वर्षों में बांग्लादेश के साथ जल प्रबंधन सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है और 2024 में तीस्ता बेसिन के लिए तकनीकी सहायता का प्रस्ताव भी दिया था। चीन की बढ़ती मौजूदगी से क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    ढाका की कूटनीतिक संतुलन नीति
    नई बांग्लादेश सरकार चीन के साथ संबंध मजबूत कर रही है, जबकि साथ ही भारत के साथ भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रही है। इससे ढाका एक बहु-ध्रुवीय कूटनीतिक रणनीति अपनाता दिख रहा है।

    चीन-बांग्लादेश आर्थिक साझेदारी
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन अब बांग्लादेश का चौथा सबसे बड़ा कर्जदाता बन चुका है और 1975 से अब तक करीब 7.5 अरब डॉलर का निवेश और ऋण दे चुका है।

    तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को और जटिल बना दिया है। जहां बांग्लादेश विकास और निवेश के नए रास्ते तलाश रहा है, वहीं भारत अपनी रणनीतिक सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सतर्क नजर बनाए हुए है।